शनिवार, 21 जुलाई 2018

कांग्रेस के महावतार बाबा

1975 से 1977 तक का समय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। चंूकि उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके अति महान पुत्र संजय गांधी ने पूरे देश को एक जेल में बदल दिया था। क्या मजाल कोई इन दोनों के खिलाफ एक शब्द भी बोल सके। बोलना तो दूर, कोई इस बारे में सोच भी नहीं सकता था। हां, इन दोनों की चमचागिरी पर कोई प्रतिबंध नहीं था। बहुत से कवि, कलाकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी अपनी कल्पनाशक्ति के बल पर इस क्षेत्र में नयी गाथाएं लिखकर अपने जीवन को कलंकित कर रहे थे।

देवकांत बरुआ उन दिनों कांग्रेस के एक बड़े नेता थे। उन्होंने उस दौरान चमचाकर्म की सभी सीमाएं पार कर एक नया नारा दिया था। इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा। अर्थात इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है। यद्यपि उनका नारा ज्यादा समय नहीं चल पाया। 1977 में लोकसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव हुए। तब भारत तो बच गया, पर इंदिरा गांधी और उनके साहबजादे धराशायी हो गये। जनता ने दोनों के मुख पर इतनी कालिख पोत दी कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया। बेचारे कांग्रेस को तो क्या जिताते, खुद ही हार गये। इस प्रकार देश के माथे से आपातकाल रूपी वह कलंक हटा।

अब न देवकांत बरुआ हैं और न ही इंदिरा और संजय गांधी। एक भगवान के पास चले गये और बाकी दोनों को भगवान ने खुद ही बुला लिया। पर खुद को खुदा और सत्ता का जन्मजात मालिक समझने वाले उस राज परिवार के वंशज अभी विद्यमान हैं। सोनिया परिवार के गुलचिराग राहुल बाबा ने अपनी मम्मीश्री को कई साल तक तरसाया और आखिरकार लाखों कांग्रेसियों पर अहसान करते हुए वे सोनिया कांग्रेस के खानदानी अध्यक्ष बन ही गये। वैसे तो कहा गया कि वे अध्यक्ष चुने गये हैं; पर किसी ने ये नहीं बताया कि उस कुर्सी के लिए दूसरा या तीसरा प्रत्याशी कौन था और उसे कितने वोट मिले ?

उन्हीं अध्यक्ष जी ने 20 जुलाई को मोदी सरकार के विरुद्ध रखे गये अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में बोलते हुए सीना ठोककर कहा कि मैं ही कांग्रेस हूं और मैं सबको कांग्रेस बना दूंगा। बात तो उन्होंने शिवजी की भी की; पर गनीमत है खुद को शिव नहीं कहा। मुझे अपने गांव का एक सड़कछाप मदारी याद आया, जो छुट्टी के समय हमारे स्कूल के रास्ते में प्रायः तमाशा दिखाता मिलता था। वह अपनी टोपी में से चूहा निकालकर दर्शकों को डराता था कि यदि उसे मनचाहे पैसे नहीं दिये गये, तो वह सबको चूहा बना देगा। कई बच्चे उसके जाल में फंस कर उसे कुछ पैसे दे देते थे।

श्रीमान अध्यक्ष जी इतने पर ही शांत नहीं हुए। वे जबरन प्रधानमंत्री मोदी के गले जा लगे और फिर अपनी सीट पर आकर न जाने किसे आंख मारने लगे। सदन में पुरुष भी थे और हर उम्र की महिलाएं भी। सदन की अध्यक्ष भी एक सम्मानित महिला ही हैं; पर कांग्रेस के महावतार बाबा छिछोरेपन से बाज नहीं आये। सारा सदन यह देखकर भौचक रह गया। यद्यपि कुछ पुराने कांग्रेसी चमचे इसे धर्म और संस्कृति की परम्परा बता रहे हैं; पर वे यह स्पष्ट नहीं कर सके कि जबरन गले पड़ना धर्म और संस्कृति है या आंख मारना।

ऐसा लगता है कि राहुल बाबा अब बौरा गये हैं। जिस कुर्सी के वे योग्य नहीं थे, उस पर जबरन उन्हें बैठना पड़ गया है। उनके खानदान के अलावा कोई दूसरा उस कुर्सी पर बैठे, ये उन्हें और उनकी मम्मीश्री को स्वीकार नहीं है। इसलिए उनका दिमागी संतुलन बिगड़ गया है। कुछ दिन पूर्व उन्होंने कहा था कि कांग्रेस देश में आखिरी पायदान पर खड़े हर व्यक्ति के साथ है। काश, कोई उन्हें ये समझाये कि उनकी इन अनर्गल बातों से लोकसभा में कांग्रेस सैकड़ा से दहाई और फिर इकाई की ओर बढ़ते हुए आखिरी पायदान पर ही पहुंच रही है। 

हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में रावण, कंस और हिरण्यकशिपु आदि की चर्चा है, जो खुद को भगवान कहते थे। वैसे थे तो वे आम मानव ही; पर अपने अहंकार और कुकर्मों के कारण उन्हें राक्षस कहा गया। वे कहते थे कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश को छोड़कर सब उनकी ही पूजा करें। जो उनकी बात नहीं मानता था, या उन्हें समझाने का प्रयास करता था, उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था। यद्यपि ऐसे सभी अहंकारियों का अंत बुरा ही हुआ। कुछ ऐसा ही परिदृश्य देश में फिर से दिखायी दे रहा है। एक नेताजी ने खुद को कांग्रेस का महावतार घोषित कर दिया है। ऐसे में उन्हें शीशा दिखाने या सही बात समझाने की हिम्मत किसमें है; और कोई समझाने की कोशिश भी करे, तो जिसकी ऊपरी मंजिल खाली हो, वह समझेगा कैसे ?

ऐसा लगता है इन महावतार बाबा को फिर कुछ दिन विदेश में गुप्त प्रवास, आराम और इलाज की जरूरत है। तब मामले में शायद कुछ सुधार हो। वे परेशान न हों। देश की चिन्ता करने के लिए मोदी जी हैं और कांग्रेस के लिए ऊपर वाला।

कारवां गुजर गया

छात्र जीवन से मेरी रुचि साहित्य में रही है। कविता मंचीय हो या पत्रिका में प्रकाशित, उनके प्रति विशेष आकर्षण था।  इसी से कुछ तुकबंदी करने की भी आदत बन गयी। पश्चिमी उ.प्र. में खतौली का श्रावणी मेला, मुजफ्फरनगर की नुमाइश, मेरठ में नौचंदी मेला, सरधना में बूढ़े बाबू का मेला, दिल्ली में गणतंत्र दिवस और उससे अगले दिन गाजियाबाद में होने वाले कवि सम्मेलन सुनने के लिए कई साल तक लगातार मैं गया हूं। 

इनमें तबके प्रख्यात कवि काका और निर्भय हाथरसी, ब्रजेन्द्र अवस्थी, शिशुपाल सिंह निर्धन, बालकवि बैरागी, बलबीर सिंह रंग, संतोषानंद, देवराज दिनेश, नीरज, किशन सरोज, हुल्लड़ मुरादाबादी आदि प्रायः प्रतिवर्ष आते थे। इनमें से अधिकांश अब नामशेष हो चुके हैं। महिला कवियों का चलन कुछ विशेष नहीं था। हरिवंशराय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा का दौर जा चुका था। आज जिन्हें मंचों पर खूब सुना जाता है, ऐसे हरिओम पंवार, अशोक चक्रधर, कुंवर बेचैन आदि का तब कहीं नाम नहीं था। कुमार विश्वास तो तब शायद जन्मे भी नहीं होंगे।

नीरज जी के निधन की खबर पढ़कर एक प्रसंग याद आ रहा है। खतौली में जन्माष्टमी से एक महीने का श्रावणी मेला होता है। कवि सम्मेलन भी उसका एक अनिवार्य कार्यक्रम है। बात लगभग 40 साल पुरानी है। कवि सम्मेलन में पहले और दूसरे चरण की कविता बोलकर रात में डेढ़ बजे नीरज जी सोने चले गये। जाते-जाते उन्होंने आयोजकों से कहा कि यदि मेरी जरूरत हो, तो बुला लेना। 

सुबह चार बजे जब कवि सम्मेलन लगभग पूरा हो गया, तो श्रोताओं ने नीरज-नीरज का शोर मचा दिया। इस पर आयोजकों ने उन्हें फिर से बुलवा लिया। नीरज जी ने आकर अपने स्वभाव के अनुसार दो गाव तकिये लगाये और उसके ऊपर बैठ गये। तब तक मुश्किल से सौ श्रोता ही बचे होंगे। उन्होंने सभी को मंच पर बुला लिया। सब उन्हें घेर कर बैठ गये। वे बोले कि ये कविता के असली रसिक हैं। मुझे ऐसे ही लोग चाहिए। 

इसके बाद दो घंटे तक वे कविता सुनाते रहे। गीत, गजल, रुबाई, मुक्तक..; जिस श्रोता ने जो कहा, वो उन्होंने सुनाया। क्या मजाल कि कोई श्रोता टस से मस हुआ हो। क्योंकि वे सब उन्हें सुनने के लिए ही रुके थे। यहां तक कि सुबह के छह बज गये। पूरब से सूर्य देवता दस्तक देने की तैयारी करने लगे। तब आयोजकों ने हाथ जोड़कर श्रोताओं से क्षमा मांगी। वरना न तो श्रोता और न ही नीरज वहां से हटने को तैयार थे। 

यों तो नीरज जी को कवि सम्मेलन में पचासों बार सुनने का अवसर मिला है; पर उस दिन का प्रसंग कभी नहीं भूल सकता। गीतों के उस राजकुमार को मेरी श्रद्धांजलि।