शनिवार, 26 मार्च 2011

नया साल जो आया है

लीजिये, हंसता और मुस्कुराता, खिलखिलाकर नव उल्लास बिखराता, निराशा को भगाता और आशा को बटोरता नया वर्ष फिर से आ गया। चारों ओर देखिये, पेड़ नये पत्तों और कलियों के आगमन से कैसे झूम रहे हैं। पेड़-पौधे मुक्तहस्त होकर सुगंध बांट रहे हैं। भला कौन वह मूर्ख होगा, जो परिवार में आ रहे नये सदस्यों को देख खुश न हो। पशु हो या पक्षी, मानव हो या वनस्पति; सब पुराने के जाने पर दुखी होते हैं; पर वह दुख नवआगत के स्वागत के कारण धूमिल भी हो जाता है। यही सृष्टि का नियम है, इसलिए आज सब खुश है। आखिर क्यों न हों, नया साल जो आया है।


पर फिर एक जनवरी क्या है ? हां, वह भी नया साल है; पर वह विदेशी है। कुछ लोग कहते हैं कि ईसा के जन्म से नया साल प्रारम्भ हुआ; पर यह बात आज तक कोई नहीं समझा पाया कि यदि यही सत्य है, तो फिर नया साल 25 दिसम्बर से क्यों नहीं होता; या फिर एक जनवरी को ईसा का जन्म क्यों नहीं मनाया जाता ? और हां, वे 25 दिसम्बर को बड़ा दिन कहते हैं। जबकि भूगोल बताता है कि मकर संक्रांति (14 अप्रैल) से दिन बढ़ने लगता है और सबसे बड़ा दिन 21 जून होता है। सच तो यह है कि अंग्रेजी वर्ष अवैज्ञानिक ही नहीं, अनैतिहासिक भी है।


असल में पश्चिम में अधिकांशतः सर्दी रहती है, इसलिए उन्होंने अपनी कालरचना सूर्य को केन्द्र मानकर की। दूसरी ओर अरब के रेगिस्तान प्रायः तपते ही रहते हैं। इसलिए उनके जीवन में चन्द्रमा की शीतलता का अधिक महत्व है। यही उनके कैलेंडर के साथ भी हुआ। इस कारण ये दोनों कैलेंडर अधूरे रह गये। पहले तो वे साल में 10 महीने ही मानते थे। फिर पश्चिम ने भूल सुधार कर इनकी संख्या 12 कर ली; पर मुस्लिम कैलेंडर आज भी वहीं है। इसीलिए कभी ईद सर्दी में आती है, तो कभी गर्मी या बरसात में।


एक अजब बात और; उनका दिन रात के अंधेरे में बारह बजे प्रारम्भ होता है। शायद ऐसे लोगों के लिए ही शास्त्रों में निशाचर शब्द आया है। निशाचरी अपसंस्कृति के प्रभाव से ही सब ओर चरित्रहीनता और अपराध बढ़ रहे हैं। जब वे 10 महीने का वर्ष मानते थे, तो सितम्बर (सप्त अम्बर: सातवां महीना), अक्तूबर (अष्ट अम्बर: आठवां महीना), नवम्बर (नवम अम्बर: नवां महीना) और दिसम्बर (दशम अम्बर: दसवां महीना) यह गणना सही थी। भूल पता लगने पर उन्होंने प्रारम्भ में जनवरी और फरवरी जोड़ दिये; पर सितम्बर से दिसम्बर वाले महीनों के नाम नहीं बदले।


अब जरा उनके साल को भी देखिये। किसी महीने में 28 दिन हैं, तो किसी में 31। कैलेंडर बनाते समय संत आगस्ट के नाम पर एक महीना बनाकर उसमें 31 दिन कर दिये; पर यह एक दिन कहां से लायें ? किस्मत की मारी फरवरी उनके सामने पड़ गयी। बस उसके 30 में से ही एक दिन काट लिया गया। अब तत्कालीन शासक जूलियस सीजर ने कहा कि एक महीना उनके नाम पर भी होना चाहिए। इतना ही नहीं, वह अगस्त से पहले और 31 दिन का ही हो। इसलिए उनके नाम पर जुलाई बना दिया गया; पर फिर एक दिन वाली समस्या आ गयी। गरीब फरवरी की गर्दन पर फिर छुरी चलाकर एक दिन काटा गया। वह बेचारी आज भी अपने 28 दिनों के साथ जुलाई और अगस्त को कोस रही है।


यह कार्य 532 ई0 में जूलियस सीजर के राज्य में हुआ था। अतः यह रोमन या जुलियन कैलेंडर कहलाया। इसमें चार साल में एक बार 366 दिन वाले लीप वर्ष की व्यवस्था भी की गयी; पर यह गणना भी पूरी तरह ठीक नहीं थी। इसमें एक साल को 365.25 दिन के बराबर माना गया, जबकि यह सायन वर्ष (365.2422 दिन) से 11 मिनट, 13.9 सेकेंड अधिक था। फलतः सन 1582 तक इस कैलेंडर में 10 अतिरिक्त दिन जमा हो गये। अतः पोप ग्रेगोरी ने एक धर्मादेश जारी कर 4 अक्तूबर के बाद सीधे 15 तारीख घोषित कर दी।


लोग 4 अक्तूबर की रात को सोये थे; पर वे उठे तो उस दिन 15 अक्तूबर था। एक साथ दस दिन की यह नींद अजब थी। यदि कुंभकर्ण को पता लगता, तो वह अपने इन लाखों नये अवतारों से मिलने जरूर आता; पर वहां तो लोग सड़कों पर आकर शोर मचाने लगे। जिनके जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ इन दिनों में पड़ती थी, वे चिल्लाकर अपने दिन वापस मांगने लगे। कुछ लोग भयभीत हो गये कि कहीं उनकी आयु एक साल कम न मान ली जाये; पर कुछ दिन के शोर के बाद सब शांत हो गये।


इस व्यवस्था से बना कैलेंडर ‘ग्रेगोरी कैलेंडर’ कहलाया। सर्वप्रथम इसे कैथोलिकों ने और 1700 ई0 में प्रोटेस्टेंट ईसाइयों ने अपनाया। 1873 में जापान और 1911 में यह चीन में भी प्रचलित हो गया। भारत में अंग्रेजों ने इसे जबरन चलवाया। यद्यपि पर्व-त्योहार आज भी भारतीय कालगणना के आधार पर ही मनाये जाते हैं।


भारत ने स्थिर सूर्य और चलायमान चन्द्रमा दोनों की गणना की। इसीलिए हमारा पंचांग तिथि, मास, दिन, पक्ष और अयन भी बताता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही पृथ्वी का पिंड सूर्य से अलग हुआ था। अतः यह पृथ्वी का जन्मदिन है। ब्रह्मपुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण इसी दिन सूर्योदय होने पर प्रारम्भ किया था।


चैत्र मासे जगदब्रह्मा संसर्ज प्रथमेहनि
शुक्ल पक्षे समग्रं तु तदा सूर्याेदय सति।।


इसके साथ ही इतिहास की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी यह दिन है। इस दिन से नवरात्रों में मां दुर्गा का पूजन एवं व्रत प्रारम्भ होते हैं। त्रेतायुग में श्रीराम और द्वापर में युद्धिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य ने विदेशी शकों को हराकर इसी दिन राजधानी में प्रवेश किया था। उसी स्मृति में विक्रम संवत प्रारम्भ हुआ। विक्रमादित्य की विशेषता यह भी थी कि उन्होंने बचे-खुचे शकों को हिन्दू समाज में ही मिला लिया। आज यह कहना कठिन है कि हममें से कौन उन शकों की संतान है। इसके बाद भी अनेक भारतीय वीरों ने शत्रुओं को धूल चटाई; पर वे उन्हें स्वयं में मिला-पचा नहीं सके। इसलिए शकारि विक्रमादित्य की विजय का महत्व सर्वाधिक है। अर्थात हिन्दू नववर्ष किसी के जन्म का नहीं, अपितु स्वदेश की विजय का पर्व है।


जब विदेशी मुसलमानों के आतंक से सिन्ध प्रदेश थर्रा रहा था, तो वरुण अवतार झूलेलाल ने चैत्र शुक्ल द्वितीया को जन्म लेकर हिन्दू समाज को त्राण दिलाया। सिख परम्परा के दूसरे गुरु अंगददेव जी का प्राक्टय दिवस भी यही है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने वैदिक मान्यताओं की पुनप्रर्तिष्ठा हेतु आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन की थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माता डा0 केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी नागपुर में इसी दिन हुआ था।


भारतीय कालगणना की एक अन्य विशेषता यह है कि प्रत्येक संवत्सर इसी दिन से प्रारम्भ होता है। भारत में सृष्टि संवत से लेकर कल्पाब्द, युगाब्द, वामन, श्रीराम, श्रीकृष्ण, युद्धिष्ठिर, बौद्ध, महावीर, शंकराचार्य, शालिवाहन, बंगला, हर्षाब्द, कलचुरी, फसली, वल्लभी आदि अनेक संवत प्रचलित हैं। शासन ने महाराजा शालिवाहन का स्मरण दिलाने वाले शक संवत को अधिकृत संवत माना है (कुछ इसे कनिष्क से जोड़ते हैं)। ईसवी सन में 57 जोड़ने पर विक्रम संवत तथा 78 घटाने से शक संवत की गणना सामान्यतः की जा सकती है। वर्ष 2011 में गणना करने पर भारतीय सृष्टि संवत (1,97,19,61,682) तथा विदेशी कालगणना में चीनी संवत (9,60,02,309) सर्वाधिक प्राचीन हैं।


इसलिए आइये, विदेशी जूठन चाटना छोड़कर अपने महान पुरखों से जुड़ें। किसी कारण से यदि अंग्रेजी तिथियों को मानना और लिखना मजबूरी बन गया हो, तो भी निजी जीवन, पत्र-व्यवहार आदि में तो अपनी कालगणना को प्रयोग किया ही जा सकता है। नयी पीढ़ी को अपनी तिथियांे और मास के बारे में जरूर बतायें। कुछ दिन यह कठिन जरूर लगेगा; पर फिर सरल हो जाएगा।


नव वर्ष वाले दिन शास्त्रों के आदेशानुसार अपने घर, बाजार और सार्वजनिक स्थानों पर भगवा पताका फहरायें। गत वर्ष के अंतिम सूर्य को विदाई देकर नव वर्ष के प्रथम सूर्योदय का सामूहिक स्वागत करें। गली-मौहल्ले और आंगन को साफ कर रंगोली बनायें। युवकों को प्रेरित कर मंदिर या सार्वजनिक स्थल पर देवी जागरण या विशेष पूजा करवायें। घर में श्रीरामचरितमानस या अन्य किसी भी धार्मिक ग्रन्थ का पाठ करें। साफ वस्त्र पहनें, यज्ञ करें और उसमें सभी पड़ोसियों को बुलायें। बाजार, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन आदि सार्वजनिक स्थानों पर मंगलतिलक लगाकर सबको बधाई दें। मिठाई खायें और खिलायें। परिचितों और संबंधियों को शुभकामना-पत्र और सरल मोबाइल संदेश (एस.एम.एस) भेजें। बधाई के बैनर लगाकर बाजार को सजायें। कार्यालय में भी सबको शुभकामना दें। समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर सबको इस कार्य के लिए प्रेरित करें।


इस अवसर पर अपने समाज के निर्धन और उपेक्षित बंधुओं को भी न भूलें। हमारे मौहल्ले और घर में काम करने वाले सफाईकर्मी हांे या घर पर चौका, बरतन करने वाली महरी; सबके कपड़े धोने वाला धोबी हो या चरणसेवा करने वाला मोची; चौकीदार हो या हमारे दैनन्दिन जीवन से जुड़े माली, लुहार, बढ़ई या अन्य कोई श्रमजीवी; सबको आज अपने घर बुलायें; अकेले नहीं, सपरिवार बुलायें। मंदिर के पुजारी और बच्चों के अध्यापकों को भी न भूलें। सबको आदर दें; अपने साथ, अपनी रसोई और मेज पर बैठाकर प्रेम से खाना खिलायें। बच्चों को खिलौने और पाठ्य सामग्री उपहार में दें, तो बड़ों को नये वस्त्र। इसके लिए चै.शु.1 से लेकर श्रीरामनवमी (चै.शु.9) तक कभी भी समय निकाल लें।


एक बार यह करिये तो; फिर देखिये सब ओर कैसा समरसता का वातावरण बनेगा। अमीरी जब अपनी पड़ोसन गरीबी से झुककर गले मिलेगी; शिक्षा जब अपनी सहचरी अशिक्षा का बढ़कर हाथ थामेगी; अहंकार जब सद्व्यवहार को अपने पास बैठायेगा; तब न जातिवाद रहेगा, न क्षेत्रवाद; भाषा और प्रांत के झगड़े कहीं कोने में मुंह दबाये पड़े मिलेंगे। नव वर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन यह सुअवसर हमें उपलब्ध कराता है। आइये, इसका उपयोग करें। प्रेम बांटे और प्रेम पायें। नाचें और गायें, हर्षाेल्लास मनायें, क्योंकि फिर एक साल बाद आज नया साल जो आया है।

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