शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

पर्यावरण पर समग्रता से सोचें

सर्वोच्च न्यायालय ने दीवाली पर पटाखों के सीमित उपयोग का सुंदर निर्णय दिया है। करोड़ों लोग इनके शोर और धुएं से परेशान होते हैं; पर इसके दूसरे पक्ष की ओर भी न्यायालय, शासन और आम नागरिकों को ध्यान देना होगा। क्योंकि केवल सरकारी नियम या न्यायालय के आदेशों से देश नहीं चलता।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केरल के सबरीमला मंदिर में सब आयु की महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए; पर स्थानीय महिलाएं इस निर्णय के विरोध में रास्ता रोक कर खड़ी हो गयीं। अतः 10 से 50 वर्ष आयु वाली महिलाएं वहां नहीं जा सकीं और न्यायालय का निर्णय धरा रह गया। हिन्दू वोटों की नाराजगी के डर से सत्ताधारी वामपंथी पार्टी भी चुप रही। 

ऐसे ही बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या, कन्या शिक्षा, मृत्यु भोज, शोर.. आदि पर भी समय-समय पर न्यायालय ने कठोर निर्णय दिये हैं; पर इनका पूरी तरह पालन नहीं होता। चूंकि जनता इसके लिए मन से तैयार नहीं है। इसलिए न्यायालय और शासन के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को भी इधर ध्यान देना होगा। बड़े लोग यदि ऐसे आयोजनों में न जाएं, तो इन पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा; पर ऐसा होता नहीं है।

मैं पिछले दिनों एक आयोजन में गया। वहां सड़क पर ही विशाल कीले गाड़कर पंडाल लगा था। पक्ष और विपक्ष के कई बड़े नेता वहां आये थे। समारोह के बाद पंडाल वाले ने जब निर्ममता से वे कीले उखाड़े, तो सड़क कई जगह से छिल गयी। कुछ दिन बाद हुई वर्षा में वह पूरी तरह उखड़ गयी। तब वही आयोजक सड़क खराब होने की दुहाई देने लगे। ऐसे उदाहरण हर जगह मिलेंगे। अर्थात जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। 

जहां तक पटाखों की बात है, तो इन्हें प्रायः बच्चे ही बजाते हैं, बड़े लोग नहीं। कभी हम भी दीवाली पर बाबा जी के साथ जाकर पटाखे खरीदते थे। बड़े पटाखों की जिद भी करते थे। यही काम आज के बच्चे भी करेंगे। न्यायालय ने जिन ग्रीन पटाखों की बात कही है, क्या वे उपलब्ध हैं ? यदि नहीं, तो इस आदेश का पालन कैसे होगा ? शासन ने अपना बोझ पुलिस पर डाल दिया है। क्या वे गलियों में जाकर बच्चों को पकड़ेगे; और क्या पुलिस वालों के बच्चे पटाखे नहीं छुड़ाएंगे ?

इसलिए हर चीज को समग्रता में सोचना पड़ेगा। न्यायालय और शासन को चाहिए कि वह दीवाली के तुरंत बाद ऐसी व्यवस्था करे, जिससे भविष्य में केवल छोटे और ग्रीन पटाखे ही बनें। जब बड़े पटाखे बनेंगे ही नहीं, तो फिर वे बिकेंगे कैसे ? अर्थात बीमारी की जड़ पर प्रहार करें। फिर शोर क्या केवल दीवाली पर ही होता है। साल भर मंदिर, मस्जिद आदि में लगे भोंपू क्या शोर नहीं करते ? रात के दो बजे तक होने वाली रामलीलाओं और पूरी रात के जागरणों पर प्रशासन चुप क्यों रहता है ? क्योंकि इनसे स्थानीय नेता जुड़े रहते हैं, जिनके समर्थन के बिना पार्षद, विधायक और सांसद चुनाव नहीं जीत सकते। फिर इन पर लगाम कैसे लगेगी ?

अब शादियों का सीजन आ गया है। बारात निकलेंगी और सड़कें जाम होंगी। देर रात तक डी.जे. बजेंगे। शराब पीकर लोग नाचेंगे। क्या इनमें शोर नहीं होता ? उत्तर भारत के अलावा प्रायः शादियां दिन में ही होती हैं। कई जगह तो हस्तमिलन, शुभदृष्टि, माल्यार्पण और फेरों का समय निश्चित रहता है। जब वे विवाह सफल होते हैं, तो बाकी को क्या परेशानी है; क्या पर्यावरण का इससे कोई संबंध नहीं है ?

इन दिनों कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। प्रत्याशियों की गाड़ियां दिन भर भोंपू लगाकर प्रचार करेंगी। हर मोहल्ले में चुनाव कार्यालय बनेंगे। वहां से भी प्रचार होगा। क्या इससे स्कूली बच्चे और मरीज परेशान नहीं होंगे ? कई बार तो एक ही चौराहे पर कई प्रचार कार्यालय बन जाते हैं। उनके शोर से आसपास वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। इस पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता ?

प्लास्टिक की थैलियों का चलन बंद होना ही चाहिए; पर इसके लिए बाजार में छापेमारी की बजाय शासन फैक्ट्रियां बंद कराए। अधिक प्रदूषण वाली गाड़ियों को सरकार क्रमशः बंद कर रही है; पर जो लोग चार कदम भी पैदल नहीं जा सकते, उनकी मानसिकता कैसे बदलेगी ? नदी जोड़ और बांध विरोधी ये नहीं बताते कि इसके बिना खेतों और बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी कैसे मिलेगा ? गांव की अपेक्षा शहरों में नहाने-धोने में पानी अधिक लगता है। क्या जनसंख्या और शहरीकरण रोकने का कोई उपाय है ? देश में हर दिन एक लाख नये वाहन बिक रहे हैं। यदि सड़कें चौड़ी नहीं होंगी, तो वे चलेंगे कहां; और बिना पेड़ काटे सड़क चौड़ी कैसे होगी ?

दिल्ली और निकटवर्ती लोग पंजाब और हरियाणा में पराली जलने से होने वाली धुंध से परेशान होने लगे हैं। खेती के अति मशीनीकरण का ये दुष्परिणाम होना ही है। दिल्ली में सम-विषम का प्रयोग भी चल नहीं सका। अर्थात यदि हम पर्यावरण पर समग्रता से नहीं सोचेंगे, तो फौरी उपाय बेकार हैं। इसके लिए शासन, प्रशासन और न्यायालय के साथ समाज को भी जागना पड़ेगा। देश में हजारों लोग प्रचार और प्रसिद्धि की इच्छा के बिना चुपचाप ये काम कर रहे हैं। उनका सम्मान तथा पर्यावरण नष्ट करने वालों का सामाजिक बहिष्कार हो, तब ही बात कुछ बन सकेगी।

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