गुरुवार, 22 जुलाई 2010

संन्यास या अवकाश

प्रायः समाचार पत्रों में छपता है कि इस खिलाड़ी ने संन्यास लिया। कुछ खिलाड़ी घोषित कर देते हैं कि इतने समय या इस प्रतियोगिता के बाद वे प्रतियोगिताओं में भाग देना बंद कर देंगे। कुछ खिलाड़ी अपनी बढ़ती अवस्था के कारण प्रथम श्रेणी के खेल से छुट्टी ले लेते हैं। जैसे श्रीलंका के क्रिकेट खिलाड़ी मुरलीधरन ने अभी-अभी किया है। मीडिया में इसके लिए संन्यास शब्द का प्रयोग होता है, जो नितांत गलत है।

संन्यास एक पवित्र शब्द है, जो हिन्दुओं की आश्रम परम्परा में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ के बाद चौथा और अंतिम आश्रम है। इसमें व्यक्ति अपने पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपनी आस्था के अनुसार प्रभु चरणों में ध्यान लगाता है, जिससे उसका अगला जन्म सुखमय हो सके।

इस समय वह निजी इच्छाओं, आकांक्षाओं और अर्थोपार्जन से ऊपर उठ जाता है। उसके लिए गेरुए वस्त्र पहनना या घर छोड़ देना आवश्यक नहीं है। इस समय तक उसका शरीर भी शिथिल हो जाता है। घरेलू जिम्मेदारियां बच्चे संभाल लेते हैं तथा सामाजिक कामों को संभालने के लिए वानप्रस्थियों की नयी पीढ़ी सामने आ जाती है।

लेकिन खिलाड़ी तो खेल से अवकाश लेते हैं। वे खेल अकादमी बनाकर नये खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, व्यापार या फिल्मों आदि से भरपूर पैसा कमाते रहते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है; पर उनके लिए संन्यास शब्द का प्रयोग अनुचित है। यहां अवकाश शब्द का प्रयोग होना चाहिए। 22.7.10

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