रविवार, 25 मई 2014

व्यंग्य बाण : खिसियानी बिल्लियों से भेंट

‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ एक प्रसिद्ध कहावत है। कक्षा छह में पहली बार मैंने इसे पढ़ा था। इससे समझने के लिए मैं कई दिन तक बिजली के खम्भे के पास खड़ा रहा। फिर भी जब कोई बिल्ली उसे नोचते हुए नहीं मिली, तो मैंने अपने हिन्दी के अध्यापक से पूछा। तब उन्होंने मुझे इस कहावत का सही अर्थ समझाया।

पिछले दिनों भारत में लोकसभा के चुनाव हुए। चुनाव से पूर्व कई नेता शेर की तरह दहाड़ रहे थे; पर जब परिणाम आये, तो उनमें से कुछ बिल्ली की तरह घर के कोने में, तो कुछ चूहे के बिल में बरामद हुए। कुछ तो ऐसे गायब हुए कि उन्हें ढूंढने के लिए गंदे नालों में जाल डलवाने पड़े। फिर भी उनकी अकड़ नहीं गयी।

इन दिनों सब लोग नमो-नमो जप रहे हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि उगते सूरज को सब प्रणाम करते हैं; पर हमारे प्रिय मित्र शर्मा जी धारा के विपरीत तैरने में विश्वास रखते हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे नेताओं से मिलने का निर्णय लिया, जिन्हें जनता ने उनकी औकात बता दी थी। मजे की बात यह रही कि व्यस्तता का झूठा बहाना बनाने वाले ये नेता अब एक फोन पर ही मिलने को तैयार हो गये। 

सबसे पहले हम श्री मुलायमसिंह के पास गये। जवानी में वे हर दिन अखाड़े में जाकर दंड पेलते थे; पर अब मन बहलाने के लिए घर में ही एक छोटा अखाड़ा बना लिया है। वे उसी में चारों खाने चित पड़े थे। भाई-भतीजे, बेटे और बहुएं दूध लिये खड़े थे; पर अखिलेश बाबू वहां नहीं थे। पता लगा कि उम्मीदों की जिस साइकिल पर चढ़कर वे लखनऊ गये थे, वह इतनी टूट चुकी है कि मिस्त्री ने उसे हाथ लगाने से ही मना कर दिया है। नेताजी के छोटे भाई शिवपाल सिंह भी अनुपस्थित थे। किसी ने कहा कि वे पार्टी तोड़कर भाई और भतीजे को इसी अखाड़े में मात देना चाहते हैं। 

हमने मुलायम जी से उ.प्र. में स.पा. की दुर्दशा की बात पूछी, तो वे बोले, ‘‘ये सब संघ वालों की बदमाशी है। हमेशा से हमारे दो खास समर्थक रहे हैं। एक को उन्होंने हिन्दू-हिन्दू कह कर फंसा लिया और दूसरे तो कभी किसी के सगे हुए ही नहीं; पर विधानसभा में हमारा बहुमत है और हम सरकार चलाते रहेंगे।’’

- पर मुलायम जी, इस बार आपके परिवार को छोड़कर बाकी सब सपाइयों की जबरदस्त सफाई हो गयी ?

- हां, हमारी पार्टी और परिवार अब दूध में पानी की तरह एकरूप हो गये हैं। यही हमारी ताकत है। इसी के बल पर हमने हाथी की सूंड काट दी है। आप हमारी ये उपलब्धि भी तो देखो।

हम मायावती जी के घर गये, तो वे एक कागज पर जोड़-घटा में व्यस्त थीं; पर ‘‘हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों’ की तरह उनके हर समीकरण के अंत में जीरो बटे अंडा ही आ रहा था। चुनाव की चर्चा चली, तो वे बोलीं, ‘‘हमारे वोट कुछ खास कम नहीं हुए; पर अमित शाह की फैलायी अफवाहों की सुनामी से हमारे दल के गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग भ्रमित हो गये।’’

- पर अब आपका और ब.स.पा. का क्या होगा ?

- होगा क्या, हम उ.प्र. में अगला चुनाव पूरी ताकत से लड़ेंगे और नरेन्द्र मोदी को धूल चटा देंगे।

बिहार में नीतीश कुमार और शरद यादव पीठ मिलाये बैठे थे। शरद यादव ने सूपड़ा साफ होने के लिए नीतीश को दोष दिया, तो नीतीश का कहना था कि शरद यादव आधा समाजवादी और आधा संघी है। वह मंत्री पद के लालच में मोदी से मिला हुआ था।

- पर नीतीश जी, सरकार के मांझी होने के नाते पराजय का श्रेय तो आपको ही है।

- इसीलिए हमने अब पूरी सरकार ही मांझी को सौंप दी है।

- लेकिन पतवार तो आपके ही हाथ में है। ऐसे में अगले विधानसभा चुनाव में नाव डूबने का दोषी कौन होगा ?

- ये तुम लालू यादव से पूछो।

लालू जी के घर गये, तो देखा वे सख्त बीमार हैं। डाक्टर बेटी हर घंटे सुई लगा रही थी। राबड़ी देवी अपने हाथ से दवा पिला रही थीं। जब भी उनकी आंख खुलती, वे बड़बड़ा उठते थे, ‘‘वहां मोदी, यहां भी मोदी, हे राम..।’’ बेटे तेजस्वी ने बताया कि पिताजी को इस बात से बहुत सदमा लगा है कि मोदी के जीतते ही हमारी भैंसें भी खुशी में अधिक दूध देने लगी हैं।

हम कोलकाता में वाममार्गियों के कार्यालय में भी गये। वहां प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, बुद्धदेव भट्टाचार्य आदि फटे रूमाल से एक दूसरे के आंसू पोंछ रहे थे। शर्मा जी ने जब उनसे भावी रणनीति पूछी, तो वे हाथ उठाकर ‘‘हम होंगे कामयाब एक दिन...’’ गीत गाने लगे। मुंबई में शरद पवार के घर हो रही बैठक में सब लोग उस घड़ी को देख रहे थे, जो कभी आगे, तो कभी पीछे चलने लगती थी। शरद पवार कह रहे थे कि हमसे अधिक बुरी गत कांग्रेस की हुई है। इसलिए विधानसभा चुनाव में हम अपना मुख्यमंत्री बनाएंगे। एक ने फिकरा कसा - ‘‘झोली में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।’’ इस पर शरद पवार ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया।

हमने वापस दिल्ली आकर केजरी ‘आपा’ से मिलना चाहा; पर वे तो तिहाड़ में आराम फरमाते मिले। उनके एक खास आदमी ने कहा कि वे अब मुंह दिखाने लायक ही कहां हैं ? इसलिए जैसे ही जेल जाने का सुअवसर मिला, वे तुरंत वहां पहुंच गये।

- लेकिन पंजाब से तो उनके चार सांसद जीते हैं ?

- हां; पर उनका कहना है कि वे अपने नाम और काम से जीते हैं, केजरीवाल के कारण नहीं। सुना है कि अब वे अपनी अलग ‘पंजाब आम आदमी पार्टी’ (पापा) बना रहे हैं। भविष्य में जब ‘आपा’ और ‘पापा’ मिलेंगे, तो बड़ा मजा आयेगा।  

अपना काम समेटने से पहले हमने उस बिल्ले से मिलना भी ठीक समझा, जिसके चक्कर में इन बिल्लियों पर यह गाज गिरी है। हम वहां गये, तो चौकीदार ने बताया कि साहब विदेश गये हैं।

- पर इस समय वे वहां क्या कर रहे हैं ?

- वैसे तो मई-जून की गरमी वे हर साल वहीं बिताते थे; पर अब तो उन्हें यहां कुछ काम ही नहीं रहा। सुना है कि वहां कई बिल्लियां उनकी प्रतीक्षा में रहती हैं। उनमें से ही किसी के साथ व्यस्त होंगे।

अब कहने और सुनने को क्या बाकी बचा था ? 

1 टिप्पणी: