सोमवार, 15 नवंबर 2010

पशु बलि विरोधी कहां हैं ?


पशुओं की बलि एक अमानवीय कृत्य है, यहां जहां और जिस नाम पर भी होती है, वह निंदनीय है, इसे बंद होना ही चाहिए। पशु-पक्षी भी ईश्वर की इस सृष्टि में जीने का उतना ही अधिकार लेकर आये हैं, जितने आप और हम।

पशु बलि के विरुद्ध अनेक व्यक्ति और संस्थाएं समय-समय पर आवाज उठाती रही हैं। उनके प्रयास को समर्थन देते हुए मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आगामी 17 नवम्बर, 2010 (बुधवार) को बकरीद है। इस दिन भारत में करोड़ों पशु हलाल अर्थात तड़पा-तड़पा कर मारे जाते हैं। क्या इससे उन्हें दुख नहीं होता; वे इसका विरोध क्यों नहीं करते; वे इसके लिए मुसलमानों को कोई और रास्ता क्यों नहीं सुझाते, जिससे पशुओं की हत्या भी न हो और उनका मजहबी कर्मकांड भी पूरा हो जाए। अब कहां हैं मेनका गांधी और उनके समर्थक ?

बहुत से स्थानों पर हिन्दुओं ने पशु बलि के बदले नारियल फोड़ना या पक्षियों को मूर्ति के सम्मुख प्रस्तुत कर उड़ा देना जैसे काम प्रारम्भ किये हैं। इससे उनकी मान्यता भी पूरी हो जाती है और निरीह पशु-पक्षियों की हत्या भी नहीं होती। क्या ऐसा कोई रास्ता मुसलमान नहीं निकाल सकते ? क्या मुसलमान बुद्धिजीवी एवं मजहबी नेता इस पर विचार करेंगे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अनावश्यक कुरिति, क्रूरता प्रेरक विचारधारा का प्रसार!!

    करूणा भाव के लिये, आपकी पोस्ट सराहनीय!! साधुवाद!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. अल्लाह ने कुर्बानी इब्रा‍हीम अलैय सलाम से उनके बेटे की मांगी थी जो की उनका इम्तिहान था, जिसे अल्लाह ने अपनी रीती से निभाया था. अब उसी लीकटी को पीटते हुए कुर्बानी की कुरीति चलाना कहाँ तक जायज है समझ में नहीं आता. अगर अल्लाह की राह में कुर्बानी ही करनी है तो पहले हजरत इब्राहीम की तरह अपनी संतान की बलि देने का उपक्रम करे फिर अल्लाह पर है की वह बन्दे की कुर्बानी कैसे क़ुबूल करता है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक तर्क यह आया की चूंकि मनुष्य भी एक पशु है और दीगर पशु जब दुसरे पशुओं को खाते हैं तब मनुष्य के लिए आपत्ति क्यूं ?मेरा कहना है मनुष्य में कालांतर में एक विवेक उत्पन्न होता गया है जो इसे समग्र जीव जगत के लिए दयालु बनाता गया है -वह निरा पशु ही नहीं रहा ...इसलिए पशु बलि जैसे नृशंस परम्परा को बंद होना ही है ..आज नहीं तो कल ..मगर शुभस्य शीघ्रम !

    उत्तर देंहटाएं