रविवार, 26 सितंबर 2010

खेल के माध्यम से बढ़ता शब्दज्ञान

कहते हैं कि यदि व्यक्ति में सीखने की इच्छा हो, तो वह जीवन भर जिज्ञासु छात्र की तरह कुछ न कुछ सीखता ही रहता है। दिल्ली में होने जा रहे खेलों के बारे में पुलिस-प्रशासन वाले कई दिन से समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवा रहे हैं कि आप हमारे आंख और कान बनें। सो जागरूक लोगों और समाचार जगत ने अपने आंख और कान खोल लिये और हर काम में ‘कांग्रेस कल्चर’ के अनुरूप हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने लगे।

इन खेलों को प्रारम्भ से ही बहुत से लोग ‘गुलाममंडल खेल’ कह रहे थे; पर भ्रष्टाचार की अधिकता के चलते अब इन्हें ‘भ्रष्टमंडल खेल’ भी कहा जा रहा है। 21 सितम्बर को खेलगांव के निकट एक पुल गिर जाने के बाद अब कई विदेशी पत्र इन्हें ‘क१मनवैल्थ गेम’ के बदले ‘क१मनवैल्थ शेम’ लिख रहे हैं।

जहां तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं की बात है, अनेक बड़े खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत रूप से यहां आने से मना कर दिया है। उनका कहना है कि हमें पदक से अधिक अपनी जान प्यारी है। कई देशों ने अपने खिलाड़ियों को देर से भेजा। पिछले दिनों कुछ देशों ने तो किसी अन्य स्थान और समय पर ‘वैकल्पिक खेल’ की बात भी चला दी थी। इन खेलों को करोड़ों रु0 की रिश्वत देकर भारत में लाया गया है, यह भी कई विदेशी पत्र लिख रहे हैं। ऐसे में यदि काम करवा रहे नेता दो नंबर का अरबों रुपया कमा रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है ? आखिर उन्हें अगला चुनाव भी तो लड़ना है।

आंख और कान खुले होने के कारण इस सबसे मेरा शब्दज्ञान बहुत बढ़ रहा है। अब खेल तो होंगे ही; पर कैसे होंगे, इसका भगवान ही मालिक है। चाहे जो हो; पर सुपर प्रधानमंत्री मैडम इटली, शीला दीक्षित और सुरेश कलमाड़ी ने जैसी छीछालेदर भारत और इन खेलों की कराई है, ऐसे में इन्हें ‘विफलमंडल खेल’ भी कहा जा सकता है। इन खेलों के चक्कर में लाखों दिल्लीवासियों को उखाड़कर पूरे शहर को जैसे उजाड़ा गया है, तो इसे उखाड़मंडल या उजाड़मंडल खेल भी कह सकते हैं। कुछ मित्रों की राय इसे विनाशमंडल, सत्यानाश मंडल, सर्वनाश मंडल या बर्बाद मंडल खेल कहने के पक्ष में है।

यह तो बच्चा भी जानता है कि यदि कोई मंडल या गोले में दौड़ रहा हो, तो वह चाहे जीवन भर दौड़ता रहे, पर किसी लक्ष्य पर नहीं पहंुचेगा। यह बात इन खेलों के प्रारम्भ होने से पहले भी सत्य है और बाद में भी सत्य सिद्ध होगी।

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