रविवार, 20 जनवरी 2019

आरक्षण का अगला चरण, आर्थिक आरक्षण

लोकसभा के पिछले सत्र में अचानक मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव सदन में रख दिया। विपक्ष को इसकी हवा तक नहीं लगी। इसलिए वे इस पर बोलने की तैयारी भी नहीं कर सके। अपवाद में दो-चार वोटों को यदि छोड़ दें, तो लगभग सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ। 

लोकसभा के बाद यह राज्यसभा में भी पारित हो गया। वहां भी विरोध की कोई बड़ी आवाज नहीं उठी। राष्ट्रपति महोदय के हस्ताक्षर से यह कानून बन गया और कई राज्यों में इस पर काम भी शुरू हो गया। यद्यपि इससे पहले जब भी आरक्षण संबंधी बात चली, तो दोनों सदनों में खूब तीखी चर्चा, बहस, वाद-विवाद आदि हुए। सड़कों पर हिंसक हंगामे और आंदोलन हुए। मंडल रिपोर्ट लागू होने की बात पुरानी होने पर भी बहुतों को याद है। 

पर इस बार जो हुआ, वह तेजी से होने के बावजूद बहुत शांति, प्रेम और सद्भाव से हो गया। बाल की खाल खींचने वाले विपक्ष और स.पा., ब.स.पा., लो.ज.पा. जैसे जातीय दलों ने भी इसका खुला समर्थन किया। इससे यह ध्यान में आता है कि इसके पक्ष में कैसी अंतर्धारा विद्यमान थी।

पर अब कुछ लोग न्यायालय में चले गये हैं। वे पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए इसे आरक्षण की मूल भावना के विरुद्ध बता रहे हैं। क्योंकि संविधान में आरक्षण के लिए आधार जाति को बनाया गया था, गरीबी या अमीरी को नहीं। शासन के अनुसार सवर्ण हिन्दुओं के साथ गरीब मुसलमान और ईसाइयों को भी इसका लाभ मिलेगा। यह कदम मोदी को कितना लाभ पहुंचाएगा, यह तो लोकसभा चुनाव के बाद ही पता लगेगा। 

आरक्षण को संविधान में लाते समय यह बात मुख्य रूप से उठी थी कि इससे निर्धन जातियों का आर्थिक और सामाजिक स्तर ऊंचा उठेगा। निःसंदेह देश में सामाजिक आधार पर भेदभाव होता है। डा. अम्बेडकर जब बड़ोदरा राज्य में एक बड़े पद पर काम करते थे, तो चपरासी उन्हें फाइलें फेंक कर देता था। चपरासी और डा. अम्बेडकर की शिक्षा और वेतन में जमीन-आसमान का अंतर था। फिर भी ऐसा होता था। चूंकि डा. अम्बेडकर महार जाति के थे। इसलिए आरक्षण में जाति को मुख्य आधार माना गया। आगे चलकर कई आयोग आरक्षण पर विचार के लिए बने। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की तथा कुछ अन्य जातियों को इसमें शामिल करने का सुझाव दिया। इसे लेकर समय-समय पर कई आंदोलन हुए हैं। 

असल में आरक्षण का विषय रोजगार से जुड़ा है। आरक्षण के चलते सरकारी नौकरी मिलने से लोगों के रहन-सहन में कुछ सालों में ही भारी अंतर दिखता है। मकान, गाड़ी, खेत, बच्चों की शिक्षा और शादी-विवाह आदि से उसकी ऊंची हैसियत प्रकट होती है। अतः कई जातियों की मांग है कि उन्हें भी इस श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ दिया जाए।

पिछले काफी समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग भी जोर पकड़ रही थी। सवर्ण जातियों में भी गरीबी तो है; पर इससे उनकी सामाजिक स्थिति पर अंतर प्रायः नहीं आता। जैसे गरीब होने पर भी डा. अम्बेडकर के चपरासी की सामाजिक स्थिति ऊंची थी; पर अब सरकारी नौकरियां घटी हैं। शहरीकरण के कारण खेती की जमीन भी कम हुई है। फिर शिक्षित युवा खेती करना भी नहीं चाहते।   

व्यापार की बात कहना तो आसान है; पर जिन परिवारों में इसकी परम्परा नहीं है, उन्हें यह कठिन लगता है। इसमें पूंजी और परिश्रम के साथ सूझबूझ भी चाहिए। शुरुआत में कुछ खतरा भी रहता है। ऐसे में बिना पूंजी और खतरे वाली सरकारी नौकरी ही बचती है; और नौकरियां हैं नहीं। क्योंकि हर जगह कम्प्यूटर और मशीन आ गयी है। पहले बहुत कम लड़कियां नौकरी करती थीं; पर शिक्षा के विस्तार और महंगी जीवन शैली के चलते वे भी नौकरी में आ रही हैं।

इसलिए आर्थिक आरक्षण की बात तो ठीक है; पर इसका दूसरा पहलू घटती नौकरियां भी है  सरकारी नौकरी में स्थायित्व के साथ अधिक वेतन, कम काम और भरपूर छुट्टियां होती हैं। जिन नौकरियों में ऊपरी पैसा खूब है, उसके लिए लोग जमीनें तक बेच देते हैं। अफसर की गुलामी और स्थानांतरण की परेशानी के बावजूद लोगों की प्राथमिकता सरकारी नौकरी ही है। इसीलिए सौ स्थानों के लिए एक लाख लोग आवेदन करते हैं। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है ?

इसलिए आर्थिक आरक्षण देने से भी समस्या हल नहीं होगी, चूंकि मुख्य चीज रोजगार है। युवाओं को यह समझना होगा कि रोजगार का अर्थ नौकरी नहीं है। अपना काम चाहे छोटा ही हो; पर वही कल बड़ा हो जाता है। यद्यपि आर्थिक आरक्षण अच्छा और जातीय आरक्षण से आगे का कदम है। यह पुराने आरक्षण को छेड़े बिना हुआ है, इसलिए स्वागत योग्य भी है; पर समस्या का पूरा समाधान तो निजी काम ही है। उससे पूरे परिवार को रोजगार मिलता है और वर्तमान ही नहीं, अगली पीढ़ी भी आर्थिक रूप से सुरक्षित रहती है। अतः युवाओं को इस दिशा में सोचना चाहिए।