शनिवार, 27 अप्रैल 2013

युद्ध और मनोबल


बात बहुत पुरानी है। एक राजा के दरबार में दूर देश से कोई पहलवान आया। उसने राजा से कहा कि यदि इस राज्य में कोई उससे तगड़ा पहलवान है, तो उसे हरा दे; अन्यथा उसे विजेता घोषित कर दिया जाए। 

राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया। तीसरे दिन एक मरियल शरीर वाले लुहार ने यह कहकर उसे हराने का दावा किया कि इसके लिए उसे एक महीने का समय चाहिए। तब तक पहलवान को अतिथिगृह में ठहरा दिया जाए। राजा ने ऐसा ही किया। 

लुहार बहुत चालाक था। उसने अतिथिगृह के सेवकों को अपनी ओर मिला लिया। पहलवान ने जब उनसे लुहार के बारे में पूछा, तो सबने कहा कि वह तो चमत्कारी व्यक्ति है। वह हर दिन एक ग्राम लौह भस्म खाता है। इसलिए उसकी हड्डियां लोहे जैसी मजबूत हैं। यदि वह कलाई पकड़ ले, तो उसे भगवान भी नहीं छुड़ा सकते। उसके माथे पर एक गुप्त आंख है। यदि वह खुल गयी, तो उसे देखते ही प्रतिद्वन्दी तुरंत मर जाता है।  

बार-बार यह कथा सुनने से पहलवान की हिम्मत टूट गयी। कुश्ती  वाले दिन अखाड़े में लुहार ने हाथ आगे बढ़ाया, तो पहलवान ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। लुहार के माथे पर तिलक लगा था। पहलवान को लगा कि यही गुप्त आंख है। अतः वह उससे आंख मिलाने से भी बचने लगा। लुहार आगे बढ़ता, तो पहलवान पीछे हट जाता। आखिर पीछे हटते-हटते वह अखाड़े से बाहर जा गिरा। राजा ने लुहार को विजेता घोषित कर दिया।

ऐसी बहुत सी कहानियां हम सबने पढ़ी और सुनी हैं। इन सबका अभिप्राय यह है कि युद्ध हो या कोई प्रतियोगिता, उसमें मनोबल का बहुत महत्व है। लुहार ने योजनाबद्ध रूप से पहलवान का मनोबल तोड़ दिया और बिना लड़े ही कुश्ती जीत ली।

वर्तमान चुनावी राजनीति भी एक प्रतियोगिता ही है। इसमें अपना मनोबल बनाये रखने के साथ ही अपनी कूटनीति से दूसरे के मनोबल को तोड़ना भी पड़ता है। पिछले कुछ चुनाव देखें, तो बंगाल में ममता बनर्जी के सामने वामपंथियों का मनोबल बहुत गिरा हुआ था। इस कारण स्वयं मुख्यमंत्री ही चुनाव हार गये। उ0प्र0 में भाजपा और कांग्रेस दोनों आधे मन से लड़े, इसलिए वे तीसरे और चैथे स्थान पर ही रह गये। गुजरात के चुनाव में भाजपा का मनोबल ऊंचा था। इन दिनों कर्नाटक में कांग्रेस का, जबकि राजस्थान, म0प्र0 और छत्तीसगढ़ में भाजपा का मनोबल बढ़ा हुआ है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आगामी लोकसभा चुनावों का है। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के कारण लोग कांग्रेस को हराना चाहते हैं। कांग्रेस वाले जिसे सेनापति बनाना चाहते हैं, वह स्वयं लड़ाई से भाग रहा है। स्पष्ट है कि कांग्रेस का मनोबल ध्वस्त है; पर ऐसे में विपक्षी दलों की अपनी स्थिति क्या है, यह भी समझना होगा।

गुजरात में तीसरी जीत से पूरे देश में नरेन्द्र मोदी के प्रति समर्थन की एक भारी लहर उठी है। वे भी अलग-अलग राज्यों तथा वर्गों में जाकर अपना आधार बना रहे हैं। उनके नाम से भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ ही देश के आम आदमी और विशेषतः युवाओं में उमंग पैदा हो जाती है। भाजपा के नेता होने के बाद भी वे सबसे अलग और आगे हैं। उनकी अनूठी कार्यशैली का जादू सबके सिर पर चढ़कर बोल रहा है। इसलिए यदि भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ने से उसके चार-छह प्रतिशत वोट अपने आप ही बढ़ जाएंगे।

लेकिन इसके साथ ही भाजपा में कई नेता और भी हैं, जिनकी लार टपक रही है। इनमें सबसे आगे हैं 85 वर्षीय श्री आडवाणी। उन्हें प्रत्याशी बनाने पर परिणाम 2009 वाला ही होगा। इसके अलावा राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और अरुण जेतली भी हैं; पर इनमें से किसी का, किसी क्षेत्र विशेष में जनाधार नहीं है। 

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी हैं; पर पिछला चुनाव उन्होंने शहरी प्रभाव वाली गाजियाबाद सीट से लड़ा था। यहां ग्रामीण क्षेत्र में मेवाड़ मूल के हिन्दू और मुस्लिम क्षत्रियों की बहुलता है। जीतने के लिए उन्होंने अजीत सिंह जैसे बेपेंदी के लोटे से समझौता किया। इससे कल्याण सिंह जैसे जमीनी नेता फिर नाराज हुए और भाजपा को भारी हानि हुई। साथ ही, तीन बार के विजयी भाजपा सांसद को पार्टी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

अरुण जेतली एक प्रभावी वक्ता और सफल चुनाव संयोजक हैं। राजग सरकार में मंत्री रहते हुए उनका काम प्रशंनीय रहा है; पर यह भी सच है कि वे सदा राज्यसभा को ही सुशोभित करते रहे हैं। सुषमा स्वराज के साथ भी ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां उनका व्यापक जनाधार हो। इसलिए उन्हें लोकसभा में आने के लिए कभी दिल्ली तो कभी म0प्र0 का मुंह देखना पड़ता है। इसलिए इन चारों में से किसी के भी नाम पर भाजपा कार्यकर्ताओं में अपेक्षित उत्साह पैदा नहीं होगा और परिणाम फिर पिछली बार जैसा ही होगा। 

नरेन्द्र मोदी की ही तरह म0प्र0 में शिवराज सिंह चैहान तथा छत्तीसगढ़ में डा0 रमन सिंह की छवि और कार्यशैली बहुत प्रभावी है। आगामी विधानसभा चुनावों में उनकी जीत भी लगभग निश्चित ही है। ऐसे में ये दोनों भी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हो सकते हैं।

कहने का अभिप्राय यह है कि प्रत्याशी चाहे जो भी हो; पर उसका व्यापक जनाधार हो तथा उसके नाम से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़े, तभी 2014 की लड़ाई में सफलता मिल सकती है। इसी संदर्भ में हमें नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के प्रकरण को समझना होगा।

नीतीश कुमार जिस तरह पिछले कुछ समय से नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को गरिया रहे हैं, उससे केवल बिहार ही नहीं, तो पूरे देश के कार्यकर्ता स्वयं को अपमानित अनुभव कर रहे हैं। समझ नहीं आता कि यह सब देखकर भी भाजपा के केन्द्रीय नेता चुप क्यों हैं ? यह ठीक है कि युद्ध में अंतिम जीत ही सबसे महत्वपूर्ण होती है; पर यदि सैनिकों में उत्साह नहीं रहा, तो जीत होगी कैसे ?

वस्तुतः बिहार में भाजपा के बिना नीतीश कुमार का अस्तित्व शून्य है। भाजपा के हटते ही प्रदेश सरकार ढह जाएगी। यदि नीतीश कांग्रेस के चार तथा कुछ अन्य विधायकों के साथ सरकार बना लें, तो वह अधिक दिन चल नहीं सकेगी। समाजवादियों में एक खास बीमारी है कि वे अधिक दिन तक साथ नहीं रह सकते। बिहार में भी नीतीश और शरद यादव के अलग गुट हैं। शरद यादव आपातकाल में इंदौर जेल में स्व0 सुदर्शन जी के साथ रहे थे। वहां उन्होंने संघ के विचार और कार्यशैली को समझा है। उससे प्रभावित होने के कारण उनके गुट के विधायक भाजपा के साथ आकर सुशील मोदी के नेतृत्व में सरकार बना लेंगे।

कहते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक की तरह नीतीश भी भाजपा से अलग होकर पूरे राजा बनने के चक्कर में थे; पर चुनाव से पूर्व हुए सर्वेक्षणों से उन्हें जमीनी सच समझ में आ गया। चुनाव परिणामों ने भी यह सिद्ध किया कि जहां भाजपा ने अपनी 90 प्रतिशत सीटें जीतीं, वहां नीतीश का प्रतिशत 82 ही रहा। अब तो उनकी स्थिति और भी खराब है। इस कारण लालू यादव का प्रभाव फिर बढ़ रहा है। लोकसभा चुनाव में वे भी अच्छी टक्कर देंगे।

कहावत है ‘वो जीते जो पहले मारे’। अर्थात लड़ाई में पहले वार करने वाला हावी हो जाता है। इसलिए भाजपा को बिहार में ताल ठोककर लोकसभा की सभी 40 सीटें लड़ने की घोषणा कर देनी चाहिए। इससे वह 25 से 30 स्थान जीत लेगी। अन्यथा नीतीश भाजपा को केवल 15 सीट देंगे। ऐसे में वह कितना भी दम लगाये, 10 से आगे नहीं बढ़ सकती। 

जो लोग सिद्धान्तों की दुहाई देते हैं, वे राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश के धोखे को याद करें। राजनीतिक समझौते अग्नि के सम्मुख लिये गये फेरे नहीं हैं। इस सम्बन्ध में महाभारत का एक प्रसंग दृष्टव्य है। जब युद्धिष्ठिर बार-बार सन्धियों की दुहाई देकर कौरवों से युद्ध करने में हिचक रहे थे, तो द्रौपदी कहती है -

न समय परिरक्षणं क्षमं ते, विकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा, विदधति सोपधि सन्धिदूषणानि।।
                                    - भारवि रचित किरातार्जुनीय महाकाव्य से

(जब शत्रु अपकार करने में संलग्न हों, तब किसी सन्धि में उल्लिखित समयावधि की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। शत्रुओं पर विजय पाने के इच्छुक राजा सन्धि में कोई न कोई कमी निकालकर उसे तोड़ ही देते हैं। अनावश्यक पूर्वकृत सन्धियां तो तोड़ने के लिए ही होती हैं। इसलिए हे महाराज, दुर्योधन के साथ की गयी सन्धि को तोड़ने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए।)

यह ध्यान रहे कि कांग्रेस हो या नीतीश कुमार; लालू हो या पासवान; मुलायम सिंह हो या मायावती; ममता बनर्जी हो या नवीन पटनायक; शरद पवार हो चंद्रबाबू नायडू; ये सब एक ही थाली के बैंगन हैं। इनकी कार्यशैली और भ्रष्टाचार का स्तर अलग-अलग हो सकता है; पर मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण, श्रीराम मंदिर, अनुच्छेद 370, घुसपैठ, गोरक्षा आदि पर इनकी नीति समान है। ये सब संघ और भाजपा को अपना शत्रु मानते हैं; पर कुर्सी का लालच इन्हें साथ नहीं आने देता।

लोकसभा चुनाव की बाजी बिछ चुकी है। भाजपा को अपने बल पर 200 सीट जीतनी ही होंगी। ऐसा होते ही अधिकांश थाली के बैंगन लुढ़क कर उसकी पतीली में आ गिरेंगे। यद्यपि पूरा परिदृश्य तो कई राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के बाद ही स्पष्ट होगा। तब तक कार्यकर्ताओं का मनोबल लगातार ऊंचा बना रहे, यह वर्तमान नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

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