शनिवार, 29 दिसंबर 2012

व्यंग्य बाण : शिष्टाचार हमारी परम्परा है


शर्मा जी के गुस्से की बात न पूछें। भगवान न करे कभी आपको ऐसे में उनके सामने जाने का मौका मिले। गुस्से में उनका चेहरा ऐसा लगता है मानो जून में हीटर जला दिया हो।

पर मैं उनका पुराना मित्र हूं, इसलिए मुझे ऐसे माहौल को झेलने का अभ्यास है; पर कभी-कभी बात इतनी गंभीर हो जाती है कि मुझे ठंड में भी पसीना आ जाता है।  

बात अधिक पुरानी नहीं है। आपने भी अखबार और दूरदर्शन पर पढ़ा या सुना होगा। हमारे परम आदरणीय गृहमंत्री शिन्दे साहब उस समय तो चुप रहे, जब पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मलिक भारत आकर अंट-संट बोलते रहे; पर उनके वापस जाते ही शिन्दे साहब के मुंह में लगा ताला खुल गया।

रहमान मलिक ने दिल्ली आकर भारतीय नेताओं को साफ-साफ बता दिया कि भारत ने मुंबई हमले और नरसंहार के सूत्रधार हाफिज सईद के बारे में जो प्रमाण पाकिस्तान को दिये हैं, वे अपर्याप्त हैं। इसलिए उसे गिरफ्तार करने के बाद भी न्यायालय ने छोड़ दिया।

उस समय तो शिन्दे साहब की बोलती बन्द रही; पर उसके जाते ही वे रहमान मलिक और पाकिस्तान सरकार पर आरोप लगाने लगे कि हाफिज सईद को मुंबई मामले में तो गिरफ्तार ही नहीं किया गया। उसकी गिरफ्तारी वस्तुतः किसी और मामले में थी। 

पर शर्मा जी के गुस्से का कारण यह नहीं था। उनका पारा इस कारण चढ़ा हुआ था कि सुशील शिन्दे ने अपने वक्तव्य में बार-बार ‘श्री हाफिज मोहम्मद सईद’ कहकर उस खूंखार आतंकी का नाम लिया। उनका बस चलता, तो वे सुशील शिन्दे का मुंह नोच कर उसे कुशील फिन्दे कर देते।
मैंने उन्हें समझाना चाहा - शर्मा जी, सरदी के मौसम में इतना गरम होना ठीक नहीं है। राजनीति और कूटनीति में कुछ मर्यादा निभानी पड़ती है। आप और हम इसे नहीं जानते। 

- भाड़ में जाए तुम्हारी मर्यादा। जब पकिस्तान हमारे साथ किसी मर्यादा का पालन नहीं करता, तो फिर हम क्यों करें ?

- देखिये पाकिस्तान अभी बच्चा है। अभी उसकी उम्र जुम्मा-जुम्मा सिर्फ 65 साल ही तो है, जबकि हमारा देश लाखों-करोड़ों साल पुराना है। उसे अभी बहुत कुछ सीखना है। हम यदि शिष्टाचार का व्यवहार करेंगे, तो उसे भी कुछ अक्ल आयेगी।

- तुम बेकार की बात मत करो वर्मा। कुत्ते की दुम चाहे दस साल नली में डालकर रखो, निकालने पर वह तिरछी ही मिलती है।

- हां, यह तो है।

- फिर, तुम यह क्यों भूलते हो कि बंगलादेश मुक्ति संग्राम के बाद इसी दुष्ट पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों की हमने कितने दिन तक खातिरदारी की थी। खुद चाहे भूखे रहे, पर उन्हें ईद पर सेवियां खिलाईं; पर इसने करगिल युद्ध में बन्दी बनाये गये हमारे वीर सौरभ कालिया को तड़पा-तड़पा कर मारा।

- उसके बाद भी इसे चैन कहां मिला शर्मा जी ? तब से इसने कश्मीर में आतंकवादियों को भेजकर हमारा जीना हराम कर रखा है।

- जी हां। हमारी भलमनसाहत का इसने सदा गलत फायदा उठाया है। संसद पर हमला हो या मुंबई का नरसंहार। यह दुष्टता से बाज नहीं आता, और हम हैं कि शिष्टाचार ही निभा रहे हैं।

- वह कैसे शर्मा जी ?

- देखो, संसद पर हमले के अपराधी मोहम्मद अफजल को फांसी  देने की बजाय हम उसकी खातिरदारी में लगे हैं। कश्मीर में बंद पाकिस्तानी आतंकियों को बिरयानी खिलाकर मोटा किया जा रहा है। कोयम्बटूर हमले के अपराधी मदनी को सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है। 

- पर सरकार ने मुंबई के अपराधी मो0 अजमल कसाब को फांसी तो दी है। 

- हां; पर उसे पुणे की जेल में ही क्यों दफना दिया ? हमें अमरीका  से कुछ सीखना चाहिए था, जिसने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारा और मछलियों की दावत के लिए उसकी लाश को समुद्र में फेंक दिया। क्या हमारी सरकार कसाब के साथ ऐसा नहीं कर सकती थी ?

- शर्मा जी आप भूलते हैं कि हमारी सरकार सेक्यूलर सरकार है।  इसीलिए तो दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के मुंह से ‘ओसामा जी’ ही निकलता है।

- यही तो मेरे गुस्से का कारण है। ऐसे सेक्यूलरवाद को ओढ़ें या बिछाएं। रहमान मलिक हमारे घर में आकर, अपने गुरगे अबू जंदाल को भारतीय एजेंट बता रहा है, और हमारे नेता कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए श्री श्री और जी जी कर रहे हैं।

- शर्मा जी, ‘अतिथि देवो भव’ तो हमारे देश की परम्परा है। 

- परम्परा तो हमारे देश में ‘शठे शाठ्यम समाचरेत’ (जैसे को तैसा) की भी है। उनकी ओर भी तो ध्यान देना चाहिए।

- आप कहना क्या चाहते हैं; पाकिस्तान से हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए ?

- वर्मा जी, इसके लिए भी हमारे शास्त्रों ने बहुत सुंदर बात बताई है। हमें इसका ही पालन करना चाहिए।

खलानां दुष्ट जनानां, द्वै उपायः विधीयते
उपानद मुखभंगो वा, दूरतो या विसर्जनम्।

(मूर्ख और दुष्ट लोगों से निबटने के दो उपाय कहे जाते हैं। या तो उनका मुंह जूतों से तोड़ दो, या फिर उनसे दूर रहो।)

मैं सोच रहा था कि शर्मा जी मुझे चाय पिलाएंगे; पर बात जूतों और मुंह तोड़ने तक पहुंचने लगी, तो मैंने अपने जूते पहनकर चलना ही उचित समझा।

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