गुरुवार, 11 जुलाई 2013

उत्तराखंड की त्रासदी : संकेत और संदेश

उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी के बाद ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ की तर्ज पर लोग पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठ भर रहे हैं। दूरदर्शन के ठंडे स्टूडियो में बैठकर ऐसे-ऐसे विशेषज्ञ ज्ञान बघार रहे हैं, जिन्होंने शायद दो दिन भी पहाड़ पर नहीं बिताये होंगे। कभी गये भी होंगे, तो वातानुकूलित सरकारी अतिथि भवनों या होटलों में रहकर, पिज्जा खाते और कोल्ड ड्रिंक पीते, फोटो खींचते और खिंचाते हुए लौट आये होंगे; पर यह मौका है, इसलिए हर कोई इसका लाभ उठाना चाहता है। 

तुलसीदास जी ने लिखा है ‘धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिये चारी।’ सचमुच इस आपत्ति में कई लोगों के चेहरे बेनकाब हुए हैं। जहां एक ओर सेना के वीर जवानों की सराहना करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं, वहां कुछ धूर्त राजनेताओं तथा गहने या धन लूटने वालों को भी सब तरफ से गालियां मिल रही हैं।

इन दिनों उत्तराखंड में स्थित चारधाम (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदरानाथ और बदरीनाथ) की यात्रा अपने चरम पर थी। इसलिए इससे केवल पहाड़ वाले ही नहीं, तो पूरे देश के लोग प्रभावित हुए हैं। जन, धन और पशुहानि का ठीक हिसाब कभी नहीं लग सकेगा। यह आपदा प्राकृतिक है या मानव निर्मित, इसका उत्तर देना बहुत कठिन है। सच तो यह है कि यहां दोनों का ही योगदान है। 

प्राकृतिक आपदाएं पहाड़ के लिए नयी नहीं हैं। उत्तराखंड में प्रति 12 वर्ष बाद ‘नंदादेवी राजजात यात्रा’ होती है। इस वर्ष भी यह अगस्त-सितम्बर में होने वाली है। नंदादेवी पार्वती का ही दूसरा नाम है। जो लोग चार सींग वाले मेढ़े (चैसिंग्या खाड़ू) के साथ चलने वाली इस दुर्गम यात्रा के साक्षी हैं, वे बताते हैं कि यात्रा के दौरान 16,200 फुट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड के आसपास हजारों मानव अस्थियां बिखरी हैं। इन्हें 600 से लेकर 1,200 वर्ष तक पुराना माना जाता है। 

इन अस्थियों पर कई भारतीय और विदेशी विद्वानों ने शोध किया है; पर वे सब किसी समान निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके हैं। कुछ लोगों का मत है कि वे सैनिक थे, जो किसी अभियान के समय आये बर्फीले तूफान में फंसकर जान गंवा बैठे। कुछ का मत है कि यह नंदादेवी राजजात यात्रा पर गया राजस्थान या महाराष्ट्र का कोई शाही जत्था था। जो भी हो; पर इतना सत्य है कि वे सब किसी प्राकृतिक आपदा के शिकार हो गये।

1998 में कैलास मानसरोवर के यात्रा मार्ग में, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले मंे स्थित मालपा पड़ाव पर भारी भूस्खलन हुआ था। इस दुर्घटना में उस पड़ाव पर रुके सभी 225 लोगों की भूसमाधि बन गयी थी। इनमें यात्री भी थे और उनके साथ चलने वाले सहयोगी तथा कर्मचारी आदि भी। उस दुर्घटना के बाद से उस पड़ाव पर अब केवल दोपहर का भोजन होता है, रात्रि विश्राम नहीं। कुछ वर्ष पूर्व अमरनाथ यात्रा में हुई दुर्घटना में भी बड़ी संख्या में लोग मारे गये थे। 

इतिहास के पृष्ठों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जिनसे पता लगता है कि पहाड़ में प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं। धर्मभीरू लोग लोग इन्हें दैवी आपदा भी कह देते हैं; पर इस बार जो हुआ, वह प्राकृतिक या दैवी आपदा से बहुत आगे की चीज है। इस बार हुआ विनाश यह स्पष्ट बताता है कि प्रकृति से अत्यधिक छेड़छाड़ का दुष्परिणाम कितना भीषण हो सकता है ? 

वस्तुतः पिछले कई वर्ष से, जब से देश में तथाकथित उदारीकरण की लहर चली है, मध्यम वर्ग के पास भरपूर पैसा आ गया है। अतः सड़कों पर कार और घरों में ए.सी. की भरमार हो गयी है। पहले लोग जीवन के संध्याकाल में चार धाम की यात्रा पर जाते थे। हरिद्वार और ऋषिकेश से आगे यह यात्रा प्रायः पैदल होती थी। इस दौरान लोग स्थानीय चट्टियों में रुकते थे। उत्तराखंड की यात्रा पथ में आज भी हनुमान चट्टी, जानकी चट्टी, गरुड़ चट्टी आदि स्थान पड़ते हैं। 

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है चट्टी शब्द चटाई से बना है। अर्थात इन स्थानों पर चटाई मिलती थी। वहां बैठकर लोग सुस्ताते थे। रात में रुकने के इच्छुक लोगों के भोजन, विश्राम आदि का प्रबन्ध स्थानीय लोग कर देते थे। रात में तीर्थयात्री तथा गांव वाले मिलकर बैठते थे और एक-दूसरे की परम्परा, सुख-दुख, खानपान, खेतीबाड़ी और रीतिरिवाजों की जानकारी लेते थे। सुबह भोजन कर यात्री आगे चलते समय अपने आतिथेय को कुछ राशि दे देते थे। कुछ लोग अपना भारी सामान वहां छोड़कर वापसी पर फिर उठा लेते थे। इस प्रकार वे चट्टियां यात्रियों की सहायता की जीवंत केन्द्र थीं।

इस तीर्थयात्रा में लूट या चोरी नहीं होती थी। कुछ शारीरिक कष्ट होता भी था, तो उसे लोग प्रभु का प्रसाद समझकर स्वीकार कर लेते थे। कुछ लोग इस दौरान बीमारी या किसी दुर्घटना में मर भी जाते थे, जिसका पता उनके गांव में कई महीने बाद तब लगता था, जब उनके सहयात्री लौटकर वापस पहुंचते थे। कुल मिलाकर ये यात्राएं तीर्थयात्रियों, स्थानीय निवासियों तथा पंडे-पुरोहितों के लिए भी उत्सव और पर्व का रूप थीं। 

जिन दिनों चारों धाम के कपाट बंद रहते थे, उन दिनों पुरोहित अपने जजमानों के पास जाकर अपनी बहियों में उनके घर-परिवार की जानकारी ताजा करते थे। इससे वे सब एक विशाल परिवार के अंग बन जाते थे। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का संकट आने पर पुरोहित उनका सहारा बनते थे। यहां तक कि यात्रियों के पास पैसा समाप्त हो जाने पर वे उनके भोजन तथा सकुशल वापसी का भी प्रबन्ध करते थे। यह स्वाभाविक ही था कि गांव पहुंच कर वे लोग किसी भी माध्यम से वह पैसा पुरोहित को भेज देते थे। 

पर अब उदारवाद और पैसे के अश्लील प्रदर्शन ने तीर्थयात्रा को पर्यटन बना दिया है। शासन भी प्रयासपूर्वक इन तीर्थों को पर्यटन स्थल के रूप में ही प्रदर्शित करता है। पर्यटकों के लिए हर तरह के मनोरंजन और मांस से लेकर मदिरा तक का प्रबन्ध वहां किया जाता है। कारण साफ है; तीर्थयात्री सादगी से रहते हुए कम खर्च करता है, जबकि पर्यटक खुलकर पैसा फेंकता है। इससे सरकार और होटल या टैक्सी वाले बड़े व्यापारियों के ही नहीं, तो साधु-संतों और पंडे-पुजारियों के पेट भी मोटे होते हैं। इसलिए ये सब भी चाहते हैं कि तीर्थयात्रा के नाम पर अधिकाधिक धनाढ्य पर्यटक ही आएं।

यात्रा का अर्थ है देश दर्शन; पर अब यह मंदिर दर्शन मात्र होकर रह गया है। इसलिए दिल्ली या हरिद्वार से चलने वाले ‘टूर पैकेजों’ में यात्री लक्जरी वाहनों से चलकर वातानुकूलित होटलों में ठहरते हैं और कुछ ही दिन में मंदिर दर्शन कर वापस लौट जाते हैं। कैसी हैरानी की बात है कि इन धामों और उनके मार्ग में बने होटलों में स्थानीय अन्न की रोटी, दाल, सब्जी और पेय पदार्थ नहीं मिलते; पर पिज्जा, बर्गर, इडली, डोसा और कोका कोला या पेप्सी आदि सदा उपलब्ध रहते हैं। रही सही कसर दो दिन में चार धाम यात्रा कराने वाली वायु-सेवाएं पूरी कर रही हैं।

सच तो यह है कि अपनी-अपनी तरह से हर कोई पहाड़ के शोषण में लगा है। राजनेताओं और ठेकेदारों की मिलीभगत से लगातार बड़े बांध बन रहे हैं तथा नये स्वीकृत हो रहे हैं। अतः मिट्टी और पानी को रोककर रखने वाले घने जंगल कट रहे हैं तथा सुरंगों से पहाड़ खोखले हो रहे हैं। जल्दी बनने वाले छोटे बांध तथा विद्युत परियोजनाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं है। क्योंकि जितना बड़ा प्रकल्प, उतना अधिक पैसा; और जितना अधिक पैसा, उतना अधिक भ्रष्टाचार।

साधु-संत और कथावाचकों की आलोचना करते हुए कुछ संकोच होता है; पर यह नहीं समझ आता कि तीर्थों में बहुमंजिले होटल, वातानुकूलित पंडाल, कुटिया व आश्रम बनाकर, विद्युत जनित्रों से चकाचैंध कर, विवाह जैसे व्यंजन खा और खिलाकर वे भगवान को प्रसन्न करते हैं या अपने धनपति शिष्यों को ? यदि किसी को पहाड़ में साधना करनी है, तो वह वहां के वातावरण में ही रहकर करे। हजारों लोग ऐसा करते भी हैं; पर पंचतारा सुविधाओं के बीच साधना करना तो शुद्ध पाखंड ही है।

इस आपदा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव केदारघाटी में हुआ है। वहां केदारनाथ मंदिर तो बच गया, जबकि आसपास के अधिकांश भवन नष्ट हो गये। यह भगवान भोलेनाथ की महिमा तो है ही; पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मंदिर प्राचीन पहाड़ी शैली तथा स्थानीय भवन निर्माण सामग्री से बना था। आपदा के बाद के जो चित्र आये हैं, उनमें मंदिर के आसपास नदी की प्राचीन धाराएं साफ दिखाई दे रही हैं। मंदिर को उनसे बचाकर बनाया गया था; पर धारापथ का अतिक्रमण कर हुए निर्माण नदी के प्रकोप से बच नहीं सके। 

1991 में गढ़वाल में आये भूकम्प से सर्वाधिक हानि उत्तरकाशी जिले की गंगाघाटी में हुई थी। भूकम्प के बाद जो वैज्ञानिक वहां गये, उन सबका निष्कर्ष यही था कि तथाकथित आधुनिक और मैदानी शैली से बने मकान गिर गये, जबकि सैकड़ों साल पुराने पहाड़ी शैली से बने मकान और मंदिर सुरक्षित रहे।

इसके बावजूद इन दिनों आधुनिकता के नाम पर जो निर्माण वहां हो रहे हैं, उनमें स्थानीयता का नितांत अभाव है। उनमें लग रहे महंगे पत्थर और टाइलों का उद्देश्य धर्म नहीं धन कमाना है। इस पाखंड के प्रदर्शन से विनाश नहीं तो और क्या होगा ?  

आजकल की शहरी जीवन शैली में बिजली और पानी का भरपूर दुरुपयोग हो रहा है। चाहे कोई कुछ कहे; पर हम इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सौर, पवन और पशु ऊर्जा पर शोध की ओर शासन का ध्यान नहीं है। ऐसे में विकल्प जल विद्युत और बांध ही हैं, जिनका खामियाजा बेचारे पहाडि़यों को ही भुगतना पड़ता है।

मनुष्य चाहे जितने प्रयत्न कर ले; पर प्राकृतिक आपदाएं सदा से आती रही हैं और आगे भी आएंगी ही; लेकिन उत्तराखंड में जो आपदा इस बार आई है, उसके लिए केवल प्रकृति को दोष देना सत्य से आंख चुराना होगा। इसे जितना शीघ्र हम समझ जाएंगे, भविष्य में होने वाली जनहानि से उतना बच सकेंगे। 

बच्चे अपनी मां के शरीर पर उछलते-कूदते और खिलवाड़ करते हैं। इससे मां को गुस्सा नहीं, अपितु आनंद ही आता है; पर यदि वे मां की आंख, नाक या कान में कोई सींक घुसेड़ने लगे, तो मां बच्चे को चांटा भी मार देती है। प्रकृति भी हमारी मां ही है। जब तक हमारा खिलवाड़ लाड़ और दुलार की परिधि में रहेगा, तब तक वह सहन करेगी; पर इससे आगे बढ़ने पर हमें उसका क्रोध सहने को भी तैयार रहना होगा।

उत्तराखंड में प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उसके संकेत और संदेश को समझकर अपने व्यवहार को सुधारें, अन्यथा इससे भी बड़ी आपदाओं के लिए हमें तैयार रहना होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें