सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

कांग्रेस की मानसिक बंधुआगीरी

सारे देश में इस समय भारी राजनीतिक हलचल है। लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सेनाएं तैयार हो रही हैं। गठबंधन से लेकर गठजोड़ तक हो रहे हैं। नये रिश्ते बन रहे हैं, तो पुराने ध्वस्त भी हो रहे हैं। परदे के आगे राजनीति तो परदे के पीछे कूटनीतिक दांवपेंच चले जा रहे हैं। मुंह में कुछ है तो दिल में कुछ। सब लोग अपने-अपने चश्मे के अनुसार इसके अर्थ लगा रहे हैं।

कई राजनीतिक विश्लेषक पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों के आधार पर लोकसभा के समीकरण हल कर रहे हैं। यह कितना ठीक होगा, यह तो चुनाव के बाद ही पता लगेगा; पर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में भारी अंतर होता है। विधानसभा चुनाव में लोग मुख्यमंत्री चुनते हैं, जबकि लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री। यह सच है कि राजस्थान, म.प्र. और छत्तीसगढ़ के परिणामों से कांग्रेस का उत्साह बढ़ा है। प्रियंका के आने से भी उ.प्र. की मुरदा कांग्रेस में कुछ जान पड़ी है; पर केवल इसी से कांग्रेस दिल्ली को जीत लेगी, यह खामख्याली ही है। 

जहां तक प्रियंका की बात है, उसका आना कोई नयी बात नहीं है। पिछले कई चुनावों से वह अपनी मां और भाई की लोकसभा सीटों पर काम करती रही हैं। ये दोनों सीटें कांग्रेस की तो नहीं, पर इस परिवार की गढ़ जरूर हैं। लोगों का अनुमान है कि सोनिया मैडम के खराब स्वास्थ्य के कारण रायबरेली से प्रियंका चुनाव लड़ेंगी। स.पा. और ब.स.पा. ने इस परिवार के लिए दो सीट छोड़ने की घोषणा की है; पर कांग्रेस ने इस जूठन को ठुकराकर उ.प्र. में सभी 80 सीट लड़ने की घोषणा की है। ऐसे में स.पा. और ब.स.पा. का रुख क्या होगा, कहना कठिन है। यदि उन्होंने वहां गंभीर प्रत्याशी उतार दिये, तो भाई-बहिन दोनों को लोकसभा में जाना मुश्किल पड़ सकता है। भा.ज.पा. तो पूरी ताकत से वहां लड़ेगी ही। अतः उ.प्र. का चुनावी समर बहुत रोचक होने वाला है।

प्रियंका को क्यों लाया गया, इस पर लोगों के तरह-तरह के मत हैं। पहला यह कि राहुल का जादू चल नहीं पा रहा, इसलिए परिवार में से कोई नया चेहरा जरूरी था; और वह प्रियंका ही है। दूसरा यह कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। उ.प्र. को बहिन के हवाले कर राहुल पूरे देश में घूम सकेंगे। तीसरा यह कि राहुल और सोनिया दोनों नेशनल हेरल्ड मामले में जमानत पर हैं। यदि चुनाव से पहले न्यायालय से विपरीत निर्णय आ गया और दोनों अंदर हो गये, तो कांग्रेस को जिंदा रहने के लिए इस परिवार से कोई एक व्यक्ति तो चाहिए ही। चैथा यह कि इस चुनाव में राहुल के फेल होने पर प्रियंका को अगले प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया जाए। 

कुछ अत्यधिक आशावादी यह भी कह रहे हैं कि राहुल जी का प्रधानमंत्री बनना तय है। ऐसे में पार्टी को प्रियंका दीदी संभालेंगी। कुछ का मत है कि वस्तुतः प्रियंका को उ.प्र. के भावी मुख्यमंत्री के लिए तैयार किया जा रहा है। राहुल ने यह कहकर इसके संकेत भी दिये हैं कि प्रियंका को यह जिम्मेदारी सिर्फ दो महीने के लिए नहीं दी गयी है। अर्थात लोकसभा चुनाव के बाद भी वे उ.प्र. को देखती रहेंगी। वैसे राबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार का शिकंजा कस रहा है, यह पूरे परिवार को पता था। उनसे पूछताछ को राजनीतिक बदले की कार्यवाही कहा जाए, इसलिए भी प्रियंका को जल्दीबाजी में लाया गया है। यहां तक कि घोषणा के समय वे विदेश में थीं और कई दिन बाद लौटीं। इससे राहुल और सोनिया की हड़बड़ी समझ में आती है।

कुछ कारण और भी हैं। उ.प्र. में दूसरों की बैसाखियों पर चलने के कारण पार्टी मरणासन्न है। उसके लोग दूसरी पार्टियों में जा रहे थे। प्रियंका के आने और सभी सीट लड़ने की घोषणा से पलायन रुका है और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है। इससे पार्टी के सब नेता खुश हैं। जिन्हें टिकट मिलेगा, उनका कद बढ़ेगा। जीतना तो उन्हें है नहीं; पर केन्द्र और चन्दे से जो पैसे मिलेंगे, उसमें से अधिकांश वे बचा लेंगे। कुछ माल छोटे कार्यकर्ताओं के हाथ भी लगेगा। सभी सीट लड़ने से कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी बढ़ेगा। इससे वह भविष्य में स.पा. या ब.स.पा. से ठीक से मोलभाव कर सकेगी।

जहां तक सीट बढ़ने की बात है, तो यह दिल बहलाने को अच्छा ख्याल मात्र है। माना कांग्रेस के हर लोकसभा सीट पर पचास हजार निश्चित वोट हैं। प्रियंका के कारण यदि हर सीट पर दस हजार वोट भी बढ़े, तो यह संख्या साठ हजार होती है; पर लोकसभा की सीट चार-पांच लाख वोट मिलने पर निकलती है। मेंढक कितना भी फूल जाए; पर वह बैल जितना नहीं हो सकता। कांग्रेस के आने से लड़ाई अब तिकोनी हो गयी है। इससे निःसंदेह भा.ज.पा. को लाभ होगा। स.पा. के प्रमुख मुसलमान नेता आजम खां ने मुस्लिम वोटों के बंटने की आशंका व्यक्त की ही है। अतः स.पा. और ब.स.पा. परेशान हैं। 

यह भी संभावना है कि भा.ज.पा. को धोखे में रखने के लिए अंदरखाने कुछ और ही खिचड़ी पक रही हो। अर्थात चुनाव की घोषणा के बाद स.पा. और ब.स.पा. से कांग्रेस मिलकर नया गठबंधन बना ले। वैसे स.पा. और ब.स.पा. अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहेंगे; पर चुनाव असंभव को संभव करने का खेल है। अतः चुनाव पूरा हो जाने तक कुछ भी हो सकता है। कुछ लोग मोदी की लोकप्रियता घटने की बात कहकर उ.प्र. में उसे भारी नुकसान होता दिखा रहे हैं; पर वे भूलते हैं कि सवर्ण आरक्षण और केन्द्रीय बजट के बाद वातावरण बहुत बदला है। राम मंदिर पर सरकार की उदासी से हिन्दुओं और साधु-संतों की नाराजगी प्रयागराज में कुंभ के सफल आयोजन से कुछ दूर जरूर हुई है। इसका प्रमाण वहां उमड़ी भीड़ है। अतः उ.प्र. में पिछली बार जैसी बंपर जीत भले ही न हो; पर बहुत अधिक नुकसान की संभावना नहीं है।

लेकिन प्रियंका के आने से यह जरूर सिद्ध हो गया है कि सौ साल बूढ़ी कांग्रेस आज भी सामंती मानसिकता में जी रही है। कांग्रेसजन एक परिवार के दायरे से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। वे फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत ‘‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’’ को गाकर ही खुश हैं। ऐसे पार्टीजनों को मानसिक बंधुआगीरी मुबारक।