मंगलवार, 6 मार्च 2018

एक देश एक चुनाव, कितने व्यावहारिक ?

परिवर्तन की बात करना राजनेताओं और समाजसेवियों में प्रचलित एक फैशन है। इन दिनों ‘एक देश एक चुनाव’ की चर्चा गरम हैं। कुछ लोग इसके पक्ष में हैं, तो कुछ विपक्ष में। कुछ दलों और नेताओं को इसमें लाभ दिख रहा है, तो कुछ को हानि। अतः वे वैसी ही भाषा बोल रहे हैं; पर एक साथ चुनाव के समर्थकों के पास भी इसका कोई ठोस प्रारूप नहीं है। लगता है सबने ये काम नरेन्द्र मोदी पर ही छोड़ दिया है।

जहां तक परिवर्तन की बात है, तो वह लोकतन्त्र की मर्यादा में होना चाहिए। यद्यपि वर्तमान चुनाव प्रणाली भी पूर्णतया लोकतान्त्रिक है; पर भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबवाद, क्षेत्रीयता, महंगाई, अनैतिकता और कामचोरी लगातार बढ़ रही है। इसका कारण यह दूषित चुनाव प्रणाली ही है। दुनिया में कई प्रकार की चुनाव प्रणालियां प्रचलित हैं। हमने उन पर विचार किये बिना उस ब्रिटिश प्रणाली को अपना लिया, जिसे गांधी जी ने ‘बांझ’ कहा था। अब तो इंग्लैंड में भी यदाकदा इसे बदलने और सांसदों की संख्या घटाने की बात उठती रहती है।   

यदि आप किसी सांसद या विधायक से मिलें, तो वह अपने क्षेत्र की बिजली-पानी, सड़क और नाली की व्यवस्था में उलझा मिलेगा। यदि वह ऐसा न करे, तो अगली बार उसे वोट नहीं मिलेंगे। सरकार द्वारा बनायी गयी खर्च की सीमा चाहे जो हो; पर पैसा इससे कई गुना अधिक खर्च होता है। पार्टी तो उसे इतना देती नहीं। ऐसे में अधिकांश लोग इधर-उधर से धन जुटाते हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार का मुख्य कारण यही है। 

लोकसभा और विधानसभा का काम देश और प्रदेश के लिए नियम बनाना है; पर सांसद और विधायक यह नहीं करते। यह उनकी मजबूरी भी है। अतः इस चुनाव प्रणाली के बदले हमें भारत में ‘आनुपातिक या सूची प्रणाली’ का प्रयोग करना चाहिए। जर्मनी में यह प्रचलित है। इसमें प्रत्येक राजनीतिक दल को सदन की संख्या के अनुसार  चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों की सूची चुनाव आयोग को देनी होगी। जैसे लोकसभा में 525 स्थान हैं, तो प्रत्येक दल 525 लोगों की सूची देगा। इसके बाद वह दल चुनाव लड़ेगा, व्यक्ति नहीं। चुनाव में व्यक्ति का कम, दल का अधिक प्रचार होगा। हर दल अपने विचार और कार्यक्रम जनता को बताएगा। इसके आधार पर जनता उस दल को वोट देगी। 

चुनाव में जिस दल को जितने प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसके उतने प्रतिशत लोग सूची में से क्रमवार सांसद घोषित कर दिये जाएंगे। यदि किसी एक दल को बहुमत न मिले, तो वह मित्र दलों के साथ सरकार बना सकता है। इस प्रणाली से चुनाव का खर्च बहुत घट जाएगा। इसमें उपचुनाव का झंझट भी नहीं है। किसी सांसद की मृत्यु या त्यागपत्र देने पर सूची का अगला व्यक्ति शेष समय के लिए सांसद बन जाएगा। 

इस व्यवस्था से अच्छे, शिक्षित तथा अनुभवी लोग राजनीति में आएंगे। इससे जातीय समीकरण टूटेंगे। आज तो दलों को जातीय या क्षेत्रीय समीकरण के कारण कई बार दलबदलू या अपराधी को भी टिकट देना पड़ता है। उपचुनाव में सहानुभूति के वोट पाने के लिए मृतक के परिजन को इसीलिए टिकट दिया जाता है। सूची प्रणाली में ऐसा कोई झंझट नहीं है।

इसमें हर सांसद या विधायक किसी क्षेत्र विशेष का न होकर पूरे देश या प्रदेश का होगा। अतः उस पर किसी जातीय या मजहबी समीकरण के कारण सदन में किसी बात को मानने या न मानने की मजबूरी नहीं होगी। किसी भी प्रश्न पर विचार करते सबके सामने जाति, क्षेत्र या मजहब की बजाय पूरे देश या प्रदेश का हित होगा। इससे राजनीति में वही दल बचेंगे, जो पूरे देश के बारे में सोचते हैं। जाति, क्षेत्र या मजहब की राजनीति करने वाले दल तथा अपराधी, भ्रष्ट और खानदानी नेता समाप्त हो जाएंगे। उन्हें एक-दो सांसदों या विधायकों के कारण सरकार को बंधक बनाने का अवसर नहीं मिलेगा। अर्थात मजबूर की बजाय मजबूत सरकारें बनेंगी और राजनीति क्रमशः शुद्ध होती जाएगी। 

पर ऐसे में जनता का प्रतिनिधि कौन होगा ? इसके लिए हमें जिला, नगर, ग्राम पंचायतों के चुनाव निर्दलीय आधार पर वर्तमान व्यवस्था की तरह ही कराने होंगे। इन लोगों का अपने क्षेत्र की नाली, पानी, बिजली और थाने से काम पड़ता है। इस प्रकार चुने गये जनप्रतिनिधि प्रदेश और देश के सदनों द्वारा बनाये गये कानूनों के प्रकाश में अपने क्षेत्र के विकास का काम करेंगे। ऊपर भ्रष्टाचार न होने पर नीचे की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी। यद्यपि इससे कुछ समय के लिए सूची बनाने वाले बड़े नेताओं का प्रभाव बहुत बढ़ जाएगा; पर यदि वे जमीनी, अनुभवी और काम करने वालों को सूची में नहीं रखेंगे, तो जनता उन्हें ठुकरा देगी। अतः एक-दो चुनाव में व्यवस्था स्वयं ठीक हो जाएगी।

इस प्रणाली में नये दल का निर्माण, राष्ट्रीय या राज्य स्तर के दल की अर्हता, दलों की सदस्यता और आंतरिक चुनाव आदि पर निर्णय लेने के लिए चुनाव आयोग को कुछ और अधिकार देने होंगे। ‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए’’ की तर्ज पर कहें, तो चुनाव प्रणाली बदलकर, चुनाव को सस्ता और जाति, क्षेत्र, मजहब आदि के चंगुल से मुक्त करने से देश की अनेक समस्याएं हल हो जाएंगी। बार-बार चुनाव होना भी उनमें से एक है। जब तक यह नहीं होता, तब तक मार्च और अक्तूबर के पहले सप्ताह को गांव से लेकर लोकसभा के चुनावों के लिए नियत किया जा सकता है। इससे समस्या का पूरी तरह समाधान तो नहीं होगा; पर कुछ राहत जरूर मिलेगी।

सोमवार, 5 मार्च 2018

बेर-केर को संग

सुना है कि मायावती ने कुछ शर्तों के साथ उ.प्र. में होने वाले उपचुनावों में स.पा. को समर्थन देने का प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि वे गोरखपुर और फूलपुर की संसदीय सीट पर अपने वोट उन्हें देने को तैयार हैं। बदले में राज्यसभा और विधान परिषद की सीट के लिए स.पा. को अपने अतिरिक्त वोट ब.स.पा. को देने होंगे। 

पता नहीं यह प्रस्ताव अखिलेश बाबू ने माना या नहीं; पर कुछ लोगों ने यह घोषित कर दिया है कि ये दोनों 2019 में लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगे। याद रहे कि 1993 में दोनों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था और भा.ज.पा. को हराकर मुलायम सिंह के नेतृत्व में उ.प्र. में सरकार बनी थी। उन दिनों एक नारा खूब चला था, ‘‘मिले मुलायम काशीराम, हवा में उड़ गये जय श्रीराम।’’   

कई अखबार और मोदी विरोधी 1993 के वोट प्रतिशत निकालकर भावी समीकरण बना रहे हैं; पर वे भूलते हैं कि चुनावों में दो और दो हमेशा चार नहीं होते। फिर काशीराम जी दिवंगत हो चुके हैं और मुलायम जबरन रिटायर। अब इधर मायावती हैं तो उधर अखिलेश। जहां तक भा.ज.पा. की बात है, तो अब उ.प्र. में योगी आदित्यनाथ हैं, तो दिल्ली में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी। गंगा और यमुना में तबसे न जाने कितना पानी बह चुका है। इसलिए 1993 के आधार पर चुनावी गणना दिमागी कसरत से ज्यादा  कुछ नहीं है। 

जहां तक इन दोनों के साथ की बात है, तो अधिकांश लोगों को पुरानी बातें याद नहीं होंगी। यद्यपि समय सब पुराने और गहरे घाव भर देता है; पर उनके निशान नहीं जाते। इसीलिए मुख्यमंत्री योगी ने इस पर टिप्पणी करते हुए इसे बेर-केर का साथ कहा है। रहीम जी का वह दोहा बहुत प्रसिद्ध है - 

कह रहीम कैसे निभे, बेर-केर को संग
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।।

(रहीमदास जी कहते हैं कि बेर और केले का साथ कैसे हो सकता है ? बेर जब अपनी मस्ती में डोलता है, तो उसके कांटों से केले के पत्ते फट जाते हैं। अर्थात इनका साथ असंभव है।)

इस संदर्भ को देखें, तो स.पा. और ब.स.पा. का वोट बैंक ही नहीं, इनके नेताओं और कार्यकर्ताओं का स्वभाव भी बिल्कुल अलग है। स.पा. की स्थापना मुलायम सिंह ने की थी। वे खुद को डा. राम मनोहर लोहिया, जनेश्वर मिश्र और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे समाजवादियों का अनुयायी मानते हैं; पर सत्ता पाते ही वे उन्हें भूलकर घोर भ्रष्टाचार, मजहबवाद और परिवारवाद में डूब गये। इसी तर्ज पर अब अखिलेश ने उन्हें और अपने चाचा को एक तरफ कर पार्टी पर कब्जा कर लिया है।

दूसरी ओर ब.स.पा. की स्थापना काशीराम ने की थी। पार्टी की स्थापना से पूर्व उन्होंने सरकारी कर्मचारियों और निर्धन वर्ग में कई संगठन बनाकर गहरा काम किया। उन्होंने स्वयं पीछे रहकर हर राज्य में कुशल नेतृत्व खड़ा किया। सबसे पहले उन्हें उ.प्र. में सफलता मिली और यहां मायावती मुख्यमंत्री बन गयीं। यद्यपि कुछ समय बाद उनकी तबीयत बिगड़ गयी और पार्टी पर मायावती का कब्जा हो गया। फिर मायावती ने काशीराम द्वारा विभिन्न राज्यों में तैयार किये गये नेताओं को एक-एक कर बाहर निकाल दिया। आज ब.स.पा. का अर्थ मायावती और उनकी बात ही ब.स.पा. का संविधान है। 

काशीराम ने ही 1993 में स.पा. और ब.स.पा. में समझौता कराया था। इससे पूर्व वहां कल्याण सिंह के नेतृत्व में भा.ज.पा. की सरकार थी। 1992 में हुए बाबरी ध्वंस से मुसलमान नाराज थे। इसका लाभ उठाकर दोनों दलों ने हाथ मिलाया। यद्यपि उन्हें बहुमत नहीं मिला; पर भा.ज.पा. विरोधी अन्य दलों को साथ लेकर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन गये; पर काशीराम की सोच बिल्कुल स्पष्ट थे। उनका मानना था कि जितनी बार चुनाव होंगे, हमारे वोट बढ़ेंगे। वे कहते थे कि पहले चुनाव में हम हारते हैं, दूसरे में हराते हैं और तीसरे में जीतते हैं। इसी सोच के चलते उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

इससे उ.प्र. की राजनीति में तूफान आ गया। दो जून, 1995 को मुलायम सिंह के साथियों ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित अतिथि निवास पर हमला बोल दिया। वहां ठहरी मायावती से उन्होंने हाथापाई की। यदि भा.ज.पा. नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी और कुछ भले पुलिसकर्मी वहां न होते, तो मायावती की इज्जत और जान दोनों ही जा सकती थी। तबसे ही मायावती और मुलायम सिंह के बीच स्थायी बैर हो गया, जो आज तक चला आ रहा है।

ऐसा ही विरोध दोनों के प्रतिबद्ध वोटरों में है। स.पा. का मुख्य वोटबैंक यादव है, तो ब.स.पा. का अनुसूचित जाति वर्ग। उ.प्र. में यादव सबसे बड़ा ओ.बी.सी. समुदाय है। गांवों में खेती की अधिकांश जमीन ओ.बी.सी. वर्ग के पास ही है। शिक्षित, सशस्त्र और धनवान होने से उनका राजनीति में प्रभावी दखल है। उनकी जमीनों पर भूमिहीन अनु.जाति वाले मजदूरी करते हैं। अभी तक तो ये लोग दबकर रहते थे; पर अब आरक्षण के कारण वे भी शिक्षा तथा नौकरियां पा रहे हैं। इससे उन पर भी पैसा आया है तथा उनका मनोबल बढ़ा है। शासन भी निर्धन वर्ग का उत्थान चाहता है। अतः इनमें प्रायः टकराव होता रहता है। यह मनभेद इतना अधिक है कि ऊपर वाले नेता भले ही मिल जाएं; पर जमीनी स्तर पर दिल मिलना कठिन है।

यही स्थिति मुसलमानों की है। उनसे ओ.बी.सी. तथा निर्धन वर्ग दोनों ही पीड़ित हैं। उनकी बढ़ती जनसंख्या से सब आतंकित हैं। मुसलमान रणनीति बनाकर वोट करते हैं। जो दल या प्रत्याशी भा.ज.पा. को हराने में सक्षम हो, वे उसके पक्ष में झुक जाते हैं। इसलिए ये कभी स.पा. तो कभी ब.स.पा. के साथ दिखाई देते हैं।

इस माहौल में स.पा. और ब.स.पा. की दोस्ती पर विचार करें, तो यह नितांत अव्यावहारिक है। मायावती की विश्वसनीयता शून्य है। वे हर दल के साथ गठबंधन करके उसे अपने स्वार्थ के चलते तोड़ चुकी हैं। फिर भी उनका कुछ प्रतिबद्ध वोटर जरूर है। यद्यपि अब यह लगातार घट रहा है। इसीलिए लोकसभा चुनाव में उ.प्र. में उनका खाता नहीं खुला तथा विधानसभा में वे तीसरे नंबर पर पहुंच गयी। 

ब.स.पा. का आधार उ.प्र. में है तथा मायावती उसका एकमात्र चेहरा है। बढ़ती आयु के कारण अब वे उतना परिश्रम नहीं कर सकतीं, जितना आज से 20 साल पहले कर लेती थीं। अब उनके सिर पर काशीराम जैसे चिंतक और मार्गदर्शक का हाथ भी नहीं है। ब.स.पा. में उनके आगे कोई नेतृत्व भी नहीं है। अर्थात ब.स.पा. का उ.प्र. में ही कोई भविष्य नहीं है। दूसरी ओर अखिलेश अभी युवा हैं। बात कितनी भी हो; पर असली लड़ाई उ.प्र. के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की कुरसी के लिए होगी। ऐसे में यह साथ निभना असंभव है। योगी जी ने इसीलिए बेर और केर की बात कही है। ऐसा ही एक दोहा ‘बिहारी सतसई’ में भी है।

कहलाने एकत बसत, अहि मयूर मृग वाघ
जगत तपोवन सों कियो, दीरघ दाघ निदाघ।। (565)

(बिहारी जी पूछते हैं कि सांप, मोर, हिरन और बाघ परस्पर शत्रु होकर भी एक साथ क्यों बैठे हैं ? फिर वे कहते हैं कि भीषण गरमी के कारण ये ऐसा करने को मजबूर हैं।)

देश इस समय मोदी के ताप से तप रहा है। शायद इसीलिए स.पा. और ब.स.पा. ही नहीं, कांग्रेस, ममता और वामपंथी जैसे शेष दल भी अपनी शत्रुता छोड़कर एक साथ आने को मचल रहे हैं।

रविवार, 4 मार्च 2018

कुछ याद उन्हें भी कर लो..

भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरे देश में त्रिपुरा और पूर्वोत्तर भारत में हुई विशाल जीत का जश्न मना रहे हैं। यह जश्न स्वाभाविक भी है। जहां लम्बे समय तक उन्हें कोई पूछता नहीं था, वहां ऐसी विराट सफलता सचमुच आश्चर्यजनक ही है; पर इसके पीछे संघ और समविचारी संगठनों का योजनाबद्ध परिश्रम छिपा है। इसे जाने बिना यह सफलता समझ नहीं आ सकती।

संघ का काम तो सीधे-सीधे शाखा का ही है, जिसमें सब तरह के लोग आते हैं। उम्र और काम के हिसाब से उनकी अलग-अलग शाखाएं लगती हैं। शाखा में आने से अनुशासन और देशप्रेम का भाव जागता है। इससे बिना किसी विशेष प्रयास के स्वयंसेवक एवं कार्यकर्ता का निर्माण होता चलता है। स्वयंसेवक अपने व्यवहार से क्रमशः अपने परिवार, गांव, मोहल्ले और दफ्तर को भी प्रभावित करता है। इसी तरह संघ का काम बढ़ा है।

इसके अलावा संघ ने क्षेत्र विशेष की परिस्थिति के अनुसार अन्य कई काम भी शुरू किये हैं। सेवा के काम इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं। आपातकाल के बाद सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने सेवा कार्यों पर जोर दिया। संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री विष्णु जी की देखरेख में सबसे पहले दिल्ली की निर्धन बस्तियों में और फिर पूरे देश में ऐसे केन्द्र खोले गये। इनकी संख्या अब एक लाख से भी अधिक है। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार प्रशिक्षण, संस्कारशाला, कीर्तन मंडली..जैसे इन केन्द्रों से हर वर्ग और उम्र के लोग संपर्क में आते हैं। इनसे सेवा के साथ ही संघ का विचार भी लोगों तक पहुंचता है। संघ विचार का हर संगठन किसी न किसी रूप में सेवा जरूर कर रहा है।

‘वनवासी कल्याण आश्रम’ नामक संगठन जनजातियों के बीच काम करता है। संस्था द्वारा लड़के और लड़कियों के अलग-अलग सैकड़ों छात्रावास पूरे देश में चल रहे हैं। समाज के सहयोग से संचालित इन छात्रावासों के छात्र अन्य राज्य वालों के संपर्क में आते हैं। इससे उनके मन का अलगाव दूर होता है। उन्हें पता लगता है कि वे केवल अपने राज्य, कबीले या जनजाति के नहीं, पूरे भारत के नागरिक हैं। ये छात्र जब अपने गांव वापिस जाते हैं, तो उनके संस्कारों से पूरा गांव प्रभावित होता है। 

इन छात्रावासों से सैकड़ों पूर्णकालिक कार्यकर्ता भी बने हैं, जो अपने ही क्षेत्र में काम कर रहे हैं। ईसाई भी वहां इसी विधि से बढ़े हैं; पर वे उन्हें अपने देश, धर्म, परम्परा, भाषा, भूषा आदि से काटते हैं, जबकि संघ इनसे जोड़ता है। इसीलिए जिस अलगाव को फैलाने में ईसाई मिशनरियों को 300 साल लगे, उसे संघ 50 साल में ही दूर करने में सफल हो रहा है। 

विश्व हिन्दू परिषद भी अपने स्थापना काल (1964) से यहां के साधु-संतों के बीच काम कर रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धर्म सभाओं में जब ये संत जाते हैं, तो इनका दृष्टिकोण व्यापक होता है। इससे वह क्षेत्र तथा जनजाति संपर्क में आती है, जहां इनका प्रभाव है। वि.हि.प. की ‘एकल विद्यालय योजना’ से भी यहां व्यापक परिवर्तन हुआ है। 

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा 1966 से संचालित ‘अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन’ प्रकल्प का पूर्वोत्तर में बहुत लाभ हुआ है। इसके अन्तर्गत युवाओं को दूसरे राज्यों में भ्रमण पर ले जाकर उन्हें परिवारों में ठहराते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित होती है। ऐसे कई युवा राजनीति में भी सक्रिय हैं। कन्याकुमारी के विवेकानंद केन्द्र से संचालित विद्यालय एवं छात्रावासों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

लेकिन ये काम इतना आसान नहीं रहा। त्रिपुरा में वामपंथी और अन्य राज्यों में प्रभावी ईसाइयों ने संघ का सदा हिंसक विरोध किया है। अतः पूरे देश से सैकड़ों साहसी, समर्पित और सुशिक्षित प्रचारक वहां भेजे गये। भा.ज.पा. की जीत के कारण महाराष्ट्र निवासी जिन सुनील देवधर का नाम मीडिया में चर्चित है, वे भी ऐसे ही कार्यकर्ता हैं। ये सब स्थानीय भाषा, बोली, खानपान और रीति-रिवाजों के साथ समरस होकर रहते हैं। इनके जमीनी काम के कारण अब स्थानीय कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में प्रचारक एवं पूर्णकालिक बन रहे हैं। अब हवा बदली है, तो संघ का काम और तेजी से बढ़ेगा।

इस दौरान कई कार्यकर्ताओं को अपने प्राण भी खोने पड़े। भा.ज.पा. कार्यालय में अपने भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने मौन रहकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। ऐसे चार कार्यकर्ताओं की चर्चा यहां उचित होगी, जिनका छह अगस्त, 1999 को कंचनपुरा स्थित वनवासी कल्याण आश्रम के एक छात्रावास से अपहरण किया गया था। त्रिपुरा के वामपंथी शासन ने उनकी खोज का नाटक तो किया; पर उससे कुछ नहीं हुआ और उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी। यह घृणित कार्य बैपटिस्ट ईसाई मिशन से प्रेरित एन.एल.एफ.टी. नामक आतंकी गुट ने किया था। 

उन दिनों दिल्ली में अटल जी की सरकार थी। जब-जब केन्द्र ने इनकी खोज का प्रयास किया, तब-तब उन्हें चटगांव (बंगलादेश) भेज दिया जाता था। 28 जुलाई, 2001 को शासन ने उनकी हत्या की घोषणा कर दी। यद्यपि ये हत्या छह महीने पहले कर दी गयी थीं। मार्च 2000 में गुवाहाटी के संघ कार्यालय में चारों द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र आया था। उसमें उन्होंने लिखा था कि वे अभी जीवित हैं; पर भीषण शारीरिक और मानसिक यातना झेल रहे हैं।

ये कार्यकर्ता थे पूर्वांचल क्षेत्र कार्यवाह श्री श्यामलकांति सेनगुप्त (68), विभाग प्रचारक सुधामय दत्त (51), जिला प्रचारक शुभंकर चक्रवर्ती (38) तथा शारीरिक शिक्षण प्रमुख दीपेन्द्र डे (46)। पता नहीं उनकी हत्या कब, कैसे और कहां हुई तथा उनके शवों का क्या हुआ ? ऐसे में उनके परिजनों का दर्द समझा जा सकता है। श्यामल जी गृहस्थ थे, जबकि बाकी तीनों अविवाहित प्रचारक। इसके अलावा सर्वश्री ओमप्रकाश चतुर्वेदी, मुरलीधरन, प्रमोद नारायण दीक्षित, प्रफुल्ल गोगोई, शुक्लेश्वर मेधी तथा मधुमंगल शर्मा भी आंतक के शिकार हुए हैं।

आज पूर्वोत्तर भारत का वातावरण केसरिया हो रहा है। ऐसे में उन कार्यकर्ताओं की याद आना स्वाभाविक है, जिन्होंने देश की सेवा में प्राण अर्पित कर दिये। इन हत्याओं की पूरी जांच तथा हत्यारे आतंकी गुटों का समूल नाश त्रिपुरा की नयी भा.ज.पा. सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।