सोमवार, 26 जुलाई 2010

इस बार दादा उम्मीद से हैं

‘उम्मीद से हैं’ एक कहावत है, जिसका अर्थ घर-गृहस्थी वाले अच्छी तरह समझते हैं। घर-परिवार में किसी बहू-बेटी के उम्मीद से होने की सूचना मिलते ही सब ओर प्रसन्नता छा जाती है। महिलाएं इशारों-इशारों में पूरे मोहल्ले में यह संदेश पहुंचा देती हैं। आसपास मिठाई बांटी जाती है। घर में विशेष पूजा होती है। पूरा घर और मोहल्ला सक्रिय हो उठता है।

बुजुर्ग महिलाएं उम्मीद वाली को घरेलू दवाएं, सावधानियां और टोने-टोटके जैसे सुझाव बिन मांगे देने लगती हैं। घर वाले पहले महीने, फिर सप्ताह और दिन गिनने लगते हैं। इस दौरान हर गतिविधि का केन्द्र वह उम्मीद वाली हो जाती है और असली मेहनत करने वाले को कोई चाय तक नहीं पूछता।

लेकिन यहां हम परिवार की नहीं, देश की उम्मीदों की बात कर रहे हैं। मैडम जी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली इस सरकार में महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है, उतनी तेजी से तो बांस भी नहीं बढ़ता। इससे उन सब उम्मीदों पर पानी फिर गया है, जिनके चलते जनता ने उन्हें चुना था। दूसरी ओर जले पर नमक छिड़कते हुए ये बेरहम नेता बार-बार ऐसे वक्तव्य देते हैं कि उम्मीदों के घड़े को फोड़ लेने की इच्छा होने लगती है।

शरद पवार को ही लें। वे कृषि मंत्री हैं या क्रिकेट मंत्री, यह आक्टोपस पाल से पूछो। कोढ़ में खाज की तरह वे हर कुछ दिन बाद दूरदर्शन पर आकर बताते हैं कि अगले सप्ताह दालों के दाम घटने की उम्मीद है। मैं एक पाव टमाटर पर हाथ रखकर सच कहता हूं कि जब-जब उन्होंने ऐसा कहा, तब-तब दालों के दाम चढ़ गये। पिछले दिनों उन्होंने दूध के दामों पर टिप्पणी की। लोग समझ गये कि अब काली चाय पीने के दिन आ गये हैं।

सब्जी, फल, चीनी हो या आटा और चावल, इस महंगाई मंत्री के कारण सबमें आग लगी है। सरकार चाहे जो कहे; पर जनता को उनसे कोई उम्मीद नहीं है। बहुत से लोगों का रक्तचाप और दिल की धड़कन तो उनका चित्र देखकर ही बढ़ जाती है। उनके चेहरे से बच्चे तो डरते ही थे; पर अब आम आदमी भी मुंह फेर लेता है। कुछ लोग तो उन्हें देखते ही ‘महंगाई डायन’ वाला गीत गाने लगते हैं। कल एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि क्या पुरुष भी डायन होते हैं ? शरद पवार के कारण बात यहां तक पहुंच जाएगी, इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।

लेकिन हम भारत के लोग सदा से आशावादी हैं। पिछले साल वाणिज्य मंत्री कमलनाथ की बातों से कुछ उम्मीद जगी थी कि शायद अब महंगाई कुछ घट जाए; पर उसे भी नौ क्या दस महीने हो गये। बार-बार दिल्ली की ओर ध्यान लगाया। कई बार कान का मैल साफ किया कि शायद अब थाली बजने की आवाज आये; पर कुछ नहीं। एक बार फिर निराशा ही हाथ लगी।

शीला दीक्षित के अनुसार दिल्ली वालों के पास पैसा बढ़ा है, तो महंगाई बढ़ने में क्या बुरा है ?

ऐसी गर्मी में प्रधानमंत्री महोदय ने मन को बहुत ठंडक पहुंचाई। उन्होंने भी उम्मीद जाहिर की कि हर हाल में दो-तीन महीने में महंगाई पर काबू पा लेंगे; पर अगले ही दिन तेल और गैस के दाम बढ़ गये। उनके अनुसार यह गरीब जनता के हित में ही है। क्या वे बताएंगे कि गरीबों के हित में वे अगला कदम कब उठाएंगे ?

इस सरकार में दादा प्रणव मुखर्जी सबसे समझदार आदमी हैं। असल में सरकार तो वही चला रहे हैं; पर नाम मनमोहन सिंह और मैडम जी का होता है। मैं जन्म से ही गंभीर प्रवृत्ति का आदमी होने के कारण दादा से बहुत प्रभावित हूं। कल वे दूरदर्शन पर कह रहे थे कि इस बार अच्छे मानसून के कारण उन्हें उम्मीद है कि फसल अच्छी होगी और सर्दियों तक खाद्य पदार्थों के दाम घट जाएंगे। जब से मैंने उनका वक्तव्य सुना है, तब से मैं जेब पकड़े बैठा हूं। शरद पवार, कमलनाथ, मैडम और मनमोहन जी तो उम्मीदों की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। ले देकर प्रणव बाबू की चुप्पी का सहारा था; पर अब वे भी...।

पर फिर भी हम निराशावादी क्यों बनें ? हमें अच्छा ही सोचना चाहिए। क्योंकि इस बार और कोई नहीं, खुद दादा उम्मीद से हैं। खुदा खैर करे।

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