शनिवार, 11 सितंबर 2010

ईद की मुबारकबाद ही क्यों ?


हमारे नेता और मीडिया वाले अपने भाषणों में भाषा, बोली और लिपि का संबंध भले ही किसी धर्म, पंथ या मजहब से न जोड़ंे; पर व्यवहार में वे ऐसा नहीं करते।

मुसलमानों के पर्व ईद को ही लें। इस मुबारक मौके पर बड़े-बड़े नेताओं ने मुसलमानों को मुबारकबाद दी है। सभी समाचार पत्रों ने भी मुखपृष्ठों पर यही लिखा है। कई नेताओं ने मुसलमान बहुल मोहल्ले, मस्जिद और ईदगाहों के पास अपने बैनर लगाये हैं, जिसमें यही संदेश अरबी लिपि में लिखवाया है। कई समाचार पत्रों और व्यापारी संस्थाओं ने भी ऐसी ही भाषा और लिपि का प्रयोग किया है।

यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या ईद के शुभ अवसर पर शुभकामनाएं नहीं दी जा सकतीं; इसे मुबारक मौका कहना और इसके लिए मुबारकबाद देना ही क्यों आवश्यक है ? शायद इन लोगों ने मान लिया है कि पूरे देश के मुसलमान हिन्दी या कोई भारतीय भाषा नहीं समझते, इसलिए शुभकामनाएं देने पर उन्हें बुरा लगेगा।

मेरा अनुभव तो ऐसा है मुसलमान जिस प्रान्त में रहता है, वह वहीं की भाषा और बोली बोलता है। यद्यपि राजनीतिक लाभ उठाने के लिए अपने मजहबी नेताओं का पिछलग्गू बनकर वह जनगणना आदि में अपनी भाषा उर्दू या फारसी लिखवा देता है। यदि हमारे राजनेता और समाचार जगत अपनी यह भूल सुधार लें, तो दो-चार प्रतिशत समझदार मुसलमान भी अवश्य इस पर विचार करेंगे।

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