शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

यह कुंभ प्रयागराज में..

प्रख्यात अंग्रेजी साहित्यकार विलियम शैक्सपियर ने कहा है कि ‘‘नाम में क्या रखा है ?’’ पर सच ये है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। इसीलिए 16 अक्तूबर, 2018 को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही भारतीय जनता पार्टी की उ.प्र. सरकार ने विश्व प्रसिद्ध संगम नगरी के उस पुराने नाम ‘प्रयागराज’ को बहाल कर दिया, जो युगों-युगों से प्रचलित था। मुगल शासक अकबर ने 1583 में इसे बदलकर इलाहाबाद किया था। 

1947 में देश के आजाद होने के बाद से ही सभी देशभक्त नागरिक प्रयागराज नाम के पुनर्जीवन की मांग कर रहे थे। लोगों को लगता था कि नेहरू परिवार का संबंध इस नगर से बहुत खास है। अतः नेहरू जी मान जाएंगे; पर वे ठहरे परम सेक्यूलर। वे खुद को नाम से हिन्दू, संस्कारों से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। इसलिए उन्होंने इसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दिया। 

इसके बाद जब-जब उ.प्र. में हिन्दुत्वप्रेमी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी, तब-तब इस मांग ने जोर पकड़ा। प्रयाग के हर कुंभ से पहले इसकी चर्चा होती थी; पर कभी प्रदेश में गठबंधन की मिली-जुली सरकार होती थी, तो कभी केन्द्र में। इसलिए निर्णय नहीं हो सका; पर अब लखनऊ और दिल्ली, दोनों जगह भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार है और 2019 में वहां विशाल कुंभ भी होने जा रहा है। अतः योगी सरकार ने निर्णय ले लिया।

पर इस निर्णय से कुछ सेक्यूलरों के पेट में दर्द होने लगा है। उन्होंने अपनी आदत के अनुसार इसका विरोध भी शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वे चुप रहे, तो न जाने प्रदेश और देश में कितने नाम बदल दिये जाएं ? कुछ लोग हिन्दू वोटों के भय से खुलकर तो विरोध नहीं कर रहे हैं; पर वे कह रहे हैं कि इस बारे में कोई सर्वसम्मत नीति बननी चाहिए। अन्यथा बड़ी अराजकता फैल जाएगी। 

असल में नाम परिवर्तन के पीछे राजनीति के साथ ही सामाजिक कारण भी हैं। जब भारत में विदेशी व विधर्मी हमलावर आये, तो उन्होंने कई स्थानों के नाम बदल दिये। इसका पहला उद्देश्य तो हिन्दुओं को अपमानित करना था। प्रयाग और अयोध्या को इलाहबाद और फैजाबाद करना इसी मानसिकता का परिचायक है। कोशिश तो उन्होंने हरिद्वार, मथुरा, काशी और दिल्ली को बदलने की भी की; पर उनकी वह चाल विफल हो गयी। 

नाम बदलने का दूसरा उद्देश्य खुद को या अपने किसी पूर्वज को महिमामंडित करना था। इसके लिए भी उन्होंने हजारों गांवों के नाम बदल दिये। जिस गांव या शहर के साथ ‘बाद’ लगा मिले, उसकी यही कहानी है। अकबराबाद, औरंगाबाद, हैदराबाद, सिकंदराबाद, गाजियाबाद, तुगलकाबाद, रोशनाबाद, अहमदाबाद..जैसे हजारों नाम हैं। बाद शब्द आबाद का छोटा रूप है। जैसे फैजाबाद अर्थात फैज द्वारा आबाद; पर सच ये है कि ये स्थान उन्होंने आबाद नहीं बरबाद किये हैं। इसलिए ‘फैजाबाद’ को ‘फैज बरबाद’ कहना अधिक समीचीन है। 

वामपंथियों ने आजादी के बाद कांग्रेस शासन की सहायता से छद्म बुद्धिजीवियों की एक बड़ी फौज खड़ी की है। वे कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने सैकड़ों साल तक देश में राज किया है। अतः उन्होंने नये गांव और नगर बसाये ही होंगे। उनके नाम पर प्रचलित महल, मकबरे और मस्जिदों के लिए भी यही तर्क दिया जाता है; पर वे यह नहीं बताते कि यदि अधिकांश ऐतिहासिक स्मारक मुस्लिम शासकों ने बनाये हैं, तो उनसे पहले के हिन्दू शासक क्या जंगल में रहते थे ? यदि नहीं, तो उनके महल और मंदिर कहां हैं ?

सच ये है कि ये इस्लामी हमलावर जीवन भर हिन्दू राजाओं से या फिर आपस में ही लड़ते-मरते रहे। उन्हें नया निर्माण कराने की फुरसत ही नहीं थी ? उनके साथ लड़ाकू लोग आये थे, वास्तुकार और कारीगर नहीं। अतः उन्होंने तलवार के बल पर पुराने नगर और गांवों के नाम ही बदल दिये। महल और मंदिरों में थोड़ा फेरबदल कर, उन पर आयतें आदि खुदवा कर उन्हें इस्लामी भवन घोषित कर दिया। अयोध्या से लेकर मथुरा, काशी, आगरा और दिल्ली तक की यही कहानी है। प्रसिद्ध इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तकों में इस बारे में विस्तार से लिखा है।

इस्लामी शासन के बाद जब अंग्रेज आये, तो कई शब्द वे ठीक से बोल नहीं पाते थे। अतः शासक होने के कारण उनके उच्चारण के अनुरूप मैड्रास, कैलकटा, बंबई, डेली.. आदि नाम चल पड़े। उनके जाने के बाद कई नाम ठीक किये गये हैं। अब इन्हें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली कहते हैं। कानपुर (Cawnpore), लखनऊ (Lucknow), बनारस (Benares) आदि कई नामों की वर्तनी (स्पैलिंग) भी अंग्रेजों ने बिगाड़ दी। 

कांग्रेस राज में नामों की यह धारा एक परिवार की बपौती बन गयी। अतः हर ओर गांधी, नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया नगरों की बहार आ गयी। अब तो कांग्रेस का सितारा ही डूब रहा है; अन्यथा राहुल, प्रियंका, राबर्ट और उनके बच्चों की भी लाटरी लग जाती।

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बदले गये नामों को ठीक करने में ही शासन ने रुचि क्यों दिखायी ? इसके पीछे का राजनीतिक कारण बिल्कुल साफ है। भारत में ईसाई वोटों की संख्या बहुत कम है। पूर्वोत्तर भारत के अलावा वह कहीं सघन रूप से रहते भी नहीं है। अतः उनकी नाराजगी का सत्ता के फेरबदल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; पर मुस्लिम वोटों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए सच जानते हुए भी राजनीतिक दल मुस्लिम शासकों द्वारा बदले गये नामों को नहीं छेड़ते। अब भा.ज.पा. सरकार ने ये काम शुरू किया है, तो इसके आगे बढ़ने की पूरी संभावना है।

उ.प्र. में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने ऊधमसिंह नगर, ज्योतिबाफुले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि कई नये जिले बनाये; पर लोग इन्हें यू.एस. नगर, जे.पी. नगर और जी.बी. नगर ही कहते हैं। हाथरस बनाम महामाया नगर और लखनऊ के किंग जार्ज बनाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिज के बीच तो कई बार कुश्ती हुई। अब भा.ज.पा. सरकार ने उ.प्र. में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह निर्णय ठीक है। क्योंकि 11 फरवरी, 1968 को भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी का शव वहां पर ही मिला था। फिर अब न मुगल हैं और न सराय; पर खतरा ये भी है कि यह नाम समय के प्रवाह में कहीं डी.डी.जंक्शन न हो जाए।

कई नामों के पीछे इतिहास और भाषायी गौरव भी जुड़ा होता है। अतः वे स्थायी रूप से लोगों के मुंह पर चढ़ जाते हैं; पर जुबान का भी एक स्वभाव है। वह कठिन की बजाय सरल शब्द अपनाती है। इसलिए भोजपाल, जाबालिपुरम् और गुरुग्राम क्रमशः भोपाल, जबलपुर और गुड़गांव हो गये। मंगलौर (मंगलुरू), बंगलौर (बंगलुरू), मैसूर (मैसुरू), बेलगांव (बेलगावि), त्रिवेन्द्रम (तिरुवनंतपुरम्), तंजौर (तंजावूर), कालीकट (कोझीकोड), गोहाटी (गुवाहाटी), इंदौर (इंदूर), कोचीन (कोच्चि), पूना (पुणे), बड़ोदा (बड़ोदरा), पणजी (पंजिम), उड़ीसा (ओडिसा), पांडिचेरी (पुड्डुचेरी) आदि की भी यही कहानी है। अब शासन भले ही इन्हें बदल दे; पर लोग पुराने और सरल नाम ही सहजता से बोलते हैं। 

अतः नगरों के नाम बदलने की नीति तो होनी ही चाहिए; पर इसमें विदेशी हमलावरों द्वारा परिवर्तित नाम हटाकर ऐतिहासिक नाम फिर प्रचलित करने पर समझौता न हो। इससे लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास का पुनर्स्मरण भी होगा। प्राचीन साहित्य और लोककथाओं में ये नाम उपलब्ध हैं। अंतरजाल (इंटरनेट) भी इसमें सहायक हो सकता है; पर सहज बोलचाल के कारण प्रचलित हो गये नाम बदलने की जिद ठीक नहीं है। अर्थात यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें