रविवार, 1 अगस्त 2010

प्रेमचंद, ऊधमसिंह और मो0रफी

31 जुलाई कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1880 में इसी दिन ग्राम लमही (वाराणसी) में कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्म हुआ था। 1940 में इसी दिन जलियांवाला बाग कांड के अपराधी माइकेल ओडवायर का वध करने वाले क्रांतिवीर ऊधमसिंह को लंदन की पेंटनविला जेल में फांसी दी गयी थी तथा 1980 में इसी दिन प्रसिद्ध गायक मो0 रफी का मुंबई में देहांत हुआ था।
लेकिन 31 जुलाई को सरकारी हो या निजी, प्रायः सभी दूरदर्शन चैनलों ने मो0 रफी को बहुत देर तक गा-बजाकर और आंसू बहाकर याद किया; पर वे प्रेमचंद और ऊधमसिंह को भूल गये। क्या यह आज के पत्रकार जगत और अफसरशाही की मानसिकता को नहीं दर्शाता, जो दिन-रात समाज के गिरते स्तर पर मगरमच्छी आंसू बहाते रहते हैं ?

इस मामले में भारतीय परम्परा को भी स्मरण करना होगा। भारत में व्यक्ति को उसके जन्मदिवस पर याद किया जाता है। मृत्यु तो उसकी महत्वपूर्ण होती है, जिसने देश, धर्म या समाज के लिए अपना जीवन बलिदान किया हो। ऐसेे व्यक्ति को उसके जन्मदिवस की बजाय पुण्यतिथि पर याद किया जाता है, जिससे उसके जीवन से नयी पीढ़ी शिक्षा ले सके।

उदाहरण के लिए गुरू तेगबहादुर, बन्दा बैरागी, हकीकत राय हों या भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद, इन्हें इनके बलिदान दिवस पर ही याद किया जाता है। क्योंकि इनके बलिदान ने देश में विदेशी हमलावरों के प्रति व्यापक चेतना जगाई थी। इसके अतिरिक्त भी देश में हजारों महामानव हुए हैं, जिन्होंने किसी भी माध्यम से देश की सेवा की और अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुए, उन्हें उनकी जन्मतिथि पर ही श्रद्धांजलि दी जाती है।

इस कसौटी पर 31 जुलाई के दूरदर्शनी कार्यक्रमों को परखें, तो समझ में आ जाता है कि युवा पीढ़ी के आदर्श देशभक्तों की बजाय क्रिकेट के दलाल और कपड़े उतारकर कमर मटकाने वाले नचैये-गवैये क्योें बने हुए हैं ?

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