गुरुवार, 2 सितंबर 2010

शठे शाठ्यम समाचरेत्

ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता पाने को इतनी आतुर हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेक खो दिया है। ज्ञानेश्वरी रेल दुर्घटना के आरोपी उमाकांत महतो और उससे पूर्व आंध्र के एक कुख्यात नक्सली आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर भी वे प्रश्न उठा रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि प्रणव मुखर्जी जैसा जिम्मेदार व्यक्ति भी उनकी हां में हां मिला रहा है।

ये दोनों क्रूर नक्सली चाहे जैसे मारे गये हों; वे मुठभेड़ में मरे हों या सुरक्षा बलों ने उन्हें पकड़कर पास से गोली मारी हो, यह हर दृष्टि से उचित है। हमारे शास्त्र हमें शठे शाठ्यम समाचरेत् (जैसे को तैसा) का पाठ पढ़ाते हैं। अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार उचित है।

जो नक्सली, कम्युनिस्ट, माओवादी या मजहबी आतंकवादी निरपराध लोगों को निशाना बना रहे हैं, उन्हें मारने को हत्या नहीं, वध कहते हैं। कंस ने हजारों निरपराध ब्रजवासियों की हत्या की; पर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। रावण ने हजारों ऋषियों की हत्या की; पर श्रीराम ने उसका वध किया। हत्या सदा अनुचित है और वध सदा उचित। हत्यारे को दंड दिया जाता है, जबकि वध करने वाले को पुरस्कार; और वध के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसे सब तरीके भारतीय शास्त्रों ने उचित बताये हैं।

श्रीराम का जीवन यदि देखें, तो उन्होंने छिपकर बाली का वध किया। उन्होंने विभीषण के माध्यम से रावण के आंतरिक भेद जानकर फिर उसका वध किया। हनुमान ने अहिरावण को पाताल में जाकर मारा। क्योंकि रावण अधर्मी था; और अधर्मी को अधर्मपूर्वक मारना गलत नहीं है। महाभारत युद्ध में भी श्रीकृष्ण ने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन जैसे महारथियों को ऐसे ही छल से मरवाया; इसके बाद भी पूरा देश इन दोनों को अपराधी नहीं, भगवान मानता है।

इसलिए जिन वीर सुरक्षाकर्मियों ने आजाद, महतो या उन जैसे किसी भी आतंकी का वध किया हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। यदि शासन न करे, तो जनता उनका सम्मान करे। केवल आतंकी ही क्यों, उनके लिए साधन और समर्थक जुटाने वाले लेखक, पत्रकार, वकील, आतंकाधिकारवादी, साधुवेश आदि को भी यदि इसी तरह जहन्नुम पहुंचा दिया जाए, तो बहुत शीघ्र आतंकवाद की कमर टूट जाएगी।

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