रविवार, 22 मई 2011

घोषणापत्र बैठक


बात उन दिनों की है, जब मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे। एक बार उनकी ब्रैड पकौड़े जैसी लाल और फूली हुई नाक देखकर किसी ने इसका कारण पूछा, तो वे फट पड़े - भैया, गांधी बाबा का राज अगर भारत में आ गया, तो किसी को जुकाम नहीं होगा।


- क्या मतलब ?


- गांधी बाबा का आदेश है कि सब हाथ से बनी मोटी खादी प्रयोग करें। जुकाम के कारण मैं तीन दिन से इस मोटे रूमाल से नाक रगड़ रहा हूं। यदि दो-चार दिन और यही हाल रहा, तो नाक ही नहीं बचेगी। फिर जुकाम कहां से होगा ?


ऐसा ही संकट बाबा रामदेव के कारण एक बार फिर भारत पर मंडरा रहा है।


भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। लोकतंत्र में चुनाव, चुनाव के लिए राजनीतिक दल और उनके लिए घोषणापत्र आवश्यक होता है। भारत में हर दूसरे-चौथे महीने चुनाव होते ही रहते हैं। जब से बाबा जी ने राजनीतिक दल बनाने और चुनाव लड़ने की बात कही है, तबसे उनके पास कई ऐसे नेता आने लगे हैं, जो घर से लेकर बाहर तक कई बार बुरी तरह पिट चुके हैं और अब कहीं उनकी पूछ नहीं हो रही। ऐसे ही कुछ शुभचिंतकों ने बाबा जी को सुझाव दिया कि आपका राजनीतिक दल भले ही बाद में बने; पर यदि एक घोषणापत्र बन जाए, तो आगे चलकर बड़ी सुविधा हो जाएगी।


वैसे भारत में अधिकांश राजनीतिक दल ऐसे हैं, जिनके लिए घोषणा पत्र का कुछ विशेष उपयोग नहीं है। वे उसे उस पुराने कपड़े की तरह समझते हैं, जिसे आग पर से गरम बरतन उतारते समय प्रयोग कर फिर खूंटी पर टांग देते हैं। कांग्रेस और उसकी परम्परा वाले घरेलू दलों में उनके मुखिया की बात ही घोषणापत्र है।


पर उस भले आदमी की बात बाबा जी की समझ में आ गयी। इसलिए घोषणापत्र पर विचार करने के लिए उन्होंने अगले दिन प्रातः पांच बजे सबको खाली पेट आने को कह दिया।


उनके कुछ साथी इससे परेशान हो गये - बाबा जी, घोषणापत्र बनाने के लिए इतनी जल्दी और खाली पेट आकर क्या होगा ?


- सबसे पहले हम लोग आधा घंटा अनुलोम-विलोम और कपालभाति करेंगे। इसके बाद बैठक प्रारम्भ होगी।


- तो क्या आपके दल का हर कार्यक्रम ऐसे ही प्रारम्भ होगा ?


- बिल्कुल। मेरी पहचान इनसे ही बनी है। लेखक हों या पत्रकार; नर्तक हों या अभिनेता; किसान हों या व्यापारी; राजनीति में आने के बाद भी वे अपना पुराना काम नहीं छोड़ते। इसलिए मैं इन्हें नहीं छोड़ सकता। जिसे मेरे दल में रहना हो, उसे हर दिन सूर्योदय के समय अनुलोम-विलोम और कपालभाति करनी ही होगी।


- दल के पदाधिकारियों को भी...?


- पदाधिकारियों को ही नहीं, सांसद हो या विधायक, मंत्री हो या संतरी, यह सबको करना होगा।


- तो क्या संसद का सत्र भी राष्ट्रपति के अभिभाषण की बजाय आसन-प्राणायाम से प्रारम्भ होगा ?


- पहले आसन-प्राणायाम होगा और फिर उनका भाषण। यह मेरा नहीं, भारत के स्वाभिमान का प्रश्न है।


बाबा जी के सामने कौन बोलता; पर जिन 25 लोगों को घोषणापत्र बैठक के लिए बुलाया गया था, उनमें से 15 ही पहुंच सके। एक को बाबा जी ने लौटा दिया, क्योंकि उसके मुंह से रात्रिपेय की दुर्गन्ध आ रही थी। शर्मा जी को कुछ कष्ट तो हुआ, फिर भी भागदौड़ कर वे समय से पहुंच गये। बाबा जी ने सबको अपने सामने धरती पर बैठा दिया। कुछ देर आसन, व्यायाम, प्राणायाम और ध्यान के बाद बैठक प्रारम्भ हो गयी।


एक सहभागी ने सुझाव दिया कि बुद्धिजीवियों की गोष्ठी में चाय और क१फी के दौर चलते रहते हैं। इसके बिना उनका दिमाग ही नहीं चलता। इसलिए आसन-व्यायाम के बाद कुछ जलपान भी हो जाए, तो ठीक रहेगा।


बाबा जी के आदेश से सबके लिए लौकी और करेले का रस आ गया। अधिकांश लोग उसे देखकर ही मुंह बनाने लगे। दो लोग हल्का होने के बहाने बाहर निकले और फिर लौटकर ही नहीं आये। रसपान के बाद बैठक फिर प्रारम्भ हुई।


बाबा जी ने एक सप्ताह पूर्व ही दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार और कालेधन के विरुद्ध सफल रैली की थी, अतः सबसे पहले अर्थनीति पर चर्चा होने लगी।


- हमारी सरकार में करनीति क्या होगी ? एक ने प्रश्न किया।


- हम जनता से कोई कर नहीं लेंगे।


- पर बिना कर के देश कैसे चलेगा ?


- हम विदेशी बैंकों में रखे कालेधन को वापस लाएंगे। उसके आने से अगले 15 साल तक किसी नागरिक से कर लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इतना ही नहीं, हर नागरिक को दो-तीन लाख रुपये और दिये जाएंगे। इसे वह खेती या व्यापार में लगा सकता है।


उसी समय शर्मा जी को बाहर जाने की आवश्यकता लगी। लौकी का रस पीने से उनका पेट कुछ गुड़गुड़ाने लगा था। वे बाहर निकले, तो उनके साथ भुनभुनाते हुए एक नेता जी और आ गये - इन बाबा जी की सरकार तो आने से रही। बिना कर लिये लौकी और करेले के जूस से कहीं देश चलता है क्या ?


- नेता जी, इनका आंदोलन सरकार बनाने के लिए नहीं है।


- तो फिर किस लिए है ?


- यह सरकार को हिलाने और देश को जगाने के लिए है। 1947 के बाद कांग्रेस ने कहा था कि देश चलाने की जिम्मेदारी हमारी है। जनता तो बस हर पांचवे साल हमें वोट देती रहे। भोली जनता इनके चक्कर में आ गयी। इसी का परिणाम है कि भ्रष्टाचार हर घर और दफ्तर में घुस गया है। अब तो मीडिया, सेना और न्यायपालिका भी कलंकित हो गये है। राजा ही चोर बने हैं। सरकार खुद कह रही है कि देश में 70 प्रतिशत लोग 20 रु0 से कम पर गुजारा करते हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हिंसा और अपराध बच्चों का खेल बन गये हैं। जो लोग राजनीति को वेश्या, राजनेताओं को दलाल और राजनीतिक दलों को माफिया क्लब कह रहे हैं, वे गलत नहीं हैं।


- तो जनता के जागने से क्या होगा ?


- और कुछ हो न हो; पर अगली सरकार इन नाकारा और मजबूर लोगों से तो अच्छी ही होगी।

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