शनिवार, 24 अगस्त 2013

गोरक्षा की उज्जवल परम्परा

भारत एक धर्मप्राण देश है। भारत की आत्मा के दर्शन करने हों, तो तीर्थों और धामों में जाना होगा। गोमाता इसी धर्म का सजीव रूप है। इसलिए किसी भी काम को करते समय गोमाता के दर्शन शुभ माने जाते हैं। यदि उस समय गोमाता अपने बछड़े या बछिया के साथ अर्थात सवत्स हो, फिर तो कहना ही क्या ?

गोमाता की पूजा, रक्षा और सेवा की भारत में सुदीर्घ परम्परा रही है। इस बारे में सबसे प्राचीन प्रसंग राजा दिलीप का मिलता है। राजा दिलीप भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। जब बहुत लम्बे समय तक उनके घर में कोई संतान नहीं हुई, तो उन्होंने अपने कुलगुरु से परामर्श किया। कुलगुरु ने उन्हें देवलोक में पूजित कामधेनु की पुत्री नंदिनी गाय की सेवा का आदेश देते हुए कहा कि इसकी सेवा से तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।

बस फिर क्या था, राजा दिलीप एवं उनकी धर्मपत्नी नंदिनी की सेवा में जुट गये। उन्होंने गोशाला में ही अपना निवास बना लिया। अब वे नंदिनी के जागने से पहले ही उठकर गोशाला की सफाई करते। फिर नंदिनी के घास-चारे आदि का प्रबंधकर उसके खाने के बाद ही अल्पाहार करते। इसके बाद वे नंदिनी को घुमाने के लिए जंगल में ले जाते। जिधर नंदिनी जाती, वे उसके पीछे-पीछे वहां ही जाते थे। नंदिनी के शरीर पर मक्खी या मच्छर न बैठें, इसके लिए वे दोनों अपने अंगवस्त्रों से हवा करते रहते थे। 

जंगल से लौटने के बाद नंदिनी की सेवा के अन्य काम करने के बाद जब वह विश्राम करती, तभी वे दोनों विश्राम करते थे। रात में गुरुदेव की अनुमति से वे नंदिनी का दूध पीकर ही सो जाते थे। अपने राज्य संबंधी आवश्यक कार्य भी वे गोशाला में रहते हुए ही निबटा लेते थे। इस प्रकार सेवा करते हुए लम्बा समय बीत गया।

एक दिन वे नंदिनी के साथ जंगल में थे। नंदिनी कुछ देर को बैठी, तो राजा और रानी भी बैठ गये। वे थके हुए तो थे ही, ऐसे में जंगल की शीतल और सुगंधित हवा से उन्हें झपकी लग गयी; पर अचानक नंदिनी की करुण पुकार सुनकर वे चैंक गये। उन्होंने देखा कि नंदिनी को एक सिंह ने दबोच रखा है। 

उन दिनों मानव, पशु-पक्षी और प्रकृति के बीच सुसमन्वय होने से सब एक दूसरे की भाषा और मनोभाव समझते थे। राजा ने सिंह से कहा कि वे अपने गुरुदेव के आदेश पर नंदिनी की सेवा कर रहे हैं, अतः वह इसे छोड़ दे। सिंह ने कहा कि उसे भूख लगी है और पशु उसका स्वाभाविक आहार है। अतः वह इसे नहीं छोड़ेगा। राजा ने फिर आग्रह किया, तो सिंह ने कहा कि यदि इसके बदले उसे किसी और प्राणी का मांस मिल जाए, तो वह इसे छोड़ देगा। 

अब राजा बड़े असमंजस में पड़ गये। वे किसी अन्य पशु को मारना नहीं चाहते थे। ऐसे में सिंह ने फिर सुझाव दिया कि राजा स्वयं को ही खाने के लिए प्रस्तुत कर दे। इधर रानी भी यह सब सुन रही थी। उसने सिंह से कहा कि वह राजा के बदले उसे खा ले। अब राजा और रानी में इस पर विवाद होने लगा। अंततः दोनों ही आंखें बंदकर सिंह के सम्मुख बैठ गये।

पर यह सब तो वस्तुतः भगवान भोलेनाथ की एक माया था। वे ही सिंह का रूप लेकर राजा और रानी की परीक्षा लेने आये थे। उन्होंने दोनों को भरपूर आशीर्वाद दिया। इस प्रकार राजा दिलीप के घर में पुत्र का जन्म हुआ, जिससे उनका वंश आगे बढ़ा और फिर उसी कुल में श्रीरामचंद्र का जन्म हुआ। अर्थात विश्ववंदित भगवान श्रीराम चंद्र जी वस्तुतः गोमाता का ही प्रसाद हैं।

द्वापरयुग में भगवान जिस रूप में अवतरित हुए, उन श्रीकृष्ण का तो नाम ही गोपाल है। गोमाता और गोवत्सों के बिना उनका चित्र अधूरा सा लगता है। उनका सारा बचपन गोसेवा में ही बीता। इसलिए जब वे वृन्दावन छोड़कर मथुरा गये, तो केवल गोपियों ने ही नहीं, गायों ने भी खाना-पीना छोड़ दिया था।

एक बार जब कंस की ओर से भेजा गया अघासुर नामक राक्षस अजगर का विशाल रूप लेकर उनकी सब गायों और ग्वाल बालों को निगल गया, तो अपने प्राणों का मोह किये बिना बालकृष्ण स्वयं उसके मुंह में घुस गये। अंदर जाकर उन्होंने अपना शरीर इतना बड़ा कर लिया कि उस राक्षस का दम घुट गया। इस प्रकार न केवल सब गायों की, अपितु सब ग्वालों और बृजवासियों की भी रक्षा हुई। 

मुगलों द्वारा जब भारत की धर्मभूमि आक्रांत हो रही थी, गोमाता की सार्वजनिक रूप से हत्या हो रही थी, मंदिर और मठों का विध्वंस हो रहा था, उस काल में छत्रपति शिवाजी के रूप में एक गोरक्षक का  जन्म हुआ। उन्होंने बाल्यावस्था में, बाजार के बीच में ही एक कसाई का सिर अपनी तलवार से उतार कर गोमाता की प्राणरक्षा की थी। आगे चलकर जब उन्होंने हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की, तो गोहत्या को पूर्ण प्रतिबंधित कर दिया था। आज भी शिवाजी को ‘गो ब्राह्मण प्रतिपालक’ के रूप में याद किया जाता है।

पंजाब में तो गुरु के प्यारे सिख वीरों ने गोरक्षा को अपने जीवन का परम ध्येय बना लिया था। लाहौर में मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गोहत्या से दुखी होकर गुरु नानकदेव ने प्रण किया था कि वे दसवें अवतार में गोघाती मलेच्छों को नाश करेंगे। इसका पालन करते हुए दशमेश गुरु गोविंद सिंह जी ने देवी की उपासना करते हुए यह वर मांगा था - 

यही देह आगिया तुरकन गहि खपाऊं
गऊघात का दोख जग सिऊं मिटाऊं।
यही आस पूरन करहु तुम हमारी
मिटै कसट गऊअन छुटै खेद भारी।
यही बेनती खास हमरी सुणीजै
असुर मार कर रच्छ गऊअन करीजै।। 

(राष्ट्रधर्म, खालसा पंथ स्थापना विशेषांक, अपै्रल 1999, पृष्ठ 82)  

इतना ही नहीं, तो देहत्याग से पूर्व अपने शिष्यों को सावधान करते हुए उन्होंने कहा था कि तेल मे डूबे हाथ पर जितने तिल चिपकें, यदि उतनी बार भी गोभक्षक यवन कसम खाएं, तो विश्वास मत करना।

पंजाब के ही भैणी साहब (जिला लुधियाना) में 1816 ई. की वसंत पंचमी पर जन्मे गुरु रामसिंह कूका का जीवन भी गोसेवा और गोरक्षा को समर्पित था। बैसाखी मेले में जा रहे उनके शिष्यों ने गोहत्यारे कसाइयों को मौत के घाट उतारा था। अतः अंग्रेज शासन ने 68 कूका वीरों को 17 और 18 जनवरी, 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर मृत्युदंड दिया था।

18 सितम्बर, 1918 को हरिद्वार के पास ग्राम कटारपुर का प्रसंग भी बहुत प्रेरक है, जब मुस्लिम थानेदार और अंग्रेज प्रशासन की शह पर मुसलमानों ने बकरीद पर सार्वजनिक रूप से गोहत्या करने के लिए गायों का जुलूस निकाला था। इस जुलूस पर महंत रामपुरी के नेतृत्व में हिन्दुओं ने हमला किया और सब गायों को छुड़ा लिया। इस संघर्ष में दोनों ओर के कई लोग मारे गये। 

प्रशासन ने 172 हिन्दुओं को गिरफ्तार किया। वह सभी को प्राणदंड देना चाहता था; पर महामना मदनमोहन मालवीय जी ने हिन्दुओं का मुकदमा लड़ा। आठ अगस्त, 1919 को घोषित निर्णय में चार गोभक्तों को फांसी तथा 135 को आजीवन कारावास की सजा हुई। फागुन शुक्ल दो, 1920 ई. को महंत ब्रह्मदास उदासीन एवं चौधरी जानकीदास को प्रयाग तथा डा. पूर्णप्रसाद एवं श्रीमुख चैहान को लखनऊ जेल में फांसी दी गयी। प्रयाग में गोभक्तों के सम्मान में उस दिन पूर्ण हड़ताल रही। जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी, उन्हें अंदमान भेज दिया गया। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार संघ की स्थापना से पहले और बाद में भी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे। 1930 में जब वे ‘जंगल सत्याग्रह’ में भाग लेने के लिए अकोला गये, तो वहां एक कसाई को गाय को ले जाता देख वे उसे छुड़ाने के लिए अड़ गये। बाजार के मुसलमानों ने इसका विरोध किया, तो वे वहीं सत्याग्रह करने को तत्पर हो गये। यह देखकर मुसलमान ढीले पड़ गये। अंततः डा. जी ने उचित मूल्य देकर वह गाय छुड़ा ली और एक हिन्दू को सौंप दी।

एक बार गांधी जी ने कहा था कि उनके लिए गोरक्षा का प्रश्न स्वाधीनता से भी बड़ा है; पर उनके शिष्य सत्ता पाकर इसे भूल गये। इतना ही नहीं, तो वे मशीनी कत्लखाने खोलकर गोमांस के व्यापार से विदेशी मुद्रा कमाने लगे; पर गोभक्त भी लोकतांत्रिक विधि से इसके विरोध में डटे हैं। सात नवम्बर, 1966 को दिल्ली में लाखों गोभक्तों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर की गयी गोलीवर्षा में सैकड़ों संन्यासी और अन्य गोभक्त बलिदान हुए। गोरक्षा के लिए विनोबा भावे, महात्मा रामचंद्र वीर, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी निरंजनदेव तीर्थ और आचार्य धर्मेन्द्र के लम्बे अनशन विख्यात हैं। 

20 नवम्बर, 1966 से श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी वृन्दावन में तथा स्वामी निरंजनदेव तीर्थ पुरी में अनशन पर बैठे। दिल्ली निवासी श्री मेहरचंद पाहूजा भी वृन्दावन में ही अनशन पर बैठे थे। उनकी स्थिति क्रमशः खराब होती गयी और कई संतों के आग्रह पर भी उन्होंने अनशन नहीं तोड़ा और 31.12.1966 को प्राण त्याग दिये। 20.11.1966 को ही श्री ऋषिस्वरूप ब्रह्मचारी दिल्ली में यमुना तट पर स्थित ‘धर्मसंघ भवन’ में अनशन पर बैठे और दस दिन बाद 30 नवम्बर को प्राण त्याग दिये। वे स्वामी करपात्री जी तथा शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के परम भक्त थे।

उ.प्र. में सहारनपुर जिले के ग्राम नगला झंडा के डा. राशिद अली का स्मरण भी यहां समीचीन होगा। वे अवैध रूप से बूचड़खाने ले जाई जा रही गायों को छुड़ा लेते थे। इससे गोहत्यारे नाराज हो गये। उन पर कई बार हमले हुए; पर गोमाता की कृपा से वे हर बार बच गये; लेकिन 20 अक्तूबर, 2003 को जब उन्होंने ग्राम खुजनापुर में काटने के लिए ले जाई जा रही गायों को छुड़ाया, तो गोहत्यारों ने उन पर गोली चला दी, जिससे उनका प्राणान्त हो गया। 

गोरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले ऐसे महामानवों की एक विशाल मालिका भारत में है। इन ज्ञात और अज्ञात गोभक्तों के चरणों में शत-शत प्रणाम। 

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