शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

प्रश्न नीति का नहीं, नीयत का भी है


किसी भी काम या अभियान की सफलता में नीति और नीयत दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे द्वारा चलाये जा रहे जन आंदोलन पर सरकार की प्रतिक्रिया को इन दोनों कसौटियों पर कसने का प्रयास होना चाहिए।


नीति का अर्थ है नियम। राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो संविधान के प्रकाश में किये जाने वाले कार्य ही नीति हैं। दूसरी ओर नीयत से अभिप्राय काम करने वालों की मानसिकता से है। यदि अंक देने हों, तो नीयत को 60 और नीति को 40 अंक दिये जा सकते हैं। अर्थात नीयत का महत्व नीति से कहीं अधिक है।


इसे एक उदाहरण से समझना ठीक रहेगा। यदि एक खराब वाहन किसी अच्छे मिस्त्री के हाथ लग जाए, तो वह जोड़-तोड़कर उससे काम चला लेगा; पर यदि फैक्ट्री से निकला हुआ नया वाहन किसी अनाड़ी को मिल जाए, तो उसे चलाना तो दूर, वह उस वाहन का ही बेड़ा गर्क कर देगा। यदि वह चलाना जानता हो; पर चलाने की इच्छा न हो या जानबूझ कर बहाने बना रहा हो, तब भी यही स्थिति होगी। अर्थात नीति ठीक होने पर भी यदि नीयत ठीक न हो, तो सार्थक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा जा सकता।


बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति सरकार का जो व्यवहार है, वह बिल्कुल ऐसा ही है। शासन की नीयत भ्रष्टाचार मिटाने की नहीं है। कारण बिल्कुल साफ है कि इसकी चपेट में कांग्रेस के सब बड़े लोग आ रहे हैं। यदि नीयत ठीक हो, तो वर्तमान संविधान में से ही मार्ग निकल सकता है; पर नीयत ठीक न होने के कारण जनता का विश्वास इस सरकार से उठ गया है। लोगों की नजर में यह सरकार खलनायक बन चुकी है, जबकि कांग्रेस वाले इस आंदोलन को ही गलत कह रहे हैं।


आंदोलन को विफल करने के लिए मनमोहन, राहुल, सिब्बल और चिदम्बरम् आदि साम, दाम, दंड और भेद जैसा हर हथकंडा अपना रहे हैं। साम अर्थात समझाना-बुझाना, बात करना। दाम अर्थात लालच से विपक्ष को खरीदना। दंड अर्थात शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न तथा भेद अर्थात आंदोलनकारियों में फूट डालना।


इस दृष्टि से देखें, तो बाबा रामदेव को पहले समझाने का प्रयत्न हुआ। उनसे वार्ता की गयी। समझौते का प्रयास हुआ; पर जब इसमें सफलता नहीं मिली, तो जनता और उनके समर्थकों में भ्रम पैदा करने के लिए एक चिट्ठी प्रस्तुत की गयी। जब उससे भी काम नहीं बना, तो आधी रात में लाठी और आंसूगैस के बल पर जबरन बाबा और उनके समर्थकों को रामलीला मैदान से खदेड़ दिया गया।


अन्ना के साथ भी क्रमशः यही हो रहा है। उन्हें भी समझाया और बातचीत में उलझाया गया। दाम देकर भी उनके साथियों को खरीदने का प्रयास अवश्य हुआ होगा, यह आंदोलन की धूल बैठने के बाद पता लगेगा। शासन ने सरकारी लोकपाल के दायरे में जानबूझ कर निजी संस्थाओं (एन.जी.ओ) को भी रखा है, जिससे अन्ना समर्थक डर जाएं। इन निजी संस्थाओं का एक बड़ा समूह अन्ना के साथ काम कर रहा है। इसीलिए उनके समर्थक इस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं। इससे कितने लोग भयभीत हुए, यह भी समय बताएगा।


अन्ना ने स्वयं माना है कि उन्हें मारने के लिए सुपारी दी गयी। आंदोलन में फूट डालने और समर्थकों को दिग्भ्रिमित करने के लिए शासन ने अपने एक भगवावेश चमचे को उनके साथ लगा दिया है, जो समय-समय पर उल्टे बयान देकर आंदोलन को विफल करने में लगा है। दुर्भाग्य की बात है कि सब जानते हुए भी अन्ना ने उसे अपनी टीम से बाहर नहीं किया है। अन्ना का आमरण अनशन अब अनिश्चितकालीन अनशन में बदल गया है। यह परिवर्तन कैसे हुआ, इस संबंध में कुछ बातें दो-चार दिन में बाहर आ जाएंगी। संभवतः यह भी किसी भेदनीति का ही परिणाम है।


कैसी हैरानी की बात है कि जिन बाबा रामदेव और अन्ना के आगे शासन के बड़े-बड़े लोग झुककर कालीन बिछाते थे, वे अब शासन को ही भ्रष्टाचारी लग रहे हैं। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को अब पचासों तरह की जांच के दायरे में उलझा दिया गया है। इसी प्रकार अन्ना के न्यासों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जांच की तलवार लटका दी है। उनके सैनिक सेवा के रिकार्ड भी खंगाले जा रहे हैं, जिससे कहीं कुछ कमजोर पहलू हाथ आ सके। जबकि इन्हीं अन्ना हजारे को भारत सरकार ने पद्म सम्मान दिये हैं।


यहां प्रश्न उठता है कि यदि अन्ना भ्रष्ट हैं, तो इन्हें पद्म सम्मान क्यों दिये गये ? इसका एक अर्थ यह भी है कि पद्म सम्मान देते समय व्यक्ति की पूरी जांच नहीं होती। यद्यपि ये सम्मान अब सैकड़ों की संख्या में खैरात की तरह बंटते हैं। अतः उसकी प्रतिष्ठा कुछ खास नहीं रही; पर यदि अन्ना भ्रष्ट हैं, तो उनके नाम की अनुशंसा और उन्हें सम्मानित करने वालों को क्या कहेंगे ?


पिछले छह महीने से चल रहे प्रकरण से स्पष्ट हो गया है कि भ्रष्टाचार को मिटाने की नीयत न होने के कारण कांग्रेस आंदोलन को दबाने, भटकाने और कमजोर करने की नीति पर चल रही है। यह बात दूसरी है कि अब तक उसे इसमें पूरी सफलता नहीं मिली है। आगे क्या होगा, यह तो समय के गर्भ में है।


जहां तक सरकारी और जन लोकपाल विधेयक की बात है, आम आदमी तो दूर, सांसदों तक को इसके बारे में ठीक से नहीं पता; पर जनता यह जान गयी है कि शासन की नीयत खराब है, वह भ्रष्टाचार को रोकना नहीं चाहती। इसलिए जनता बिना कुछ जाने अन्ना वाले जन लोकपाल को समर्थन दे रही है।


मीडिया और कांग्रेजजनों ने मनमोहन सिंह की छवि ऐसी बनाई गयी है, मानो वे प्रामाणिकता के अवतार हों; पर अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार को होते देखना क्या अपराध नहीं है ? यदि वे चाहते, तो इसे रोक सकते थे; पर देश के संविधान से अधिक मैडम इटली और राहुल बाबा के प्रति निष्ठा होने के कारण वे चुप रहे।


कांग्रेस को भय है कि यदि प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के अधीन रख दिया गया, तो उनकी ओर से अगले संभावित प्रधानमंत्री राहुल बाबा का क्या होगा ? और यदि पिछले प्रधानमंत्रियों की फाइलें खुलने लगीं, तो राजीव और इंदिरा गांधी से लेकर नेहरू तक के काले मुंह पूरी दुनिया को नजर आ जाएंगे। तब लोगों को पता लगेगा कि जिन्हें वे देश के तारनहार समझते थे, वे तो देशद्रोही थे।


आज आवश्यकता इस बात की है कि देश की नीति भी ठीक हो और शासकों की नीयत भी। यदि नीयत ठीक होगी, तो नीतियां भी ठीक होने लगेंगी। इसलिए भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन करने वाले चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे, उन्हें हर तरह से समर्थन देने की आवश्यकता है।


इस आंदोलन से यदि सत्ता बदलती है, तो उससे एक रात में सब ठीक हो जाएगा, यह सोचना मूर्खता है। वस्तुतः जब तक जाति, भाषा, क्षेत्र और अवैध जोड़तोड़ के आधार पर सिर गिनने वाली यह भ्रष्ट और महंगी चुनाव प्रणाली नहीं बदलेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। आवश्यकता इसके बदले विचारधारा पर आधारित सूची प्रणाली को लाने की है।

जयप्रकाश नारायण और वी.पी.सिंह के आंदोलन के अनुभव बहुत पुराने नहीं हुए हैं। तब भी सत्ता तो बदली; पर व्यवस्था नहीं। फिर भी जन आंदोलन से निरंकुश सत्ता को भय अवश्य लगता है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे इन आंदोलनों की सफलता वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता है।

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