मंगलवार, 31 मार्च 2015

व्यंग्य बाण : घमासान के बाद

आम आदमी पार्टी (आपा) में पिछले दिनों हुए घमासान से शर्मा जी बहुत दुखी थे। उन्होंने सब नेताओं से कहा कि वे मिलकर काम करें; पर जो मिलकर काम कर ले, वह समाजवादी कैसा ? फिर यहां तो समाजवादी के साथ साम्यवादी, अराजकतावादी और अवसरवादी भी थे। यानि ‘करेला और नीम चढ़ा।’ इसलिए पहले जबरदस्त फूट हुई और फिर टूट। किसी ने ठीक ही कहा है - इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा।

खैर, जब टूट हो ही गयी, तो टूटे दिल (क्षमा करें दल) वालांे ने अलग से एक बैठक की। दिल्ली की सत्ता से तो वे बाहर हो ही गये थे, सो वे अपनी मनपंसद जगह जंतर-मंतर पर आ बैठे। शर्मा जी भी अपने खटारा स्कूटर पर वहां पहुंचे। सब इससे बहुत दुखी थे कि गर्मियों में उनके कुछ मित्र तो ए.सी. कमरों का सुख उठा रहे हैं, और वे सड़क पर बैठे हैं; पर अब क्या हो सकता था ? हनीमून पीरियड में हुए तलाक के दोषी तो दोनों पक्ष ही थे। 

बैठक की अध्यक्षता के लिए प्रशांत दूषण और बचे-खुचे दल के संयोजक पद के लिए योगेन्द्र माधव के नाम तय हुए। माधव ने कहा कि बैठक की कार्यवाही कोई रिकार्ड न करे। इस पर रामलाल जी उखड़ गये, ‘‘वाह, हम पूर्ण पारदर्शिता के पक्षधर हैं। इसी मुद्दे पर तो हमारे केजरी ‘आपा’ से मतभेद हैं।’’

- वो तो ठीक है; पर हर बात सबको नहीं बतायी जाती। हम बैठक का एजेंडा और इसके निष्कर्ष कल खुद सार्वजनिक कर देंगे।

इस पर काफी बहस हुई। दो लोग बैठक छोड़कर फिर केजरी ‘आपा’ के पाले में चले गये। सबको शांत करने के लिए अध्यक्ष जी ने कार्यवाही रिकार्ड करने की जिम्मेदारी श्यामलाल जी को दे दी। फिर भी उनके ध्यान में आया कि कई लोग अपने मोबाइल से सारी बात टेप कर रहे हैं। यह देखकर वे चुप रह गये, क्योंकि उनकी पार्टी में यह बीमारी आम थी।

अगला विषय यह था कि हम ‘पूर्ण स्वराज’ के पक्षधर हैं। इसलिए राज्यों को अपने निर्णय लेने की छूट होनी चाहिए। वे चुनाव में जातिवादियों से समझौता करें या वंशवादियों से; भ्रष्टाचारियों को टिकट दें या भूमाफिया को, यह राज्य इकाई स्वयं तक करे। इस पर दूषण जी बोले कि अगर यही करना है, तो फिर पुराने दल में ही रहना चाहिए था। हम दाग-धब्बों से मुक्त राजनीति के लिए अलग हुए हैं। अतः हम अपना चुनाव चिन्ह भी ‘वाशिंग मशीन’ रखेंगे।

गुप्ता जी का मत था कि पार्टी का स्वरूप केन्द्रीय होने की बजाय राज्य स्तर का हो। सब अलग-अलग नाम रखें। जैसे दिल्ली में दिल्ली आम आदमी पार्टी (दाप) और महाराष्ट्र में ‘माप’। इस पर बिहार वाले खुश हो गये, ‘‘फिर तो हम ‘बाप’ हो जाएंगे।’’ बंगाल वाले भी पीछे क्यों रहते। बोले, ‘‘नहीं-नहीं, ‘बाप’ हम होंगे।’’

उन दोनों को लड़ते देख माधव जी ने बीच-बचाव कराया। बच्चे के जन्म से पहले ही बाप का झगड़ा ठीक नहीं था। बाप अगर दो हो गये, तो बड़ी समस्या हो जाएगी। पंजाब वालों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया। क्योंकि इस नियम से उनकी पार्टी का नाम ‘पाप’ हो जाता। जम्मू-कश्मीर वाले बोले, ‘‘ऐसा हुआ, तो हम जीवन भर ‘जाप’ ही करते रह जाएंगे।’’

एक ने ‘समाजवादी आम आदमी पार्टी’ नाम रखने का सुझाव दिया; पर इसका संक्षिप्त नाम ‘साप’ हो रहा था। सबको डर था कि कहीं लोग इसे मजाक में ‘सांप’ न कहने लगें। दूसरे ने कहा कि नाम में से ‘आम आदमी’ को ही क्यों न हटा दें ? न रहेगा मर्ज, न रहेगा मरीज; लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बनी। क्योंकि आम आदमी को हटाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो जाता। फिर विरोधी इसे खास आदमी पार्टी (खाप) कहने लगेंगे। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यद्यपि खापों का काफी प्रभाव है; पर कई जगह उसे पिछड़ी सोच वाले पुरुषवादियों का समूह माना जाता है।  

एक घंटे से अधिक हो गया; पर नाम तय नहीं हो सका। उधर गर्मी के चलते खुले में बैठना कठिन हो रहा था। दोनों नेता सबसे अधिक कष्ट में थे। उन्हें अब बिना ए.सी. रहने की आदत नहीं रही थी। इसलिए वे सब पास के एक बड़े होटल में जा बैठे। वहां कुर्सियों पर बैठने से मन ठीक हुआ और ठंडा पीने से दिमाग में तरावट आयी। अतः अब झगड़े की बजाय शांति से बात होने लगी। सबने नाम तय करने की जिम्मेदारी अध्यक्ष और संयोजक को सौंप दी।

पर दो लोग इसका भी विरोध करने लगे। उनका कहना था कि हम पार्टी में ‘आंतरिक लोकतंत्र’ के समर्थक हैं। नाम एक की बजाय दो सोचे जाएं। फिर अंतिम निर्णय वोट द्वारा होगा। तीन लोग इससे नाराज हो गये। वे बोले कि ऐसे तो अगले छह महीने तक हम नाम ही तय नहीं कर सकेंगे। इस विषय पर गरमागरमी होने लगी, तो अध्यक्ष जी ने चाय-नाश्ता मंगा लिया। पेट की आग कुछ ठंडी हुई, तो बाहरी माहौल भी शांत हो गया।

अगले दो-ढाई घंटे तक कई विषयों पर बात हुई; पर निर्णय एक पर भी नहीं हो सका। कुछ का मत था कि हमें हर तरह से ‘आम आदमी पार्टी’ जैसा ही दिखना चाहिए, जबकि कुछ बोले कि हमारे पास अलग चेहरे होना ही काफी है। कुछ इस बात पर जोर दे रहे थे कि पार्टी और नेता तो बनते रहेंगे; पर उन्हें अभी से अगले चुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिया जाए।

आधे लोग तो नाश्ते के बाद ही चले गये थे। दोनों नेताओं को भी प्रेस वार्ता में जाना था। अतः बैठक समाप्त कर दी गयी। तभी होटल वाला पांच हजार रु. का बिल ले आया। उसने अध्यक्ष जी को बिल थमाया, तो वे बोले, ‘‘मैं तो पुरानी पार्टी को बहुत पैसा दे चुका हूं; पर उन्होंने अध्यक्ष बनाने की बजाय ठेंगा दिखा दिया। इसलिए अब मैं पैसे नहीं दूंगा।’’ माधव जी बोले, ‘‘मैं सोचता था कि पार्टी मुझे राज्यसभा में भेजेगी, तो कुछ काम-धंधा चलेगा; पर अब तो सब तरफ अंधेरा ही है। मुझसे बिल के भुगतान की आशा न करें।’’

बाकी लोग भी बिल की बात सुनकर खिसक गये। बच गये बेचारे शर्मा जी। होटल वाले ने उनका स्कूटर जब्त कर लिया। 

शर्मा जी अब अपना स्कूटर छुड़ाने के लिए परेशान हैं। पांच हजार रु. देने को कोई तैयार नहीं है। यदि आप उनकी कुछ सहायता कर सकें, तो बड़ी कृपा होगी। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें