बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

व्यंग्य बाण : छिपाने का सामान


किसी भी लेखक के लिए उसकी पुस्तक का छपना और फिर विमोचन होना ऐसा ही है, जैसे बहुत प्रतीक्षा के बाद घर में बेटे का जन्म और फिर उसका विवाह होना; पर यह सब इतना आसान काम नहीं है। जो लेखक अच्छे या बुरे, किसी भी कारण से प्रसिद्ध हो जाते हैं, उनकी बात तो जाने दें; पर बाकी के बारे में यह शत-प्रतिशत सच है। विश्वास न हो, तो किसी भी लेखक से पूछ लें।

मेरी भी ऐसी कई पुस्तकों की पांडुलिपियां वर्षों से अल्मारी और फाइलों में पड़ी धूल खा रही थीं। एक भले आदमी के माध्यम से मेरा एक प्रकाशक महोदय से सम्पर्क हो गया और वे मेरी कुछ पुस्तकें छापने को तैयार हो गये।

अब मैं तेजी से इस काम में लग गया। पुस्तकों की सामग्री पर फिर से एक बार निगाह डालकर उन्हें प्रकाशक और फिर प्रेस में भेजा। इसके बाद कम से कम दो बार उनका प्रूफ पढ़ना और मुखपृष्ठ की सज्जा भी एक महत्वपूर्ण काम था। 

मैंने एक महीने तक घर में ही रहकर प्राथमिकता के आधार पर यह काम करने का निश्चय किया। कहीं ऐसा न हो कि प्रकाशक महोदय का मन बदल जाए और फिर ऐतिहासिक महत्व की वे पुस्तकें छपने से रह जाएं।

इसलिए मैंने अपने सब मित्रों को बता दिया कि 144 साल बाद हो रहे इस महाकुंभ में मैं एक महीने के कल्पवास हेतु प्रयाग जा रहा हूं। वहां के धार्मिक तथा आध्यात्मिक वातावरण में मैं अपना मोबाइल भी बंद रखूंगा। इसलिए वे सम्पर्क का प्रयास न करें।

लेकिन महाकुंभ में हुई दुर्घटना से मेरे मित्रों की चिन्ता बढ़ गयी। जब मृतकों की सूची और चित्रों में उन्हें मैं दिखाई नहीं दिया, तो वे शान्त हो गये; लेकिन शर्मा जी को फिर भी चैन नहीं पड़ा और वे मेरी कुशलमंगल जानने के लिए घर पर ही आ धमके।

अब मैं आपको क्या बताऊं ? जब वे आये, तो मैं कागजों से उलझा हुआ था। मेरे हाथ में पुस्तक के मुखपृष्ठ के नमूने भी थे। मैं नहीं चाहता था कि प्रकाशन और विधिवत विमोचन से पहले कोई उन्हें देखे। इसलिए मैंने उन्हें दरी के नीचे छिपा दिया। यह देखते ही वे भड़क गये।

- वर्मा, महाकुंभ और कल्पवास के नाम पर झूठ बोलकर तुम यहां घुसे बैठे हो, यह ठीक नहीं है।

- शर्मा जी, पहले आप मेरी पूरी बात सुन लें...।

- मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है। तुम तो मुझे दो वाक्यों में यह बता दो कि तुम्हारे पास आखिर ऐसी क्या चीज है, जो तुम मुझसे और बाकी सबसे छिपाना चाहते हो ?

- शर्मा जी, आप मुझ पर विश्वास करें। मेरे पास छिपाने जैसी कोई चीज नहीं है। मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रक्षामंत्री एंटनी या देश के उस विशिष्ट ‘परिवार’ की तरह नहीं हूं, जो हर दिन कुछ न छिपाने की दुहाई दे रहे हैं। 

- वर्मा, लगता है तुम्हारा शकों से कोई पूर्व जन्म का नाता है। इसलिए तुम हर किसी पर शक करने लगते हो। वे बेचारे...।

- शर्मा जी, आप भले ही उन्हें बेचारा कहें; पर इस समय मैं नहीं, पूरा देश उन पर शक कर रहा है। फिर बात जब रक्षा सौदे और इटली की हो, तो शक होना ही है। 

- क्यों, इटली में क्या खास बात है ?

- लगता है आप बोफोर्स कांड को भूल गये हैं ?

- कुछ-कुछ याद तो आ रहा है। 

- तो ठीक से याद कर लीजिये। वहां भी इटली, क्वात्रोकी और राजीव गांधी का त्रिकोण था। राजीव गांधी पहले कहते थे कि मैंने दलाली नहीं ली। फिर बोले कि मेरे परिवार में से किसी ने नहीं ली; पर इससे आगे की बात बोलने से पहले ही वे दिवंगत हो गये। 

- तो बोफोर्स और हैलिकाॅप्टर सौदे में क्या कुछ समानता है ?

- बहुत समानता है। दोनों में रिश्वत दी गयी, यह तो पक्का है; पर भारत में वह किसने ली, यह साफ नहीं हुआ।

- लेकिन सी.बी.आई. ने इसकी जांच तो की थी ?

- शर्मा जी, आप भी बहुत भोले हैं। भारत में जितने भी बड़े घोटाले हुए हैं, किसी की जांच अपनी पूर्णता तक नहीं पहुंची। हां, कुछ लाख या कुछ करोड़ वाले मामलों में लोग जेल जरूर गये हैं। 

- सुना है हैलिकाॅप्टर खरीद के इस मामले में 320 करोड़ रु0 की रिश्वत दी गयी है। ये राशि तो बहुत अधिक है वर्मा ?

- शर्मा जी, बोफोर्स तोपों के लिए 65 करोड़ रु0 की रिश्वत ली गयी थी। तब से महंगाई दस गुना बढ़ गयी है। ऐेसे में बिचैलियों का 320 करोड़ रु0 का हक तो बनता ही है। फिर जहां पौने दो लाख करोड़ रु0 के घोटाले हुए हों, वहां यह पैसा तो चिल्लर जैसा है; लेकिन बात चूंकि रक्षा मंत्रालय की है, इसलिए बहुत गंभीर है।

- तो इस मामले में क्या होगा ?

- वही जो पहले होता आया है। कुछ दिन शोर होगा, फिर पहले की तरह पतनाला वहीं गिरने लगेगा। 

- लेकिन वर्मा, ऐसे में विपक्ष की भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है।

- हां, बोफोर्स कांड के विरुद्ध विश्वनाथ प्रताप सिंह ने झंडा बुलंद किया था। देश ने भी उनका भरपूर साथ दिया; पर आज कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा। क्योंकि इस मामले के तार बहुत पीछे तक जा रहे हैं। सच हो या झूठ; पर बदनामी से तो हर आदमी डरता ही है।

शर्मा जी को आये काफी देर हो चली थी। मेरा काम अटक रहा था। इसलिए मैंने उन्हें एक कप चाय पिलाकर यह संकेत दिया कि अब वे कृपया प्रस्थान करें। मेरी बात समझकर वे उठ खड़े हुए।

- लेकिन वर्मा, कल्पवास के नाम पर झूठ बोलकर, इस तरह घर में छिपे रहना ठीक नहीं है। तुम्हें निश्चित रूप से पाप लगेगा।

- शर्मा जी, मैं तो इस पाप को भुगत लूंगा; पर आप कृपया हमारे उन महान नेताओं से जाकर कहें कि उनके पापों के कारण देश के हर नागरिक की आंखें शर्म से झुकी जा रही हैं। भारत के जो लोग विदेशों मे काम-धंधा कर रहे हैं, उनके लिए सिर उठाकर चलना कठिन हो गया है। यदि इन नेताओं में कुछ शर्म और हया बाकी है, तो छिपने-छिपाने का यह गंदा खेल छोड़कर वे हमारी नजरों से दूर हो जाएं। अन्यथा कुछ दिन बाद जनता अपने वोट की ताकत से उन्हें स्थायी कल्पवास में भेज देगी।

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