बुधवार, 19 जून 2019

कांग्रेस को चाहिए एक असली गांधी

भारतीय राजनीति में कांग्रेस लम्बे समय तक शीर्ष पर रही; पर अब उसके अवसान के दिन हैं। कांग्रेस वालों को ये कहना ठीक ही है कि वे इतनी बुरी हार पर चिंतन-मंथन कर भावी सफलता की योजना बनाएंगे; पर बीमारी का मूल कारण समझे बिना उसका स्थायी इलाज संभव नहीं है। अर्थात इस पराजय की जड़ तक पहुंचे बिना वे इसका निदान नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें थोड़ा पीछे जाकर अपनी सफलता की पृष्ठभूमि समझनी होगी।

1947 के बाद कांग्रेस की चुनावी सफलता के दो बड़े कारण थे। इसमें से पहला था गांधीजी का नेतृत्व। यद्यपि 1948 में उनकी हत्या के चार साल बाद, 1952 में पहले आम चुनाव हुए; पर उनका नाम और नैतिक आभामंडल कांग्रेस की सदा सहायता करता रहा। 

असल में अफ्रीका से लौटने से पहले ही गांधीजी यहां चर्चित हो चुके थे। सत्याग्रह की शक्ति से उन्होंने वहां अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया था। भारत आकर कांग्रेस नेता और अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर वे पूरे देश में घूमे। इस दौरान उन्होंने गरीबी का नंगा नाच देखा। अतः उन्होंने जीवन भर आधे वस्त्र पहनने का निर्णय लिया। इससे उनके आभामंडल में त्याग की एक सुनहरी किरण और जुड़ गयी। 

गांधीजी जब भारत आये, तो कांग्रेस में नेतृत्व के नाम पर खालीपन था। लाल, बाल, पाल और गोखले राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो रहे थे। नेतृत्व की इस शून्यता को गांधीजी ने भरा। धीरे-धीरे गांधीजी और कांग्रेस एक दूसरे के पर्याय हो गये। यद्यपि वे कभी पार्टी के चवन्निया सदस्य भी नहीं बने; पर उनकी इच्छा और अनुमति के बिना वहां कुछ होता नहीं था। यहां त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख जरूरी है, जहां उनकी इच्छा के विरुद्ध सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बन तो गये; पर अंततः उन्हें त्यागपत्र देना ही पड़ा। आजादी से पूर्व सभी राज्यों की कांग्रेस समितियां सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थीं। चूंकि अध्यक्ष को ही भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनना था; पर गांधीजी ने वीटो लगा दिया। इस प्रकार उन्होंने पहले सुभाष चंद्र बोस को और फिर सरदार पटेल को हटाकर जवाहर लाल नेहरू के लिए रास्ता साफ कर दिया। अर्थात कांग्रेस में कुछ नहीं होते हुए भी सर्वेसर्वा गांधीजी ही थे।

गांधीजी के नैतिक आभामंडल का एक कारण यह भी था कि वे राजनीतिक दलदल में होते हुए भी कमल की तरह उसमें लिप्त नहीं हुए। उन्होंने पार्टी या शासन में कोई पद नहीं लिया और अपने किसी परिजन को भी राजनीति में नहीं आने दिया। आजादी मिलने पर जहां नेहरू और उनके साथी जश्न में डूबे थे, वहां गांधीजी बंगाल में हो रहे मजहबी दंगों के पीडि़तों के बीच घूम रहे थे। नेहरू के लिए सत्ता ही सब कुछ थी, जबकि गांधीजी के लिए देश। इसलिए गांधीजी के नाम और काम का लाभ कांग्रेस को हमेशा मिलता रहा।

कांग्रेस की सफलता का दूसरा कारण विपक्ष के पास नेतृत्व का अभाव था। आजादी से पहले विभिन्न विचारधारा वाले सब लोग कांग्रेस के बैनर पर काम करते थे। इसीलिए 1947 में गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने को कहा था; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी पकाई खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी की हत्या से वे शासन और पार्टी दोनों के मालिक हो गये। उनकी निरंकुशता से नाराज होकर जो लोग पार्टी से निकले, उन पर भी कांग्रेस का लेबल ही लगा रहा। इसलिए वे नेहरू से बड़ी लकीर नहीं खींच सके। आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. राममनोहर लोहिया, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई आदि ऐसे ही उदाहरण हैं। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी तक यही कहानी चलती रही।

पर इसके बाद परिदृश्य बदला। देश में वह पीढ़ी आ गयी, जिसने गांधीजी को देखा नहीं था। अतः कांग्रेस का प्रभाव घटने लगा। यद्यपि राजीव गांधी को अभूतपूर्व जीत मिली; पर वह इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण थी। उधर वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर आदि का तत्कालीन नेतृत्व भी मूलतः कांग्रेसी ही था। इसलिए एक ओर असली कांग्रेसी, तो दूसरी ओर कांग्रेस से निकले कांग्रेसी। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों ने असली कांग्रेसियों को ही समर्थन देना जारी रखा।

पर आज का राजनीतिक माहौल दूसरा है। भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा नेतृत्व है, जो कभी कांग्रेस में नहीं रहा। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा तक सब ऐसे ही नेता हैं। हर राज्य में ऐसे कई युवा नेता हैं, जिनका सामाजिक प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हुआ है। नये लोग भी लगातार तैयार हो रहे हैं। कांग्रेस में अपने परिवार को, जबकि संघ में देश को सर्वोपरि मानने की शिक्षा दी जाती है। संघ अपनी सैकड़ों समविचारी संस्थाओं, हजारों शाखाओं और लाखों सेवा कार्यों से देश के हर नागरिक तक पहुंच रहा है। कांग्रेस के पास इसका कोई तोड़ नहीं है। इसलिए वह देश के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो रही है।

इसी प्रकार कांग्रेस के पीछे गांधीजी जिस नैतिक बल के प्रतिनिधि थे, वह भूमिका भी अब संघ निभा रहा है। संघ के कार्यकर्ता वोट तो देते हैं। चुनाव के समय कुछ दिन जनसंपर्क भी करते हैं; पर फिर वे अपने दैनिक शाखा और सेवा के काम में लग जाते हैं। देश में पिछले दिनों लोकसभा के चुनाव हुए और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार बनी; पर संघ वाले इस कोलाहल से दूर हैं। अपै्रल से जून तक देश भर में लगभग 150 स्थानों पर संघ शिक्षा वर्ग लगे हैं। तीन से चार सप्ताह वाले इन वर्गों में लगभग 50,000 कार्यकर्ताओं ने प्रशिक्षण पाया है। जैसे आजादी के बाद के जश्न से दूर रहकर गांधीजी बंगाल में घूम रहे थे, ऐसे ही भा.ज.पा. की चुनावी सफलता से अलिप्त रहकर संघ के कार्यकर्ता घोर गरमी में प्रशिक्षण पा रहे हैं। 

1947 में कांग्रेस के पास नेहरू जैसा नेतृत्व और गांधीजी की नैतिक शक्ति थी, जबकि विपक्ष नेतृत्वहीन था। आज इसका उल्टा है। भा.ज.पा. के पास मोदी जैसा नेतृत्व और नैतिक शक्ति से लैस रा.स्व. संघ है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व दिग्भ्रमित है। तभी तो भारी पराजय के बावजूद कांग्रेस में नेता बदलने का साहस नहीं है, जबकि भा.ज.पा. ने भारी जीत के बावजूद नया अध्यक्ष चुन लिया।

ऐसे में यदि कांग्रेस वाले अपनी पार्टी को जिन्दा करना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक पदलिप्सा से दूर रहने वाले एक नये और असली गांधीजी ढूंढने होंगे; पर क्या यह संभव है ? शायद नहीं। क्योंकि कांग्रेस में तो लोग आते ही खाने और कमाने के लिए हैं। इसलिए कांग्रेस लगातार पीछे खिसक रही है। शायद यही उसकी नियति भी है।