सोमवार, 11 अगस्त 2014

व्यंग्य बाण : आत्मकथा

शर्मा जी कई दिन से बेचैन थे। जब भी मिलते, ऐसा लगता मानो कुछ कहना चाहते हैं; पर बात मुंह से निकल नहीं पा रही थी। मन की बात बाहर न निकले, तो वह भी पेट की गैस की तरह सिर पर चढ़ जाती है। रक्षाबंधन वाले दिन मैं उनके घर गया, तो शर्मानी मैडम मायके गयी थीं। मैदान साफ देखकर मैंने बात छेड़ दी।

- शर्मा जी क्या बात है; मुझे तो बताओ। आपका बुझा हुआ चेहरा अच्छा नहीं लगता। हो सकता है, मैं कुछ सहायता कर सकूं।

- वर्मा जी क्या बताऊं, जीवन की शाम आ गयी है। बाल सफेद हो गये हैं। सिर पर चांद उभर आया है। कमर झुकने लगी है। छड़ी के बिना अब चला नहीं जाता। आधे दांत रिटायर हो गये हैं, बाकी भी तैयारी में हैं; पर अब तक मुझे न तो तुम्हारी भाभी समझ पायी और न बच्चे। बाकी लोगों की तो बात ही करना बेकार है।

- ये आपका विचार होगा; पर मैं तो ऐसा नहीं मानता।

- जो भी हो; पर मैं चाहता हूं कि कम से कम अब तो लोग मुझे ठीक से जान लें। आजकल कई लोग आत्मकथा लिख रहे हैं। अखबारों में और दूरदर्शन पर उनकी खूब चर्चा भी हो रही है। इसलिए मैं सोचता हूं कि मैं भी अपनी आत्मकथा लिख डालूं।

- शर्मा जी, अच्छे काम करने वालों की जीवनी भावी पीढ़ियां लिखती हैं। सूर, कबीर, तुलसी ने कभी अपना जीवन चरित नहीं लिखा; पर जिन्हें अपने कर्मों पर विश्वास न हो, उनकी बात दूसरी है। 

- पर मेरे बच्चे और मित्र तो नाकारा हैं। वे कुछ नहीं करेंगे। इसलिए मैं चाहता हूं कि यह काम मेरी आंखों के सामने ही हो जाए।

- तो आप दरवाजे बंद करके कागज-कलम लेकर बैठ जाओ।

- पर मुझे तो लिखना नहीं आता। मैंने सुना है कि लोग इसके लिए किराये पर किसी लेखक की सेवाएं ले लेते हैं। तुम भी तो इसी लाइन में हो। कोई ऐसा आदमी बताओ, जो यह काम कर दे।

- पर शर्मा जी, इस आत्मकथा को छापेगा कौन ?  

- क्यों, बाजार में इतने प्रकाशक क्या चने बेचने को बैठे हैं ?

- पर प्रकाशक तो वही पुस्तक छापते हैं, जो खूब बिक सके। आखिर उन्हें भी तो अपने बच्चों को दाल-रोटी खिलानी है।

- तो जिस लेखक की सेवाएं मैं लूंगा, वह यही काम तो करेगा। वह झूठी-सच्ची घटनाएं लिखकर उसे चटपटा बनाएगा। सामयिक और राजनीतिक घटनाओं के साथ मुझे इस तरह जोड़ेगा, जिससे मेरा व्यक्तित्व युद्धिष्ठिर की तरह धरती से छह इंच ऊपर उठ जाए।

- पर पुस्तक इतने मात्र से भी नहीं बिकती।

- जी हां, मैं जानता हूं। इसलिए प्रकाशक पुस्तक बाजार में आने से पहले ही उसके कुछ ऐसे अंश जारी कर देता है, जिन पर खूब वाद-विवाद हो। कुछ प्रायोजित लेखक उसकी प्रशंसा करते हैं, तो कुछ निंदा। कभी-कभी तो गाली-गलौच भी हो जाती है; पर प्रकाशक इससे तटस्थ रहकर अपने लक्ष्य पर ही ध्यान टिकाये रखता है। विवाद जितना तीखा होगा, पुस्तक उतनी अधिक बिकेगी। 

- तो आप भी यह सब करोगे ?

- बिल्कुल। मैंने सुना है कि अच्छे प्रकाशन संस्थान लेखक को पैसे देते हैं; पर मैं तो चाहता हूं कि मेरी आत्मकथा पर खूब चर्चा हो। भले ही इसके लिए मुझे प्रकाशक को अपनी तरफ से पैसे देने पड़ें।

मैंने उनके सिर से यह भूत उतारने का बहुत प्रयास किया; पर सब व्यर्थ। अतः मैंने अपने एक मित्र लेखक को उनसे मिलवा दिया। वह बीस हजार रु. में यह काम करने को तैयार हो गया।

कुछ दिन में सभी मित्रों को यह अनुभव हुआ कि शर्मा जी की बाहरी हलचल बहुत कम हो गयी हैं। बाकी मित्र चिन्तित होने लगे; पर मैं जानता था कि वे किस दुनिया में व्यस्त हैं।

शर्मा जी ने एक बार मुझे कुछ पृष्ठ दिखाये। उसमें लिखा तो बहुत कुछ था; पर कहा क्या है, यह समझ से परे था। उन्होंने एक जगह अपने वरिष्ठ अधिकारी के रिश्वत के किस्से भी लिखे थे। मैंने इस पर आपत्ति की - शर्मा जी, ये ठीक नहीं है। आपके बीच चाहे जैसे मतभेद रहे हों; पर अब आप दोनों कार्यमुक्त हो चुके हैं। ऐसे में अपने अधिकारी की छीछालेदर करना ठीक नहीं है।

- पर वह कितना कामचोर और घूसखोर था, यह सबको पता लगना चाहिए। उसने मुझे कितना दुखी किया है, ये मैं ही जानता हूं।

- पर कम तो आप भी नहीं थे। लोग मेज के नीचे से लेते हैं; पर आप तो ऊपर से ही नोट थाम लेते थे। और कार्यालय में आप कभी दो घंटे से अधिक नहीं बैठे। क्या ये सब भी लिखोगे ?

- कैसी बात कर रहे हो वर्मा। मुझे अपना मान बढ़ाना है, तो ये सब क्यों लिखूंगा ? मैंने मोहल्ले के प्रधान जी को भी खूब रगड़ा है।

- वो तो बहुत सज्जन आदमी हैं। फिर भी आप उन्हें परेशान करते रहते थे। आपने मोहल्ला सभा का चंदा कभी समय से नहीं दिया। कभी कोई जिम्मेदारी नहीं ली। हां, उनके विरुद्ध पर्चे छपवाने और चुनाव के समय हंगामा करने में आप सबसे आगे रहते थे।

- तुम चाहे जो कहो; पर मैं अपने मन की भड़ास निकाल कर रहूंगा। मैंने तो तुम्हारी भाभी की भी खूब खिंचाई की है।

- पर आपने उन्हें कितने कष्ट दिये हैं, यह मुझे खूब पता है। आधा वेतन तो आप मौज-मस्ती में ही खर्च कर देते थे और उन बेचारी को आधे वेतन में ही घर चलाना पड़ता था।

- जब मैं कमाता था, तो मेरी मरजी। मैं चाहे जो करूं ?

पांडुलिपि तैयार होने पर मैंने उसे देखा। वह उनके मन की भड़ास नहीं, उनके दिल-दिमाग का कीचड़ था। उन्होंने खुद को दूध का धुला बताते हुए बाकी सबको दुष्ट सिद्ध करने का प्रयास किया था। मैंने पांडुलिपि उनकी मेज पर दे मारी।

- क्यों वर्मा जी, क्या हुआ ?

- हुआ तो कुछ नहीं; पर इसे छपवाने से पहले ये जरूर सोच लो कि इससे दूसरों की नजर में चढ़ना तो दूर, आप अपनी नजर में इतने गिर जाओगे कि भगवान भी नहीं उठा सकेंगे।

- मैं समझा नहीं..।

- जो कीचड़ में थूथन डालकर अपने काम की चीज ढूंढते रहते हैं, उन्हें यह समझने के लिए एक जिंदगी काफी नहीं है।

यह कहकर मैं आ गया। कल वे मिले, तो हंसते हुए मेरे कान में बोले - मैंने आत्मकथा छपवाने का विचार छोड़ दिया है।

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