शनिवार, 18 अगस्त 2018

फाकाकशी और मस्ती के वे दिन


यह बात अटल जी के राजनीति में आने से पहले की है। उन दिनों लखनऊ से मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य, दैनिक स्वदेश और सांयकालीन तरुण भारत भी निकलते थे। अब पांचजन्य दिल्ली से, स्वदेश मध्यप्रदेश से तथा तरुण भारत महाराष्ट्र में कई स्थानों से निकलता है। यद्यपि इन सबमें और लोग भी थे; पर मुख्य जिम्मेदारी अटल जी की ही थी। अतः वे दिन भर इसी में डूबे रहते थे।

कई बार वे दोपहर भोजन के लिए नहीं पहुंचते थे, तो प्रांत प्रचारक भाऊराव उन्हें बुलाने आ जाते थे। उनके आग्रह पर अटल जी कागजों से जूझते हुए कहते थे, ‘‘भोजन करने गया, तो अखबार नहीं निकलेगा।’’ भाऊराव एक-दो बार फिर आग्रह करते थे। लेकिन फिर वही उत्तर। अतः उस दिन अटल जी और भाऊराव दोनों ही भूखे रह जाते थे।

उन दिनों संघ की तथा इन पत्र-पत्रिकाओं की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। दरी पर रखे कुछ लोहे के ट्रंकों में सब सामग्री रहती थी। उन पर कागज रखकर ही सम्पादकी, प्रूफ रीडिंग आदि होती थी। प्रचारक होने के नाते अटल जी बिना किसी वेतन के काम करते थे। राष्ट्रधर्म के कोषाध्यक्ष से उन्होंने एक बार कहा, ‘‘पांच रुपये दीजिए। नयी चप्पल लेनी है।’’ स्वभाव से अति कठोर कोषाध्यक्ष जी उस दिन अच्छे मूड में थे। उन्होंने पैसे दे दिये।

अटल जी ने वचनेश जी के साथ बाजार में पहले दो भुट्टे खाये और फिर लस्सी पी। इसमें काफी पैसा खर्च हो गया। वचनेश जी ने पूछा, ‘‘अब चप्पल कैसे लोगे ?’’ अटल जी ने मस्ती में जवाब दिया, ‘‘अभी इतनी खराब नहीं हुई है। मोची से ठीक करा लेते हैं, तो कुछ दिन और चल जाएगी।’’ अर्थात फाकाकशी के दौर में भी मस्ती का अभाव नहीं था। इसी के बल पर संघ और बाकी सब काम खड़े हुए।

1989 में नारायण दत्त तिवारी उ.प्र. में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के एक वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी (भैया साहब) को उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने एक लाख रु. वाला अपना सर्वोच्च भारत-भारतीसम्मान देने की घोषणा की। 14 सितम्बर हिन्दी दिवसपर कार्यक्रम होना था; पर उससे एक दिन पूर्व 13 सितम्बर को मुख्यमंत्री ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित कर दिया। राज्य के हिन्दी प्रेमियों में आक्रोश की लहर दौड़ गयी। लखनऊ निवासी भैया साहब प्रखर हिन्दी सेवी थे। उन्होंने इसके लिए अंग्रेजों की नौकरी ठुकरा दी थी। वृद्धावस्था के कारण इन दिनों वे बिस्तर पर थे। उन्होंने इस निर्णय के विरोध में भारत भारती सम्मान ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैंने अपने जीवन में एक लाख रु. कभी एक साथ नहीं देखे; पर देश विभाजक उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाना मुझे स्वीकार नहीं है। पूरे राज्य में हड़कम्प मच गया।

भैया जी राष्ट्रधर्म और पांचजन्य के नियमित लेखक रहे थे। अतः अटल जी उनका बड़ा आदर करते थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि हम जनता की ओर से भैया साहब को सम्मानित करेंगे। उनके आह्नान पर एक लाख रु. से भी अधिक धन एकत्र हो गया। फिर अटल जी ने सार्वजनिक सभा में भैया जी के पुत्र को वह राशि भेंट की तथा घर जाकर भैया जी को जनता भारत भारतीसम्मान प्रदान किया।

यह घटना 10 मई, 2003 की है। दिल्ली में पांचजन्य की ओर से संसद के बालयोगी सभागार में नचिकेता सम्मान का कार्यक्रम था। राष्ट्रधर्म में सहायक संपादक के नाते मैं भी वहां उपस्थित था मंच पर प्रधानमंत्री अटल जी भी थे। कुछ दिन पूर्व ही कुछ पत्रकारों ने षड्यंत्रपूर्वक भा.ज.पा. के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को जाल में फंसाया था। अटल जी ने पहला वाक्य कहा, ‘‘मैं आजकल पुरस्कार बांट रहा हूं और तिरस्कार बटोर रहा हूं।’’ पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया। अटल जी का चेहरा बता रहा था कि उन्हें इस घटना से कितना दुख पहुंचा है।

रात में प्रधानमंत्री निवास पर भोजन करते हुए मैंने बताया कि मैं पांचजन्य में छह लाइनों का छोटा सा कॉलम भी लिखता हूं। अटल जी ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘हां, मैं उसे पढ़ता हूं।’’ मेरे जैसे छोटे लेखक को इतनी तारीफ ही काफी थी। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अटल जी, बातें और यादें


बात संभवतः सितम्बर 1983-84 की है। मैं उन दिनों बरेली में प्रचारक था। पश्चिमी उ.प्र. के सभी जिला प्रचारकों की एक बैठक मथुरा में हुई। स्व. दीनदयाल उपाध्याय का पैतृक गांव नगला चंद्रभान मथुरा जिले में ही है। उनके निधन के बाद वहां उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष मेला होता है। अनेक तरह के सेवा और ग्राम्य विकास के काम भी चल रहे हैं। उनकी पैतृक झोंपड़ी को संरक्षित करते हुए एक स्मृति भवन बनाया गया है। उसका संचालन जो समिति करती है, उन दिनों उसके अध्यक्ष अटल जी ही थे।

बैठक के अंतिम दिन उन कार्यों को देखने और समझने के लिए सभी जिला प्रचारक वहां गये थे। उस दिन समिति की बैठक भी थी। अतः अटल जी भी आये हुए थे। उनके साथ सभी प्रचारकों की गपशप और प्रश्नोत्तर हुए। उन दिनों पंजाब में आतंक का बोलबाला था। उस पर लिखी अपनी कविता ‘‘दूध में दरार पड़ गयी, खून क्यों सफेद हो गया, भेद में अभेद खो गया...’’ भी अटल जी ने सुनायी। भाऊराव भी वहां उपस्थित थे। काफी अनौपचारिक वातावरण था।

इसके बाद सबने साथ-साथ भोजन किया। ब्रज की प्रसिद्ध दाल, बाटी, चूरमा आदि बना था। गांव के भी कई लोग वहां थे। अटल जी सबसे बड़ी सहजता से मिल रहे थे। एक सज्जन के साथ एक छोटा बालक भी था। अटल जी ने उससे नाम पूछा। उसने नाम बताकर कहा - राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, शिशु मोर्चा। अटल जी ने पूछा, ‘‘तुम अध्यक्ष हो, तो तुम्हारे बाकी साथी कहां हैं ?’’ उसे जो सिखाकर लाया गया था, उसमें ये प्रश्न शामिल नहीं था। अतः वह बालसुलभ सहजता से बोला, ‘‘मोय का पतो।’’ इस पर अटल जी और बाकी सब लोग खूब हंसे।

अटल जी राष्ट्रधर्मके प्रथम सम्पादक रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री रहते हुए वे राष्ट्रधर्म कार्यालय में आये भी थे; पर प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे आयें, ऐसी हम सबकी इच्छा थी। लखनऊ के सांसद होने के नाते वे प्रायः लखनऊ आते भी थे। एक बार राजभवन में उनसे मिलकर हम लोगों ने बड़ा आग्रह किया। दबाव बनाने के लिए हम श्री वचनेश त्रिपाठी को भी साथ ले गये थे। वचनेश जी उनसे बड़े थे। अतः वे उनका बहुत आदर करते थे और उनकी बात टालते नहीं थे। कुछ देर तो वे चुप रहे, फिर बोले, ‘‘भाई मेरे आने से पूरे मोहल्ले वाले परेशान हो जाएंगे।’’ हमने उन्हें राष्ट्रधर्म का ताजा अंक, लोकहित प्रकाशन की कुछ पुस्तकें भेंट की और लौट आये।

एक बार पता लगा कि उनका कार्यक्रम बन गया है। सप्ताह भर पहले से कई तरह के सुरक्षाकर्मी राष्ट्रधर्म कार्यालय में आने-जाने लगे। वहां और आसपास रहने वालों की सूचियां बनने लगीं। सड़कें साफ होने लगीं। एक दिन दिल्ली से सीधे बातचीत के लिए एक हॉटलाइन फोनभी लग गया। हम सब बड़े उत्साहित थे; पर दो दिन पूर्व फिर कार्यक्रम निरस्त हो गया। पता लगा कि प्रधानमंत्री के विशेष सुरक्षा दस्ते ने इतनी पतली गली में आने की अनुमति नहीं दी। पश्चिमी उ.प्र. में एक कहावत है, ‘‘काणी के ब्याह को सौ जोक्खो..।’’ यहां भी ऐसा ही हुआ।

प्रधानमंत्री रहते हुए वे लखनऊ में राष्ट्रधर्म के किसी विशेषांक का लोकार्पण करें, हमारी यह इच्छा भी अधूरी ही रही। लखनऊ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन सर्वेसर्वा तैयार ही नहीं होते थे, और उनकी सहमति के बिना अटल जी का कार्यक्रम नहीं बनता था। जैसे-तैसे एक बार यह तय हुआ कि लखनऊ संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में ही अटल जी एक विशेषांक का लोकार्पण करें। सब तैयारी हो गयी; पर उस दिन अटल जी बीमार हो गये और दिल्ली से आये ही नहीं। क्या कहें, हमारा भाग्य ही साथ नहीं दे रहा था -

किस्मत की खूबी देखिये, टूटी कहां कमन्द
दो चार हाथ जब कि लबे बाम रह गया।।

वर्ष 2006 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रापर राष्ट्रधर्म ने एक विशेषांक निकाला। उन दिनों अटल जी प्रधानमंत्री नहीं थे। उनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रहता था। अतः उसका लोकार्पण दिल्ली में भा.ज.पा. के केन्द्रीय कार्यालय में ही हुआ। अटल जी के साथ आडवाणी जी भी मंच पर थे। उस दिन अटल जी ने लिखित भाषण पढ़ा। जिनकी वाणी पर सरस्वती विराजती हो, उन्हें लिखा हुआ भाषण पढ़ता देख हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर ध्यान में आ गया कि अब उनका स्वास्थ्य ही नहीं, स्मृति भी उतार पर है। इसके बाद तो वे सार्वजनिक जीवन से दूर ही होते गये।

भारतीय राजनीति के उस तेजस्वी नक्षत्र को मेरी श्रद्धांजलि।