रविवार, 8 जून 2014

व्यंग्य बाण : पार्क की महफिल में

बचपन में रामलीला देखने का चाव किसे नहीं होता ? हमारे गांव में भी जब रामलीला होती थी, तो हम शाम को ही मंच के आगे अपनी बोरी बिछा आते थे। एक बड़े से कागज पर अपने बाबाजी का नाम लिखकर उसे बोरी पर रखकर एक ईंट से दबा देते थे। फिर क्या मजाल जो कोई उस पर बैठ सके। और यदि कोई बैठ गया, तो फिर झगड़ा होते देर नहीं लगती थी।

रामलीला शुरू होते समय सबसे पहले आरती होती थी। छोटा गांव होने के कारण उसकी आवाज हर घर तक पहुंच जाती थी। उसे सुनते ही हम सब भाई-बहिन कुछ खानपान की सामग्री लेकर उस बोरी पर डट जाते थे। वहां ऐसी दो-चार नहीं, पचासों बोरियां बिछी रहती थीं। मंच के सामने दायीं ओर का भाग बड़े लोगों के लिए सुरक्षित था। वे वहां अपनी चारपाई या कुर्सी बिछवा देते थे। कई लोग तो अपना बड़ा हुक्का भी वहीं ले आते थे। गांव में रामलीला तो अब भी हर साल होती है। अब चमक-दमक, दिखावा और शोर-शराबा पहले से कई गुना अधिक है; पर अब उधर झांकने का मन ही नहीं करता। यह बात दूसरी है कि बच्चों की अब भी वहां खूब भीड़ रहती है। क्या करें, बचपन चीज ही ऐसी है। 

रामलीला में गीत, अभिनय, नाटक, हास्य, प्रहसन आदि सब होते थे एक रोचक प्रसंग मुझे अब तक याद है।

लंका में रावण का दरबार लगा था। सामने कई नर्तकियां नृत्य कर रही थीं। पीने-पिलाने का दौर भी चल रहा था। नृत्य समाप्ति के बाद रावण ने अपने मंत्री से कहा कि मैं अपने पुत्र का विवाह करना चाहता हूं। उसके लिए कोई अच्छी लड़की ढूंढकर लाओ।

- जी ठीक है; पर लड़के की आयु कितनी है ?

- 21-22 साल होगी।

- तो 18 साल की लड़की ठीक रहेगी ?

- हां, बिल्कुल।

नाटक और राजा के दरबार में विदूषक न हो, तो फिर मजा आधा रह जाता है। सो इस बीच में विदूषक महोदय वहां टपक पड़े - महाराज, क्षमा करें। यदि 18 साल की एक न मिले, तो क्या नौ साल वाली दो लड़कियों से काम चल जाएगा ?

कुछ-कुछ ऐसा ही प्रहसन इन दिनों हमारी संसद में भी चल रहा है। पिछले दिनों सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव में जनता ने नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत दिया। जो नेता पिछले दस साल से सत्ता के गलियारों में इत्र-फुलेल लगाकर चहकते रहते थे, उनके चेहरे की सारी पॉलिश जनता ने उतार ली। उनकी सीट इतनी कम हो गयीं कि उन्हें विधिवत विपक्ष का दर्जा भी नहीं दिया जा सकता। इसके लिए भी किन्हीं दो दलों को गठबंधन करना होगा, शायद तब जाकर कोई विपक्ष का नेता बन सकेगा। मामला बिल्कुल लंकापति रावण के दरबार के विदूषक जैसा हो गया, जिसने पूछा था कि यदि 18 साल की एक न मिले, तो क्या नौ साल की दो लड़कियों से काम चल जाएगा ?

आप जानते ही हैं कि हम बहुत से मित्र हर दिन सुबह-शाम पार्क में टहलते हैं। यह किस्सा जब मैंने कल शाम सबको सुनाया, तो शर्मा जी का चेहरा गुस्से में ऐसा हो गया, जैसे मकई का दाना भाड़ में भुनकर पापकार्न बन जाता है। वे कुछ कहना चाहते थे; पर उससे पहले ही वर्मा जी ने एक किस्सा और सुना दिया।

यों तो भगवान की कृपा सब पर ही होती है; पर उसके रूप और रंग अलग-अलग होते हैं। चंदूलाल पर यह कृपा इस रूप में हुई कि 16 साल का होते तक उसकी लम्बाई सात फुट, गोलाई पांच फुट और वजन 125 किलो हो गया। इस कारण उसे अपनी जरूरत की हर चीज अलग से ही लेनी या बनवानी पड़ती थी। 

एक बार वह जूता लेने बाजार गया। दुकानदार ने एक से एक बड़े जूते दिखाये; पर चंदूलाल किसी से संतुष्ट नहीं हुआ। किसी में उसका पंजा दबता था, तो किसी में एड़ी। जूते पहनते और उतारते एक घंटे से अधिक हो गया। दुकानदार के माथे पर पसीना आ गया; पर चंदूलाल जाने का नाम नहीं ले रहा था। अचानक चंदूलाल खुशी से उछलता हुआ बोला - बस, बस। ये एकदम ठीक है। इसमें मेरे पैर को बहुत आराम लग रहा है। तुम इसे ही पैक कर दो।

दुकानदार ने कहा - श्रीमान जी, जरा आंखें खोलकर नीचे की तरफ देखिये। आपने पैर में जूता नहीं, उसका डिब्बा ही पहन लिया है। यदि यह आपके पैर में फिट है, तो यही ले जाइये। इसके लिए मैं आपसे पैसे भी नहीं लूंगा। बस, कृपा करके अब आप टलिये। आपके चक्कर में मेरी तीन ग्राहक वापस लौट गये हैं।

इतना कहकर वर्मा जी बोले - भारत की 125 साल बूढ़ी पार्टी के महान युवा नेता का भी आजकल यही हाल है। अब तक तो वे संगठन मजबूत करने के नाम पर जिम्मेदारी से भागते रहे; पर ‘नंगा क्या नहाये और क्या निचोड़े’ की तर्ज पर जब न सत्ता बची, न संगठन, तब भी वे आगे आने से डर रहे हैं। चंदूलाल के ग्यारह नंबरी पांव के जूते की तरह उन्हें कोई जिम्मेदारी फिट ही नहीं आ रही। यदि बहुत दिन ऐसे ही चलता रहा, तो लोग उन्हें जूते की बजाय डिब्बा थमा कर दुकान का दरवाजा दिखा देंगे।

इतना कहकर वर्मा जी ने तिरछी नजर से शर्मा जी की ओर देखा। शर्मा जी आंख में आंसू ऐसे हो रहे थे, जैसे पिया के घर जाने के लिए बाबुल के देहरी से निकलती हुई दुल्हन दो कदम आगे रखकर फिर किसी से मिलने के लिए अंदर मुड़ जाती है। मुझे अचानक एक शेर याद आ गया - 

हम तो ‘हज़ीं’ ये समझे हैं, दामन जो भिगो दे पानी है
आंसू तो वही इक कतरा है, पलकों पे जो तड़पे बह न सके।।

एक किस्सा गुप्ता जी भी सुनाना चाहते थे; पर मैंने उन्हें रोक लिया। आखिर जैसे भी हैं, शर्मा जी हैं तो अपने लंगोटिया यार ही। उनके बिना शाम को पार्क की महफिल उदास सी लगती है। इसलिए उनका दिल बहुत अधिक दुखाना उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं था; और हम एक मुर्दा पार्टी के चक्कर में अपने जिंदादिल मित्र को खोना नहीं चाहते थे। इसलिए आज की महफिल यहीं समाप्त करने का निर्णय लेकर हम लोग उठ गये। 

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