शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू

बहुत साल पहले मोदी सूटिंग का एक विज्ञापन आता था ‘ए मैड मौड मूड मेड मोदी’। यह विज्ञापन जिसने भी बनाया, उसके दिमाग और शाब्दिक बाजीगरी को दाद देनी होगी। मोदी ब्रांड तो अब भी है; पर कारोबार बंटने से वह कमजोर पड़ गया है। यद्यपि मेरठ के पास मोदीनगर और मोदीपुरम् में अब भी कई उद्योग चल रहे हैं; पर मोदी ब्रांड में वो चमक नहीं है, जो कभी ‘रायबहादुर’ गूजरमल मोदी के जमाने में थी।

लेकिन दूसरी ओर पिछले कुछ साल में एक और मोदी बहुत मजबूत हुए हैं। वह हैं नरेन्द्र मोदी। उनका नाम भी राजनीति में एक ब्रांड बन गया है। मोदी ब्रांड का अर्थ है कठिन परिश्रम, देशहित में कठोर निर्णय लेने की क्षमता, ईमानदारी, विनम्रता, भाषण कौशल्य, स्पष्ट नीति, विदेशी नेताओं से मधुर संबंध, साहसी नेतृत्व.. आदि। यद्यपि बड़े लोगों की तुलना नहीं की जाती। क्योंकि परिस्थिति हर समय एक सी नहीं होती। फिर भी पिछले साढ़े चार साल में नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो उपलब्धियां पायी हैं, वह अभूतपूर्व हैं।

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे साढ़े चार साल राष्ट्रनीति पर ध्यान देंगे और फिर राजनीति पर। अब लोकसभा के चुनाव पास आ रहे हैं। अतः मोदी राष्ट्रनीति के साथ ही चुनावी राजनीति की ओर भी बढ़ गये हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने साल के पहले ही दिन एक बड़ी समाचार संस्था को साक्षात्कार देकर की।

साक्षात्कार में उन्होंने हर प्रश्न का साफ उत्तर दिया। यद्यपि जिनकी रोटी-रोजी ही विरोध से चलती है, उन्होंने कहा कि यह साक्षात्कार प्रायोजित था। मोदी को प्रश्न पता थे, इसलिए वे तैयारी करके आये। सच तो ये है कि इसमें कुछ गलत नहीं है। यह साक्षात्कार प्रधानमंत्री का था, झूठे आरोप लगाने वाले किसी नेता का नहीं। जो दूसरों का लिखा पढ़ते हैं और हर पत्रकार वार्ता से पहले जिन्हें सिखाना पड़ता है, उनके द्वारा इस साक्षात्कार को प्रायोजित कहना मजाक है। 

राफेल विवाद पर सरकार का मंतव्य बिल्कुल साफ है। पिछली सरकार का सौदा केवल विमान का था; पर इस बार के सौदे में उन विमानों में लगाये जाने वाले हथियार भी शामिल हैं। एक डिब्बा खाली है और दूसरा सामान सहित, तो दोनों की कीमत में अंतर तो होगा ही। यही अंतर विमान और हथियारों से लैस युद्धक विमान में है। यह बात जनता समझ रही है; पर कांग्रेस नहीं।

राफेल में कौन से हथियार लगेंगे, इसे विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं, आम आदमी नहीं। सामरिक महत्व का विषय होने के कारण यह गोपनीय है। वायुसेना के अधिकारी इससे संतुष्ट हैं। फिर भी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सब तथ्य बताये, जिसे देखकर उसने कहा कि इसमें कोई घपला नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस शोर मचा रही है। कारण बिल्कुल साफ है। उसकी चिंता का विषय देश की रक्षा नहीं, अगला चुनाव है।

मोदी एक बात और भी कह रहे हैं कि रक्षा सौदों में पहले दलाली खायी जाती थी। बोफोर्स सौदा बहुत पुराना नहीं है। वह तोप बहुत अच्छी थी, यह सच है; पर उसकी खरीद में घपला था, यह भी उतना ही सच है। उसकी ठीक जांच कांग्रेस ने नहीं होने दी। उसके अपराधियों को देश छोड़कर भागने का मौका दिया। विदेश में बंद उसके खातों से प्रतिबंध हटवाये। फिर भी वह अपने दामन को साफ कहे, तो ये मजाक ही है।

कहते हैं कि जिस सौदे में दलाली नहीं मिलती थी, उसे वे किसी बहाने से रद्द कर देते थे। इसीलिए मनमोहन सिंह के समय में कोई महत्वपूर्ण रक्षा सौदा नहीं हो सका; पर अब सौदे हो रहे हैं। व्यापारियों की बजाय सरकारों के बीच हो रहे हैं। किसी को दलाली नहीं मिली। इतना ही नहीं, पिछले दलाल भी पकड़ में आ गये हैं। इसलिए कांग्रेस बेचैन है। यही उनकी बौखलाहट का कारण है। 

एक फिल्मी गीत है, ‘‘चोरों को सारे नजर आते हैं चोर।’’ कांग्रेस को लगता है कि जैसे बोफोर्स दलाली ने राजीव गांधी की छुट्टी की थी, ऐसा ही इस बार भी होगा। तब वी.पी.सिंह ने नारा दिया था, ‘‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है।’’ इसी तर्ज पर राहुल बाबा भी ‘‘चैकीदार चोर है’’ के नारे लगा रहे हैं। 

साक्षात्कार में श्रीराम मंदिर के बारे में भी मोदी ने साफ बात कही। मंदिर बने, यह उनकी भी इच्छा है। सबकी तरह उन्हें भी पता है कि इस विवाद का निर्णय मंदिर के पक्ष में होगा। यद्यपि कानून या अध्यादेश का रास्ता भी है; पर संवैधानिक पद पर होने के कारण वे चाहते हैं कि निर्णय न्यायालय ही दे। इसलिए वे कुछ और समय तक प्रतीक्षा करना चाहते हैं; पर कांग्रेस की शह पर बाबरी वाले बार-बार सुनवाई टलवा रहे हैं। ऐसा लगता है कि यदि इस पर शीघ्र निर्णय नहीं हुआ, तो लोकसभा चुनाव की घोषणा से पूर्व मोदी अध्यादेश ले आएंगे। 

सी.बी.आई प्रमुख आलोक वर्मा प्रकरण पर भी मोदी का मन साफ है। उन्हें आलोक वर्मा से बैर नहीं है; पर वे चाहते हैं कि चूंकि दो शीर्ष लोगों पर आरोप लगे हैं, इसलिए जांच पूरी होने तक दोनों अवकाश पर रहें। आलोक वर्मा ने इसे नहीं माना। वे सर्वोच्च न्यायालय से बहाली ले आये; पर शासन के हाथ लम्बे हैं। मोदी ने उनका स्थानांतरण कर दिया। 

इस मामले में सबसे हास्यास्पद स्थिति कांग्रेस की रही। उनके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आलोक वर्मा को लाने का भी विरोध किया और हटाने का भी। क्योंकि उनका काम केवल विरोध करना है। जैसे संपत और चंपत मित्र थे; पर संपत हमेशा चंपत का विरोध करता था। एक बार चाय पीते हुए दोनों के कप में मक्खी गिर गयी। चंपत ने चाय और मक्खी दोनों फेंक दी। इस पर संपत ने चाय और मक्खी दोनों गटक लीं। यही हाल खड़गे जी और कांग्रेस का है।

गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण, पड़ोसी देशों से दुखी होकर आये हिन्दुओं के लिए नागरिकता नियम में संशोधन, जी.एस.टी. में छोटे कारोबारियों को राहत.. आदि से लगता है कि नरेन्द्र मोदी चुनावी मूड में आ गये हैं। लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। मोदी ब्रांड इस बार पहले से अधिक मजबूत होकर उभरेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

विशाल सामाजिक आयोजन है कुंभ

भारत में चार स्थानों पर प्रति बारह वर्ष बाद पूर्ण कुंभ और छह साल बाद अर्धकुंभ की परम्परा हजारों सालों से चली आ रही है। कुंभ का धार्मिक और पौराणिक महत्व तो है ही; पर इसे केवल धार्मिक आयोजन कहना उचित नहीं है। वस्तुतः कुंभ एक विराट सामाजिक आयोजन भी है। भारतीय, और विशेषकर हिन्दू समाज व्यवस्था में जो परिवर्तन हुए हैं, उनके पीछे कुंभ की बड़ी भूमिका है। 

कुंभ मेलों का इतिहास बताता है कि स्वाधीनता सेनानी भी यहां आते थे। वे यहां आकर अपने पिछले काम की समीक्षा कर अगली योजनाएं बनाते थे। इनमें से अधिकांश लोग गुप्त रूप में साधुओं के वेश में आते थे। इसलिए व्यवस्था के नाम पर विदेशी और विधर्मी प्रशासक भी इन मेलों पर गहरी निगाह रखते थे। 

आजकल यातायात के तीव्रगामी साधन बहुत बढ़ गये हैं। इसलिए अधिकांश लोग वायुयान, रेलगाड़ी, बस, कार या दुपहिया वाहनों से आकर गंगा मइया में डुबकी लगाकर एक-दो दिन में लौट भी जाते हैं। पूरे ढाई-तीन महीने, अर्थात कुंभ में पूरे समय रहने वाले तो दो प्रतिशत भी नहीं होंगे। अधिकांश साधु-संतों का भी यही हाल है।

पर पहले ऐसा नहीं था। तब लोग पैदल या बैलगाडि़यों से आते-जाते थे और फिर लम्बे समय तक कुंभ में रहते भी थे। लाखों लोग आने-जाने और कुंभ में रहने के लिए तीन-चार महीने का समय लेकर आते थे। साधु-संतों के लिए तो यह आसान था; पर गृहस्थ जन भी हर छह या बारह साल बाद ऐसा समय निकाल ही लेते थे। क्योंकि उनके मन में गंगा मां के प्रति अतिशय प्रेम था और गंगा स्नान के पीछे बहुत गहरी धर्म भावना जुड़ी थी। 

पर इस अवसर का उपयोग हिन्दू धर्म के प्रचार और प्रसार के साथ ही सामाजिक समस्याओं के बारे में चिंतन, मंथन, विचार, विमर्श और फिर निर्णय में भी होता था। साधु-संत लोग तो अपने डेरों या आश्रमों से साल भर पहले ही कुंभ के लिए निकल पड़ते थे। वे रास्ते में पड़ने वाले गांव और नगरों में कुछ-कुछ दिन ठहरते थे। हर जगह लोग श्रद्धा भाव से उनके भोजन और निवास का प्रबंध करते थे। इससे गांव वालों को जहां उनके अनुभव और प्रवचन का लाभ मिलता था, वहां उन संतों को क्षेत्र की धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की जानकारी मिलती थी। समाज में क्या परिवर्तन हो रहे हैं या होने अपेक्षित हैं, इससे उनका साक्षात्कार होता था। इस प्रकार वे सैकड़ों जगह रुकते और वहां की जानकारी लेते हुए कुंभ में पहुंचते थे।

कुंभ में भी साधु, संत और आम लोग आकर महीनों ठहरते थे। इनमें किसान, मजदूर, व्यापारी और कर्मचारी सब होते थे। सैकड़ों राजा, रजवाड़े, जमींदार और साहूकार भी आते थे। कुंभ में धार्मिक प्रवचन के साथ सामाजिक विषयों पर भी गहन चर्चा और विचार-विमर्श होता था। एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र वालों से मिलते थे। आपस में अनुभवों का आदान-प्रदान होता था। इस विमर्श में कुछ निर्णय भी लिये जाते थे। 

कुंभ से लौटकर लोग इन निर्णयों के बारे में अपने गांव में जाकर चर्चा करते थे। साधु-संत कुंभ से लौटते भी वैसे ही थे, जैसे वे आये थे। अर्थात रास्ते के गांव और नगरों में रुकते और प्रवचन करते हुए वे छह-आठ महीने में अपने आश्रम, डेरे और निवास पर पहुंचते थे। जाते समय उनका निवास कहीं और होता था तो लौटते हुए कहीं और। अर्थात इन हजारों साधु-संतों की कुंभ में जाते और लौटते हुए लाखों-करोड़ों लोगों से भेंट और वार्ता होती थी। लोगों के मन में साधु-संतों के प्रति श्रद्धा होती है। वे उनकी बात पर विश्वास करते हैं। अतः बिना किसी प्रचार माध्यम के कुंभ में हुए सामाजिक निर्णय साल भर के अंदर पूरे देश में फैल जाते थे। ये प्रक्रिया हर छठे और फिर बारहवें साल में होती थी।

एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो सकती है। भारत में 25 वर्ष तक युवक ब्रह्मचर्य का पालन कर फिर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते थे। जब लड़का 25 साल का होगा, तो लड़की भी 18-20 साल की तो होगी ही। आश्रम व्यवस्था के नाम से इसे धर्म का भी संरक्षण था; पर उसी भारत में फिर बाल विवाह क्यों होने लगे ? 

कारण बिल्कुल साफ है। जब भारत में इस्लामी हमलावर आये, तो वे कुमारी कन्याओं को उठाकर ले जाते थे। ऐसे में सब साधु-संतों और समाज शास्त्रियों ने निर्णय लिया कि अब गोदी के बच्चों की ही शादी कर दी जाए। शुभ मुहूर्त या तिथि-पत्रे के झंझट से बचने के लिए इसके लिए ‘अक्षय तृतीया’ भी निश्चित कर दी गयी। यद्यपि गौना किशोर या युवा होने पर ही होता था; पर विवाह के कारण लड़की के माथे पर सिंदूर सज जाता था। अतः कई इस्लामी हमलावर उसे बख्श देते थे। 

करोड़ों लोगों के जीवन पर स्थायी प्रभाव डालने वाले ऐसे सामाजिक निर्णय कुंभ मेलों में ही होते थे; पर इसका एक दूसरा पक्ष भी है। सैकड़ों सालों के इस्लामी प्रभाव के कारण लड़कियों की सुरक्षा के लिए स्वीकार किये गये इस उपाय ने क्रमशः कुप्रथा का रूप ले लिया। इसलिए आज भी लाखों बच्चों की शादी छुटपन में ही कर दी जाती है। इसलिए साधु-संतों और समाज शास्त्रियों ने जैसे आपत् धर्म के रूप में बाल और शिशु-विवाह की इस प्रथा को मान्य किया, वैसे ही अब इसे अमान्य भी करना चाहिए। इसका माध्यम भी कुंभ ही बन सकता है।

खानपान, छुआछूत, ऊंचनीच, पर्दा, लड़कियों को पढ़ने या बाहर न निकलने देना जैसी कई प्रथाएं अब कुप्रथा बन चुकी हैं। इन सब पर कुंभ में सख्त निर्णय हों तथा इन्हें न मानने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। यद्यपि यह काम इतना आसान नहीं है। जैसे किसी प्रथा को बनते हुए सैकड़ों साल लगते हैं, वैसे ही उसे टूटते हुए भी समय लगता है; पर इसकी प्रक्रिया लगातार चलती रहनी चाहिए। तभी कुंभ मेलों की सामाजिक सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी।