मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

कांग्रेस मुक्त भारत के लिए दो कदम और

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव की धूल बैठ चुकी है। मैदानी भागों में पहाड़ की अपेक्षा धूल और गुबार कुछ अधिक ही उठता है। ऐसा ही इस बार भी हुआ। चुनाव तो दोनों राज्यों में थे; पर शोर गुजरात का अधिक हुआ। इस चक्कर में लोग हिमाचल प्रदेश को भूल ही गये। 

असल में कांग्रेस वालों ने चुनाव से पहले ही मान लिया था कि हिमाचल में इस बार हमें हारना है। इसलिए उन्होंने वहां ताकत ही नहीं लगायी। राहुल बाबा भी एक दिन चक्कर लगाकर चले गये। मैडम जी तो घर से निकली ही नहीं। वैसे उनके आने से होना भी क्या था ? वहां लोग वीरभद्र सिंह को जानते और पहचानते हैं। वोट भी उनके नाम पर ही पड़ता है। इसीलिए कांग्रेस ने मजबूर होकर पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के बावजूद 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह पर ही दांव लगाया। उन्होंने इस चुनाव को अपनी आखिरी पारी बताकर सहानुभूति बटोरनी चाही; पर जनता ने उनकी बजाय मोदी की अपील पर भरोसा किया। हां, वीरभद्र सिंह ने अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को विधायक बनवा दिया। इससे स्पष्ट है कि अगले चुनाव में वंशवादी कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी वही होंगे।  

यद्यपि भा.ज.पा. की जीत तो हुई; पर खीर में कंकड़ भी पड़ गया। चूंकि उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल खुद चुनाव हार गये। कुछ लोगों का कहना है कि इसके लिए उन्हें नेता घोषित करने में देर तथा उनके चुनाव क्षेत्र की बदल जिम्मेदार है। अर्थात यह भूल केन्द्रीय नेतृत्व की है। इसका दोष मोदी को दें या अमित शाह और मुख्यमंत्री पद की लालसा पाले केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा को; पर इससे नुकसान तो हुआ ही है। जो भी हो, अब पांच बार के विधायक जयराम ठाकुर वहां मुख्यमंत्री बन गये हैं। यह निर्णय उचित ही है। केन्द्र से राज्य और राज्य से केन्द्र में भेजना ठीक नहीं है। यद्यपि राजनीतिक मजबूरियों के कारण यह द्रविड़ प्राणायाम प्रायः सभी दलों को करना पड़ता है।

जहां तक गुजरात की बात है, वहां के चुनाव पर पूरे भारत की ही नहीं, पाकिस्तान और चीन तक की निगाहें थीं। सब यह जानने को उत्सुक थे कि मोदी और शाह अपने घरेलू राज्य में भा.ज.पा. को फिर से जिता सकते हैं या नहीं। दूसरी ओर सब राहुल बाबा की योग्यता भी जांचना चाहते थे। कांग्रेस वाले भी उन्हें इस जीत से पार्टी की अध्यक्षता का उपहार देना चाहते थे; पर पहले ही कौर में हिमाचल के साथ गुजरात की मक्खी भी आ गयी। सिर मुंडाते ही ओले पड़ गये। न मंदिर दर्शन काम आया और न जनेऊ का प्रदर्शन। यद्यपि वोट और सीटें बढ़ने से हार का दुख कुछ कम हो गया। फिर भी हार तो हार ही है। यद्यपि कांग्रेसी चमचे इसे ही उनकी जीत बता रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि राहुल बाबा और उनके खानदानी चमचे अब भी कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं।

जो लोग वहां कांग्रेस की सीट और वोट बढ़ने को उपलब्धि मान रहे हैं, वे भूलते हैं कि यह वस्तुतः हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर तथा जिग्नेश मेवाणी नामक उन युवा नेताओं की उपलब्धि है, जिनकी बैसाखी के सहारे राहुल बाबा 77 सीटों तक पहुंचे हैं। इनके बिना कांग्रेस 50 से भी नीचे रह जाती। कांग्रेस को अधिकांश सीटें पटेल बहुल सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र से ही मिली हैं। अर्थात ये सीटें हार्दिक की हैं, कांग्रेस की नहीं। 2019 के लोकसभा तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ये तीनों कांग्रेस के साथ रहेंगे, यह सोचना दूर की कौड़ी ही है। कांग्रेस की ताकत इसी से आंकी जा सकती है कि मुख्यमंत्री पद के दावेदार उसके चारों बड़े नेता (शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोधवाडिया, सिद्धार्थ पटेल तथा तुषार चौधरी) चुनाव हार गये। 

इसमें तो कोई संदेह नहीं है कि इस बार भा.ज.पा. के लिए यह चुनाव काफी कठिन था। एक ओर मोदी की राज्य में अनुपस्थिति तथा पांच बार की सत्ता के कारण कुछ नाराजगी, तो दूसरी ओर देश और विदेश स्थित मोदी विरोधियों के सहयोग और शह पर चल रहे जातिवादी आंदोलन। फिर भी मोदी के अथक परिश्रम, भारी लोकप्रियता और अमित शाह के जमीनी संगठन कौशल ने बाजी मार ली। यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप ही है कि वोट बढ़ने के बाद भी सीटें घट जाती हैं। सवा प्रतिशत वोट बढ़ने के बावजूद भा.ज.पा. को 16 सीटों की हानि हुई तथा ढाई प्रतिशत की वृद्धि से कांग्रेस को इतना ही लाभ।

गुजरात का चुनाव तीखे शाब्दिक बाणों के लिए भी याद किया जाएगा। चाहे कांग्रेस नेता और सर्वोच्च न्यायालय में बाबर के पैरोकार कपिल सिब्बल द्वारा श्रीराम मंदिर का विवाद टालने का दुराग्रह हो या मणिशंकर अय्यर का मोदी को नीच कहने वाला बयान। इनसे चुनावी प्रचार का स्तर गिरा ही है। उधर मोदी ने भी मणि बाबू के घर पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ हुए भोज को खूब उछाला। इस चक्कर में सज्जनता के कलियुगी अवतार मनमोहन सिंह भी फंस गये। अब चुनावी घात-प्रतिघात मान कर इस अध्याय को बंद कर देना ही उचित है। 

इस चुनाव के कुछ अन्य पक्ष भी हैं। काफी समय से गुजरात जातीय प्रपंचों से मुक्त था; पर कांग्रेस ने तीन जातीय नेताओं के सहारे राज्य को फिर से इस गंदगी में धकेलने का प्रयास किया। कांग्रेस की हार से यह षड्यंत्र विफल तो हुआ है; पर इसका कुछ खराब असर तो रहेगा ही। भा.ज.पा. के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के लिए भी यह चिंता का विषय है। उन्हें यह गंदगी दूर करने के लिए नये सिरे से योजनाबद्ध प्रयास करने होंगे। अन्यथा 2019 के चुनाव में यह रोग फिर सिर उठाएगा। दूसरी ओर कांग्रेस और उसके नेताओं को यह बात समझ में आ गयी कि सरकार हिन्दुओं के वोट से ही बनती है। इसलिए इस बार राहुल बाबा ने मजारों की बजाय मंदिरों में माथा टेका। गुजरात का यह संदेश दूर तक जाएगा और सभी दलों में मुल्ला टोपी, रोजा इफ्तार और कब्रों पर चादर चढ़ाने जैसे ढकोसले कम हो जाएंगे।

कई महत्वपूर्ण संदेश भा.ज.पा. के लिए भी हैं। यह स्पष्ट है कि उसकी लाज अमदाबाद, बड़ोदरा और सूरत जैसे बड़े नगरों ने बचायी है। गांवों में किसान और युवाओं की नाराजगी उसके प्रति साफ नजर आयी है। अतः भा.ज.पा. को इस ओर ध्यान देना ही होगा। मोदी ने भा.ज.पा. कार्यालय में दिये गये भाषण में इसकी चर्चा की भी है। जिग्नेश मेवाणी को मुसलमान ताकतें इतना सहयोग क्यों कर रही हैं, यह भी समझना होगा। यह दोस्ती हिन्दू समाज और विशेषकर उसके निर्धन (दलित) वर्ग के लिए सदा घातक ही सिद्ध हुई है। भा.ज.पा. ने विजय रूपाणी और नितिन पटेल की जोड़ी पर फिर से भरोसा किया है। पिछला समय इनके लिए सीखने का था; पर इस बार ये दोनों निश्चित ही गुजरात में कुछ करके दिखाएंगे।

कांग्रेस वाले और उनके पिछलग्गू विश्लेषक गुजरात और हिमाचल के परिणामों की व्याख्या चाहे जैसे करें; पर भारत कांग्रेसमुक्ति की दिशा में दो कदम और आगे बढ़ गया है। अगले कदम के लिए कर्नाटक भी प्रतीक्षा में है।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

खेलों की संस्कारशाला अर्थात संघ की शाखा

भोजन, पानी और हवा की तरह खेल भी व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। बालपन में तो यह उसका अधिकार ही है। बच्चे मुख्यतः शारीरिक प्रधान खेल खेलते हैं, जबकि बड़े होने पर उसमें कुछ मानसिक खेल भी जुड़ जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताओं में खेलों को महत्व दिया गया है। अनेक प्राचीन नगरों की खुदाई में बच्चों के खिलौने तथा शतरंज, चौपड़ आदि मिले हैं। बचपन में भगवान श्रीकृष्ण ने तो जानबूझ कर यमुना में गेंद फेंक दी थी और फिर उस बहाने कालिया नामक दुर्दम्य गुंडे (नाग) का ही नाश कर दिया।

सभ्यता एवं सम्पन्नता के विकास के साथ उपकरण आधारित खेल बने। इनमें क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबाल, बास्केट बॉल, बैडमिंटन, टेनिस, लॉन टेनिस आदि उल्लेखनीय हैं। इन सबका विकास पश्चिम में ही हुआ। टी.वी. के जीवंत प्रसारण तथा महंगी प्रतियोगिताओं ने इन्हें लोकप्रिय बनाया है। क्रिकेट इसमें सबसे आगे है। फिल्मी कलाकारों की तरह उसके खिलाड़ियों का नाम और चेहरा भी बिकता है। इसीलिए विराट कोहली की शादी टी.वी. पर खूब चली। सचिन तेंदुलकर को कांग्रेस ने इसीलिए ‘भारत रत्न’ दिया और राज्यसभा में भी भेजा। कम्प्यूटर और मोबाइल के विकास ने भी खेलों में क्रान्ति की है। बच्चे हों या बड़े, सब उन पर उंगलियां चलाते हुए अपना समय काटते हैं और साथ में अपनी आंखें भी खराब करते हैं। इन खेलों का कितना उपयोग है, यह बहस का विषय है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। संघ के काम का आधार एक घंटे की शाखा है। इसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। शाखा में यद्यपि योग, आसन, सूर्यनमस्कार जैसे शारीरिक तथा गीत, सुभाषित, अमृत वचन, चर्चा आदि बौद्धिक कार्यक्रम भी होते हैं; पर विद्यार्थी और युवा शाखा में 40-45 मिनट बिना उपकरण वाले खेल ही होते हैं। उपकरण न होने से इनमें कुछ खर्च नहीं होता। अतः गरीब हो या अमीर, सब इन्हें खेल सकते हैं। मैदान पर चूने, ईंट के टुकड़े या फिर चप्पल आदि से ही सीमा रेखा बनाकर ये खेल हो जाते हैं। 

सच तो ये है ये बहुरंगी खेल ही शाखा के प्राण हैं। इनके आकर्षण में बंधकर ही बच्चे शाखा में आते हैं। भले ही संघ का विचार उन्हें बाद में समझ आता है। शाखा में तरुण, बाल, शिशु आदि अलग-अलग समूह (गण) में खेलते हैं। खेल कराने वाला ‘गणशिक्षक’ कहलाता है; पर ये खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनकी विशेषता संस्कार देने की क्षमता भी है। इनसे स्वयंसेवक के मन पर संस्कार पड़ते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखायी देते हैं। स्वयंसेवक में कई गुणों का भी विकास होता है। 

इन खेलों का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है। ‘हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा’ की तरह क्रिया के मामूली परिवर्तन से नया खेल बन जाता है। ये खेल सैकड़ों हैं तथा हर क्षेत्र में इनके अलग नाम हैं। खेलों के नाम में राम, हनुमान, गणेश, कृष्ण तथा कश्मीर, इसराइल, चीन आदि जोड़ने से स्वयंसेवक के मन में जिज्ञासा पैदा होती है, जिसका समाधान बड़े लोग करते हैं। कुछ खेलों के नाम तथा उनके प्राप्त गुणों की चर्चा करना यहां उचित रहेगा।

शाखा में कई खेल दो या अधिक दल बनाकर होते हैं। कबड्डी, बैठी खो, रस्सा या दंड खींच, बंदी बनाना, घोड़ा कबड्डी, डमरू दौड़, टैंक युद्ध, चीन की दीवार जैसे खेलों में खिलाड़ी अपनी टीम को जिताने का प्रयास करते हैं। अतः उनमें टीम भावना एवं नेतृत्व क्षमता का विकास होता है। शेर बकरी, बंदा बैरागी जैसे खेलों में एक खिलाड़ी साहस एवं कुशलता से बाकी 15-20 लोगों के बीच में घुसता  और निकलता है। सब उसकी पीठ पर घूंसे लगाते हैं। संगठन की जंजीर, हिन्दू बनाना, स्वर्गारोहण जैसे खेलों से संगठन की भावना मजबूत होती है। गणेश छू, हनुमान की पूंछ, अंधे की लाठी आदि मनोरंजन प्रधान खेल हैं। 

शक्ति परिचय, मुर्गा युद्ध, हाथी युद्ध, घुड़सवार युद्ध तथा एक टांग की दौड़, उल्टी दौड़, मेढक दौड़, भालू दौड़, हाथी दौड़, बिच्छू दौड़, हनुमान कूद, गोरैया दौड़, तीन टांग की दौड़.. जैसे द्वंद्व के खेलों से स्वयंसेवक की निजी ताकत का पता लगता है। संख्या कम होने पर त्रिभुज या छोटा गोला बनाकर यज्ञकुंड, मेरा घर, रक्षक जैसे कई खेल होते हैं। शिविर आदि में संख्या 100 या इससे भी अधिक होती है। ऐसे में मैदान पर चक्रव्यूह, कच्छप व्यूह, चतुर्व्यूह आदि बनाकर सबको दो सेनाओं में बांटकर खेल होता है। सभी आयु और कद-काठी के लोग मिलकर पिरामिड भी बनाते हैं।

शाखा पर 40-45 मिनट में प्रायः 10-12 खेल हो जाते हैं। इसके लिए दक्ष, आरम्, एकशः सम्पत्, गण विभाग आदि आज्ञाओं द्वारा बार-बार रचना बनती एवं बदलती है। इनसे अनुशासन का विकास होता है। खेल में खिलाड़ी की लम्बाई के आधार पर ही टीमें बनती हैं। हर जाति, आयु और वर्ग के खिलाड़ी साथ मिलकर दूसरी टीम से संघर्ष करते हैं। इससे स्वयंसेवक के मन में समरसता की भावना पैदा होती है। खेल समाप्ति पर ‘कौन जीता, संघ जीता’ के उद्घोष से प्रतिद्वंद्विता का मनो-मानिल्य मिट जाता है। ताली बजाकर मस्ती में उत्साहवर्धक गीत गाने से पसीने के साथ ही खेल की थकान भी दूर हो जाती है। इससे उत्साह एवं आनंद का वातावरण बन जाता है।

वर्षा या ठंड में कमरे में बैठकर या भागदौड़ के खेलों से थककर बौद्धिक खेल खेलते हैं। इनसे मनोरंजन के साथ ही बुद्धि का विकास भी होता है। अंत्याक्षरी, सूचना, मुक्ताक्षरी, प्रश्नोत्तरी, उल्टी गिनती, खाएंगे, चिड़िया उड़, काला सफेद, ऐसा करो वैसा करो, नेता की खोज, डाकघर, मछली की आंख.. आदि ऐसे ही खेल हैं।

खेलों के बीच में स्थानीय भाषा-बोली में कई तरह के नारे और उद्घोष भी बोले जाते हैं। इनसे देशभक्ति, हिन्दुत्व प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता आदि विचार मन में दृढ़ होते हैं। भारत माता की-जय। वन्दे-मातरम्। हर हर-बम बम। रुद्र देवता-जय जय काली।  जय शिवाजी-जय भवानी। अलग है भाषा अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश। जय हो-विजय हो। संगठन में-शक्ति है। संघे शक्ति-कलौयुगे। जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वो कश्मीर हमारा है; जो कश्मीर हमारा है-वो सारे का सारा है। हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे। हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे। हिन्दू हिन्दू-भाई भाई। एक दो तीन चार-भारत मां की जय जयकार। अन्न जहां का-हमने खाया, वस्त्र जहां के-हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे। आदि। 

शाखा पर खेल होते हैं; पर वह खेल क्लब नहीं है। इसका कारण खेलों से प्राप्त संस्कार हैं। इसीलिए संघ की शाखा से बड़े खिलाड़ी तो नहीं; पर देश के प्रति प्रेम और समर्पण रखने वाले अनुशासित नागरिक जरूर निर्माण हो रहे हैं। संघ का उद्देश्य भी तो यही है।