बुधवार, 16 जुलाई 2014

आलेख : बाजार के हवाले भगवान

पंजाबी लोकगायक गुरदास मान का एक प्रसिद्ध गीत है - 

ऐ दुनिया मंडी पैसे दी, हर चीज विकैंदी आ सजना
ऐथे रोदें जेड़े नईं विकदे, तू विकन दी आदत पा सजना।।

(ये दुनिया पैसे की मंडी है। यहां हर चीज बिकती है। जो यहां बिक नहीं पाते, वे रोते हैं। अतः तू भी बिकने की आदत डाल ले।)

मनुष्य के बारे में इस गीत में ठीक कहा है या नहीं, यह तो गुरदास मान के प्रशंसक ही जानें; पर इन दिनों भगवान जरूर बाजार के हवाले हो गये हैं। शिरडी वाले साईं बाबा के बारे में जो चर्चा पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी ने छेड़ी है, वह कुछ ऐसी ही है। इस पर कोई टिप्पणी संभवतः ‘छोटे मुंह बड़ी बात’ ही होगी; पर पिछले कुछ समय से जो परिवर्तन देश, समाज और धार्मिक जगत में हो रहे हैं, उन पर विचार जरूर किया जा सकता है।

कई वर्ष पूर्व तक अध्यापक, चिकित्सक और पुजारी के प्रति लोगों के मन में बहुत श्रद्धा रहती थी। इनके बारे में यह सामान्य धारणा थी कि ये जनसेवक हैं और पैसे का लालच नहीं करते; पर भौतिकता की आंधी ने सब पुराने प्रतिमान ध्वस्त कर दिये हैं। हर घर में महंगे उपकरण देखकर इनके मन में भी उनके प्रति चाह जगी है। अतः ये तीनों संस्थाएं भी बाकी सबकी तरह भ्रष्ट हो गयी हैं। अब इनका लक्ष्य भी केवल पैसा कमाना रह गया है। 

इसके लिए अध्यापक ट्यूशन पढ़ाता है; परीक्षा-पत्र बेचता है और मनचाहा परिणाम दिलवाने के लिए दलाली करता है। चिकित्सक अपनी बतायी दुकान पर कई तरह के अनावश्यक परीक्षण कराता है और बिना जरूरत महंगी दवाइयां लिखता है। पुजारी का दावा है कि भक्त की प्रार्थना भगवान तक वही पहुंचाता है। इसलिए जब तक मनचाही दक्षिणा नहीं मिलेगी, वह प्रार्थना आगे नहीं बढ़ाएगा। प्रार्थना न हुई, किसी सरकारी कार्यालय का प्रार्थना पत्र हो गया। पैसे की इस अंधी लालसा के कारण विद्यालय अब दुकान बन गये हैं। चिकित्सालय को लोग जेबकतरों का अड्डा मानने लगे हैं और धर्मस्थलों में भीड़ बढ़ने के बावजूद लोगों की आस्था घट रही है। 

जहां तक साईं मंदिरों में बढ़ रही भीड़ की बात है, तो इससे तो कोई इन्कार नहीं कर सकता। न केवल नये साईं मंदिर बन रहे हैं, बल्कि पुराने मंदिरों में भी श्रीराम, श्रीकृष्ण, मां दुर्गा, हनुमान जी आदि के साथ ही साईं की प्रतिमाएं रखी जाने लगी हैं। हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती और ओम जय जगदीश हरे.. की तर्ज पर साईं के भजन भी खूब प्रचलित हो रहे हैं। साईं का वास्तविक नाम क्या था, वे हिन्दू थे या मुसलमान, इस बारे में पक्का कुछ नहीं कह सकते। शिरडी में वे जिस मस्जिद में रहते थे, उसे वे ‘द्वारका माई’ कहते थे। जब से कुछ विवाद चला है, तब से कुछ नयी बातें सामने आ रही हैं। वे सच हैं या झूठ, यह कोई ठीक नहीं जानता। जैसे वे मांस खाते थे तथा औरों को भी खिलाते थे। वे सबका मालिक एक कहते थे या सबका अल्लाह एक..आदि। पानी से दीपक जलाना, आटा बिखेर कर रोग भगा देना तथा मृतक को जीवित कर देना...जैसे चमत्कार प्रायः सभी संतों के साथ जुड़े हुए हैं। 

कुछ का मत है कि साईं हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं। यह बड़ा भ्रम है। साईं मंदिर में किसी मुसलमान को जाते इन आंखों ने नहीं देखा। भला मुसलमान मूर्ति की पूजा क्यों करेगा ? हां, मूर्ख हिन्दू अरजी-फरजी मजारों पर मत्था टेककर और मंदिर या दरगाहों के बाहर खड़े मुसलमानों से पूजा-सामग्री लेकर उनकी जेब जरूर भरते रहते हैं। हिन्दू कण-कण में भगवान को देखते हैं; पर मुसलमान अपने मजहब का होते हुए भी उस संत या फकीर को छोड़ देते हैं, जिन्होंने श्रीराम और श्रीकृष्ण की पूजा की या हर मानव को एक समझने का संदेश दिया। कबीर से लेकर रहीम, रसखान, सरमद और अब साईं बाबा तक ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं।  

लेकिन इस बीच साईं संध्या के नाम पर पैसा ऐंठने वाले कलाकारों के कई दल जरूर बन गये हैं, इनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं। ये समय के अनुसार फिल्मी गीत, गजल और कव्वाली से लेकर दुर्गा जागरण और भजन संध्या तक सब कर लेते हैं। उनका कहना है कि यह उनका धंधा है और धंधे में धर्म आड़े नहीं आता।

पिछले दिनों मेरे एक सम्पन्न मित्र ने घर में पौत्र जन्म के उपलक्ष्य में साईं संध्या और खानपान का आयोजन किया था। वहां बाकी सब तो ठीक था; पर आश्चर्य एक लाख रु. में बुलाई गयी कव्वाल पार्टी को देखकर हुआ। उसमें सब मुसलमान थे। वे कुछ देर साईं के गुण गाते, फिर हजरत निजामुद्दीन की कव्वाली गाने लगते थे। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि जो लोग शिरडी या हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर नहीं गये हैं, वे वहां जरूर जाएं। भावुक श्रोताओं से उन्होंने हाथ उठवाकर वचन भी लिया। कार्यक्रम के बाद मैंने उस मूर्ख मित्र को खूब खरी-खरी सुनायी।

जहां तक साईं बाबा की बात है, बीस साल पहले तक उन्हें शिरडी के आसपास के लोग ही जानते और मानते थे; पर कुछ फिल्म और गीतों ने उन्हें प्रसिद्ध कर दिया। ‘‘शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली’’ ऐसा ही एक गीत था। फिल्म ‘अमर अकबर एंथोनी’ में इसे ऋषि कपूर आदि पर फिल्माया गया था। आनंद बख्शी द्वारा लिखित, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध और मोहम्मद रफी द्वारा स्वरबद्ध यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म की सफलता में इस गीत का बहुत बड़ा योगदान था। इसके बाद ऐसी कई फिल्में बनीं। इससे साईं बाबा पूरे देश में छा गये।

फिल्मों से किसी देवी-देवता के लोकप्रिय होने का यह पहला उदाहरण नहीं है। इससे पूर्व बहुत कम बजट में, सामान्य कलाकारों के साथ बनी ‘जय संतोषी मां’ ने भी रातोंरात ‘संतोषी मां’ को घर-घर में स्थापित कर दिया था। प्रदीप के लिखे और उषा मंगेशकर के साथ गाये गीत सुपरहिट हो गये। महिलाओं के अनेक व्रतों में शुक्रवार का एक व्रत और जुड़ गया, जिसका पारायण चने और गुड़ से होता था। मंदिरों में आग्रहपूर्वक काल्पनिक संतोषी मां की मूर्तियां स्थापित कर दी गयीं। उनका गुण गाने वाले टेप और पुस्तकें आ गयीं; पर उनकी मान्यता महिलाओं में ही रह जाने से वे पुरुषों द्वारा संचालित बाजार की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकीं और जल्दी ही भुला दी गयीं। दूसरी ओर पालकी, भंडारे और चमक-दमक वाली भजन संध्याएं बाजार के तंत्र में फिट बैठने के कारण साईं बाबा छा गये।

आज से 25-30 साल पहले तक फिल्मों का समाज पर, अच्छा हो या खराब, पर बहुत प्रभाव पड़ता था। अब यह काम दूरदर्शन के हिस्से में आ गया है। काले/सफेद दूरदर्शन के दौर में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित धारावाहिक ‘हम लोग’ को पुराने लोग आज भी याद करते हैं। यही स्थिति धारावाहिक ‘बुनियाद’ की भी थी। जब रंगीन टी.वी. आया, तो हर रविवार को रामानंद सागर कृत ‘रामायण’ के प्रसारण के समय सड़कें सूनी हो जाती थीं। लोग अपनी बस और रेल की यात्रा रोक देते थे। कई घरों में तो लोग टी.वी. कक्ष को मंदिर जैसा बनाकर परिवार सहित बैठ जाते थे। ‘महाभारत’ के समय भी लगभग ऐसा ही होता था। कुछ वर्ष पूर्व तक मां दुर्गा के जागरण पंजाबियों में, दुर्गा पूजा बंगालियों में, गणेश पूजा मराठियों में तथा जगन्नाथ रथ यात्रा ओड़िया समाज में प्रचलित थी। दशहरे पर रावण दहन भी मुख्यतः उत्तर भारत में ही होता था; पर दूरदर्शन ने इन पर्वों को राष्ट्रव्यापी बना दिया है। पंजाब और फिर उत्तर भारत की महिलाओं में प्रचलित ‘करवा चौथ’ के व्रत की भी यही स्थिति है। यह दूरदर्शन देवता की महिमा का प्रभाव है।

अब समय मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का है। विज्ञान जिस तेजी से भाग रहा है, उससे दो-चार साल बाद कोई और चीज हमारे जीवन में छा जाएगी। अर्थात यह सब चीजें अस्थायी हैं। साईं बाबा की पूजा और चढ़ावे को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। हिन्दू धर्म एक जीवित धर्म है। व्यक्ति, परिवार, समाज और परम्पराओं की तरह हमारे देवी-देवता भी नये रूप धारण करते रहते हैं। इसलिए निश्चित जानिए कि आठ-दस साल बाद लोग किसी नये देवता की पूजा करते मिलेंगे। जैसे बाजार में बड़ी दुकान के खुलने से छोटी दुकान की बिक्री घट जाती है, ऐसा ही यहां भी होगा। यद्यपि श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवजी, हनुमान और मां दुर्गा की पूजा सदा से हो रही है और होती रहेगी। अलग-अलग रूपों में इनका प्रभाव चिरस्थायी है।

पिछले कुछ समय से बाजार का हस्तक्षेप जैसे-जैसे जीवन में बढ़ा है, उसका प्रभाव धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी हुआ है। अब कोई भी कथा या धार्मिक आयोजन लाखों रु. के बजट के बिना नहीं होता। जितना बड़ा वक्ता, उतना ही भव्य और महंगा आयोजन। प्रसिद्धि के लिए नये कथावाचक बेचारे क्या-क्या नहीं करते ? दूरदर्शन पर पैसे देकर कथा चलवाते हैं। फिर अखबारी विज्ञापन और मोबाइल संदेश (एस.एम.एस.) द्वारा अपने परिचितों तक इसकी सूचना भेजते हैं। पहले वे कथा निःशुल्क करते हैं; पर फिर नाम के साथ ही दाम भी बढ़ते जाते हैं। धन और धर्म का घालमेल इतना अधिक हो गया है कि कहां धर्म है और कहां धन, पता ही नहीं चलता। पहले भगवान भक्तों के हाथ से निकलकर पंडे-पुजारियों के चंगुल में फंसे और अब बाजार के हवाले हो गये हैं। एक फिल्मी गीत में कहा भी है -

रामचंद्र कह गये सिया से, ऐसा कलयुग आएगा
हंस चुगेगा दाना तिनका, कौआ मोती खाएगा।।

इस विषम परिस्थिति में से भगवान को कौन निकालेगा, भगवान ही जाने।                                       

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