मंगलवार, 7 जून 2011

थोड़े-थोड़े सब दुखी...


पिछले दिनों बहुत वर्षों बाद एक मित्र से मिलना हुआ। मैं उनके मोटापे पर आश्चर्यचकित हुआ, तो वे मेरे हल्केपन पर। उन्हें लगा कि मैं किसी बात से दुखी हूं। मैंने उन्हें बताया कि इसका कारण कोई रोग या शोक नहीं है। मैं तो अपने प्यारे भारत के भविष्य की चिंता में दुबला हो रहा हूं।


भारत के वर्तमान और भविष्य की चिंता लोग अपने-अपने ढंग से करते हैं। अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर पांच दिन अनशन कर भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकर्षित किया। मीडिया ने उनका खूब साथ दिया, सो सरकार हिल गयी। उमा भारती ने भी पिछले दिनों हरिद्वार में गंगा की रक्षा के लिए अनशन किया। मीडिया की उपेक्षा से उनका अनशन चर्चित नहीं हो सका। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें गंगा की बजाय अपने राजनीतिक अस्तित्व की अधिक चिन्ता है।


बाबा रामदेव का प्रकरण तो ताजा ही है। अनशन प्रारम्भ होने से पूर्व शासन और अनशन उजाड़ दिये जाने के बाद बाबा जी दुखी नजर आये; पर अब सारे देश में इस रावणलीला के लिए शासन की जो थू-थू हो रही है, उससे कई मोटी चमड़ी वाले कांग्रेसी भी दुखी हैं। रही-सही कसर सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर पूरी कर डाली। अब तो इस बारे में मैडम इटली, मनमोहन सिंह और राहुल बाबा की प्रतिक्रिया की ही प्रतीक्षा है।


चिदम्बरम् महोदय देश के बड़े आकार के साथ ही पाकिस्तान को दी गयी भगोड़ों की सूची के कारण हो रही फजीहत से दुखी हैं। दिग्विजय सिंह का हाल न पूछें, वे माननीय श्री ओसामा बिन लादेन जी के शव के अनादर से अंदर ही अंदर घुले जा रहे हैं। काश, उन्हें भी उस समय बुला लिया जाता, तो उनका जन्म सफल हो जाता। अग्निवेश अमरनाथ यात्रा की बढ़ती लोकप्रियता तथा नक्सलियों और देशद्रोहियों के अधिकारों में हो रही कटौती से दुखी हैं।


मैडम इटली और मनमोहन सिंह के कई प्रिय मित्र तिहाड़ पहुंच चुके हैं; पर बदनामी के भय से वे उनसे मिल भी नहीं सकते। राहुल बाबा का गुब्बारा फूलने से पहले ही फुस्स हो गया है। इसलिए कांग्रेसजन प्रियंका दीदी को राजनीति में आने के लिए मना रहे हैं, जिससे उन्हें भविष्य में भी सत्ता की मलाई मिलती रहे।


वामपंथियों का तो कहना ही क्या; उनके धतकर्मों के चलते बंगाल और केरल की जनता ने उन्हें समुद्र में ढकेल दिया। अब एक त्रिपुरा बचा है, समझ नहीं आता उसे ओढ़ें या बिछाएं ? लालू, मुलायम, मायावती और करुणानिधि के दुख की कोई सीमा नहीं है।


दुख भाजपा वालों को भी है। बिहार की जीत से जितना वजन बढ़ा था, इन पांच राज्यों के चुनाव ने सब छीन लिया। असम का घाव कुछ अधिक ही गहरा है, जहां चौबे जी छब्बे बनने के चक्कर में दुब्बे ही रह गये। अधिक क्या कहूं; सबके अपने-अपने दुख हैं। गुरु नानकदेव ने ठीक ही कहा है - नानक दुखिया सब संसार।


पर मुझे तो भावी भारत की चिंता है। जब मैं गलियों में विकेट की जगह कुर्सी या पत्थर रखकर बल्ला घुमाते वर्तमान और भावी युवाओं को देखता हूं, तो मुझे क्रिकेट के भविष्य की चिंता होने लगती है। हर दो-चार मिनट बाद गेंद सड़क पर चली जाती है। फिर प्रतीक्षा होती है वहां से निकलने वाले किन्हीं अंकल जी की, जो उनकी गेंद उठा दें। समझ नहीं आता कि सचिन और धोनी के रिटायर होने के बाद क्या होगा ?


यही हाल घर के दरवाजे पर बैडमिंटन और टेनिस खेलती लड़कियों का है। साइना नेहवाल और सानिया मिर्जा कितने ही पुरस्कार जीत लें; पर यहां भी भविष्य अंधकारमय ही है। फुटबाल, हाकी, व१लीब१ल और कुश्ती आदि की तो बात ही न पूछें।


मुझे चिन्ता केवल इन्सान की ही नहीं, भगवान की भी है। कथा, कीर्तन और जागरण में जितना शोर होता है, उसकी चर्चा व्यर्थ है। शादी-विवाह में फूहड़ फिल्मी गानों पर नाचने और नचाने वाले कलाकार ही नवरात्र में भजन गायक बन जाते हैं। पता नहीं भगवान तक उनकी आवाज पहुंचती है या नहीं; पर मोहल्ले वालों की नींद जरूर हराम हो जाती है।


मस्जिद और दरगाहों के शोर से खुदा भी दुखी होता है; पर क्या करे, उस बेचारे की बात सुनता कौन है ? अच्छा है कि वह बहुत दूर हैं, वरना हर दिन के इस शोर से उनका तो जीना कठिन हो जाता। कबीरदास जी के प्रश्न ‘‘क्या साहिब तेरा बहरा है..’’ का उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया।


दुख तो मेरे और भी हैं; पर उन्हें सुनाकर मैं आपको दुखी करना नहीं चाहता। चलते-चलते फिर ये पंक्तियां याद आती हैं।


कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास
थोड़े-थोड़े सब दुखी, सुखी राम के दास।।


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