गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हम कितने मूर्ख हैं ?


पाकिस्तान इस समय भीषण बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। भारत ने मानवता के नाते उसे अरबों रुपये की सहायता दी है; पर उसका दिल कितना काला है, यह इसी से पता लगता है कि उसने एक सप्ताह तक भारत से राशि नहीं ली। अब उसने इस शर्त पर इसे स्वीकार किया है कि यह पहले संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी और फिर वह इसे पाकिस्तान के राहत कार्यों में खर्च करेगा।

सचमुच हम कितने मूर्ख हैं। पाकिस्तान हमारा शत्रु देश है। वह हर समय भारत को परेशान करने का प्रयास करता है। 1947, 65, 71 और 99 में वह हमारे विरुद्ध खुला युद्ध कर चुका है। एक समय पंजाब में खालिस्तानी उभार के पीछे वही था। कश्मीर समस्या को खाद-पानी वही दे रहा है। वह हिन्दुओं को क्रमशः समाप्त कर रहा है। बाढ़ में फंसे हिन्दुओं को गोमांस खाने पर मजबूर कर रहा है। घुसपैठ का उसका नियमित कार्यक्रम जारी ही है; और हम मूर्ख उसे पैसे दे रहे हैं।

यही काम गांधी ने किया था। पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सेना भेज रहा था और गांधी महोदय उसे 55 करोड़ रु0 दिलाने के लिए अनशन पर बैठे थे। इसी से नाथूराम गोडसे विचलित हो गया और....।

वस्तुतः हमारे पास यह सुअवसर था कि हम उस पर हमला कर अपना कश्मीर वापस ले लेते। शेष पाकिस्तान के भी दो-तीन टुकड़े कर उसे सदा के लिए अपंग बना देते, जिससे वह कभी भारत की ओर आंख तिरछी करने का साहस न कर सके। कोई कह सकता है कि दुख के समय तो पड़ोसी की सहायता करना मानवता है। बात ठीक है; पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानवता का व्यवहार मानवों से किया जाता है, शत्रुओं से नहीं।

यहां महाभारत का प्रसंग याद करना उचित होगा। जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह उसे ठीक करने के लिए नीचे उतरा, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि इस दुष्ट को दंड देने का यही समय उचित है। इस पर कर्ण धर्म की दुहाई देने लगा। वह बताने लगा कि जब विपक्षी के हाथ में शस्त्र न हों, जब वह किसी संकट में फंसा हो, तब उससे युद्ध नहीं किया जाता।

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा - कर्ण, जब पांडवों को छलपूर्वक जुए में हराया गया था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब द्रोपदी को भरी सभा में निर्वसन किया जा रहा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब अभिमन्यु को कई महारथियों ने घेर कर मारा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था ? आज जब तुम स्वयं घिर गये हो, तो धर्म की दुहाई दे रहे हो।

ऐसे ही माहौल को देखकर कभी दुष्यन्त कुमार ने लिखा था -

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
वे सलीबों के करीब आये तो हमको
कायदे-कानून समझाने लगे हैं।।

श्रीकृष्ण की खरी-खरी सुनकर कर्ण क्या कहता, उसने सिर झुका लिया; और फिर अर्जुन के अगले ही बाण से उसका सिर धड़ से अलग हो गया। महाभारत का यह प्रसंग हमें बहुत कुछ सिखाता है; पर जो अपनी गलती को सुधार ले, वह मूर्ख कैसा; और हम ठहरे जन्मजात मूर्ख।

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