शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

व्यंग्य बाण : सदस्यता अभियान

दिल्ली में केजरी ‘आपा’ के नेतृत्व में ‘झाड़ू वाले हाथ’ की सरकार बनने पर अन्य कई लोगों की तरह शर्मा जी को भी इसमें एक आशा की किरण नजर आयी। उन्हें लगा कि यदि ‘आपा’ ऐसे ही बढ़ती रहे, तो मोदी के रथ को रोकने का सोनिया मैडम और राहुल बाबा का सपना पूरा हो सकता है। इसलिए उन्होंने इधर-उधर से ध्यान हटाकर ‘चिडि़या की आंख’ पर ही खुद को केन्द्रित कर लिया।

पिछले दिनों जब केजरीवाल साहब ने ‘आपा’ (आम आदमी पार्टी) के सदस्यता अभियान की घोषणा की, तो शर्मा जी ने भी इसमें पूरी ताकत लगाने का निश्चय कर लिया। वे ‘आपा’ कार्यालय से बैनर,  पोस्टर, एक बड़ा झाड़ू, टोपी और कुछ सदस्यता पत्र ले आये और घर के बाहर ही मेज-कुर्सी डाल कर बैठ गये। 

हर दिन की तरह जब कल वे शाम को पार्क में टहलने नहीं आये, तो मुझे चिन्ता हो गयी। मैं उनके घर गया, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गया। शर्मा जी की मेज पर बड़ा वाला झाड़ू रखा था। कुर्सी पर भी दो बड़े डंडों के सहारे झाड़ू बंधे थे। पीछे दीवार पर सदस्यता अभियान का बैनर लगा था। यद्यपि उनके आसपास काफी गंदगी थी। फिर भी वे निर्विकार भाव से वहां डटे थे। मैंने उनके हालचाल पूछे और वहीं बैठ गया। इतने में रामलाल जी आ गये।

- मैं ‘आपा’ का सदस्य बनना चाहता हूं।

- आइये-आइये, आपका स्वागत है।

- क्या मैं ‘आपा’ का संविधान देख सकता हूं ?

- संविधान.. ?

- जी हां, जिससे मैं जान सकूं कि इसकी सदस्यता के क्या नियम हैं; पार्टी का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री और कोषाध्यक्ष आदि कौन है ?

- देखिये, अभी तो संविधान बना नहीं है। 

- तो बिना संविधान के ही पार्टी चल रही है ?

- सर, आपको याद होगा कि 1947 में देश आजाद होने पर नेहरू जी ने कहा था, ‘इंडिया इज ए नेशन इन मेकिंग।’ ऐसे ही हमारी पार्टी और उसका संविधान भी ‘इन मेकिंग’ है।

- लेकिन फिर भी कुछ पदाधिकारी तो होंगे ?

- अभी तो सब कुछ केजरी ‘आपा’ ही हैं। जैसे ही संविधान बनेगा, बाकी सब पदों पर भी लोग नियुक्त कर दिये जाएंगे; पर आप इस चक्कर में क्यों पड़ते हैं, आप तो बस यह प्रपत्र भर दीजिये।

- जी नहीं, मैं देश के संविधान को मानता हूं। इसलिए ऐसे किसी दल से नहीं जुड़ सकता, जो खुद असंवैधानिक हो ?

- आप नाराज न हों। केजरी ‘आपा’ कुछ दिन में सब ठीक कर देंगे।

- जहां ‘पीर बावर्ची भिश्ती खर’ सब एक ही आदमी हो, वह पार्टी है या दुकान ? मुझे क्षमा करें, मैं इसका सदस्य नहीं बनूंगा।

इतना कहकर रामलाल जी उठ गये। कुछ देर बाद श्यामलाल जी आ गये। वे भी सदस्य बनना चाहते थे। शर्मा जी ने मुस्कुरा कर उनका स्वागत किया और उन्हें सदस्यता पत्र थमा दिया। श्यामलाल जी ने उसे भरकर शर्मा जी को दे दिया।

- श्यामलाल जी, आपने इसमें अपना ई.मेल पता नहीं लिखा ?

- मैंने अपने घर का पता तो लिखा है।

- आजकल घर के पते को कौन पूछता है ? मैं ई.मेल पते की बात कर रहा हूं। हमारे यहां सारे काम कम्प्यूटर से ही होते हैं। ई.मेल से ही हम आपको अपने कार्यक्रमों की सूचना देंगे। 

- अच्छा जी, फिर... ?

- फिर कोई बात नहीं; पर अपना मोबाइल नंबर तो लिखिये ?

- उससे क्या होगा ?

- उससे आप हमें ÛÛÛÛÛÛ नंबर पर मिसकाॅल देंगे, तो आप सदस्य बन जाएंगे। आपने अखबार में पढ़ा ही होगा कि पिछले एक सप्ताह में दस लाख लोग ‘आपा’ के सदस्य बने हैं।

श्यामलाल जी मोबाइल नंबर और ई.मेल की उलझन में ही थे कि उनकी 14 वर्षीय बेटी ने शर्मा जी द्वारा बताये नंबर पर मिसकाॅल मार दी। तुंरत ही वहां से संदेश आ गया कि आप सदस्य बना ली गयी हैं। बेटी ने यह संदेश उन्हें दिखाया, तो वे चकरा गये। सदस्य बनना चाहते थे खुद; पर बन गयी अवयस्क बेटी। इससे उन्हें एक सप्ताह में बने दस लाख सदस्यों का रहस्य भी समझ में आ गये। अतः वे भी प्रपत्र अधूरा छोड़कर प्रस्थान कर गये।

हम खाली बैठे-बैठे बोर हो रहे थे कि अपने कीमती विदेशी कुत्ते ‘चार्ली’ के साथ बाबूलाल जी आ गये। शर्मा जी अब उनसे प्रपत्र भरवाने लगे; पर इसी बीच चार्ली को देखकर स्थानीय कुत्ते भड़क गये और उन्होंने उस पर हमला बोल दिया। चार्ली भागकर शर्मा जी की मेज के नीचे आ छिपा; पर स्थानीय कुत्तों ने पीछा नहीं छोड़ा और उसे कई जगह काट लिया। इस उठापटक में शर्मा जी की मेज उलट गयी। बाबूलाल जी यह सब देखकर बौखला गये।

- शर्मा जी देखिये, आपके कुत्तों ने मेरे डियर चार्ली का क्या हाल कर दिया है ? आप तो इसी मोहल्ले के हैं। कुछ कीजिये न...।

- क्षमा करें, मैं कुत्तों के बीच दखल नहीं दे सकता। इसके लिए आप दिल्ली सरकार के हैल्पलाइन नंबर ÛÛÛÛÛ से सहयोग मांगिये।

झक मारकर बाबूलाल जी ने वह नंबर मिलाया, तो वहां से मशीनी जवाब आने लगे, ‘‘बिजली की समस्या के लिए एक, पानी के लिए दो, नर्सरी में प्रवेश के लिए तीन, पुलिस से संपर्क के लिए चार दबाएं।’’ बाबूलाल जी ने चार नंबर दबाकर पुलिस थाने को कुत्तों के झगड़े की बात कही, तो जवाब मिला कि अभी हम आम आदमियों के झगड़े निबटा रहे हैं, कुत्तों का नंबर इसके बाद आएगा।

बाबूलाल जी गुस्से में ऐसे ही लौट गये। कई घंटे की कसरत के बावजूद एक भी सदस्य नहीं बन सका था, अतः शर्मा जी भी घर में आ गये। टी.वी. खोला, तो ‘आपा’ विधायक विनोद बिन्नी केजरीवाल पर तानाशाही के आरोप लगा रहे थे। उधर योगेन्द्र यादव बिन्नी को भाजपा का पिट्ठू कह रहे थे, तो बिन्नी उन्हें कांग्रेस का दलाल। 

शर्मा जी का दिमाग चकराने लगा। बिना टिकट के इस तमाशे की आशंका तो उन्हें थी; पर यह ‘हनीमून पीरियड’ में ही होने लगेगा, इसका अनुमान नहीं था। ‘मोदी रोको’ अभियान को दम तोड़ते देख वे निराश हो उठे। उन्होंने ‘आपा’ के बैनर, पोस्टर, टोपी और पर्चे फाड़कर झाड़ू पर रखे और आग लगा दी।

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