शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

पैसे की भाषा

इन दिनों शादी-विवाह का मौसम है। जिधर देखो उधर ‘आज मेरे यार की शादी है’ की धुन पर नाचते लोग मिल जाते हैं। कुछ लोगों को इस शोर या सड़क जाम होने से परेशानी होती है; पर वे यह सोच कर चुप रहते हैं कि अपनी जवानी में उन्होंने भी यही किया था। किसी ने ठीक ही लिखा है कि शादी से ही संसार है। इसका एक अर्थ जहां विवाह से सृष्टि का चलना है, वहां दूसरा अर्थ यह भी है कि विवाह से सैकड़ों तरह के लोगों को रोजगार मिलता है।

पर कुछ लोगों के पास पैसे की अधिकता के कारण विवाह समारोह इन दिनों जैसे वीभत्स और अश्लील बनते जा रहे हैं, वह अवश्य चिन्ताजनक है। मजबूरी में ऐसे विवाहों में जाना तो पड़ता है, पर वहां का दृश्य देखकर कुछ खाने-पीने की इच्छा नहीं होती।

पिछले दिनों एक मित्र की बेटी के विवाह में गया था। मेरे उस मित्र पर ईश्वर की बड़ी कृपा है। अति सामान्य घर में जन्म लेकर उसने अपने भाग्य, परिश्रम और योग्यता से अपार धन कमाया। अपने छोटे भाई-बहिनों की शिक्षा से लेकर विवाह और मकान-दुकान का भी प्रबन्ध किया। सचमुच उसने एक अच्छे बड़े भाई का कर्तव्य पूरी तरह निभाया। इसलिए वे भाई-बहिन उसे पितातुल्य ही मानते हैं।

विवाह में इन दिनों 40-50 तरह के व्यंजन होना सामान्य बात है; पर वहां 150 से भी अधिक व्यंजन थे। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही वहां खड़े बैरे सबको एक पुस्तिका दे रहे थे, जिस पर लिखा था कि किस स्ट१ल पर क्या चीज उपलब्ध है। उसे पढ़कर लोग अपनी इच्छानुसार खा-पी रहे थे।

वहां चाट-पकौड़ी, ठंडे और गर्म पेय, रोटी-चावल, दाल-सब्जी, मिठाई, आइसक्रीम आदि के औसत 20-25 प्रकार उपलब्ध थे। अर्थात कुल मिलाकर 150 से भी अधिक व्यंजन। लोग जितना खा रहे थे, उससे अधिक व्यर्थ हो रहा था। भोजन निर्माण और वितरण में शायद 200 से अधिक कर्मचारी लगे होंगे। अनेक युवतियां मेज-कुर्सी पर बैठे लोगों को लाकर खाद्य पदार्थ दे रही थीं। उनका चेहरा बता रहा था कि वे पूर्वाेत्तर भारत की हैं। इसके साथ संगीत पार्टी से लेकर जोकर और चित्र खींचने वाले अलग। बच्चों के लिए गुब्बारे और झूले भी थे। अर्थात एक हजार अतिथियों के स्वागत एवं प्रबन्ध के नाम पर ढाई-तीन सौ कर्मचारी लगे होंगे। मेरे पास बैठे एक अतिथि बोले - यह विवाह का मेला है या मेले में विवाह ?

विवाह के नाम पर होने वाले खर्च का दिखावा विवाह निश्चित होते ही प्रारम्भ हो जाता है। दोनों पक्ष परस्पर जो नकद, आभूषण या वस्त्रादि देते-लेते हैं, उसे यदि छोड़ दें, तो बाहर वालों को कई दिन पहले डाक से मनुहार पत्रिका और फिर कीमती निमन्त्रण पत्र भेजा ही जाता है। जिन्हें स्वयं जाकर निमन्त्रण देना हो, तो साथ में मिठाई का डिब्बा और कहीं-कहीं कुछ उपहार भी। इतने पर ही बस नहीं, तो विवाह स्थल से निकलते समय एक मिठाई का डिब्बा और।

विवाह मंडप भी आजकल महल जैसे आलीशान और भव्य बनने लगे हैं। बिजली की लपदप से आंखें चौंधिया जाती हैं। विवाह का बजट तो कई जगह लाखों की बजाय अब करोड़ों में बनता है। मैंने अपने एक मित्र से इस बारे में पूछा, तो उसका उत्तर बड़ा तर्कसंगत था। उसने कहा कि व्यक्ति जैसे वातावरण में रहता है, जिनसे उसकी रिश्तेदारी, मित्रता या व्यापार के संबंध होते हैं, वे सब जैसा करते हैं, उसे भी वैसा ही करना पड़ता है। ऐसा न होने पर उसकी प्रतिष्ठा और कारोबार पर विपरीत असर पड़ता है।

मुझे अपने एक और मित्र की बात ध्यान आ गयी। जिन दिनों वह काफी घाटे में चल रहा था, तब भी वह सामाजिक-धार्मिक कामों में चंदा देने में कंजूसी नहीं करता था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि यदि मैं ऐसा न करूं, तो बाजार में हमारे घाटे की बात फैल जाएगी और ऐसा होने पर हमें कोई माल उधार नहीं देगा।

व्यापारियों की बात तो वे ही जानें; पर ऐसे में मुझे एक अन्य मित्र की बात ध्यान में आई। उन पर भी ईश्वर की बड़ी कृपा है। उन्होंने अपने पुत्र के विवाह का दस पृष्ठ वाला निमन्त्रण पत्र हस्तनिर्मित कागज पर छपवाया। उसमें वर और वधू पक्ष का विस्तृत परिचय और कार्यक्रमों का विवरण देते हुए सप्तपदी के मंत्र, उनके अर्थ और उस समय वर द्वारा दिये गये वचनों की विस्तृत व्याख्या प्रकाशित की थी। उन्होंने हर निमन्त्रण पत्र के साथ एक बहुत कीमती पुस्तक भी दी, जिसमें भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का सचित्र वर्णन था। विवाह समारोह गंगा तट पर स्थित एक तीर्थनगरी में हुआ, जिसमें मुंबई के प्रसिद्ध कलाकार सत्यनारायण मौर्य ‘बाबा’ ने अपने बहुचर्चित कार्यक्रम ‘भारतमाता की आरती’ प्रदर्शित किया। इससे वह आयोजन न केवल वर और वधू, बल्कि अतिथियों के लिए भी अविस्मरणीय बन गया।

आजकल समाजसेवी संस्थाओं द्वारा निर्धन कन्याओं के सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का खूब प्रचलन है। ऐसे में एक मित्र की पुत्री के विवाह का ध्यान आता है। वह समारोह भी अत्यधिक भव्य था; पर कुछ दिन बाद उन्होंने अपने घर कई साल से काम रही बाई की बेटी का विवाह अपने खर्च पर धूमधाम से करा दिया। उन्होंने कहा कि अपने परिवार में होने वाले हर विवाह के बाद वे ऐसा ही करते हैं।

एक बार काम पर जाते समय एक विवाह स्थल के बाहर भिखारियों को खाना खाते देखा। पता लगा कि रात में जिन सज्जन की बेटी का विवाह था, उनके आदेश से बचे हुए स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ फेंकने या घर लाने की बजाय भिखारियों में बांटे जा रहे थे।

दूरदर्शन पर आजकल असली नोट को पहचानने वाले एक विज्ञापन के अंत में कहा जाता है, ‘‘पैसे की भाषा सुनिए, क्योंकि पैसा बोलता है।’’ इसे थोड़ा आगे बढ़ाते हुए कह सकते हैं कि विवाह के मौसम में पैसा बोलता ही नहीं, बहता भी है। यदि उसकी एक धारा निर्धनों की ओर भी बह जाए, तो उनके आशीष से कई गुना पैसा और प्रतिष्ठा वापस बहकर आपकी ओर आएगी, यह निश्चित है।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

व्यंग्य: वर्तमान परिदृश्य

बहुत पुरानी बात है। एक रानी के दरबार में राजा नामक एक मुंहलगा दरबारी था। रानी साहिबा मायके संबंधी किसी मजबूरी के चलते गद्दी पर बैठ नहीं सकीं। बेटा छोटा और अनुभवहीन था, इसलिए उन्होंने अपने एक विश्वासपात्र सरदार को ही गद्दी पर बैठा दिया। वे उस राज्य को महारानी की कृपा समझ कर भोगने लगे। वे हर दूसरे-तीसरे दिन जाकर महारानी को सलाम बजाते थे। परदे के आगे सरदार साहब और पीछे महारानी। इस तरह राजकाज चलने लगा।

वह राजा नामक दरबारी था तो बहुत भ्रष्ट; पर मुंहलगा होने के कारण सब चुप रहते थे। महारानी और सरदार साहब के कई भेद उसके पास थे, इसलिए उसे हटाना कठिन था। कहते हैं कि वे अपनी गद्दी के लिए भी उसकी करुणा रूपी निधि पर निर्भर थे। इसलिए कुछ करना तो दूर, उसे कुछ कह भी नहीं सकते थे।

राजा था तो बुद्धिमान; पर वह अन्य दरबारियों की अपेक्षा कुछ अधिक ही भ्रष्ट था। महारानी के सुझाव पर सरदार साहब ने कई बार उसका काम और स्थान बदला; पर वह हर बार गोलमाल करने के तरीके निकाल लेता था। महारानी भी उससे दुखी थीं; पर मजबूरीवश कुछ कर भी नहीं सकती थीं।

जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा, तो सरदार साहब ने उसे समुद्र के किनारे बैठकर आती-जाती लहरें गिनने में लगा दिया। कुछ दिन तो वह चुपचाप वहां बैठा; पर फिर अपने बुद्धिबल से उसने वहां भी पैसा वसूलने का रास्ता खोज लिया।

राजा सुबह-सवेरे ही कागज-कलम लेकर, कुर्सी-मेज डालकर समुद्र के किनारे बैठ जाता। दिखाने के लिए वह कागज पर कुछ लिखता भी रहता। उसने जलयानों और नौकाओं के लिए नियम बना दिया कि वे तट से एक किलोमीटर दूर ही लंगर डालें, जिससे लहरों के गिनने वाले शासनादेश का पालन हो सके।

इस आदेश से जलयान और नाव वालों को बड़ी परेशानी हो गयी। यदि वे तट पर नहीं आएंगे, तो माल और यात्रियों को कैसे उतारे या चढ़ायेंगे। उन्होंने राजा को बहुत समझाया कि यह आदेश अव्यावहारिक है, इसे वापस ले लें; पर राजा को तो अपना मतलब हल करना था।

कई दिन तक दोनों पक्ष बहस करते रहे; पर राजा पीछे हटने को तैयार नहीं था। उसका कहना था कि उसे लहरें गिनने को कहा गया है और जलयान या नौकाओं के किनारे आने से होने वाली उथल-पुथल से इसमें बाधा पड़ती है। इसलिए उन्हें किनारे से दूर रह कर ही अपना काम करना होगा।

आखिर दोनों ने मिलकर बीच का रास्ता निकाला। राजा को हर जलयान और नौका से माल और यात्रियों की संख्या के अनुसार कुछ राशि मिलने लगी। इससे वे तट तक आने लगीं। राजा के साथ-साथ उसके कागजों का पेट भी भरने लगा। महारानी की गद्दी सुरक्षित हो गयी, तो उन्होंने भी आंखें बंद कर लीं। विपक्षियों ने फिर शोर मचाया; पर महारानी कुछ सुनने को तैयार नहीं थीं। हंगामा होता रहा, राज चलता रहा।

ऐसी ही कहानी इन दिनों दिल्ली में भी सुनी जा रही है। उस राजा ने लहरें गिनकर पैसे बनाये थे, तो इस राजा ने हवा की तरंगें बांटकर ही नोट बना लिये। इसमें से उसे, सरदार जी और महारानी को क्या मिला, यह तो वे जानें; पर देश के खजाने से खरबों रु0 लुट गये। विपक्ष सदा की तरह इस बार भी शोर मचा रहा है; पर उसकी दाल को भी काली देखकर प्रजा चुप है।

हाथ हिलाकर हवा में से ही भभूत या मिठाई निकालने वाले बाबा सबने देखे होंगे। लोहा और कांच खाने वाले मदारी भी सड़क पर तमाशा करते मिल जाते हैं; पर ऐसा जादूगर तो आज तक नहीं देखा, जिसने हवा में से नोट कमा लिये हों।

संस्कृत में कहावत है यथा राजा, तथा प्रजा। अंग्रेजी में कहते हैं - People get the government, they deserve. इन दोनों को मिलाकर चूल्हे पर संसद के शून्य सत्र की तरह 22 दिन तक पकाएं। इससे जो व्यंजन बनेगा, वही वर्तमान परिदृश्य है।