शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

लुटियन की दिल्ली


इतिहासकार बताते हैं कि पहले भारत की राजधानी कलकत्ता थी; पर जब वहां हर दिन बम फटने लगे, तो अंग्रेजों ने राजधानी को दिल्ली लाने का निर्णय कर इसकी तैयारी जोरशोर से प्रारम्भ कर दी।

राजधानी के लिए बहुत कुछ नये सिरे से बनाना था। अतः सर एडविन लुटियन नामक एक बड़े वास्तुविद की सेवाएं ली गयीं। उसने बड़े मनोयोग से काम किया और कई वर्ष के परिश्रम के बाद नई दिल्ली बन कर तैयार हो गयी।

अंग्रेज दिल्ली को भले लोगों का शहर मानते थे; पर उद्घाटन वाले दिन ही वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंक दिया गया। यद्यपि वह मरा नहीं; पर अपशकुन तो हो ही गया। बस, तब से लेकर आज तक दिल्ली अपशकुनों की छाया में ही जी रही है।

दिल्ली में हो रहे गुलाममंडल खेलों के प्रति छात्रों में जागरूकता लाने के लिए मेरे एक अध्यापक मित्र ने अपने विद्यालय के छात्रों से ‘लुटियन की दिल्ली: तब और अब’ विषय पर निबन्ध लिखने को कहा। निबन्ध देखकर उसने सिर पीट लिया। वह स्वयं को बहुत बुद्धिमान और साहित्यिक प्राणी समझता था; पर कम्प्यूटर युग के छात्रों ने उसे अनाड़ी सिद्ध कर दिया। छात्रों ने जो श्रेष्ठ विचार प्रकट किये, उनकी बानगी देखें -

Û लुटियन की दिल्ली, नाम से ही स्पष्ट है कि यह सदा से लूटने वालों का शहर है। अंग्रेजों ने पहले कलकत्ता को लूटकर कंगाल बनाया, जब वहां कुछ नहीं बचा, तो वे दिल्ली आ गये। 1947 तक वे इसे लूटते रहे और फिर अपने प्रिय नेहरू जी को यह काम सौंपकर चले गये। आज भी उनके वंशज इसे लूट कर लुटियन के सपनों को साकार कर रहे हैं।

Û पुरानी दिल्ली को लुटियन की दिल्ली नहीं कह सकते, चूंकि उसे तो मुगल आक्रमणकारी ही लूट चुके थे। लुटियन वाली तो नई दिल्ली है। इसमें जो नेता और शासन-प्रशासन के लोग रहते हैं, वे अपने-अपने हिस्से के देश को लूट रहे हैं।

Û लुटियन का विचार था कि नई दिल्ली में रहने का अधिकारी वही है, जो लूटने में न शर्माये। हमारे गरीब जनसेवकों को ही देखो। बेचारे 50,000 रु0 वेतन और कुछ लाख रु0 भत्ते में जैसे-तैसे सूखी रोटी खा रहे हैं; पर यह भी लोगों से नहीं देखा जाता। पिछले दिनों उन्होंने कुछ शोर मचाया, तो क्या पाप कर दिया ? कितने प्रयास, परिश्रम और परिक्रमा के बाद उन्हें यह अधिकार मिलता है। यदि वे इस जन्म को सार्थक न करें, तो क्या अगले जन्म में लूटेंगे ? फिर ऋषि चार्वाक के अनुसार अगले जन्म का भरोसा भी क्या है - भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनर्जन्मम् कुतः।

Û यह लूटने वालों की नहीं, लुटने वालों की दिल्ली है। यहां आने वाला पहले लुटता ही है। मकान, दुकान, रुपया-पैसा और नौकरी से लेकर इज्जत तक यहां लुट जाती है। इससे जो डर गया, वह मर गया; पर जो हिम्मत से डटा रहता है, कुछ वर्षों में वह भी ‘लूट जोन’ का स्थायी वासी हो जाता है।

Û लुटियन की दिल्ली का अर्थ लूटने या लुटने वालों से नहीं, बल्कि लुटिया से है। यहां वही लुटिया अच्छी मानी जाती है, जो बेपेंदी की हो और मौका मिलते ही सब तरफ लुढ़क सके। जो हर रंग, रूप और आकार की पतीली से माल खींच सके, वही लुटिया सर्वश्रेष्ठ है। पिछले 63 साल से नेतागण देश की लुटिया डुबोने में लगे हैं। इस पर भी हम बचे हुए हैं। फिर भी प्रयास जारी है, देखें किसके सिर इसका ताज बंधता है ?

Û यह लुटियन नहीं, लटकन की दिल्ली है। यहां कोई काम बिना लटके पूरा नहीं होता। किसी भी कार्यालय में जाएं, हजारों काम खूंटी से लटके मिलेंगे। फिर आप लगाएं चक्कर पर चक्कर। जब तक आप गांधी जी के चित्र वाले बड़े नोट नहीं दिखाएंगे, आपका काम उस लटकन से मुक्त नहीं होगा।

मेरा मित्र आधे सिर के दर्द से दुखी रहता था। निबन्ध पढ़ने के बाद अब वह पूरा सिर लपेटे घूम रहा है। यदि आपको भी ऐसा ही लगे, तो दोष लुटियन या कलमाड़ी को दें, मुझे नहीं।

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