बुधवार, 6 मार्च 2013

व्यंग्य बाण : लाली देखन मैं गयी...


शब्द, उसके अर्थ, मात्रा और फिर उसके उच्चारण की महिमा निराली है। यदि शब्द को बोलने या सुनने में कुछ गड़बड़ हो जाए, तो कई बार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है। उर्दू में तो इसके लिए एक कहावत ही है - नुक्ते की गलती से खुदा जुदा हो गया। हिन्दी में भी ‘रोको, मत जाने दो’ और ‘रोको मत, जाने दो’ जैसे उदाहरण देकर शब्द और मात्राओं के प्रयोग समझाये जाते हैं।

यों तो एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। ‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय’ ...वाला दोहा आपने भी सुना ही होगा। इसमें एक कनक का अर्थ सोना है, तो दूसरे का धतूरा। ऐसे प्रयोग को हिन्दी काव्य में ‘यमक अलंकार’ कहा गया है।

एक ही शब्द के अलग-अलग भाषा या क्षेत्रों में भी अलग-अलग अर्थ होते हैं। घुमक्कड़ लोगों को इस मामले में बहुत सावधानी रखनी होती है। दूध शब्द से प्रायः गाय या भैंस के दूध का अर्थ लगाया जाता है; पर मैंने सुना है कि भारत के कुछ राज्यों में दूध का अर्थ मां का दूध होता है। ऐसे में यदि आप किसी घर या दुकान में जाकर दूध की मांग करें, तो हो सकता है हाथापाई हो जाए। 

चाय के साथ मैदे से बनी नमकीन मट्ठी आपने भी कई बार खाई होगी; पर इसका अर्थ कुछ स्थानों पर युवा लड़की होता है। यदि आप ऐसे किसी स्थान पर जाएं, तो चाय वाले से मठरी भले ही मांग लें; पर भूलकर भी मट्ठी की बात न कहें, वरना हो सकता है वह आपको पुलिस के हवाले कर दे।

मेरा कहने का अभिप्रायः यह है कि एक ही शब्द के कई अर्थ होते ही हैं; पर यह अजूबा कम ही देखने में आता है कि कई शब्दों का एक ही अर्थ हो। भारत में आजकल ऐसा ही हो रहा है।

‘मोदी’ शब्द भारत वालों के लिए अनजाना नहीं है। दैनिक उपयोग के लिए आटा, दाल, चावल आदि का भंडार करने और बेचने वाले को प्रायः मोदी कहा जाता है। इसी से ‘मोदीखाना’ शब्द प्रचलित हुआ। शायद इसी से मोदी गोत्र भी निकला होगा।

दिल्ली से हरिद्वार जाते समय लगभग 50 कि.मी. दूर ‘मोदीनगर’ आता है। जिसे रायबहादुर गूजरमल मोदी ने बसाया था। वहां मोदी परिवार द्वारा स्थापित कई उद्योग हैं। किसी समय भारत के उद्योगपतियों में मोदी का डंका बजता था। वहां लालटेन से लेकर साबुन तक बनते थे; पर अब सम्पत्तियों के बंटवारे के साथ ही इस परिवार का जलवा भी कम हो गया। 

हां, इस परिवार के एक लाड़ले सपूत ललित मोदी ने आई.पी.एल. के माध्यम से क्रिकेट में बहुत नाम कमाया। उसने खेल के नाम पर मनोरंजन, पैसे और दलाली का काॅकटेल बनाकर जनता को खूब मूर्ख बनाया। यद्यपि वह खुद इस जाल में ऐसा फंसा कि भारत आना ही कठिन हो गया है। 

मोदी नाम से सुशील मोदी का भी ध्यान आता है, जो इन दिनों बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं। कहते हैं कि यदि वे पीछे हट जाएं, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दो मिनट में चित हो जाएं; पर दोनों ही मजबूर हैं। इसलिए मतभेद और मनभेद होते हुए भी अन्धे और लंगड़े की तरह दोनों लगातार साथ निभा रहे हैं।

लेकिन इन दिनों मोदी नाम लेते ही जिस प्रभावी और तेजस्वी व्यक्ति का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है, वह है नरेन्द्र मोदी। आप उनसे सहमत या असहमत हो सकते हैं; उनके घोर समर्थक या कट्टर विरोधी भी हो सकते हैं; पर उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। ‘जिधर देखता हूं, उधर तू ही तू है..’ की तरह नरेन्द्र मोदी के चाहने वाले उनके दिल्ली आने की चर्चा से उत्साहित हैं, तो उनके विरोधी अभी से पसीने-पसीने हो रहे हैं। 

पिछले दिनों दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। वहां अंदर क्या हुआ, ये तो अंदर वाले ही जानें; पर अखबारों में जो छपा, उससे तो लगा कि नरेन्द्र मोदी का जादू वहां सबके सिर चढ़कर बोल रहा था। मिशन और कमीशन, दीमक और पसीना, परिवार और चौकीदार जैसी उनकी चुटकियों ने सबका दिल जीत लिया।

पर उनके इस सम्बोधन से कांग्रेस वालों को भी खूब मिर्चें लगीं और सारे भोंपू एक स्वर में बोलने लगे। कोई उन्हें अभद्र बता रहा है, तो कोई अशालीन, कोई सांप कह रहा है, तो कोई बिच्छू। एक से एक भारी शब्द ढूंढ कर शब्दकोश में से निकाले जा रहे हैं; पर नरेन्द्र मोदी हैं कि आसपास के क्षुद्र जीवों की चिन्ता किये बिना मस्त हाथी की तरह बढ़े जा रहे हैं। 

मुझे पिछले दिनों कुछ घरेलू कामों से गांव जाना पड़ा। लौटकर आया, तो पता लगा कि शर्मा जी बीमार हैं। उनके घर गया, तो शर्मा मैडम बहुत परेशान थीं। बिस्तर के पास दवाइयों का ढेर लगा था। उन्होंने बताया कि रात में सोते-सोते अचानक शर्मा जी चीख पड़ते हैं - बचाओ, बचाओ, मोदी आया। 

शर्मा जी मेरे पुराने मित्र हैं। मैंने उन्हें समझाया कि आप दुखी न हों, क्योंकि नरेन्द्र मोदी के आने से भले लोगों को परेशान नहीं होना पड़ेगा; पर वे कुछ समझने की मानसिकता में ही नहीं थे।

मैडम शर्मा ने बताया इस बीमारी का कारण दूरदर्शन भी है। जिस दिन दिल्ली में नरेन्द्र मोदी का भाषण हुआ, दिन भर सभी चैनल उसे ही दिखाते रहे। शर्मा जी ने कई चैनल बदले; पर हम जगह वही नरेन्द्र मोदी की हुंकार। अगले दिन अखबार देखे, तो सबमें मुखपृष्ठ पर नरेन्द्र मोदी। जैसे लंका दहन के बाद वहां सबको सपने में भी हनुमान जी नजर आते थे, ऐसा ही हाल शर्मा जी का हो गया।

मैं इस समस्या का समाधान ढूंढने एक मनोविज्ञानी डा0 वर्मा के पास गया। उन्होंने बताया कि यूनानी लोककथाओं में एक ऐसी मकड़ी की चर्चा आती है, जो जाल में बैठे-बैठे ही अपने शिकार पर आंखें गड़ा देती है। धीरे-धीरे वह शिकार सम्मोहित होकर आगे बढ़ने लगता है और उस मकड़ी के शरीर में समाहित हो जाता है।

मुझे कबीरदास जी की पंक्तियां याद आईं -

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल।।

डा0 वर्मा ने बताया कि उनके पास इन दिनों ‘मोदी बुखार’ से ग्रस्त मरीज बड़ी संख्या में आ रहे हैं। इनमें मोदी के विरोधी तो हैं ही, कुछ समर्थक भी हैं। कांग्रेस वालों का तो बुरा हाल है। उनकी बैठक का एजेंडा चाहे जो हो; पर थोड़ी देर में ही वहां किसी न किसी रूप में नरेन्द्र मोदी की चर्चा होने लगती है। जैसे किसी समय अफगानिस्तान की महिलाएं अपने बच्चों से कहती थीं कि सो जा, नहीं तो नलवा आ जाएगा। इसी तरह कांग्रेस वाले अपने कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि जाग जाओ, वरना मोदी आ जाएगा। राहुल बाबा और बड़ी मैडम को तो बिना गोली खाए नींद ही नहीं आती।  

- पर डा0 साहब, इसका कोई इलाज.. ? मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

- ऐसा लगता है कि यह ‘मोदी बुखार’ अगले साल ‘मोदी की जयकार’ में बदलकर स्वयं ही शांत हो जाएगा।  

मैंने शर्मा जी को सलाह दी है कि वे डा0 वर्मा से मिल लें। यदि आपके आसपास भी कोई ऐसा मरीज हो, तो उसे यथाशीघ्र वहां पहुंचा दें। ऐसा न हो कि मनीष तिवारी और मणिशंकर अय्यर की तरह यह बुखार लाइलाज होकर सन्निपात में बदल जाए।

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