शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

विजयादशमी पर : शक्ति ही तो शान्ति का आधार है

शान्ति की आकांक्षा किसे नहीं होती; मानव हो या पशु, हर कोई अपने परिवार, मित्रों और समाज के बीच सुख-शांति से रह कर जीवन बिताना चाहता है। विश्व के किसी भी भाग में सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और कलाओं का विकास अपनी पूर्ण गति से शांति-काल में ही हुआ है; लेकिन इस धारणा को स्वीकार कर लेने के बाद, यह भी सत्य है कि सृष्टि के निर्माण के समय से ही शांति के साथ-साथ अशांति, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा और उठापटक का दौर भी चलता रहा है।

इतिहास का कोई भी कालखंड उठा लें; देवों के विरोध में दानव, सुरों के विरोध में असुर, सज्जनों के विरोध मंे गुंडे....सदा खड़े दिखायी देते हैं। संघर्ष का कारण चाहे सत्ता की लालसा हो या धन-सम्पत्ति की लूट; अधिकाधिक धरती पर अधिकार करने की इच्छा हो या अपने विचारों को जबरन दूसरों पर थोपने की जिद; पर यह संघर्ष सदा होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। अच्छाई और बुराई के संघर्ष में सफलता सदा अच्छाई को ही मिलती है; पर बुरा विचार भी नष्ट नहीं होता। इसलिए उन तत्वों की खोज सदा चलती रहनी चहिए, जिनसे शांति प्राप्त हो सकती है।

कहते हैं कि महावीर स्वामी के प्रवचन में आकर एक विषद्दर सर्प ने दया और अहिंसा का मार्ग अपनाकर किसी को न काटने का निश्चय किया। इतना ही नहीं तो उसने फुंकारना भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे सर्प के अंहिसा व्रत की बात सब ओर फैल गयी; पर इसका एक विपरीत परिणाम यह हुआ कि अब आते-जाते लोगों ने उससे डरना ही छोड़ दिया। इतना ही नहीं तो बच्चों ने उसे पत्थर मार-मार कर बुरी तरह घायल भी कर दिया। अब सर्प बड़े असमंजस में फंस गया। यदि वह फिर से काटने लगे, तो इससे अहिंसा व्रत भंग होता है; और यदि शांत पड़ा रहे, तो लोग उसके प्राण ले लेंगे, यह निश्चित था। अतः उसने महावीर स्वामी से मिलकर अपनी समस्या उनके सामने रखी। इस पर स्वामी जी ने उसे कहा कि मैंने तुम्हें किसी को अनावश्यक काटने को मना किया था; पर इसका अर्थ यह नहीं कि तुम फंुकारना भी बन्द कर दो। इससे तो लोग तुम्हें निश्चय ही मार डालेंगे।

सर्प की समझ में स्वामी जी के प्रवचन का मर्म अब आया और उसने जैसे ही फिर से जोरदार फंुकार भरी, सब लोग उससे पूर्ववत डरने लगे और उससे छेड़छाड़ करने का साहस फिर किसी ने नहीं किया। स्पष्ट है कि अहिंसा और शांति का अर्थ चुपचाप पिटना नहीं, अपितु किसी का अनावश्यक परेशान न करना है।

शांति का यह सिद्धान्त जंगल में भी पूर्णतः लागू होता दिखायी देता है। दो शेर आपस में प्रायः नहीं लड़ते; पर शेर और बकरी के आमने-सामने आने पर क्या होता है, यह सब जानते हैं। इसीलिए गांधी जी जैसे अहिंसावादी को भी यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि दुनिया में शांति के सबसे बड़े दुश्मन वे कमजोर लोग हैं, जो हिंसा और अत्याचार के लिए गुंडांे को उकसाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में कुछ वर्ष पूर्व की वह घटना स्मरण करें, जब सोवियत संघ के विघटन के बाद अमरीका ने एक बार रूस को धमकाया, तो रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति येल्तसिन ने उतनी ही कड़ाई से बता दिया कि हम कमजोर अवश्य हो गये हैं; पर अमरीका यह न भूले कि हमारे पास परमाणु अस्त्र-शस्त्र आज भी जीवित अवस्था में हैं। कहना न होगा कि इसका तत्काल असर हुआ और फिर अमरीका ने समय-असमय रूस को धमकाना बन्द कर दिया।

प्राचीन मान्यता के अनुसार सृष्टि के आदिकाल में सब ओर शांति का साम्राज्य था। उस अवस्था का वर्णन करते हुए पुराणकारों ने कहा है - न राज्यं नैव राजासीत्, न दंड्यो न च दांडिका धर्मणैव प्रजा सर्वे, रक्षंतिस्म परस्परम्।। अर्थात उस समय न कोई राजा था और न ही राज्य; न कोई दंड था और न ही दंड देने वाला, क्योंकि गलत काम न करने के कारण कोई दंड का पात्र ही नहीं था। धर्म के आधार पर ही सब एक दूसरे की रक्षा करते थे। स्पष्ट है कि इस सुव्यवस्था का कारण यह था कि सब धर्म अर्थात नियम के अनुसार चलते हुए अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते थे तथा इस प्रकार अपने साथ-साथ स्वयमेव ही दूसरे की भी रक्षा हो जाती थी।

पर समय बीतने के साथ ही मानव जीवन की दुष्प्रवृत्तियों ने भी जोर मारना प्रारम्भ कर दिया, और इसी के परिणामस्वरूप धरती पर लड़ाई-झगड़े बढ़ने लगे। इस अव्यवस्था को समाप्त करने के लिए समाज के तत्कालीन विद्वान एवं प्रभावी लोगों, ऋषि-मुनियों आदि ने मिलकर दंडशक्ति से सम्पन्न्न ‘राजा’ का निर्माण किया। राजा नामक इस व्यवस्था और उसके हाथ में स्थित दंडशक्ति के कारण समाज में एक बार फिर से शांति की स्थापना हुई। अर्थात् शांति के लिए क्षात्रशक्ति या दंडशक्ति की आवश्यकता अति महत्वपूर्ण है।

क्षात्रशक्ति या दंडशक्ति का ही आधुनिक रूप सशस्त्र सेनाएं हैं। विश्व के सभी महान विचारकों ने इनके महत्व को स्वीकारा है। भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ (7/1) में महाभारत का उद्धरण देते हुए कहा है, ‘‘सेना के अभाव में राजकोष निश्चय ही समाप्त हो जायेगा। सेना की सहायता से धन वसूल किया जा सकता है। सेना यदि तत्पर रहे, तो वह मन्त्री के कार्य पूरे करवा सकती है।’’ तथा ‘‘यदि शासक को राज्य संचालन के लिए दूसरी अनेक विधाओं का ज्ञान न हो; पर यदि वह दंडविधान का ज्ञाता है, तो वह सफलतापूर्वक शासन चला सकता है।’’

कौटिल्य से सहòों वर्ष पूर्व मनु ने सफल शासन में दंड की भूमिका की प्रंशसा की है।

स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सःचतर्णाभाश्रमाणं च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ।।1।।
दण्डःशास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवामिरक्षितिदण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्ड धर्म विदुर्बुधाः।। 2।।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रजयति प्रजाःअसमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः।। 3।।
दुष्येयु सर्ववर्णाश्य भिद्येरन्सर्वसेतवःसर्वलोकप्रकापश्य भवेद्दण्डस्य विभ्रमात्।। 4।।
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्यरित पापहाप्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति।। 5।।

अर्थात दंड ही राज्यपुरुष, न्याय का प्रचारकर्ता और सबका शासनकर्ता है। वही चार वर्ण और चार आश्रमों के धर्म का रक्षक है।। 1।। दंड ही प्रजा का शासनकर्ता और रक्षक है। जब सब सोते हैं, तब वह जागता है। उसके भय से दुष्ट लोग प्रजा की नींद में बाधा नहीं डाल सकते। इसलिए बुद्धिमान लोग दंड को ही धर्म कहते हैं।। 2।। जो दंड खूब सोच-विचार कर लागू किया जाता है, वह सबको आनंद देता है और जो बिना विचारे चलाया जाय, वह राजा का ही नाश कर देता है।। 3।। बिना दंड के सब वर्ण दूषित और मर्यादाएं छिन्न-भिन्न हो जाती हैं तथा लोग अनेक प्रकार के प्रकोपों के शिकार होते हैं।। 4।। जहां कृष्णवर्ण, रक्तनेत्र, भयंकर पुरुष जैसा पापों का नाश करने वाला दंड विचरता हैै, वहां प्रजाजन अपराधों से दूर भागते हैं; पर यह तभी संभव है, जब शासक विद्वान एवं विवेकशील हो।। 5।।

रामायण के अनुसार भरत चित्रकूट में राम से राजधर्म संबंधी लगभग 60 प्रश्न पूछते हैं (अयोध्याकांड, सर्ग: 100) उनमें दो प्रश्न दंड से संबंधित हैं। राम कहते हैं: हे भरत ! तुम राज्य में दंडविधान को चलाने वालों को भली प्रकार जांच परख कर ही नियुक्त करो; क्योंकि जो राजा धर्मानुसार प्रजा का पालन करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य पाता है।

केवल भारतीय ही नहीं, तो विदेशी विचारकों ने भी अपने विचार इसी प्रकार प्रस्तुत किये हैं। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ (2/369) में संरक्षक श्रेणी अर्थात सेना द्वारा राज्य की रक्षा करने की आवश्यकता को पूर्णतः स्वीकार किया है। वह सैनिक को राज्य का अभिन्न और आवश्यक अंग मानता था। जेनोफोन ने यह कहकर कि मनुष्यों के बीच सदा युद्ध होता रहता है, सेना और सैनिक की आवश्यकता पर बल दिया है। अरस्तू ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पोलिटिक्स’ में कहा है कि खाद्य पदार्थ उत्पादक वर्ग, यांत्रिक वर्ग, व्यापारिक वर्ग, कृषि दासों, योद्धा वर्ग, न्यायाधीशों, अधिकारी वर्ग और विचारक वर्ग द्वारा ही राज्य का निर्माण होता है। यदि देश को किसी का दास बनना स्वीकार नहीं है, तो योद्धा वर्ग भी अन्य वर्गों की तरह ही आवश्यक है। इतना ही नहीं तो उसने शरीर से अधिक महत्वपूर्ण आत्मा की तरह ही राज्य के अन्य अवयवों की अपेक्षा योद्धा वर्ग, न्यायाद्दीश और विचारक वर्ग को राज्य के लिए अधिक आवश्यक कहा है।

मोर ने अपने ग्रन्थ ‘यूटोपिया’ में युद्ध को गणतन्त्र के जीवन का सामान्य अंग मानते हुए इसके लिए सशस्त्र सेनाओं को राज्य व्यवस्था में विशिष्ट स्थान दिया है। इसी प्रकार बेकन भी अपने ‘न्यू अटलांटिस’ में युद्ध को राष्ट्रीय गौरव का आवश्यक अंग मानते हुए ‘‘बारूद और शस्त्रों के आविष्कारक भिक्षु’’ की मूर्ति स्थापित करने वाले एक सैनिक राज्य का चित्र प्रस्तुत करता है।

इतालवी विचारक मैकियावेली के अनुसार ‘‘युद्ध, इसके नियम और अनुशासन के अतिरिक्त किसी राजकुमार का अन्य उद्देश्य अथवा विचार नहीं होना चाहिए और अपने अध्ययन के लिए उसे इसके अतिरिक्त कोई अन्य विषय नहीं चुनना चाहिए। अपनी पुस्तक ‘दि प्रिंस’ में वह नये, पुराने अथवा मिश्रित सभी राज्यों का मुख्य आधार अच्छे नियम और शस्त्रों को बताता है।

हाब्स अपनी पुस्तक ‘लेवियाथन’ में कहता है कि तलवार के बिना प्रसंविदाएं कोरे शब्दमात्र हैं, जो मनुष्य को बांधने में अशक्त हैं। इस प्रकार कौटिल्य और प्लेटो से लेकर आज तक के सभी विचारकों ने सशस्त्र सेनाओं को राज्यतन्त्र का आवश्यक अंग माना है। तो क्या यह मान लिया जाये कि ये सभी मूर्धन्य विचारक युद्धपिपासु और अशांतिप्रेमी थे; क्या उजड़े नगर, चीखते-चिल्लाते लोग, जलती फसलें, रक्त बहाती नदियां और लाशों पर विलाप करती महिलाओं को देखकर इन्हें संतुष्टि मिलती थी ? ऐसा कहना तो संभवतः इन विश्वप्रसिद्ध समाजशास्त्रियों के साथ अन्याय होगा। फिर भी इन्होंने यु़द्ध और सशस्त्र सेनाओं की तैयारी और महत्व पर इतना बल क्यों दिया है ? स्पष्ट है कि अपने अध्ययन, अनुभव और विचारशक्ति के कारण इन्हें यह साक्षात्कार हुआ कि विश्व-शांति के लिए दुष्ट शक्तियों के सामने सज्जन शक्तियों को भी संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। अर्थात दुष्टों के साथ-साथ सज्जनों के पास भी उतनी ही नहीं, अपितु उनसे भी कहीं अधिक शक्ति होनी आवश्यक हैै। यह बात ठीक है कि वे उसे पहले प्रयोग न करें; पर बिना शक्ति और आधुनिक आयुधों के शांति की कल्पना निराधार है।

त्रेतायुग के भगवान राम हों, या द्वापर के भगवान कृष्ण; या फिर कलियुग के चन्द्रगुप्त मौर्य, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, डा0 केशव बलिराम हेडगेवार जैसे युगपुरुष। सभी ने ब्रह्मशक्ति के साथ क्षात्रशक्ति के महत्व को भी पहचाना और इन दोनों की साधना व आराधना के बल पर अपने समय की दुष्ट शक्तियों को मात दी। शायद इसीलिए विश्व के सभी प्रसिद्ध विचारकों और समाजशास्त्रियों ने शक्ति को ही शांति का प्रबल आधार बताया है।

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