शुक्रवार, 1 जून 2018

बहुत कठिन है डगर पनघट की..

पिछले दिनों हुए उपचुनाव में भा.ज.पा. को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इस कारण लोकसभा में उसकी सीटों की संख्या लगातार घट रही है। आंकड़े बता रहे हैं कि यदि दो सीट और घट गयीं, तो भा.ज.पा. का अपना बहुमत नहीं रहेगा और उसे सरकार चलाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ेगा। शायद कांग्रेस और अन्य भा.ज.पा. विरोधी दल इसी की प्रतीक्षा में हैं। उन्हें लग रहा है कि 2019 जैसे-जैसे पास आ रहा है, उनके लिए लाल कालीन बिछने की तैयारी हो रही है।  

सबसे पहले उपचुनाव का गणित समझें। ये बात बिल्कुल स्पष्ट है कि हर दल का क्षेत्रीय या जातीय आधार पर अपना वोट बैंक होता है। जैसे उ.प्र. में ब.स.पा. का वोट बैंक मुख्यतः तथाकथित दलित जातियों में है। लोकदल का पश्चिमी उ.प्र. के जाटों में प्रभाव है। कांग्रेस का प्रभाव सभी जातियों में है; पर इतना नहीं कि वह अकेले कुछ कर सके। यादवों का रुझान स.पा. की ओर रहता है। भा.ज.पा. का प्रभाव मध्यवर्ग के हिन्दुओं में अधिक है। मुसलमान का आज भी यह स्वभाव है कि जो दल या प्रत्याशी भा.ज.पा. के सामने सबसे भारी होे, उसके पलड़े में बैठकर उसे झुका दो। उ.प्र. में गोरखपुर, प्रयाग और अब कैराना तथा नूरपुर में यही हुआ है। 

दूसरी बात ये भी है कि उपचुनाव के कारण सत्ता के समीकरणों में कोई परिवर्तन नहीं होता। लोकसभा के उपचुनावों से नरेन्द्र मोदी की कुर्सी पर तथा उ.प्र. में विधानसभा के उपचुनाव से योगी की कुर्सी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। इसलिए भा.ज.पा. वाले प्रायः उपचुनावों में उदासीन रहे। दूसरी ओर स.पा., ब.स.पा. या लोकदल आदि अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी का कांग्रेसमुक्त भारत का नारा कांग्रेस के साथ उनकी जमीन भी खिसका रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में ब.स.पा. और लोकदल को एक भी सीट नहीं मिली। अतः उनके सामने जीने-मरने का प्रश्न खड़ा हो गया है। इसलिए इन उपचुनावों में उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी।

भा.ज.पा. को सदा संघ तथा उसके समविचारी संगठनों का सहयोग मिलता है। ये लोग हर समय तो राजनीति नहीं करते; पर चुनाव के समय कुछ दिन जरूर उनके साथ लगा देते हैं। यद्यपि इन संगठनों को भा.ज.पा. शासन से कुछ विशेष लाभ नहीं होता। ये कुछ लाभ लेना भी नहीं चाहते; पर इतना जरूर है कि जहां अन्य सरकारें इनके काम में बाधा डालती हैं, वहां भा.ज.पा. शासन में इन्हें ऐसी परेशानी नहीं होती। 

मध्यावधि चुनाव में ये संगठन अपनी कुछ शक्ति भा.ज.पा. के पक्ष में लगाते हैं; पर बाकी समय वे अपने नियमित काम में व्यस्त रहते हैं। इन दिनों ग्रीष्मावकाश के कारण सभी संगठनों के प्रशिक्षण वर्ग चल रहे हैं। एक सप्ताह से लेकर चार सप्ताह तक के इन वर्गों में संघ तथा समविचारी संस्थाओं के सभी कार्यकर्ता व्यस्त हैं। अपै्रल से जून तक, तीन माह का सबका समय इसी काम में लगता है। इन वर्गों से उन्हें नये और युवा कार्यकर्ता मिलते हैं। ऐसे में उनके लिए रोज-रोज होने वाले उपचुनावों में रुचि लेना बहुत कठिन है।

सच तो ये है भारत में चुनाव वैचारिक आधार पर कम और जाति, क्षेत्र या सम्प्रदाय आदि के आधार पर अधिक लड़े जाते हैं। आजादी के बाद से हमारी मानसिकता ही ऐसी बनायी गयी है। हमारी चुनाव प्रणाली भी इसे ही पोषित करती है। यद्यपि कभी-कभी जनता इससे ऊपर उठ जाती है। जैसे 1971 में पाकिस्तान का विभाजन, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या, 1991-92 में राममंदिर की लहर या 2014 में मोदी की जीत। 

इन चुनावों में लोगों ने जाति या क्षेत्र को भूलकर भावना के आधार पर वोट दिये। इससे पूर्ण ही नहीं तो सम्पूर्ण बहुमत की सरकारें बनीं; पर कुछ ही समय में ये भावना ढीली पड़ गयी और लोग फिर जाति और क्षेत्र के कुएं में कूद पड़े। या यों कहें कि उन्हें जबरन उसमें ढकेल दिया गया, क्योंकि जाति और क्षेत्रवादी नेताओं के लिए यही सुविधाजनक होता है। उपचुनाव में प्रायः देश या प्रदेश के नेतृत्व का प्रश्न गौण होता है। ऐसे में जाति और क्षेत्रवाद प्रभावी हो जाता है। 

पिछले दिनों हुए उपचुनावों को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। यद्यपि इससे जनता की समस्याओं और उनके रुझान का अनुमान भी होता है। इसलिए उपचुनाव का महत्व तो है; पर पूर्ण चुनाव जैसा नहीं। जो लोग इन्हें 2019 का टेªेलर मान रहे हैं, वे कुछ अधिक ही खुशफहमी में हैं। इन उपचुनावों में प्रायः सभी जगह कांग्रेस ने स्वयं को तीसरे या चैथे नंबर पर रखना मान लिया है। क्या 2019 में कांग्रेस पूरे देश में स्वयं को इस स्थिति में रखना चाहेगी ? यदि हां, तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी का मुकाबला कौन करेगा ? और यदि नहीं, तो उसे लड़ने के लिए सीटें कौन देगा ? 

क्या उ.प्र. में स.पा. और ब.स.पा., बिहार में लालू, बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, महाराष्ट्र में शिवसेना और शरद पवार, आंध्र में चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना में चंद्रशेखर राव, तमिलनाडु में द्रमुक या अन्नाद्रमुक आदि कांग्रेस को 60-70 प्रतिशत सीट दे देंगे ? यदि नहीं, तो कांगे्रस के पास सरकार बनाने लायक सीट कहां से आएंगी ? और फिर उस समय संघ परिवार भी पूरी ताकत से मोदी का साथ देगा। यद्यपि संघ वाले भी मोदी की सब नीतियों से खुश नहीं हैं; पर संघ को मिटाने पर तुली कांग्रेस का दिल्ली की गद्दी पर बैठना उन्हें भी स्वीकार नहीं है। इस परिदृश्य में ही 2019 का उत्तर छिपा है।

इसलिए जो नेता 2019 के लिए अपने मुंह के नाप के रसगुल्लों के आर्डर दे रहे हैं, अच्छा हो वे सपने देखना छोड़ दें। क्योंकि इस पनघट की डगर बहुत कठिन है।

मंगलवार, 29 मई 2018

प्रणव मुखर्जी का नागपुर प्रवास

जब से कांग्रेस वालों ने ये सुना है कि पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जा रहे हैं, तब से उनकी नींद हराम है। कई तो मन ही मन उन्हें गाली दे रहे हैं। हो सकता है दो-चार दिन में गालियों का स्वर ऊंचा हो जाए। शायद अभी विदेश यात्रा पर गये मां-बेटे की ओर से संकेत नहीं मिला है। अन्यथा गाली देना तो कांग्रेस के (कु)संस्कार का ही हिस्सा है।

जहां तक संघ की बात है, तो प्रशिक्षण संघ के काम का एक नियमित अंग है। संघ के स्थापना काल से ही ये वर्ग लग रहे हैं। जिस वर्ग में प्रणव दा जा रहे हैं, वह संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण वर्ग है। 25 दिवसीय इस वर्ग में पूरे देश से कार्यकर्ता आते हैं। इस बार का वर्ग 14 जून को प्रारम्भ हुआ था। इसमें 708 कार्यकर्ता प्रशिक्षण ले रहे हैं। सात जून को इसका सार्वजनिक समापन कार्यक्रम है। परम्परागत रूप से इसमें सरसंघचालक मुख्य वक्ता रहते हैं। इस बार प्रणव दा वहां मुख्य अतिथि के नाते जा रहे हैं। वे शारीरिक प्रदर्शन देखेंगे और फिर अपनी बात भी कहेंगे।

कुछ लोगों को एक खांटी कांग्रेसी का संघ के इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जाना भले ही आश्चर्यजनक लग रहा हो; पर संघ वालों के लिए ये सामान्य सी बात है। संघ अपने कार्यक्रमों में  समाज के प्रतिष्ठित लोगों को अध्यक्ष या मुख्य अतिथि के नाते बुलाता रहता है। ये लोग व्यापारी, उद्योगपति, शिक्षक, वकील, डॉक्टर, किसान, समाजसेवी, पत्रकार, राजनेता आदि कोई भी हो सकते हैं। संघ के मंच पर आकर वे अपनी बात कहते हैं और मुख्य वक्ता से संघ के विचार भी सुनते हैं। वे संघ के अनुशासन और कार्यकर्ताओं के प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होते हैं। ऐसे अधिकांश लोग फिर सदा के लिए संघ के साथ जुड़ जाते हैं।

वैसे तो संघ में प्रारम्भ से ही ये काम चल रहा है। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार पूरे देश से ऐसे प्रभावी लोगों को बुलाकर नागपुर की शाखा दिखाते थे; पर पिछले 25 वर्ष से संघ में इसके लिए एक ‘संपर्क विभाग’ बना दिया गया है। संघ की राष्ट्रीय से लेकर नीचे तक की हर इकाई में एक संपर्क प्रमुख और उनके साथ पूरी टीम काम करती है। ये अपने क्षेत्र के अच्छे लोगों से मिलकर उन्हें संघ का साहित्य देते हैं। फिर उन्हें संघ या किसी समविचारी संस्था से जोड़ते हैं। इसके लिए प्रतिवर्ष कुछ दिन के लिए विशेष संपर्क कार्यक्रम चलाया जाता है। इस कारण संघ का फैलाव निरन्तर बढ़ रहा है।

ऐसे ही संपर्क कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से भी संपर्क किया गया। उन जैसे बड़े आदमी से संपर्क करने सरसंघचालक श्री मोहन भागवत स्वयं गये। ऐसी एक-दो मुलाकातों में प्रणव दा को संघ का काम समझ में आया; पर पद की मर्यादा के कारण वे खुलकर संघ के किसी कार्यक्रम में नहीं आ सकते थे; पर अब ऐसी बाध्यता नहीं है। इसलिए उन्होंने संघ के कार्यक्रम में जाना स्वीकार किया है।

यदि प्रणव दा के पक्ष पर ध्यान दें, तो राजनीति में वे सर्वोच्च स्थान पा चुके हैं; पर उनका बेटा और बेटी दोनों वंशवादी कांग्रेस में सक्रिय हैं। प्रणव दा के नागपुर जाने से उनके राजनीतिक भविष्य का क्या होगा, यह कहना कठिन है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में प्रणव दा सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे। प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा भी थी; पर राजीव गांधी स्वयं प्रधानमंत्री बन गये। इसके बाद एक षड्यंत्र के अन्तर्गत वे कांग्रेस से बाहर कर दिये गये। उन्होंने ‘राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस’ नामक दल भी बनाया; पर सफल नहीं हुए। अतः वे फिर कांग्रेस में आ गये। 

राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया मैडम को उनके अनुभव का बहुत लाभ मिला; पर 2004 में जब कांग्रेस को सत्ता मिली, तो सोनिया ने उनकी बजाय मनमोहन सिंह जैसे जनाधारहीन व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया। सोनिया मैडम को ये भय था कि यदि प्रणव दा पार्टी और सरकार में जम गये, तो कहीं उनकी और उनके परिवार की छुट्टी न हो जाए। मनमोहन सिंह से ऐसा कोई खतरा नहीं था। इस अपमान को सह कर भी प्रणव दा कांग्रेस में बने रहे। अंततः राष्ट्रपति पद के रूप में उन्हें इसका पुरस्कार भी मिला। 

यों तो संघ या स्वयंसेवकों द्वारा संचालित संस्थाओं के कार्यक्रमों में आने वालों की सूची बहुत बड़ी है। इनमें डा. कलाम, इन्दिरा गांधी, वी.वी.गिरी, करुणानिधि, ज्योति बसु, हरेकृष्ण कोनार, नीलम संजीव रेड्डी, मिर्जा हमीदुल्ला बेग, रामनरेश यादव, जगजीवन राम, नारायण दत्त तिवारी, शिवराज पाटिल, डा. कर्णसिंह, मालवीय जी, गांधी जी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, डा. राधाकृष्णन, मोरारजी देसाई, प्रभाष जोशी, शरद यादव, शंकर दयाल शर्मा, कुंवर महमूद अली, बलराम जाखड़, अन्ना हजारे, खुशवंत सिंह, एच.डी.देवेगौड़ा, मुलायम सिंह, सुशील कुमार शिंदे, एम.जी.बोकारे, अजीम प्रेमजी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सभी पत्रकार तथा जन प्रतिनिधि स्वयंसेवकों द्वारा चलाये जा रहे शिक्षा, सेवा एवं संस्कार केन्द्रों में प्रायः आते रहते हैं।

संघ का दिल बड़ा और दिमाग खुला है। उसे किसी विरोधी को अपने मंच पर बुलाने में आपत्ति नहीं होती। इसीलिए संघ का काम सभी दिशाओं में बढ़ रहा है। प्रणव दा के इस निर्णय में भी बहुत से लोग राजनीतिक अर्थ ढूंढेंगे; पर संघ इन प्रपंचों से दूर है। उनके आने से संघ, समाज और देश को लाभ ही होगा, यह निश्चित है।