मंगलवार, 29 जून 2010

लड़का-लड़की एक समान

आपात्काल के समय भारत में इंदिरा गांधी और संजय की तूती बोलती थी। इंदिरा गांधी के बीस और संजय के चार, अर्थात 24 सूत्रों के कारण लोग चौबीसों घंटे मुंह बंद रखने को मजबूर थे। जबरन नसबन्दी के उस दौर में ‘लड़का हो या लड़की, बच्चे सिर्फ दो’ तथा ‘दो बच्चों का लक्ष्य महान, लड़का-लड़की एक समान’ जैसे नारे हर दीवार पर लिखे मिलते थे। इनका अर्थ उस समय तो समझ में नहीं आता था; पर ‘लड़का-लड़की एक समान’ वाली बात अब जरूर पूरी होती दिखाई दे रही है।

बचपन में जब कभी सड़क से कोई ऐसी कार निकलती, जिसे कोई महिला चला रही हो, तो हम बच्चे आश्चर्य से कहते - देखो, देखो; लड़की कार चला रही है। ऐसा ही आश्चर्य उन्हें स्कूटर चलाते देखकर होता था; पर अब तो हर चौथे वाहन को चलाने वाली महिलाएं ही होती हैं। टैक्सी और बस से लेकर, रेल और वायुयान तक वे चला रही हैं। इससे लड़का-लड़की की समानता पर संदेह नहीं रह जाता।

पहले लड़के प्रायः विज्ञान और लड़कियां इतिहास, गृह विज्ञान, चित्रकला आदि लेती थीं; पर अब यह भेद नहीं रहा। लड़कियां पुलिस और सेना में जा रही हैं, तो लड़के भी होटल मैनेजमेंट के नाम पर खाना पका और खिलाकर झूठे बर्तन साफ कर रहे हैं। पहले लड़के फुटब१ल, ह१की, व१लीब१ल आदि खेलते थे और लड़कियां रस्सीकूद या गिट्टू; पर अब सब दूरदर्शन और कम्प्यूटर पर क्रिकेट देखकर ही फिदा हैं।

पहले छोटे लड़के निक्कर और बड़े पैंट पहनते थे। छोटी लड़कियां फ्राक या स्कर्ट तथा बड़ी सलवार कमीज पहनती थीं; पर अब जीन्स ने यह भेद मिटा दिया है। इतना ही नहीं, लड़का हो या लड़की, घर और घर के आसपास सब बरमूडा पहने दिखते हैं। वह निक्कर है या पैंट, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। लड़कियां बाजार और क१लिज में भी बड़ी शान से निक्कर पहन कर आ जाती हैं; पर लड़के यहां कुछ पिछड़ गये हैं। जीन्स को अधिकतम नीचे पहनने की भी प्रतियोगिता सी चली है। कई बार एक हाथ मोबाइल और दूसरा कमर पर जीन्स के साथ होता है। हाथों का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या होगा; सचमुच भगवान ने सोच समझ कर ही दो हाथ दिये हैं। दुपट्टा तो इतिहास की चीज हो गया है; पर साड़ी अभी अस्तित्व बचाये है।

नाक-कान के आभूषण भी पहले नारी वर्ग के शृंगार थे; पर अब लड़के यहां भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। वे कान के साथ ही होंठ और भौंहें छिदवा रहे हैं, तो लड़कियां नाभि में मोती टंकवा रही हैं। चूड़ियां, बिछुवे, पायल और सिंदूर से सजे लड़के मैंने अभी नहीं देखे; पर फैशन युग में वह दिन भी आ ही जाएगा।

लड़का-लड़की एक समान का मामला यहीं समाप्त नहीं होता। पहले महिलाएं धूम्रपान नहीं करती थीं। गांव में वे भले ही कभी हुक्का गुड़गुड़ा लेती हों, या खेत में मेहनत मजदूरी कर बीड़ी पी लेती हों; पर अब तो लड़का हो या लड़की, सब खुलेआम धुआं उड़ाते मिलते हैं। घर में मौका न मिले, तो बाहर सही। शहरों में इसकी अच्छी सुविधा है। राजीव नगर वाले सोनिया विहार में जाकर सिगरेट पी लें, तो कौन देखता है ?

शराब के क्षेत्र मे भी लड़कियां तेजी से समानता की ओर बढ़ रही हैं। शादी-विवाह में दो-चार घूंट लगा लेना और बात है; पर शराब की दुकान पर ही बोतल खोलकर गटगट करने का दृश्य सचमुच बड़ा वीभत्स लगता है। कल जब एक युवती शराब के नशे में अस्त-व्यस्त सी एक नाले में पड़ी दिखाई दी, तो मैं समझ गया कि हमारे दूरदर्शी नेताओं और समाजसेवियों का ‘लड़का-लड़की एक समान’ वाला सपना अब शीघ्र ही पूरा होने को है।

पर इनमें से किस समानता पर गर्व करूं और किस पर शर्म, यह निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूं। यदि संभव हो, तो आप ही कुछ सहायता करें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. bat to sahi hai par yaha har vayakti par nirbhar hai ki vaha aapane swatantraya ka sada upiyog karta hai ki dur upiyog

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  2. मेरे विचार से दूसरों की बराबरी करने की बजाय अपने अस्तित्व को इस काबिल बनाना चाहिए कोई आपकी बराबरी करे ।......पवन शर्मा

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