मंगलवार, 13 जुलाई 2010

बांटो और राज करो

शर्मा जी हर दिन की तरह आज भी बगल में अखबार दबाये चौराहे पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मेरे पहुंचते ही वे चालू हो गये।
- क्यों वर्मा जी, अंग्रेजों के बारे में तुम्हारा क्या विचार है; उनके भारत में रहने से कुछ लाभ हुआ या नहीं ?
- शर्मा जी, गुलामी को तो सबने ही खराब बताया है। इसलिए उनके रहने से तो केवल हानि ही हुई।
- पर वे बहुत से ऐसे सूत्र भी तो दे गये, जिन्हें आज तक हमारे नेता मान रहे हैं। लो यह अखबार पढ़ो। रामविलास पासवान ने नितीश कुमार पर आरोप लगाया है कि वे कई जातियों को महादलित बनाकर बिहार के दलितों को बांट रहे हैं।
- दलितों में भी महादलित.. ?
- हां, उनका कहना है कि यह सब अगली विधानसभा में वोट लेने का चक्कर है। नितीश कुमार ने उनकी पासवान बिरादरी को छोड़कर शेष सब दलितों को महादलित घोषित कर कुछ विशेष सुविधाएं दे दी हैं। इसी से पासवान दुखी हैं।
- पर वे तो इन जातियों के हितचिंतक हैं। यदि मुख्यमंत्री इन्हें लाभ पहुंचा रहे हैं, तो उनके पेट में दर्द क्यों हो रहा है ?
- तुम भी भोले भंडारी हो वर्मा। नेताओं को गरीबों से नहीं, उनके वोट से मतलब होता है। इससे पासवान जिंदाबाद बोलने वाले अब नितीश जिंदाबाद बोल रहे हैं। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पासवान की नाक कट ही चुकी है। जैसे-तैसे लालू जी के सहयोग से राज्यसभा में उनकी दाल-रोटी का जुगाड़ हुआ है। इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी यदि यही हाल रहा, तो फिर उन्हें घास कौन डालेगा ?
- पर पासवान बिरादरी तो पूरी तरह अपने नेता के साथ है।
- यहां भी एक पंेच है। नितीश ने पासवान बिरादरी को महादलित तो घोषित नहीं किया; पर उन्हें भी महादलितों वाली सब सुविधाएं दी जा रही हैं।
- यह तो अच्छा ही है शर्मा जी।
- पर यही नेता जी की परेशानी है। उनका कहना है कि इससे पासवान बिरादरी भी उनके पाले से खिसक रही है।
- तो नितीश कुमार यह चक्कर समाप्त कर दें। जब सबको एक सी सुविधा देनी है, तो दलित या महादलित का बखेड़ा क्यों ?
- यहीं तो मार खा गया हिन्दुस्तान वर्मा जी। नितीश की रुचि भी दलित उत्थान में नहीं, अपने वोट उत्थान में है। इसलिए वे उस सूत्र को अपना रहे हैं, जिसके कारण अंग्रेज यहां 200 साल राज करते रहे।
- वह क्या ?
- वह सूत्र है ‘बांटो और राज करो’। इसी के बल पर कांग्रेस भी आजादी के बाद से दिल्ली में चिपकी है। बीच में कुछ साल रही अटल जी की सरकार ने इसका पालन नहीं किया, सो वे लोग आज तक वनवास भोग रहे हैं।
- लेकिन शर्मा जी, विभाजन के इन विषसूत्रों से नेताओं को लाभ भले मिल जाए; पर जनता तो वहीं की वहीं रहेगी। सुना है वे मुसलमानों में से पसमांदा मुसलमानों को कुछ विशेष सुविधाएं देने जा रहे हैं। इन हथकंडों से यदि नितीश कुमार फिर जीत गये, तो अगली बार वे किसे बांटेंगे ?
- तब वे दलित में से महादलित की तरह अति और अत्यधिक दलित छांटेंगे। पसमांदा की तरह दुखमांदा और खुशमांदा मुसलमान ढूंढेंगे। भाजपा से उनकी अनबन कहां तक पहुंचेगी, कहना कठिन है। असल में समाजवादियों का काम ही है बांटना। पहले वे जनता को बांटते हैं, फिर सत्ता की बंदरबांट में खुद बंट जाते हैं। इसलिए हर समाजवादी की अलग दुकान है, जिसे वे पार्टी कहते हैं। बिहार में नितीश और शरद यादव की खटपट देख लो। कुछ दिन बाद इनकी भी अलग समाजवादी दुकानें होंगी।
- तो ‘बांटो और राज करो’ का सूत्र ठीक है या नहीं ?
- सत्ता को खुदा मानने वालों के लिए यह ठीक है, बाकी के लिए नहीं। इस कसौटी पर हर नेता और दल को परख सकते हो।

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