शुक्रवार, 6 जून 2014

व्यंग्य बाण : दुखराम बाबा

शर्मा जी के मोहल्ले में संकटमोचन हनुमान जी का एक प्राचीन सिद्ध मंदिर है। वहां प्रायः कथा, कीर्तन और सत्संग होते रहते हैं। पिछले दिनों भी वहां अयोध्या से एक प्रख्यात संत आये हुए थे। शर्मा जी के बहुत आग्रह पर मैं भी एक-दो बार वहां गया। एक दिन संत जी ने सत्संग में दुख और सुख की व्याख्या करते हुए कहा कि इनका संबंध बाहरी परिस्थितियों की बजाय मन की अवस्था से अधिक होता है। इसे समझाने के लिए उन्होंने एक कहानी सुनायी।

एक परिवार में पांच लोग थे। उसमें बड़े बेटे का नाम तो सुखराम था; पर वह न जाने क्यों सदा दुखी रहता था। इसलिए लोग हंसी में उसे कई बार ‘दुखराम’ भी कह देते थे। उससे दो साल छोटी एक बहिन थी। दुखराम उससे बहुत प्यार करता था। समय की बात, उस बहिन का रिश्ता तय हो गया। दुखराम वैसे तो सदा दुखी ही रहता था; पर आज वह कुछ ज्यादा ही परेशान दिखा। दादी ने पूछा, तो बोला - दादी, मुझे दुख इस बात का है कि अब तक घर में हम पांच लोग थे; पर बहिना की शादी के बाद चार ही रह जाएंगे।

- इसमें दुख की क्या बात है बेटा ? बेटी तो होती ही पराये घर की है। वह अपने घर जा रही है, यह तो खुशी की बात है।

- पर अब हम सिर्फ चार ही रह जाएंगे ?

- अरे पगले, इसकी शादी के बाद हम तेरी शादी भी तो करेंगे। इससे हमारे घर की संख्या फिर पांच हो जाएगी।

- लेकिन दादी, आपकी आयु भी तो 80 से ऊपर हो गयी है। हो सकता है, साल-दो साल में आप भगवान के पास चली जाओ। तब हम फिर चार रह जाएंगे।

- तो क्या हुआ ? भगवान के पास तो हर किसी को जाना ही है; लेकिन जब तेरी शादी होगी, तो घर में बच्चे का जन्म भी तो होगा। इस तरह संख्या फिर पांच हो जाएगी।

दादी बहुत आशावादी थीं। उन्होंने घुमा-फिराकर संख्या का हिसाब कई तरह समझाया; पर दुखराम का दुख नहीं मिटा। वह चार और पांच के फेर में ही उलझा रहा।

संत जी की बात मेरे मन को छू गयी। सचमुच सुख और दुख का संबंध शरीर से कम, मन से ही अधिक है। मुझे भारत के एक महान युवा नेता की बात ध्यान आयी। कुछ दिन पूर्व उन्होंने भी अपने भाषण में भूख और गरीबी को एक मानसिकता कहा था। मुझे लगा कि वह युवा नेता उन संत जी से किसी तरह कम नहीं है। बाबा जी ने जो ज्ञान 75 वर्ष में पाया, वह नेता जी ने 44 साल में ही पा लिया। इस दृष्टि से देखें, तो युवा नेता को अधिक नंबर मिलने चाहिए।

मैंने शर्मा जी से अपने मन की बात कही, तो वे भी मुझसे सहमत दिखायी दिये। अतः हमने उन नेता जी से मिलने का निश्चय किया। 

अगले दिन हम उनके घर जा पहुंचे। उन दिनों दिल्ली में उन्हीं की सरकार थी। अतः चमचों से लेकर कलछी और पतीलों तक की काफी भीड़ थी; पर अपनी आदत के अनुसार नेता जी मुंह पर दाढ़ी चिपकाये चुप बैठे थे। इस कारण बाकी किसी का भी बोलने का साहस नहीं हो रहा था। आखिर शर्मा जी ने ही बात शुरू की।

- नेता जी, जनता बहुत दुखी है। सब तरफ महंगाई, गुंडागर्दी और बेरोजगारी का माहौल है। ऐसे कब तक चलेगा। सब आशा से आपकी ही तरफ देख रहे हैं। आप कुछ करते क्यों नहीं ?

- दुख तो मुझे भी बहुत है; पर मैं क्या कर सकता हूं ? कुर्सी पर तो मौनी बाबा बैठे हैं। मैं तो ऊपर से नीचे तक सारे सिस्टम को बदलना चाहता हूं; पर मेरे हाथ में कुछ हो, तब तो.... ?

- पर मौनी बाबा को तो आपकी मम्मी जी ने ही वहां बैठाया है। आप मम्मी जी से ही कह कर देखिये।

- मैंने उनसे कहा था; पर वे कहती हैं कि मेरा समय तो पूरा हो गया। अब जो करना है, तुम्हीं करो। इसीलिए तो मैं दुखी हूं। 

यह कहते हुए नेता जी की आंखों में आंसू आ गये। शर्मा जी ने कल ही अपने पुराने पाजामे में से दो नये रूमाल बनवाये थे। उन्होंने उन कीमती आंसुओं को सहेजने के लिए एक रूमाल नेता जी को समर्पित कर दिया और वापस हो लिये।

शर्मा जी को आशा थी कि लोकसभा चुनाव के बाद नेता जी का दुख कम हो जाएगा; पर यहां तो बाजी पलट गयी। चौबे जी चले थे छब्बे बनने, बेचारे दुब्बे भी नहीं रहे। गये थे नया सूट सिलवाने, दरजी ने पुराना हिसाब दिखाकर कुर्ता-पाजामा भी रखवा लिया। बेचारे रात के अंधेरे में मुंह छिपाते हुए जैसे-तैसे वापस आये।

शर्मा जी को पता लगा, तो वे फिर उनके घर जा पहुंचे। अब तो मैदान खाली था। न चमचे थे और न कलछी। नेता जी अकेले बैठे खुद ही पतीला रगड़ रहे थे। दुख से उनका चेहरा पहले से भी अधिक लबालब था। यह देखकर शर्मा जी का गला भर्रा गया।

- नेता जी, बहुत बुरा हुआ।

- हां, सचमुच बहुत बुरा हुआ।

- पर अब मौनी बाबा हट गये हैं। अब तो आप कुछ कर ही सकते हैं ? जनता को आपसे बड़ी आशा है।

- मौनी बाबा तो हट गये हैं; पर उनकी जगह तूफानी बाबा भी तो आ गये हैं। बोलना तो दूर, मेरी तो उनके सामने जाने की भी हिम्मत नहीं है। इसलिए मैंने संसद में पीछे बैठने का निश्चय किया है। न जाने इस गरीब देश और इसकी बेचारी जनता का क्या होगा ?

नेता जी की आंखें फिर नम होने लगीं। शर्मा जी ने आंसू पोंछने के लिए पुराने पाजामे से बना दूसरा रूमाल भी उन्हें दे दिया। 

मैं आज भी शर्मा जी के साथ था। मुझे याद आये वे संत जी, जिन्होंने दुखराम की कहानी सुनाकर सुख और दुख का संबंध बाहरी परिस्थिति की बजाय मन की अवस्था से अधिक जोड़ा था। 

नेता जी ने भी अब तक आंसू पोंछ लिये थे। उन्होंने पूछा - शर्मा साहब, इस दुख से उबरने का क्या कोई उपाय है ?

- बिल्कुल है। संसद के सत्र के दौरान आप नहा-धोकर, खाली पेट हमारे मोहल्ले के प्राचीन संकटमोचन हनुमान मंदिर की नंगे पांव प्रतिदिन 11 परिक्रमा करें, तो निश्चित लाभ होगा।

यह सुनते ही नेता जी की आंखें फिर नम हो गयीं।  

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