सोमवार, 16 जुलाई 2012

संशयात्मा विनश्यति


महाभारत के युद्ध से पूर्व जब अर्जुन जैसा पराक्रमी योद्धा संशय और विषाद से ग्रस्त होकर, अपने शस्त्र त्याग कर संन्यासी होने की बात कहने लगा, तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर उसके संशय को दूर किया। 


संसार में हर व्यक्ति और संस्था के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं। इससे वह जितनी जल्दी उबर जाए, उतना ही भला होता है। व्यक्ति के संशय से उसकी और उसके परिवार की, जबकि संस्था के मुखिया के संशय से पूरी संस्था की हानि होती है। 


दुर्भाग्यवश इस समय देश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का यही हाल है। केन्द्र में सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी, दोनों ही संशय तथा अनिर्णय की शिकार हैं। आश्चर्यजनक रूप से दोनों की इस स्थिति का कारण भी लगभग समान ही है। 


जहां तक कांग्रेस की बात है, वहां शीर्ष पर मैडम सोनिया, राहुल बाबा और मनमोहन सिंह बैठे हैं। मैडम के विचार किसी भी गंभीर राष्ट्रीय समस्या पर कभी किसी ने नहीं सुने। वे कुछ लोगों द्वारा रोमन लिपि में लिखे हिन्दी भाषणों को पढ़ती मात्र हैं। उन्होंने कभी किसी सार्वजनिक सभा में बिना कागज देखे भाषण नहीं दिया। आज तक उन्होंने किसी पत्रकार को साक्षात्कार नहीं दिया। भारत की कोई भाषा ठीक से न जानने वाली मैडम को निर्देश कहां से मिलता है, यह कोई नहीं जानता। 


यह भारत जैसे देश का दुर्भाग्य है कि विचारों से कंगाल ऐसी मैडम को कांग्रेस ने सिर पर बैठा रखा है। पिछले कुछ साल से वे बीमार हैं। उनके रोग के बारे में दो-चार लोगों के अतिरिक्त किसी को नहीं पता। उसका इलाज उन्होंने भारत की बजाय विदेश में गुपचुप ढंग से क्यों कराया, यह पूछने का साहस कांग्रेस में किसी को नहीं है। इस रोग के कारण उनकी सक्रियता लगातार घट रही है। ऐसे में पूरे दल को लकवा मारना स्वाभाविक ही है। 


कांग्रेस में नंबर दो कहलाने वाले राहुल बाबा सचमुच बबुआ ही हैं। भारत में जन्म लेने के कारण वे हिन्दी बोल और समझ तो लेते हैं; पर विचारों की कंगाली वहां भी कम नहीं है। इसलिए वे भी लिखे हुए भाषण ही पढ़ते हैं। उन्होंने भी कभी किसी पत्रकार को विधिवत साक्षात्कार नहीं दिया। देश को नहीं पता कि विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर उनके विचार क्या हैं ? जैसा उनके लेखक लिख देते हैं, वैसा ही वे पढ़ देते हैं।


राहुल बाबा ने कांग्रेस के संगठन को ठीक करने का बहुत प्रयास किया; पर हर जगह उन्हें असफलता ही मिली। युवा कांग्रेस में वही लोग हावी हैं, जिनके माता या पिता राजनीति में हैं। बिहार और उ0प्र0 के विधानसभा चुनाव में राहुल ने कई नाटक किये; पर जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। जहां-जहां वे गये, वहां कांग्रेस बुरी तरह हारी। उनका जाना अब अपशगुन माना जाने लगा है। इसलिए कांग्रेस वाले उन्हें चुनाव प्रचार में बुलाना ही नहीं चाहते। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री ने सितारगंज में राहुल को नहीं बुलाया और भारी मतों से जीते।


कांग्रेस में तीसरी मूर्ति निःसंदेह मनमोहन सिंह हैं। प्रायः लोगों को  उनकी योग्यता के कारण कुर्सी मिलती है; पर भारत में कांग्रेस शासन इसका अपवाद है। यहां योग्यता और जनाधार न होने के कारण मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली है। जिस व्यक्ति का पूरा जीवन दूसरों की नौकरी बजाते और जी-हुजूरी करते बीता हो, वह अपनी इच्छा से कुछ कर पाएगा, यह सोचना ही व्यर्थ है। 


इस कांग्रेसी मेज के चौथे पाये थे श्री प्रणव मुखर्जी, जो सरकार में हर समस्या के लिए संकटमोचक की भूमिका निभा रहे थे; पर अब उन्होंने सब पदों से मुक्ति पा ली हैै। जिस मेज के चारों पैर दुर्बल हों, उसका टिके रहना असभंव है। संशय और अनिर्णय की शिकार इस कांग्रेस सरकार और दल का भविष्य क्या होगा, कहना कठिन है ?


दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का भी यही हाल है। उ0प्र0 के चुनाव में वे अन्त तक सेनापति ही तय नहीं कर पाये। इसी कारण उनकी यह दुर्गति हुई। कन्नौज के उपचुनाव में भी यही हाल रहा। उत्तराखंड में चुनाव परिणाम आने के बाद यदि हरीश रावत या हरक सिंह की पीठ पर हाथ रख देते, तो कांग्रेसी पंजा टूट जाता। सितारगंज उपचुनाव में भी बहुत देर में प्रत्याशी तय हो सका। 


उ0प्र0 में एक समय भाजपा शासन ने बड़ी संख्या में लाल बत्तियां बांटी थीं। यद्यपि ऐसा तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी के षड्यन्त्र को विफल करने के लिए मजबूरी में किया गया था; पर इसका संदेश बहुत गलत गया। उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी ने भी यही किया था; पर दोनों सरकारों को जनता ने धूल चटा दी। कर्नाटक में जगदीश शेट्टार ने जितना बड़ा मंत्रिमंडल बनाया है, उसका परिणाम भी भविष्य में यही होने की संभावना है।


राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में भाजपा की भूमिका सबसे अधिक हास्यास्पद रही है। प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते उन्हें अपना प्रत्याशी मैदान में उतारना चाहिए था। हार होती या जीत; पर लड़ाई से बाहर तो न होते। अब प्रणव मुखर्जी जीते या संगमा, भाजपा को तो खाली हाथ ही रहना है। यदि भाजपा वाले अपना प्रत्याशी पहले उतार देते, तो कांग्रेस मजबूर होकर समझौता करती और उपराष्ट्रपति पद भाजपा को मिल जाता; पर संशय में घिर कर उसने दोनों पद खो दिये। 


भाजपा द्वारा निर्दलीय प्रत्याशी पूर्णो संगमा को समर्थन बहुत ही आश्चर्यजनक है। भाजपा वाले यह कैसे भूल गये कि संगमा कांग्रेसी ही नहीं, कट्टर ईसाई भी हैं। 1996 में जब वे लोकसभा अध्यक्ष के नाते पहली बार कुर्सी पर बैठे, तब उनके दोनों ओर अपने मजहबी वेश में दो बिशप उपस्थित थे। संगमा यदि राष्ट्रपति बन गये, तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे शपथ के समय पोप या उसके प्रतिनिधि को ही बुला लें। सोनिया मैडम भले ही दिखावे के लिए उनकी विरोधी हों; पर संगमा की जीत से वे प्रसन्न ही होंगी। हां, करेले और नीम का यह मिलाप देश के लिए कितना घातक होगा, कहना कठिन है।


राजीव गांधी बोफोर्स दलाली और श्रीलंका संबंधी गलत निर्णय के चलते अधिक समय तक शासन नहीं कर सके; पर पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों में विधानसभा चुनाव के समय बाइबल के आदेशों के अनुसार शासन चलाने की बात उन्होंने सार्वजनिक रूप से कही थी। यहां यह भी न भूलें कि संगमा भी पूर्वाेत्तर में ईसाई बहुल मेघालय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 


राजीव की मृत्यु के बाद सोनिया मैडम द्वारा ईसाइयों को जो महत्व दिया जा रहा है, वह चिन्ताजनक है। उन्होंने प्रायः सभी ईसाइयों को ही मुख्यमंत्री बनाया है। उड़ीसा में गिरधर गमांग, छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, आंध्र में राजशेखर रेड्डी, केरल में ए.के.एंटनी और अब ओमन चांडी.. ये सब ईसाई ही हैं। अब ए.के.एंटनी को केन्द्र सरकार में प्रणव मुखर्जी के बदले दो नंबर का स्थान मिल गया है। आस्कर फर्नांडीज, विसेंट जार्ज, मार्गरेट अल्वा आदि मैडम के परम विश्वस्त हैं। पी.जे.थॉमस को केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त बनाने का षड्यन्त्र न्यायालय ने विफल कर दिया। कांग्रेस में वे नेता महत्वपूर्ण स्थानों पर हैं, जिनकी पत्नियां ईसाई (और विशेषकर विदेशी) हैं।


कांग्रेस में शिखर पर फैले संशय और अनिर्णय से देश लगातार गड्ढे में जा रहा है। दूसरी ओर भाजपा में भी यही हाल है। वहां वर्तमान टीम के सिर पर जो बुजुर्ग सवार हैं, वे जब तक स्थायी अवकाश नहीं लेंगे, तब तक भाजपा का उद्धार कठिन है। इसलिए जीवन के चौथेपन में चल रहे नेताओं को अपना शेष समय अनुभव लिखने में लगाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो, यदि इस सूची में वे पूर्व अध्यक्ष भी शामिल कर लिये जाएं, जिनका अपने राज्यों में ही जनाधार नहीं है। इससे उनका मान-सम्मान बचा रहेगा, जो अब लगातार घट रहा है। 


कांग्रेस के संशय का कोई इलाज नहीं है। वहां नेतृत्व के लिए सब राहुल बाबा का नाम लेते हैं, जो फटे गुब्बारे से अधिक कुछ नहीं हैं; पर भाजपा में तो राज्यों से लेकर केन्द्र तक सबल, सक्षम और योग्य नेताओं की पूरी सेना तैयार है; लेकिन जब तक थके और बुझे हुए शीर्ष पुरुष उन्हें स्वतन्त्र निर्णय नहीं करने देंगे, तब तब भाजपा का रथ संशय और अनिर्णय के कीचड़ में फंसा रहेगा।


खेल जगत में कहा जाता है कि जब खिलाड़ी अपने सर्वोच्च शिखर पर हो, तब उसे अवकाश ले लेना चाहिए। उसके जाते समय लोग कहें कि अभी और खेलते तो अच्छा रहता; पर कुछ लोग अपने नाम और पुराने काम के बल पर टीम में बने रहते हैं। उनके खेल का स्तर क्रमशः गिरता जाता है और लोग पूछने लगते हैं कि ये कब अवकाश लेंगे ? किसी भी अच्छे खिलाड़ी के लिए यह स्थिति बहुत ही अपमानजनक है।


कांग्रेस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से भी सब यही पूछ रहे हैं - हे महानुभावो, आप कब अवकाश पर जाने की कृपा करेंगे ? 

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