सोमवार, 8 नवंबर 2010

दीपावली और पर्यावरण

हर बार की तरह इस बार भी प्रकाश का पर्व दीपावली सम्पन्न हो गया। लोगों ने जमकर आनंद मनाया; घर और प्रतिष्ठान सजाए; मिठाई खाई और खिलाई; उपहार बांटे और स्वीकार किये; बच्चों ने पटाखे और फुलझड़ियां छोड़ीं; कुछ जगह आग भी लगी; पर दीप पर्व के उत्साह में यह सब बातें पीछे छूट गयीं।

हर बार की तरह कुछ पर्यावरणवादियों ने दीवाली से कुछ दिन पहले से पटाखों के विरुद्ध अभियान छेड़ा। उन्होंने इनसे होने वाले शोर और प्रदूषण की हानि गिनाते हुए लोगों से इन्हें न छुड़ाने की अपील की। उन्होंने बताया कि इससे बच्चों, बूढ़ों और बीमारों को ही नहीं, तो पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को बहुत परेशानी होती है। सरकारी दूरदर्शन भी उनके इस अभियान में सहायता करता है। लखनऊ में कुछ लोग चिड़ियाघर के जानवरों के दुख से इतने दुखी हो जाते हैं कि वे पटाखे न छुड़ाने की मार्मिक अपील करते हुए जुलूस निकालते हैं। ऐसा और जगह भी होता होगा।

लेकिन इसके बाद भी पटाखों का शोर और प्रदूषण हर साल बढ़ रहा है। दीवाली के बाद अखबारों ने प्रदूषणमापी उपकरणों के सौजन्य से इस बार भी बताया कि शहर के किस क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर कितना बढ़ा। कितने वृद्धों को दीवाली की रात में विभिन्न रोगों के शिकार होकर चिकित्सालय की शरण लेनी पड़ी। यद्यपि पिछले 30 साल से मैंने पटाखे नहीं फोड़े; लेकिन इस अवसर पर जो पर्यावरण प्रेमी दिखावा करते हैं, मैं उसका भी विरोधी हूं।

सच तो यह है कि व्यक्ति अपने उत्साह एवं उल्लास को विभिन्न तरीकों से प्रकट करता है। घर में किसी का विवाह, जन्म या जन्मदिन हो, तो लोग घर की रंगाई, पुताई और साज-सज्जा करते हैं। रिश्तेदार और मित्रों के साथ सहभोज का आनंद लेते हैं। इस समय होने वाला नाच-गाना, गीत-संगीत आदि भी उल्लास के प्रकटीकरण का एक तरीका ही है। गरबा, दुर्गा पूजा, देवी जागरण जैसे धार्मिक आयोजनों में एक-दो दिन होने वाला शोर भी लोग सह लेते हैं। यद्यपि अति होने पर वह परेशानी का कारण बन जाता है।

लेकिन दीवाली पर हर नगर और ग्राम पटाखों की आवाज से गूंजने लगता है। रात के तीन-चार घंटे में शोर और प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है। ऐसे में कुछ लोगों को परेशानी होनी स्वाभाविक है। इसका कुछ प्रबन्ध होना ही चाहिए; पर प्रदूषण से जुड़ी कुछ बातें और भी हैं, जिनकी ओर पर्यावरणवादी ध्यान नहीं देते। इसीलिए दीवाली पर किये जाने वाले उनके प्रयास निष्फल सिद्ध हो रहे हैं।

कृपया ये पर्यावरण प्रेमी बताएं क्या शोर और प्रदूषण केवल दीवाली पर ही होता है ? या इसे यों कहें कि दीवाली की रात में तो शोर और प्रदूषण कुछ घंटों के लिए ही होता है। वातावरण में जो बारूदी गंध और धुआं फैलता है, वह एक-दो दिन में छंट भी जाता है; पर जिन चीजों से सारे साल प्रदूषण फैलता है, उसके बारे में वे मौन क्यों रहते हैं ?

इस समय सबसे अधिक प्रदूषण वातानुकूलित यंत्रों से हो रहा है। बाजार में आने वाली 90 प्रतिशत कारें वातानुकूलित उपकरणों से लैस हैं। नये बनने वाले प्रायः सभी भवनों और कार्यालयों में केन्द्रीय वातानुकूलन की व्यवस्था की जा रही है। इससे निकलने वाली जहरीली गैसें ओजोन परत को काट रही हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। सम्पन्न लोग तो कूलर और ए.सी लगवा लेते हैं; पर उन निर्धनों से पूछो, जिनकी झोपड़ी में बिजली ही नहीं है। ए.सी से सबसे अधिक हानि उन्हें ही होती है, जो इसे प्रयोग ही नहीं करते।

बढ़ती जनसंख्या और नगरीकरण से जंगल कट रहे हैं। नदियों और धरती का पानी सूख रहा है। पर्वतीय हिमानियां सिकुड़ रही हैं। पशु और पक्षियों की संख्या भी घट रही है; पर मक्खी-मच्छर और इनके कारण रोग फैल रहे हैं। प्लास्टिक का उपयोग और गंदगी के ढेर बढ़ रहे हैं। पर्यावरण प्रेमी बताएं कि वे निजी और सामूहिक रूप से इस बारे में क्या कर रहे हैं ?

यही हाल मस्जिदों के शोर का है। भारत की शायद ही कोई मस्जिद हो, जिस पर बड़े-बड़े चार-छह भोंपू न लगे हों। हजारों मस्जिदें तो ऐसी हैं, जिनमें नमाज के लिए चार आदमी भी नहीं आते। शहर के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जब पांच बार अजान दी जाती है, तो एक साथ सैकड़ों भोंपुओं से निकलने वाले स्वर से क्या प्रदूषण नहीं होता ? सूर्याेदय की अजान से कितने बच्चे, बूढ़े और बीमारों को परेशानी होती है। गर्मियों में छत पर सोने वालों की नींद तो उस समय अनिवार्य रूप से टूटती ही है।

रमजान के समय तो हाल और बुरा रहता है। मुस्लिम बहुल मोहल्लों में सारी रात बाजार और मजलिसों का दौर चलता है। सुबह तीन बजे से ही मस्जिद के भोंपू लोगों को सहरी खाने के लिए जगाने लगते हैं। रात को दस से प्रातः छह बजे तक का प्रतिबन्ध यहां लागू नहीं होता। जब ध्वनिवर्धक यंत्र नहीं थे, क्या तब अजान, मजलिस और सहरी नहीं होती थी।

ऐसे बहुत सारे विषय हैं, जिस पर दो-चार दिन नहीं, पूरे वर्ष ध्यान देना होगा। भयानक आवाज वाले डी.जे से लेकर वाहनों के कर्कश हार्न पर प्रतिबंध लगना ही चाहिए। अधिक शोर और प्रदूषण वाले पटाखे मुख्यतः विदेशों से आ रहे हैं। इन्हें शासन क्यों नहीं रोकता ? 15 अगस्त और 26 जनवरी को शासकीय स्तर पर आतिशबाजी होती है। दिल्ली में पिछले दिनों हुए खेलों में भी यही हुआ। इसका पर्यावरणवादियों ने कितना विरोध किया ?

सच तो यह है कि बालपन और युवावस्था में सब पटाखे छुड़ाते ही हैं। बचपन में इन पर्यावरणवादियों ने बड़ों के मना करने पर भी पटाखे छुड़ाए होंगे। यही आज उनके बच्चे करते हैं। विरोध से इन्हें रोकना संभव नहीं है। इसके लिए तो शासन को इनका निर्माण ही रोकना होगा; पर इसके साथ ही पर्यावरणप्रेमी सभी तरह के शोर और प्रदूषण के विरुद्ध आवाज उठाएं। अन्यथा उनका यह प्रयास पाखंड समझा जाएगा। वर्तमान स्थिति यही है और यही उनकी विफलता का कारण भी है।

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