शनिवार, 16 मार्च 2013

व्यंग्य बाण : अंकल कहि-कहि जायं


भारतीय नव वर्ष और अंग्रेजी न्यू ईयर में बड़ा भारी अंतर है। अंग्रेजी साल के आते समय भीषण सरदी से जनजीवन बेहाल रहता है। रजाई, कंबल और स्वेटर से बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। धन्य है वह वैज्ञानिक, जिसने मोबाइल फोन का आविष्कार किया। उसकी कृपा से लोग रजाई में घुसे-घुसे ही एस.एम.एस. कर अपने मिलने वालों को बधाई पहुंचा देते हैं। फीकी बधाई देने का सबसे सस्ता और सरल उपाय अभी तक तो यही है।

पर भारतीय नव वर्ष की महिमा निराली है। इस समय मौसम ऐसा सुहाना होता है कि कोई चाहकर भी घर में नहीं बैठ सकता। मनुष्य ही क्या, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी अपनी पूरी रंगत में होते हैं। चारों ओर हर्ष, आनंद और उमंग का वातावरण विद्यमान रहता है। वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि और होली से होता हुआ उल्लास नव वर्ष आते ही अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाता है। ऐसे में भी यदि कोई घर में घुसा रहे, तो उसे मनहूस नहीं तो और क्या कहेंगे ?

मेरे परम मित्र शर्मा जी यों तो बड़े खुशदिल आदमी हैं; पर पिछले कुछ दिन से वे न जाने क्यों सुबह टहलने नहीं आ रहे थे। मौसम बदलते समय कई लोग सर्दी और बुखार के चक्कर में आ जाते हैं। अतः मुझे भी उनकी तबीयत के बारे में शंका हो गयी और मैं बिना बताये उनके घर जा पहुंचा। सोचा भाभी जी के हाथ की एक कप गरम चाय मिलेगी और हालचाल भी पता लग जाएगा।

उनके घर पहुंचा, तो शर्मा जी बड़ी मुश्किल से बाहर आने को तैयार हुए। अपने ही घर में ऐसी बेरुखी देखकर मुझे बड़ी हैरानी हुई। मैं हालचाल पूछना ही चाहता था कि वे अचानक रुआंसे हो गये। 

- क्यों वर्मा, क्या मैं बूढ़ा लगता हूं ?

- सुबह-सुबह कैसी बात कर रहे हैं शर्मा जी... ?

- नहीं वर्मा, सच बताओ। तुम्हें मेरी कसम।

- शर्मा जी मैं इन झूठी कसमों मे विश्वास नहीं रखता। अगर इनमें कुछ दम होता, तो सर्वोच्च न्यायालय में कसम खाकर दो हत्यारे नौसैनिक अपने घर इटली न भाग जाते।

- अच्छा कसम को छोड़ो; पर बताओ क्या मैं बूढ़ा हो गया हूं ?

- शर्मा जी, बूढ़े हों आपके दुश्मन। आप तो इतने जवान हैं कि क्या कहूं; पर आज ये बेवक्त का वृद्धराग कैसे याद आ गया ?

- कुछ पूछो मत वर्मा। पिछले दिनों मैं बाजार गया, तो बाल-बच्चों वाली कई महिलाएं मुझे ‘अंकल जी’ कहने लगीं।

- आप भी कहां-कहां की बात सोचने लगते हैं शर्मा जी। कहने से ही कोई अंकल नहीं बन जाता।

- पर... ?

- पर और बेपर की छोडि़ये। वैसे तो जब से राहुल बाबा ने शादी न करने की घोषणा की है, तब से लोग उन्हें भी ‘राहुल अंकल’ कहने लगे हैं। क्या इससे वे अंकल हो गये ?

- देखो वर्मा, तुम हमारे राहुल जी के बारे में कुछ मत कहो।

- मेरे चुप रहने से क्या होगा शर्मा जी ? लोग बचपन से जवानी की ओर बढ़ते हैं; पर वे तो सीधे ‘अंकल’ हो गये। 

- तो क्या अंकल की कुछ विशेष पहचान होती है ?

- बिल्कुल। कुछ पहचान तो बाहरी होती हैं, जो सबको दिखाई दे जाती हैं। जैसे बालों की सफेदी, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी होने के कारण माथे पर खिंची लकीरें, थका हुआ चेहरा, अस्त-व्यस्त कपड़े, हाथ में सब्जी और राशन के लिए थैला, बड़बड़ाते होठों पर बीमा और पेंशन का हिसाब....आदि से कोई भी आसानी से समझ सकता है कि ये अंकल जी हैं।

- और ...?

- और अंकल लोग घर हो या बाजार, दफ्तर हो या व्यापार, हर जगह समझदार नागरिक जैसा व्यवहार करते हैं। वे किसी जिम्मेदारी से डरते नहीं और सफलता या असफलता से घबराते नहीं।

- हमारे राहुल जी में तो ये सब विशेषताएं पहले से ही हैं।

- पर लोग तो ऐसा नहीं मानते। जो व्यक्ति घर-परिवार का बोझ ही नहीं उठा सकता, वह देश को कैसे संभालेगा ? शायद इसी डर से उन्होंने प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से अलग कर लिया है। इसलिए कई लोग तो उन्हें अभी से ‘मामू’ कहने लगे हैं।

- ये तुम्हारी क्षुद्र सोच है वर्मा; पर मैं ऐसा नहीं मानता।

- शर्मा जी, ओवैसी हो या गीलानी और मलिक, भारत में सबको अपनी-अपनी तरह से सोचने और कहने की स्वतंत्रता है। इसलिए मैं इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा; पर यह न भूलें कि अंकल का कुछ सम्बन्ध अक्ल और ‘अक्कल दाड़’ से भी है।

- यानि जिसमें अक्ल होती है, उसे ही लोग अंकल कहते हैं ?

- जी हां। और वे सब्जी बेचने वाली महिलाएं तो आपको ‘अंकल जी’ कह रही थीं। यानि वे आपको सामान्य अक्ल वालों से भी बड़ा मान रही थीं।

- तो मुझे इस सम्बोधन का बुरा नहीं मानना चाहिए ?

- बिल्कुल नहीं। 

- तर्क के हिसाब से तुम्हारी बात भले ही ठीक हो वर्मा; पर अंकल सुनकर बूढ़ेपन का अहसास तो होता ही है।

- शर्मा जी, ये तो दुनिया का एक शाश्वत सत्य है। इसे जितना जल्दी आप स्वीकार कर लें, उतना ही अच्छा है। दशरथ जी को शीशा देखते समय अपने कान के पास सफेदी दिखाई दी, तो उन्होंने राम को युवराज बनाने का निर्णय कर लिया; पर यदि कोई इसे स्वयं न माने, तो फिर जमाने की ठोकर उसे समझा देती है।

- अच्छा.. ?

- जी हां। रीतिकाल के महान कवि केशवदास के सफेद बालों को देखकर कुएं से पानी भर रही युवतियों ने जब उन्हें ‘बाबा’ कहा, तो उनके दिल में आग लग गयी और मुंह से निकल पड़ा -

केशव केसन अस करि, जस अरिहु न कराय
चन्द्रवदन मृगलोचिनी बाबा कहि-कहि जायं।।

- यानि मैं यह मान लूं कि अब मैं भी ‘अंकल’ हो गया हूं ?

- बिलकुल। अच्छा अब मैं चलता हूं। नमस्ते शर्मा अंकल।

शर्मा जी का खिलखिलाता चेहरा एक बार फिर रुआंसा हो उठा, ‘‘ओह वर्मा, तुम भी..।’’                           

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