शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

पर्यावरण पर समग्रता से सोचें

सर्वोच्च न्यायालय ने दीवाली पर पटाखों के सीमित उपयोग का सुंदर निर्णय दिया है। करोड़ों लोग इनके शोर और धुएं से परेशान होते हैं; पर इसके दूसरे पक्ष की ओर भी न्यायालय, शासन और आम नागरिकों को ध्यान देना होगा। क्योंकि केवल सरकारी नियम या न्यायालय के आदेशों से देश नहीं चलता।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केरल के सबरीमला मंदिर में सब आयु की महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए; पर स्थानीय महिलाएं इस निर्णय के विरोध में रास्ता रोक कर खड़ी हो गयीं। अतः 10 से 50 वर्ष आयु वाली महिलाएं वहां नहीं जा सकीं और न्यायालय का निर्णय धरा रह गया। हिन्दू वोटों की नाराजगी के डर से सत्ताधारी वामपंथी पार्टी भी चुप रही। 

ऐसे ही बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या, कन्या शिक्षा, मृत्यु भोज, शोर.. आदि पर भी समय-समय पर न्यायालय ने कठोर निर्णय दिये हैं; पर इनका पूरी तरह पालन नहीं होता। चूंकि जनता इसके लिए मन से तैयार नहीं है। इसलिए न्यायालय और शासन के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को भी इधर ध्यान देना होगा। बड़े लोग यदि ऐसे आयोजनों में न जाएं, तो इन पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा; पर ऐसा होता नहीं है।

मैं पिछले दिनों एक आयोजन में गया। वहां सड़क पर ही विशाल कीले गाड़कर पंडाल लगा था। पक्ष और विपक्ष के कई बड़े नेता वहां आये थे। समारोह के बाद पंडाल वाले ने जब निर्ममता से वे कीले उखाड़े, तो सड़क कई जगह से छिल गयी। कुछ दिन बाद हुई वर्षा में वह पूरी तरह उखड़ गयी। तब वही आयोजक सड़क खराब होने की दुहाई देने लगे। ऐसे उदाहरण हर जगह मिलेंगे। अर्थात जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। 

जहां तक पटाखों की बात है, तो इन्हें प्रायः बच्चे ही बजाते हैं, बड़े लोग नहीं। कभी हम भी दीवाली पर बाबा जी के साथ जाकर पटाखे खरीदते थे। बड़े पटाखों की जिद भी करते थे। यही काम आज के बच्चे भी करेंगे। न्यायालय ने जिन ग्रीन पटाखों की बात कही है, क्या वे उपलब्ध हैं ? यदि नहीं, तो इस आदेश का पालन कैसे होगा ? शासन ने अपना बोझ पुलिस पर डाल दिया है। क्या वे गलियों में जाकर बच्चों को पकड़ेगे; और क्या पुलिस वालों के बच्चे पटाखे नहीं छुड़ाएंगे ?

इसलिए हर चीज को समग्रता में सोचना पड़ेगा। न्यायालय और शासन को चाहिए कि वह दीवाली के तुरंत बाद ऐसी व्यवस्था करे, जिससे भविष्य में केवल छोटे और ग्रीन पटाखे ही बनें। जब बड़े पटाखे बनेंगे ही नहीं, तो फिर वे बिकेंगे कैसे ? अर्थात बीमारी की जड़ पर प्रहार करें। फिर शोर क्या केवल दीवाली पर ही होता है। साल भर मंदिर, मस्जिद आदि में लगे भोंपू क्या शोर नहीं करते ? रात के दो बजे तक होने वाली रामलीलाओं और पूरी रात के जागरणों पर प्रशासन चुप क्यों रहता है ? क्योंकि इनसे स्थानीय नेता जुड़े रहते हैं, जिनके समर्थन के बिना पार्षद, विधायक और सांसद चुनाव नहीं जीत सकते। फिर इन पर लगाम कैसे लगेगी ?

अब शादियों का सीजन आ गया है। बारात निकलेंगी और सड़कें जाम होंगी। देर रात तक डी.जे. बजेंगे। शराब पीकर लोग नाचेंगे। क्या इनमें शोर नहीं होता ? उत्तर भारत के अलावा प्रायः शादियां दिन में ही होती हैं। कई जगह तो हस्तमिलन, शुभदृष्टि, माल्यार्पण और फेरों का समय निश्चित रहता है। जब वे विवाह सफल होते हैं, तो बाकी को क्या परेशानी है; क्या पर्यावरण का इससे कोई संबंध नहीं है ?

इन दिनों कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। प्रत्याशियों की गाड़ियां दिन भर भोंपू लगाकर प्रचार करेंगी। हर मोहल्ले में चुनाव कार्यालय बनेंगे। वहां से भी प्रचार होगा। क्या इससे स्कूली बच्चे और मरीज परेशान नहीं होंगे ? कई बार तो एक ही चौराहे पर कई प्रचार कार्यालय बन जाते हैं। उनके शोर से आसपास वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। इस पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता ?

प्लास्टिक की थैलियों का चलन बंद होना ही चाहिए; पर इसके लिए बाजार में छापेमारी की बजाय शासन फैक्ट्रियां बंद कराए। अधिक प्रदूषण वाली गाड़ियों को सरकार क्रमशः बंद कर रही है; पर जो लोग चार कदम भी पैदल नहीं जा सकते, उनकी मानसिकता कैसे बदलेगी ? नदी जोड़ और बांध विरोधी ये नहीं बताते कि इसके बिना खेतों और बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी कैसे मिलेगा ? गांव की अपेक्षा शहरों में नहाने-धोने में पानी अधिक लगता है। क्या जनसंख्या और शहरीकरण रोकने का कोई उपाय है ? देश में हर दिन एक लाख नये वाहन बिक रहे हैं। यदि सड़कें चौड़ी नहीं होंगी, तो वे चलेंगे कहां; और बिना पेड़ काटे सड़क चौड़ी कैसे होगी ?

दिल्ली और निकटवर्ती लोग पंजाब और हरियाणा में पराली जलने से होने वाली धुंध से परेशान होने लगे हैं। खेती के अति मशीनीकरण का ये दुष्परिणाम होना ही है। दिल्ली में सम-विषम का प्रयोग भी चल नहीं सका। अर्थात यदि हम पर्यावरण पर समग्रता से नहीं सोचेंगे, तो फौरी उपाय बेकार हैं। इसके लिए शासन, प्रशासन और न्यायालय के साथ समाज को भी जागना पड़ेगा। देश में हजारों लोग प्रचार और प्रसिद्धि की इच्छा के बिना चुपचाप ये काम कर रहे हैं। उनका सम्मान तथा पर्यावरण नष्ट करने वालों का सामाजिक बहिष्कार हो, तब ही बात कुछ बन सकेगी।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

यह कुंभ प्रयागराज में..

प्रख्यात अंग्रेजी साहित्यकार विलियम शैक्सपियर ने कहा है कि ‘‘नाम में क्या रखा है ?’’ पर सच ये है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। इसीलिए 16 अक्तूबर, 2018 को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही भारतीय जनता पार्टी की उ.प्र. सरकार ने विश्व प्रसिद्ध संगम नगरी के उस पुराने नाम ‘प्रयागराज’ को बहाल कर दिया, जो युगों-युगों से प्रचलित था। मुगल शासक अकबर ने 1583 में इसे बदलकर इलाहाबाद किया था। 

1947 में देश के आजाद होने के बाद से ही सभी देशभक्त नागरिक प्रयागराज नाम के पुनर्जीवन की मांग कर रहे थे। लोगों को लगता था कि नेहरू परिवार का संबंध इस नगर से बहुत खास है। अतः नेहरू जी मान जाएंगे; पर वे ठहरे परम सेक्यूलर। वे खुद को नाम से हिन्दू, संस्कारों से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। इसलिए उन्होंने इसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दिया। 

इसके बाद जब-जब उ.प्र. में हिन्दुत्वप्रेमी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी, तब-तब इस मांग ने जोर पकड़ा। प्रयाग के हर कुंभ से पहले इसकी चर्चा होती थी; पर कभी प्रदेश में गठबंधन की मिली-जुली सरकार होती थी, तो कभी केन्द्र में। इसलिए निर्णय नहीं हो सका; पर अब लखनऊ और दिल्ली, दोनों जगह भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार है और 2019 में वहां विशाल कुंभ भी होने जा रहा है। अतः योगी सरकार ने निर्णय ले लिया।

पर इस निर्णय से कुछ सेक्यूलरों के पेट में दर्द होने लगा है। उन्होंने अपनी आदत के अनुसार इसका विरोध भी शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वे चुप रहे, तो न जाने प्रदेश और देश में कितने नाम बदल दिये जाएं ? कुछ लोग हिन्दू वोटों के भय से खुलकर तो विरोध नहीं कर रहे हैं; पर वे कह रहे हैं कि इस बारे में कोई सर्वसम्मत नीति बननी चाहिए। अन्यथा बड़ी अराजकता फैल जाएगी। 

असल में नाम परिवर्तन के पीछे राजनीति के साथ ही सामाजिक कारण भी हैं। जब भारत में विदेशी व विधर्मी हमलावर आये, तो उन्होंने कई स्थानों के नाम बदल दिये। इसका पहला उद्देश्य तो हिन्दुओं को अपमानित करना था। प्रयाग और अयोध्या को इलाहबाद और फैजाबाद करना इसी मानसिकता का परिचायक है। कोशिश तो उन्होंने हरिद्वार, मथुरा, काशी और दिल्ली को बदलने की भी की; पर उनकी वह चाल विफल हो गयी। 

नाम बदलने का दूसरा उद्देश्य खुद को या अपने किसी पूर्वज को महिमामंडित करना था। इसके लिए भी उन्होंने हजारों गांवों के नाम बदल दिये। जिस गांव या शहर के साथ ‘बाद’ लगा मिले, उसकी यही कहानी है। अकबराबाद, औरंगाबाद, हैदराबाद, सिकंदराबाद, गाजियाबाद, तुगलकाबाद, रोशनाबाद, अहमदाबाद..जैसे हजारों नाम हैं। बाद शब्द आबाद का छोटा रूप है। जैसे फैजाबाद अर्थात फैज द्वारा आबाद; पर सच ये है कि ये स्थान उन्होंने आबाद नहीं बरबाद किये हैं। इसलिए ‘फैजाबाद’ को ‘फैज बरबाद’ कहना अधिक समीचीन है। 

वामपंथियों ने आजादी के बाद कांग्रेस शासन की सहायता से छद्म बुद्धिजीवियों की एक बड़ी फौज खड़ी की है। वे कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने सैकड़ों साल तक देश में राज किया है। अतः उन्होंने नये गांव और नगर बसाये ही होंगे। उनके नाम पर प्रचलित महल, मकबरे और मस्जिदों के लिए भी यही तर्क दिया जाता है; पर वे यह नहीं बताते कि यदि अधिकांश ऐतिहासिक स्मारक मुस्लिम शासकों ने बनाये हैं, तो उनसे पहले के हिन्दू शासक क्या जंगल में रहते थे ? यदि नहीं, तो उनके महल और मंदिर कहां हैं ?

सच ये है कि ये इस्लामी हमलावर जीवन भर हिन्दू राजाओं से या फिर आपस में ही लड़ते-मरते रहे। उन्हें नया निर्माण कराने की फुरसत ही नहीं थी ? उनके साथ लड़ाकू लोग आये थे, वास्तुकार और कारीगर नहीं। अतः उन्होंने तलवार के बल पर पुराने नगर और गांवों के नाम ही बदल दिये। महल और मंदिरों में थोड़ा फेरबदल कर, उन पर आयतें आदि खुदवा कर उन्हें इस्लामी भवन घोषित कर दिया। अयोध्या से लेकर मथुरा, काशी, आगरा और दिल्ली तक की यही कहानी है। प्रसिद्ध इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तकों में इस बारे में विस्तार से लिखा है।

इस्लामी शासन के बाद जब अंग्रेज आये, तो कई शब्द वे ठीक से बोल नहीं पाते थे। अतः शासक होने के कारण उनके उच्चारण के अनुरूप मैड्रास, कैलकटा, बंबई, डेली.. आदि नाम चल पड़े। उनके जाने के बाद कई नाम ठीक किये गये हैं। अब इन्हें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली कहते हैं। कानपुर (Cawnpore), लखनऊ (Lucknow), बनारस (Benares) आदि कई नामों की वर्तनी (स्पैलिंग) भी अंग्रेजों ने बिगाड़ दी। 

कांग्रेस राज में नामों की यह धारा एक परिवार की बपौती बन गयी। अतः हर ओर गांधी, नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया नगरों की बहार आ गयी। अब तो कांग्रेस का सितारा ही डूब रहा है; अन्यथा राहुल, प्रियंका, राबर्ट और उनके बच्चों की भी लाटरी लग जाती।

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बदले गये नामों को ठीक करने में ही शासन ने रुचि क्यों दिखायी ? इसके पीछे का राजनीतिक कारण बिल्कुल साफ है। भारत में ईसाई वोटों की संख्या बहुत कम है। पूर्वोत्तर भारत के अलावा वह कहीं सघन रूप से रहते भी नहीं है। अतः उनकी नाराजगी का सत्ता के फेरबदल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; पर मुस्लिम वोटों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए सच जानते हुए भी राजनीतिक दल मुस्लिम शासकों द्वारा बदले गये नामों को नहीं छेड़ते। अब भा.ज.पा. सरकार ने ये काम शुरू किया है, तो इसके आगे बढ़ने की पूरी संभावना है।

उ.प्र. में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने ऊधमसिंह नगर, ज्योतिबाफुले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि कई नये जिले बनाये; पर लोग इन्हें यू.एस. नगर, जे.पी. नगर और जी.बी. नगर ही कहते हैं। हाथरस बनाम महामाया नगर और लखनऊ के किंग जार्ज बनाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिज के बीच तो कई बार कुश्ती हुई। अब भा.ज.पा. सरकार ने उ.प्र. में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह निर्णय ठीक है। क्योंकि 11 फरवरी, 1968 को भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी का शव वहां पर ही मिला था। फिर अब न मुगल हैं और न सराय; पर खतरा ये भी है कि यह नाम समय के प्रवाह में कहीं डी.डी.जंक्शन न हो जाए।

कई नामों के पीछे इतिहास और भाषायी गौरव भी जुड़ा होता है। अतः वे स्थायी रूप से लोगों के मुंह पर चढ़ जाते हैं; पर जुबान का भी एक स्वभाव है। वह कठिन की बजाय सरल शब्द अपनाती है। इसलिए भोजपाल, जाबालिपुरम् और गुरुग्राम क्रमशः भोपाल, जबलपुर और गुड़गांव हो गये। मंगलौर (मंगलुरू), बंगलौर (बंगलुरू), मैसूर (मैसुरू), बेलगांव (बेलगावि), त्रिवेन्द्रम (तिरुवनंतपुरम्), तंजौर (तंजावूर), कालीकट (कोझीकोड), गोहाटी (गुवाहाटी), इंदौर (इंदूर), कोचीन (कोच्चि), पूना (पुणे), बड़ोदा (बड़ोदरा), पणजी (पंजिम), उड़ीसा (ओडिसा), पांडिचेरी (पुड्डुचेरी) आदि की भी यही कहानी है। अब शासन भले ही इन्हें बदल दे; पर लोग पुराने और सरल नाम ही सहजता से बोलते हैं। 

अतः नगरों के नाम बदलने की नीति तो होनी ही चाहिए; पर इसमें विदेशी हमलावरों द्वारा परिवर्तित नाम हटाकर ऐतिहासिक नाम फिर प्रचलित करने पर समझौता न हो। इससे लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास का पुनर्स्मरण भी होगा। प्राचीन साहित्य और लोककथाओं में ये नाम उपलब्ध हैं। अंतरजाल (इंटरनेट) भी इसमें सहायक हो सकता है; पर सहज बोलचाल के कारण प्रचलित हो गये नाम बदलने की जिद ठीक नहीं है। अर्थात यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

विजयादशमी का संदेश

हर बार की तरह इस बार भी विजयादशमी का पावन पर्व फिर से आ गया है। अब नौ दिन तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होगी। रात में दुर्गा जागरण होंगे और अष्टमी या नवमी वाले दिन लोग कन्याओं का पूजन करेंगे। सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत में जय काली कलकत्ते वाली का जोर रहेगा। उत्तर भारत में नौ दिन तक रामलीलाओं का गांव-गांव और शहर-शहर में मंचन होगा और फिर आश्विन शुक्ल दशमी को बुराई और आसुरी शक्ति के प्रतीक रावण का पुतला फूंक दिया जायेगा। लोग दैवी शक्ति के स्वरूप भगवान राम की जय-जयकार कर अपने घरों को लौट जाएंगे।

लेकिन क्या विजयादशमी का केवल इतना ही प्रतीकात्मक महत्व है। क्या विजयादशमी पर केवल कुछ कर्मकांड पूरे कर लेना ही पर्याप्त है। सच तो यह है किसी भी पर्व या उत्सव को प्रचलित हुए जब काफी लम्बा समय बीत जाता है, तो उसमें कुछ जड़ता और कमियां आ जाती हैं। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि इन कमियों को दूर करने के लिए समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का भी प्रादुर्भाव होता रहा है, जो समाज के सम्मुख अपना आदर्श प्रस्तुत कर इस जड़ता को तोड़ते हैं और समाज को सही दिशा दिखाते हैं। 

विजयादशमी के साथ अनेक ऐतिहासिक प्रसंग प्रचलित हैं। सबसे पुराना प्रसंग मां दुर्गा के साथ जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि जब सारे देवता शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज और महिषासुर जैसे राक्षसों से पराजित हो गये, तो उन्होंने मिलकर उनका सामना करने का विचार किया; पर आज की तरह वहां भी पुरुषोचित अहम् तथा नेतृत्व का विवाद खड़ा हो गया। ऐसे में सब देवताओं ने एक नारी के नेतृत्व में एकजुट होकर लड़ना स्वीकार किया। इतना ही नहीं, तो उन्होंने अपने-अपने शस्त्र अर्थात अपनी सेनाएं भी उनको समर्पित कर दीं। मां दुर्गा ने सेनाओं का पुनर्गठन किया और फिर उन राक्षसों का वध कर समाज को उनके आतंक से मुक्ति दिलायी थी। 

मां दुर्गा के दस हाथ और उनमें धारण किये गये अलग-अलग शस्त्रों का यही अर्थ है। स्पष्ट ही यह कथा हमें संदेश देती है कि यदि आसुरी शक्तियों से संघर्ष करना है, तो अपना अहम् समाप्त कर किसी एक के नेतृत्व में अनुशासनपूर्वक सामूहिक रूप से संघर्ष करना होगा, तभी सफलता मिल सकती है, अन्यथा नहीं।

दूसरी घटना भगवान राम से संबंधित है। लंका के अनाचारी शासक रावण ने जब उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया, तो उन्होंने समाज के निर्धन, पिछड़े और वंचित वर्ग को संगठित कर रावण पर हल्ला बोल दिया। वन, पर्वत और गिरी-कंदराओं में रहने वाले वनवासी रावण और उसके साथियों के अत्याचारों से आतंकित तो थे; पर उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे उसका मुकाबला कर पाते। श्रीराम ने उनमें ऐसा साहस जगाया। उन्हें अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण और उनका संचालन सिखाया। और फिर उनके बलबूते पर रावण जैसे शक्तिशाली  राजा को उसके घर में जाकर पराजित किया। आज की रामलीलाओं और चित्रों में भले ही वानर, रीछ, गृद्ध आदि का अतिरंजित वर्णन हो; पर वे सब हमारे जैसे सामान्य लोग ही थे।

यह दोनों प्रसंग बताते हैं कि जब सब लोग अपने अहम् एवं पूर्वग्रह छोड़कर संगठन की छत्रछाया में आते हैं, तो उससे आश्चर्यजनक परिणाम निकलते हैं। आधुनिक युग में इसी विचार को कार्यरूप देने के लिए 1925 की विजयादशमी पर नागपुर में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की थी। इसी प्रकार नारियों को संगठित करने हेतु श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने 1936 में इसी दिन वर्धा में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना की थी।

पर समय के साथ इस पर्व के मूल उद्देश्य पर कुछ धूल आ गयी, जिसे साफ करने की आवश्यकता है। हिन्दू समाज में जहां व्यक्तिगत रूप से पालन करने के लिए तरह-तरह के व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा आदि का प्रावधान है, वहीं अधिकांश पर्व सामूहिक रूप से मनाये जाने वाले हैं। हर पर्व के साथ कुछ न कुछ सामाजिक संदेश भी जुड़ा है। नवरात्र में किये जाने वाले उपवास के पीछे शुद्ध वैज्ञानिक कारण है। इससे गर्मी और सर्दी के इस संधिकाल में पेट की मशीनरी को कुछ विश्राम देने से अनेक आतंरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है; पर कुछ लोग व्रत के नाम पर बिना अन्न की महंगी और गरिष्ठ वस्तुएं खाकर पेट ही खराब कर लेते हैं। यह शारीरिक रूप से तो अनुचित है ही, भारत जैसे निर्धन देश में नैतिक दृष्टि से भी अपराध है।

इसी प्रकार नवरात्र में मां दुर्गा के जागरण के नाम पर इन दिनों जो होता है, वह बहुत ही घिनौना है। सारी रात बड़े-बड़े ध्वनिवर्द्धक लगाकर पूरे मौहल्ले या गांव की नींद खराब करने को धर्म कैसे कहा जा सकता है ? गंदे फिल्मी गानों की तर्ज पर बनाये गये भजनों से किसी के मन में भक्तिभाव नहीं जागता। जागरण मंडली में गाने-बजाने वालों का स्वयं का चरित्र कैसा होता है, नवरात्र के दौरान भी क्या वे दुर्व्यसनों से दूर रहते हैं, इसे कोई नहीं देखता। शादी-विवाह में संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले युवक और युवतियां ही इन दिनों भजन गायक बन जाते हैं। उनका उद्देश्य भक्तिभाव जगाना नहीं, पैसा कमाना होता है।

वस्तुतः दुर्गा पूजा और विजयादशमी शक्ति की सामूहिक आराधना के पर्व हैं। मां दुर्गा के हाथ में नौ प्रकार के शस्त्र हैं। नवरात्र का अर्थ है कि गांव या मौहल्ले के युवक मां दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सम्मुख किसी विशेषज्ञ के निर्देशानुसार शस्त्र-संचालन का अभ्यास करें। इस प्रकार नौ दिन तक नौ तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण प्राप्त कर विजयादशमी के दिन पूरे गांव और नगर के सामने उनका सामूहिक प्रदर्शन करें। महाराष्ट्र में शिवाजी के गुरु समर्थ स्वामी रामदास द्वारा स्थापित अखाड़ों में यही सब होता था। इनके बल पर ही शिवाजी ने औरंगजेब जैसे विदेशी और विधर्मी को धूल चटाई थी। 

उस समय खड्ग, शूल, गदा, त्रिशूल, चक्र, परिध, धनुष-बाण, कृपाण आदि प्रचलित थे, इसलिए मां दुर्गा के हाथ में वही परम्परागत शस्त्र दिखायी देते हैं; पर आजकल जो आधुनिक शस्त्रास्त्र व्यवहार में आ गये हैं, उनका भी अभ्यास करने की आवश्यकता है। शस्त्रों की पूजा करने का यही व्यावहारिक अर्थ है; पर दुर्भाग्य से जातिवाद की प्रबलता के कारण इसे क्षत्रियों का पर्व बताकर शेष समाज को इससे काटने का प्रयास हो रहा है। इसी प्रकार कुछ राजनेता और दल भगवान राम की विजय को उत्तर भारत की दक्षिण पर विजय बताकर इसे देश बांटने का उपकरण बनाना चाहते हैं।

नवरात्रों में अष्टमी या नवमी पर होने वाले कन्यापूजन का भी बड़ा भारी सामाजिक महत्व है। आजकल इसका स्वरूप भी व्यक्तिगत हो गया है। हर व्यक्ति अपने आसपास या रिश्तेदारों की कन्याओं को अपने घर बुलाकर उनके पूजन की औपचारिकता पूरी कर लेता है, जबकि यह भी समाजोत्सव है। गांव की सब कुमारी कन्याओं को किसी एक स्थान पर एकत्रकर गांव के प्रत्येक युवक एवं गृहस्थ को उसके पांव पूजने चाहिए। वर्ष में एक बार होने वाला यह कार्यक्रम जीवन भर के लिए मन पर अमिट संस्कार छोड़ता है। जिसने भी कन्याओं के पांव पूजे हैं, वह आजीवन किसी लड़की से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। यौन अपराधों को रोकने में केवल यही एक पर्व देश के सब कानूनों से भारी है। सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति माता का भाव जगाने वाले इस पर्व को सब एक साथ मनायें, यही अपेक्षित है।

इन दिनों दूरदर्शन के बढ़ते प्रभाव के कारण क्षेत्र या प्रान्त विशेष में होने वाले उत्सव पूरे भारत में होने लगे हैं। इनमें पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित दुर्गा पूजा, उड़ीसा की जगन्नाथ रथ यात्रा, महाराष्ट्र की गणेश पूजा, पंजाब के देवी जागरण, उत्तर भारत की रामलीला आदि उल्लेखनीय हैं। विजयादशमी पर दुर्गा पूजा एवं फिर उन प्रतिमाओं का विसर्जन निकटवर्ती जल में करते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज से सौ साल पूर्व भारत की जनसंख्या बीस करोड़ ही थी और नदी, ताल आदि में भरपूर पानी रहता था। आज जनसंख्या सवा अरब से ऊपर है। नदियों में जल का स्तर कम हो गया है और तालाबों की भूमि पर बहुमंजिले भवन खड़े हो गये हैं। ऐसे में जो जल शेष है, वह प्रदूषित न हो, इस पर विचार अवश्य करना चाहिए।

इसलिए प्रतिमा बनाते समय उसमें प्राकृतिक मिट्टी, रंग तथा सज्जा सामग्री का ही प्रयोग करें। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग आदि का प्रयोग उचित नहीं है। विसर्जन से पूर्व ऐसी अप्राकृतिक सामग्री को उतार लेने में कोई बुराई नहीं है। विसर्जन के कई दिन बाद तक घाट स्नान योग्य नहीं रहते। उस जल की निवासी मछलियां इस दौरान बड़ी संख्या में मर जाती हैं। अतः पूजा समितियों को इनकी सफाई की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

कुछ अतिवादी सोच के शिकार लोग मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने की मांग करते हैं। वे भूल जाते हैं कि मूर्ति-निर्माण और विसर्जन हिन्दू चिंतन का अंग है, जो यह दर्शाता है कि मूर्ति की तरह ही यह शरीर भी मिट्टी से बना है, जिसे एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है। विसर्जन के समय निकलने वाली शोभायात्रा से अन्य नागरिकों को परेशानी न हो, यह भी आयोजकों को ध्यान रखना चाहिए। इस दिशा में कानून कुछ खास नहीं कर सकता; अतः हिन्दू धर्माचार्यों को आगे आकर लोगों को सही दिशा दिखानी होगी। वैसे लोग स्वयं ही जाग्रत हो रहे हैं; पर इसकी गति और तेज होनी चाहिए।

यदि विजयादशमी से जुड़े इन प्रसंगों को सही अर्थ में समझकर हम व्यवहार करें, तो यह पर्व न केवल हमें व्यक्तिगत रूप से अपितु सामाजिक रूप से भी जागरूक करने में सक्षम है। रावण, कंुभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन करते समय अपनी निजी और सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और कालबाह्य हो चुकी रूढ़ियों को भी जलाना होगा। आज विदेशी और विधर्मी शक्तियां हिन्दुस्थान को हड़पने के लिए जैसे षड्यन्त्र कर रही हैं, उनका सामना करने का सही संदेश विजयादशमी का पर्व देता है। आवश्यकता केवल इसे ठीक से समझने की ही है।

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

क्या आप भी पचास के हो रहे हैं ?


पिछले दिनों हमारे पड़ोस में श्रीरामकथा का आयोजन था। कथावाचक घर-गृहस्थी वाले अच्छे विद्वान और संत पुरुष थे। प्रतिदिन एक घंटा वे अपने आवास पर लोगों से मिलते थे। उसमें लोग अपनी निजी जिज्ञासा, समस्या आदि की चर्चा करते थे। गुप्ता जी अब 55 साल के हो गये हैं। अवकाश प्राप्ति में कुछ ही वर्ष बचे हैं। उन्होंने इसके बाद की अपनी चिन्ताओं के बारे में कुछ जिज्ञासा रखी। इसका उत्तर संत जी ने जो दिया, उसका सार संक्षेप निम्न है। यह केवल गुप्ता जी ही नहीं, बाकी सबके लिए भी उपयोगी है।

जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती है, लोगों का आपकी ओर देखने का दृष्टिकोण बदलने लगता है। आपके सफेद होते जा रहे बाल, बढ़ते जा रहे पेट, चाल में आते धीमेपन और माथे पर बढ़ती जा रही लकीरों को देखकर लोग समझ जाते हैं कि आप भी 50 के आस-पास पहुंचने लगे हैं। इस आयु में सामान्यतः हर व्यक्ति अपनी बेटी की शादी, बेटे के काम-धंधे आदि के बारे में चिंतित होता है। यह ठीक भी है। क्योंकि इस दायित्व को ठीक से निबटाये बिना आप अगले सफर की ओर सफलतापूर्वक नहीं चल सकते।

50 का होते-होते व्यक्ति को और एक बात की ओर ध्यान देना चाहिए; और वह यह कि वह 60 साल का हो जाने के बाद क्या करेगा ? अर्थात अपने जीवन के तीसरेपन में, जब वह नौकरी से सेवानिवृत हो जाएगा; यदि वह व्यवसायी है, तो जब उसके लड़के-बच्चे काम संभाल लेंगे। यदि आप महिला हैं, तो जब आपकी पुत्रवधू घर पर आ जाएगी.. आदि। निःसंदेह अगले कदम का आधार पिछला कदम ही होता है। इसलिए यदि आप 50 पार कर रहे हैं, तो कुछ बातों की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।

अवकाशप्राप्ति के बाद का जीवन सुख-चैन से व्यतीत करने का सबसे अच्छा मार्ग है स्वयं को किसी सामाजिक, धार्मिक सेवाकार्य में व्यस्त रखना। इससे आपका घर, कारोबार, स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा सब ठीक बने रहेंगे; पर इसके लिए 50 वर्ष के होते ही कुछ तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण अपने मन की तैयारी है। विचार करें कि हमें अवकाशप्राप्ति के बाद किस संस्था से जुड़ना है। यदि ऐसी कोई संस्था आपके आसपास है, तो बहुत अच्छा; अन्यथा आप अपने समविचारी चार-छह मित्रों के साथ ऐसी संस्था बना सकते हैं। अच्छा तो यह रहेगा कि अपने परिचय की संस्थाओं में कुछ समय लगाना शुरू करें, वहां की रीति-नीति और कार्यशैली को समझें। इनमें से जो पति-पत्नी दोनों के मन, बुद्धि और स्वभाव के अनुकूल हो, उसका चयनकर अवकाशप्राप्ति के बाद उसमें ही पूरा समय लगायें।

यह जरूरी नहीं कि वह संस्था आपके घर के आसपास या नगर में ही हो। भारत में हजारों तीर्थ और धर्मस्थल हैं, जहां अनेक प्रकार की धार्मिक और सेवा संबंधी गतिविधियां चलती हैं। इनमें से भी किसी के साथ आप सम्बद्ध हो सकते हैं। 50 से 60 वर्ष के बीच का समय इसमें लगाएं। चयनित संस्था के बारे में पति-पत्नी दोनों की सहमति आवश्यक है। अपनी आवष्यकताएं सीमितकर स्वयं पर कम से कम खर्च करंें। पति-पत्नी दोनों मिलकर विचार करें और फिर निष्चयपूर्वक एक ही कमरे में, पर अलग-अलग सोने का नियम बनाएं।

यहां तक पहुंचते-पहुंचते शरीर कुछ शिथिल होने लगता है; पर आसन-व्यायाम और ध्यान आदि से शरीर को अधिकाधिक स्वस्थ बनाये रख सकते हैं। अब अपने आहार-विहार में भी कुछ परिवर्तन कर लेना चाहिए। अन्न का प्रयोग तीन के बदले दो बार तथा सब्जी, सलाद, फल, दूध आदि का प्रयोग अधिक करना ठीक रहेगा। मसालेदार भोजन, सिगरेट या शराब जैसी कोई आदत है, तो उसे अब छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। प्रातः या सायंकाल का तीन-चार कि.मी. का भ्रमण सदा ही ठीक रहता है; पर अब तो इसे दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना लें। किसी बीमारी की उपेक्षा न करें; पर शरीर में हो रहे आयुगत परिवर्तनों से परेशान भी न हों। स्वयं को अपने अगले कार्य और जीवन के लिए तैयार करना प्रारम्भ कर दें।

अवकाशप्राप्ति के बाद पति-पत्नी दोनों को सामान्य जीवनयापन में कठिनाई न हो, इसके लिए समुचित धन का प्रबन्ध भी अवश्य कर लेना चाहिए। निजी संस्थाओं के बदले सरकारी बैंक पर ही भरोसा करना ठीक है। केवल अपने खाने-पीने के लिए ही नहीं, तो बेटी के घर आने पर, किसी शादी-विवाह में जाने पर लेन-देन के जो दायित्व निभाकर हर दम्पति को प्रसन्नता होती है, उसकी भी व्यवस्था कर लें। यद्यपि भविष्य क्या होगा, कोई नहीं जानता, फिर भी किसी आकस्मिक संकट का विचार भी कर लेना चाहिए।

यदि आप अवकाशप्राप्ति के बाद भी अपने बच्चों के साथ ही रह रहे हैं, तो अपने लिए अपेक्षाकृत छोटे स्थान को चुन लें; जिससे बेटे, बहू और उनके बच्चों को कष्ट न हो। पुत्र और पुत्रवधू को अपनी तरह से घर चलाने दें, बार-बार टोककर घर का वातावरण अषांत न करें। घर-बाजार के अधिकांश कार्य उन्हें ही सौंप दें। भौतिक वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग उन्हें ही करने दें। उनकी इच्छा के आगे अपनी इच्छाएं त्याग दें, अपनी आवश्यकता भी उन्हीं को बताएं। निश्चय जानिए, वे प्रसन्नतापूर्वक उसे पूरा करेंगे।

अपनी चल-अचल सम्पत्ति के संबंध में किसी विश्वस्त वकील और एक-दो घनिष्ठ मित्रों से परामर्शकर उसकी लिखित वसीयत बना लें। यथासंभव बच्चों की भी उसमें सहमति लें; पर यदि कोई समस्या हो, तो भी वसीयत बनाएं अवश्य। इससे आप अनेक प्रकार के मानसिक तनाव से मुक्त रहेंगे तथा बाद में बच्चों में झगड़ा नहीं होगा।

ध्यान रहे, हर व्यक्ति को 50 ही नहीं, 60 का भी होना है। उसे आज नहीं तो कल अवकाश भी लेना ही है। यदि उसकी तैयारी ठीक से की, तो न केवल आपका, बल्कि आपके बच्चों का जीवन भी अच्छा बीतेगा। इसके साथ-साथ आपके अनुभव से देश, धर्म और समाज का भी कुछ भला अवश्य होगा। और जब परमपिता परमेश्वर का बुलावा आयेगा, तो आप संतोष के साथ वहां भी जा सकेंगे।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

फाकाकशी और मस्ती के वे दिन


यह बात अटल जी के राजनीति में आने से पहले की है। उन दिनों लखनऊ से मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य, दैनिक स्वदेश और सांयकालीन तरुण भारत भी निकलते थे। अब पांचजन्य दिल्ली से, स्वदेश मध्यप्रदेश से तथा तरुण भारत महाराष्ट्र में कई स्थानों से निकलता है। यद्यपि इन सबमें और लोग भी थे; पर मुख्य जिम्मेदारी अटल जी की ही थी। अतः वे दिन भर इसी में डूबे रहते थे।

कई बार वे दोपहर भोजन के लिए नहीं पहुंचते थे, तो प्रांत प्रचारक भाऊराव उन्हें बुलाने आ जाते थे। उनके आग्रह पर अटल जी कागजों से जूझते हुए कहते थे, ‘‘भोजन करने गया, तो अखबार नहीं निकलेगा।’’ भाऊराव एक-दो बार फिर आग्रह करते थे। लेकिन फिर वही उत्तर। अतः उस दिन अटल जी और भाऊराव दोनों ही भूखे रह जाते थे।

उन दिनों संघ की तथा इन पत्र-पत्रिकाओं की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। दरी पर रखे कुछ लोहे के ट्रंकों में सब सामग्री रहती थी। उन पर कागज रखकर ही सम्पादकी, प्रूफ रीडिंग आदि होती थी। प्रचारक होने के नाते अटल जी बिना किसी वेतन के काम करते थे। राष्ट्रधर्म के कोषाध्यक्ष से उन्होंने एक बार कहा, ‘‘पांच रुपये दीजिए। नयी चप्पल लेनी है।’’ स्वभाव से अति कठोर कोषाध्यक्ष जी उस दिन अच्छे मूड में थे। उन्होंने पैसे दे दिये।

अटल जी ने वचनेश जी के साथ बाजार में पहले दो भुट्टे खाये और फिर लस्सी पी। इसमें काफी पैसा खर्च हो गया। वचनेश जी ने पूछा, ‘‘अब चप्पल कैसे लोगे ?’’ अटल जी ने मस्ती में जवाब दिया, ‘‘अभी इतनी खराब नहीं हुई है। मोची से ठीक करा लेते हैं, तो कुछ दिन और चल जाएगी।’’ अर्थात फाकाकशी के दौर में भी मस्ती का अभाव नहीं था। इसी के बल पर संघ और बाकी सब काम खड़े हुए।

1989 में नारायण दत्त तिवारी उ.प्र. में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के एक वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी (भैया साहब) को उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने एक लाख रु. वाला अपना सर्वोच्च भारत-भारतीसम्मान देने की घोषणा की। 14 सितम्बर हिन्दी दिवसपर कार्यक्रम होना था; पर उससे एक दिन पूर्व 13 सितम्बर को मुख्यमंत्री ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित कर दिया। राज्य के हिन्दी प्रेमियों में आक्रोश की लहर दौड़ गयी। लखनऊ निवासी भैया साहब प्रखर हिन्दी सेवी थे। उन्होंने इसके लिए अंग्रेजों की नौकरी ठुकरा दी थी। वृद्धावस्था के कारण इन दिनों वे बिस्तर पर थे। उन्होंने इस निर्णय के विरोध में भारत भारती सम्मान ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैंने अपने जीवन में एक लाख रु. कभी एक साथ नहीं देखे; पर देश विभाजक उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाना मुझे स्वीकार नहीं है। पूरे राज्य में हड़कम्प मच गया।

भैया जी राष्ट्रधर्म और पांचजन्य के नियमित लेखक रहे थे। अतः अटल जी उनका बड़ा आदर करते थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि हम जनता की ओर से भैया साहब को सम्मानित करेंगे। उनके आह्नान पर एक लाख रु. से भी अधिक धन एकत्र हो गया। फिर अटल जी ने सार्वजनिक सभा में भैया जी के पुत्र को वह राशि भेंट की तथा घर जाकर भैया जी को जनता भारत भारतीसम्मान प्रदान किया।

यह घटना 10 मई, 2003 की है। दिल्ली में पांचजन्य की ओर से संसद के बालयोगी सभागार में नचिकेता सम्मान का कार्यक्रम था। राष्ट्रधर्म में सहायक संपादक के नाते मैं भी वहां उपस्थित था मंच पर प्रधानमंत्री अटल जी भी थे। कुछ दिन पूर्व ही कुछ पत्रकारों ने षड्यंत्रपूर्वक भा.ज.पा. के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को जाल में फंसाया था। अटल जी ने पहला वाक्य कहा, ‘‘मैं आजकल पुरस्कार बांट रहा हूं और तिरस्कार बटोर रहा हूं।’’ पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया। अटल जी का चेहरा बता रहा था कि उन्हें इस घटना से कितना दुख पहुंचा है।

रात में प्रधानमंत्री निवास पर भोजन करते हुए मैंने बताया कि मैं पांचजन्य में छह लाइनों का छोटा सा कॉलम भी लिखता हूं। अटल जी ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘हां, मैं उसे पढ़ता हूं।’’ मेरे जैसे छोटे लेखक को इतनी तारीफ ही काफी थी। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अटल जी, बातें और यादें


बात संभवतः सितम्बर 1983-84 की है। मैं उन दिनों बरेली में प्रचारक था। पश्चिमी उ.प्र. के सभी जिला प्रचारकों की एक बैठक मथुरा में हुई। स्व. दीनदयाल उपाध्याय का पैतृक गांव नगला चंद्रभान मथुरा जिले में ही है। उनके निधन के बाद वहां उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष मेला होता है। अनेक तरह के सेवा और ग्राम्य विकास के काम भी चल रहे हैं। उनकी पैतृक झोंपड़ी को संरक्षित करते हुए एक स्मृति भवन बनाया गया है। उसका संचालन जो समिति करती है, उन दिनों उसके अध्यक्ष अटल जी ही थे।

बैठक के अंतिम दिन उन कार्यों को देखने और समझने के लिए सभी जिला प्रचारक वहां गये थे। उस दिन समिति की बैठक भी थी। अतः अटल जी भी आये हुए थे। उनके साथ सभी प्रचारकों की गपशप और प्रश्नोत्तर हुए। उन दिनों पंजाब में आतंक का बोलबाला था। उस पर लिखी अपनी कविता ‘‘दूध में दरार पड़ गयी, खून क्यों सफेद हो गया, भेद में अभेद खो गया...’’ भी अटल जी ने सुनायी। भाऊराव भी वहां उपस्थित थे। काफी अनौपचारिक वातावरण था।

इसके बाद सबने साथ-साथ भोजन किया। ब्रज की प्रसिद्ध दाल, बाटी, चूरमा आदि बना था। गांव के भी कई लोग वहां थे। अटल जी सबसे बड़ी सहजता से मिल रहे थे। एक सज्जन के साथ एक छोटा बालक भी था। अटल जी ने उससे नाम पूछा। उसने नाम बताकर कहा - राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, शिशु मोर्चा। अटल जी ने पूछा, ‘‘तुम अध्यक्ष हो, तो तुम्हारे बाकी साथी कहां हैं ?’’ उसे जो सिखाकर लाया गया था, उसमें ये प्रश्न शामिल नहीं था। अतः वह बालसुलभ सहजता से बोला, ‘‘मोय का पतो।’’ इस पर अटल जी और बाकी सब लोग खूब हंसे।

अटल जी राष्ट्रधर्मके प्रथम सम्पादक रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री रहते हुए वे राष्ट्रधर्म कार्यालय में आये भी थे; पर प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे आयें, ऐसी हम सबकी इच्छा थी। लखनऊ के सांसद होने के नाते वे प्रायः लखनऊ आते भी थे। एक बार राजभवन में उनसे मिलकर हम लोगों ने बड़ा आग्रह किया। दबाव बनाने के लिए हम श्री वचनेश त्रिपाठी को भी साथ ले गये थे। वचनेश जी उनसे बड़े थे। अतः वे उनका बहुत आदर करते थे और उनकी बात टालते नहीं थे। कुछ देर तो वे चुप रहे, फिर बोले, ‘‘भाई मेरे आने से पूरे मोहल्ले वाले परेशान हो जाएंगे।’’ हमने उन्हें राष्ट्रधर्म का ताजा अंक, लोकहित प्रकाशन की कुछ पुस्तकें भेंट की और लौट आये।

एक बार पता लगा कि उनका कार्यक्रम बन गया है। सप्ताह भर पहले से कई तरह के सुरक्षाकर्मी राष्ट्रधर्म कार्यालय में आने-जाने लगे। वहां और आसपास रहने वालों की सूचियां बनने लगीं। सड़कें साफ होने लगीं। एक दिन दिल्ली से सीधे बातचीत के लिए एक हॉटलाइन फोनभी लग गया। हम सब बड़े उत्साहित थे; पर दो दिन पूर्व फिर कार्यक्रम निरस्त हो गया। पता लगा कि प्रधानमंत्री के विशेष सुरक्षा दस्ते ने इतनी पतली गली में आने की अनुमति नहीं दी। पश्चिमी उ.प्र. में एक कहावत है, ‘‘काणी के ब्याह को सौ जोक्खो..।’’ यहां भी ऐसा ही हुआ।

प्रधानमंत्री रहते हुए वे लखनऊ में राष्ट्रधर्म के किसी विशेषांक का लोकार्पण करें, हमारी यह इच्छा भी अधूरी ही रही। लखनऊ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन सर्वेसर्वा तैयार ही नहीं होते थे, और उनकी सहमति के बिना अटल जी का कार्यक्रम नहीं बनता था। जैसे-तैसे एक बार यह तय हुआ कि लखनऊ संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में ही अटल जी एक विशेषांक का लोकार्पण करें। सब तैयारी हो गयी; पर उस दिन अटल जी बीमार हो गये और दिल्ली से आये ही नहीं। क्या कहें, हमारा भाग्य ही साथ नहीं दे रहा था -

किस्मत की खूबी देखिये, टूटी कहां कमन्द
दो चार हाथ जब कि लबे बाम रह गया।।

वर्ष 2006 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रापर राष्ट्रधर्म ने एक विशेषांक निकाला। उन दिनों अटल जी प्रधानमंत्री नहीं थे। उनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रहता था। अतः उसका लोकार्पण दिल्ली में भा.ज.पा. के केन्द्रीय कार्यालय में ही हुआ। अटल जी के साथ आडवाणी जी भी मंच पर थे। उस दिन अटल जी ने लिखित भाषण पढ़ा। जिनकी वाणी पर सरस्वती विराजती हो, उन्हें लिखा हुआ भाषण पढ़ता देख हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर ध्यान में आ गया कि अब उनका स्वास्थ्य ही नहीं, स्मृति भी उतार पर है। इसके बाद तो वे सार्वजनिक जीवन से दूर ही होते गये।

भारतीय राजनीति के उस तेजस्वी नक्षत्र को मेरी श्रद्धांजलि।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दलित

दलित शब्द कब, कहां और क्यों प्रचलित हुआ, इस पर कई मत हैं। प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था के बावजूद दलित नहीं थे। कहते हैं कि भारत में इस्लामी हमलावरों ने कुछ लोगों का दलन और दमन कर उन्हें घृणित कामों में लगाया। आज भी किसी चीज को बुरी तरह तोड़ने को दलना ही कहते हैं। दाल और दलिया शब्द यहीं से बना है। 

सैकड़ों साल तक ऐसा होने पर ये लोग ‘दलित’ कहलाने लगे, जबकि ये प्रखर हिन्दू थे। इनमें से अधिकांश क्षत्रिय थे और इनके राज्य भी थे; पर फिर इनकी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शैक्षिक दशा बिगड़ती गयी और ये अलग-थलग पड़ गये। अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक इन भेदों को और बढ़ाया। आजकल सरकारी भाषा में इस वर्ग को अनुसूचित जाति कहते हैं। 

आजादी के बाद सबने सोचा था कि ये स्थिति बदलेगी; पर वोट के लालची सत्ताधीशों ने कुछ नहीं किया। अब चूंकि ये बहुत बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं, इसलिए सब दलों की इन पर निगाह है। अतः कांग्रेस वाले भा.ज.पा. को और भा.ज.पा. वाले कांग्रेस को दलित विरोधी बताते हैं। 

इन दिनों राहुल बाबा भा.ज.पा. को कोसते हुए संघ को भी उसमें लपेट लेते हैं। यद्यपि इससे उन्हीं का नुकसान हो रहा है। वो संघ को जितना गाली देंगे, संघ वाले चुनाव में उतनी ताकत से कांग्रेस का विरोध करेंगे। इसका दुष्परिणाम 2014 में वे देख ही चुके हैं। गत नौ अगस्त को भी राहुल बाबा ने एक रैली में संघ को दलित विरोधी कहा।  

संघ यद्यपि इस सामाजिक विभाजन को ठीक नहीं मानता; पर जमीनी सच तो ये है ही। इसलिए ‘जाति तोड़ो’ जैसे राजनीतिक आंदोलन चलाने की बजाय संघ इनकी आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति सुधारने का प्रयास कर रहा है। अपने गली-मोहल्ले के लोगों के सुख-दुख में सहभागी होना स्वयंसेवक का स्थायी स्वभाव है। इसीलिए विरोधी विचार वाले भी उसका आदर करते हैं। 

आपातकाल के बाद संघ का नाम और काम बढ़ने पर सेवा कार्यों को संगठित रूप दिया गया। सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस का इस पर बहुत जोर था। 1989 में संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की जन्मशती वर्ष का केन्द्रीय विचार सेवा ही था। अतः संघ की रचना में भी ‘सेवा विभाग’ शामिल कर हर राज्य में ‘सेवा भारती’ आदि संस्थाओं का गठन किया गया। 

ये संस्थाएं नगर तथा गांवों की निर्धन बस्तियों में शिक्षा, चिकित्सा तथा संस्कार के काम करती हैं। डा. हेडगेवार जन्मशती के अवसर पर ‘सेवा निधि’ एकत्र कर कार्यकर्ताओं की एक विशाल मालिका तैयार की गयी। इनके बल पर आज स्वयंसेवक डेढ़ लाख से भी अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। 

कुछ संस्थाएं ग्राम्य विकास के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। संघ के अलावा भी देश भर में हजारों संस्थाएं सच्चे मन से सेवा में संलग्न हैं। इनमें समन्वय बना रहे तथा वे एक-दूसरे के अनुभव का लाभ उठाएं, इसके लिए ‘राष्ट्रीय सेवा भारती’ का गठन हुआ है। अब हर राज्य में ‘सेवा संगम’ आयोजित किये जाते हैं। इनमें सैकड़ों संस्थाएं अपने स्टाॅल तथा प्रदर्शिनी आदि लगाती हैं। इससे छोटी संस्थाओं को भी पहचान मिलती है। हर पांचवे साल इनका राष्ट्रीय सम्मेलन भी होता है। 

अधिकांश हिन्दू मंदिर तथा धार्मिक संस्थाएं भी कुछ सेवा के काम करती हैं। इन्हें जोड़ने के लिए कई राज्यों में हिन्दू आध्यात्मिक मेले प्रारम्भ हुए हैं। सेवा निजी ही नहीं, सामाजिक साधना भी है। अतः कई संस्थाएं बनाकर स्वयंसेवक समाज की जरूरत के अनुसार काम कर रहे हैं। 

वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, भारत विकास परिषद, विद्यार्थी परिषद, दीनदयाल शोध संस्थान, भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, विवेकानंद केन्द्र आदि का इनमें विशेष योगदान है। इनके द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास से रोजगार, ग्राम एवं कृषि विकास, कुरीति निवारण, नारी उत्थान और स्वावलम्बन, गो संवर्धन जैसे हजारों प्रकल्प चलाये जा रहे हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियां इनसे विशेष रूप से लाभान्वित होती हैं।

संघ के कार्यकर्ता जिस निर्धन बस्ती में काम करते हैं, वहां अपनी राजनीतिक दुकान लगाये नेता उनका विरोध करते हैं; पर कुछ समय बाद बस्ती के लोग उन नेताओं को ही भगा देते हैं। क्योंकि सेवा के कार्य से उस बस्ती वालों का ही भला होता है। राहुल बाबा चाहे जितना चिल्लाएं; पर संघ का काम इन बस्तियों में लगातार बढ़ रहा है।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महिलाएं

जब से राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं, तब से वे कुछ अधिक ही बोलने लगे हैं; पर इससे उनका अज्ञान भी लगातार प्रकट हो रहा है। वे कई बार कह चुके हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महिला विरोधी है। गत सात अगस्त 2018 को दिल्ली में कांग्रेस के महिला सम्मेलन में उन्होंने फिर यही बात दोहरायी। 

असल में उन्हें पता ही नहीं है कि संघ केवल पुरुषों का संगठन है। इसमें महिलाएं सदस्य बन ही नहीं सकतीं; पर ऐसा ही ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नाम का महिला संगठन भी है, जिसमें पुरुष नहीं जाते। दोनों के कार्यालय, कार्यकर्ता और शाखाएं अलग हैं। शाखा में मुख्यतः शारीरिक कार्यक्रम (खेल, आसन, व्यायाम आदि) होते हैं। इन्हें लड़के और लड़कियां या पुरुष और स्त्रियां एक साथ नहीं कर सकते। 

जैसे कबड्डी को ही लें। इसमें खिलाड़ी आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते हैं। अतः इसे युवक और युवतियां एक साथ नहीं खेल सकते। ऐसा ही अन्य कार्यक्रमों के साथ है। इसलिए संघ की शाखा पूरी तरह पुरुष वर्ग की होती है और समिति की शाखा महिला वर्ग की। साल में एक-दो कार्यक्रम सामूहिक भी होते हैं; पर व्यावहारिक कठिनाई के कारण दोनों की दैनिक गतिविधि, शाखा, शिविर आदि अलग हैं।

आइए, राष्ट्र सेविका समिति के बारे में कुछ जानें। शाखा में जाने से स्वयंसेवक के विचार और व्यवहार में भारी परिवर्तन होता है। ऐसा ही अनुभव हुआ वर्धा निवासी श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर को, जब उनके बेटे शाखा जाने लगे। इससे उनके मन में यह भावना पैदा हुई कि ऐसा ही संगठन महिलाओं और लड़कियों के लिए भी होना चाहिए। कुछ दिन बाद जब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार वर्धा आये, तो श्रीमती केलकर ने उनसे भेंट की। डा. जी ने उनके विचारों का स्वागत करते हुए उन्हें महिला वर्ग के लिए अलग संगठन बनाने को कहा। डा. जी ने कहा कि ये दोनों संगठन रेल की पटरियों की तरह साथ-साथ और एक दूसरे के पूरक बन कर तो चलेंगे; पर आपस में मिलेंगे नहीं। 

इस प्रकार विजयादशमी (25 अक्तूबर, 1936) को वर्धा में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना हुई। इसकी कार्यशैली संघ जैसी ही है। समिति में भी गुरु का स्थान व्यक्ति बजाय ‘परम पवित्र भगवा ध्वज’ को दिया गया है। इसकी शाखा तथा शिविरों में नारियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सबल और समर्थ बनाने वाले कार्यक्रमों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

श्रीमती केलकर (वंदनीय मौसी जी) अति सामाजिक, धार्मिक और साहसी महिला थीं। 1947 में देश विभाजन से कुछ समय पूर्व तक उन्होंने कराची तथा सिंध में प्रवास किया था। समिति जीजाबाई के मातृत्व, रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व और देवी अहिल्याबाई होल्कर की कर्तव्यपरायणता को नारियों के लिए आदर्श मानती है। इसके साथ ही सेविकाएं दुष्टों को मारने और सज्जनों को अभयदान देने वाली देवी पार्वती के अष्टभुजा रूप की भी वंदना करती हैं। 

समिति पांच उत्सव (वर्ष प्रतिपदा, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयादशमी तथा मकर संक्रांति) अपनी शाखाओं में मनाती हैं। इसके अलावा देश, धर्म और समाज के उत्थान में योगदान देने वाली महान महिलाओं की जयंती तथा पुण्यतिथियां भी मनायी जाती हैं। हर चार-पांच साल बाद राष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं।

हिन्दू संस्थाओं द्वारा समय-समय पर चलाये गये गोरक्षा, कश्मीर बचाओ, असम समस्या, धर्मान्तरण का विरोध, स्वदेशी का प्रचलन, श्रीराम जन्मभूमि जैसे राष्ट्रीय अभियानों में भी सेविकाएं सक्रिय रहती हैं। समिति ने अपने बलबूते पर भी कई देशव्यापी कार्यक्रम किये हैं। इनमें वंदे मातरम् स्मृति शताब्दी, डा. अम्बेडकर जन्मशती, रानी लक्ष्मीबाई का 125 वां बलिदान दिवस, भगिनी निवेदिता का 125 वां जन्मदिवस, देवी अहिल्या द्विशताब्दी, रानी मां गाइडिन्ल्यू जन्मशती आदि प्रमुख हैं। देश की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात सैनिकों को राखी भेजने की शुरुआत समिति ने ही की थी। अब इसे अनेक अन्य संस्थाओं ने भी अपना लिया है।  

समिति चित्र प्रदर्शिनी, संस्कार केन्द्र, नाटक, कथा, विद्यालय, चिकित्सालय, छात्रावास, पुस्तकालय, वाचनालय, भजन मंडली, योगासन केन्द्र, पुरोहित प्रशिक्षण, साहित्य प्रकाशन आदि से समाज की सेवा कर रही है। समिति द्वारा हिन्दू संवत्सर के अनुसार छपने वाली ‘वार्षिक दिनदर्शिका’ देश ही नहीं, तो विदेश में भी बहुत लोकप्रिय है। 

समिति की अनेक सेविकाएं शिक्षा, नौकरी या कारोबार के लिए विदेश जाती रहती हैं। हजारों सेविकाएं विवाह के बाद वहीं बस गयी हैं। वे वहीं समिति का काम करती हैं। विदेशों में संघ की अधिकांश शाखाएं साप्ताहिक हैं। उनमें स्वयंसेवक सपरिवार आते हैं। इससे भी वहां समिति का काम बढ़ रहा है। विदेश में बसे स्वयंसेवक एवं उनके परिजनों के लिए प्रायः हर पांच साल बाद भारत में एक सप्ताह का शिविर होता है। इसमें समिति की सेविकाएं भी आती हैं।

मंगलवार, 24 जुलाई 2018


कल्याण आश्रम से चिढ़ क्यों ?

कुछ दिन पूर्व कांग्रेस कार्यकारिणी को सम्बोधित करते हुए राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पहले आदिवासी लोग हमें वोट देते थे; पर संघ वाले उनके बीच जाकर काम करने लगे और अब वे हमें वोट नहीं देते। उनका यह भाषण यू-ट्यूब पर भी आ गया; पर इससे कांग्रेस को नुकसान होता देख थोड़ी देर बाद उसे हटा लिया गया। यद्यपि इस दौरान हजारों लोगों ने इसे देख लिया।

राहुल गांधी ने जिन्हें आदिवासी कहा, उन्हें सरकारी भाषा में अनुसूचित जनजाति कहते हैं। इनके बीच काम करने वाली संघप्रेरित संस्था का नाम वनवासी कल्याण आश्रमहै। संघ आदिवासी की बजाय वनवासी शब्द प्रयोग करता है। तुलसी बाबा ने भी मानस में 'बनचर' शब्द का प्रयोग किया है -

राम सकल बनचर तब तोषे, कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे। (अयो. 137/1)

आइये, वनवासियों के बीच काम करने वाली संस्था के बारे में कुछ जानें। यदि संभव हो तो राहुल बाबा भी इसे पढ़ें। फिर वे खुद से पूछें कि कांग्रेस को इनके बीच काम करने को किसने मना किया है ? देश में 50-55 साल तो कांग्रेस का ही राज रहा। तब उन्होंने इस क्षेत्र को मिशनरियों के लिए खुला क्यों छोड़ दिया ? जिन गांधी जी का नाम अपने साथ लगाकर राहुल और उनकी मम्मीश्री दुनिया को धोखा दे रहे हैं, उन गांधी जी ने भारतीय आदिम जाति सेवक संघनामक स्वयंसेवी संस्था बनायी थी; पर उनके जाने के बाद यह संस्था पूरी तरह सरकारी होकर मृतप्रायः हो गयी।

संघ और कल्याण आश्रम के लोग निःस्वार्थ भाव से काम करते हैं। उनका उद्देश्य सेवा और वनवासियों का उत्थान है, राजनीतिक कुर्सी पाना नहीं। इसलिए संघ आगे बढ़ रहा है और कांग्रेस पीछे खिसक रही है। जितनी जल्दी राहुल बाबा इसे समझ लें, उनके और देश के लिए उतना ही अच्छा है।

वनवासी कल्याण आश्रम

भारत के वनवासी क्षेत्र में ईसाई गतिविधियां बहुत समय से चल रही हैं। अंग्रेजों का यहां आने का असली उद्देश्य देश का ईसाइकरण ही था। सत्ता हाथ में आने से मिशनरियों को खूब देशी और विदेशी सहायता मिली। उन्होंने वनों में रहने और प्रकृति की पूजा करने वाले निर्धन हिन्दुओं को आदिवासीकहकर शेष हिन्दुओं से काटने का षड्यंत्र रचा। सेवा के नाम पर विद्यालय, छात्रावास, चिकित्सालय, कुष्ठ आश्रम, वृद्धाश्रम जैसे केन्द्रों का उन्होंने व्यापक तंत्र खड़ा किया। सरकार उनके साथ थी ही। अतः म.प्र., झारखंड, उड़ीसा के साथ ही पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय समाज का बड़ी संख्या में धर्मान्तरण हुआ।

आजादी मिलने के बाद सरसंघचालक श्री गुरुजी एवं समाजसेवी ठक्कर बापा के आशीर्वाद से जसपुर में कार्यरत सरकारी वकील श्री बालासाहब देशपांडे ने नौकरी छोड़कर 26 दिसम्बर, 1952 को वर्तमान छत्तीसगढ़ के जसपुर नगर में इस संस्था की स्थापना की। जसपुर नरेश श्री विजय भूषण सिंह जूदेव प्रखर हिन्दू थे। वे अपने क्षेत्र में चल रही ईसाई गतिविधियों से बहुत दुखी थे। अतः उन्होंने भी बालासाहब देशपांडे की सहायता की।

प्रारम्भ में यह काम मुख्यतः म.प्र. तक ही सीमित था; पर आपातकाल के बाद इसे पूरे देश में फैला दिया गया। संस्था का ध्येयवाक्य है, "नगरवासी, ग्रामवासी, वनवासी, हम सब हैं भारतवासी।"  कल्याण आश्रम की मान्यता है कि वनों और पर्वतों में रहने वाले लोग भी हिन्दू ही हैं। यद्यपि सड़कों से दूरी के कारण उनका समुचित विकास नहीं हुआ; पर इस कारण उन्हें शोषित और पीड़ित मानना ठीक नहीं है। अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक उन्हें आदिवासीकहा, जिससे शेष हिन्दुओं को कहीं बाहर से आया हुआ हमलावर कहा जा सके। भारत की एकता और अखंडता के लिए नगर, ग्राम और वनवासी समाज की दूरी कम होना जरूरी है। आश्रम द्वारा संचालित सभी सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भी यही है।

आश्रम के काम के चार आयाम (शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग प्रशिक्षण तथा धर्म जागरण) हैं। कल्याण आश्रम द्वारा किये गये राष्ट्रीय महत्व के दो कामों का उल्लेख आवश्यक है। आजादी के बाद मध्य भारत के पहले मुख्यमंत्री श्री रविशंकर शुक्ल जब रायगढ़ के जनजातीय क्षेत्र में गये, तो मिशनरियों की शह पर उन्हें काले झंडे दिखाकर भारत विरोधी नारे लगाये गये। इस पर शुक्ल जी ने 1950 में नागपुर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में नियोगी आयोग'  बनाया। कल्याण आश्रम की तब तक स्थापना नहीं हुई थी; पर वहां कार्यरत संघ के कार्यकर्ताओं ने साहसपूर्वक इस आयोग के सम्मुख प्रामाणिक तथ्य प्रस्तुत किये। इससे मिशनरियों के षड्यंत्रों का भंडाफोड़ हो सका।

1989 में अंतरराष्ट्रीय श्रम आयोग (International Labour Organisation) का अधिवेशन जेनेवा में हुआ था। भारत के सबसे बड़े श्रम संगठन भारतीय मजदूर संघके पदाधिकारी भी वहां गये थे। वहां उन्होंने भारत और अन्य देशों के जनजातीय समाज का अंतर स्पष्ट किया। अन्य देशों पर यूरोपीय लोगों ने हमला किया और वहां के मूल जनजातीय समाज को गुलाम बना लिया; पर भारत में गुलाम प्रथा कभी नहीं रही। यहां का जनजातीय और शेष समाज सब यहीं के मूल नागरिक हैं।

श्रम आयोग का विचार था कि अब परिस्थिति बदली है। अतः जनजातीय लोगों के लिए स्वशासन (Autonomy) की जरूरत है। भा.म.संघ ने कहा कि भारत में इससे अलगाव बढ़ेगा। अतः यहां एकात्मता (Integration) की जरूरत है। भा.म.संघ ने यह भी कहा कि जनजातीय समाज की देखरेख की जिम्मेदारी शासन तथा स्वदेशी संस्थाओं की है, चर्च या अन्य किसी बाहरी संस्था की नहीं। भा.म.संघ को ये तथ्य कल्याण आश्रम ने ही उपलब्ध कराये थे।

शनिवार, 21 जुलाई 2018

कांग्रेस के महावतार बाबा

1975 से 1977 तक का समय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। चंूकि उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके अति महान पुत्र संजय गांधी ने पूरे देश को एक जेल में बदल दिया था। क्या मजाल कोई इन दोनों के खिलाफ एक शब्द भी बोल सके। बोलना तो दूर, कोई इस बारे में सोच भी नहीं सकता था। हां, इन दोनों की चमचागिरी पर कोई प्रतिबंध नहीं था। बहुत से कवि, कलाकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी अपनी कल्पनाशक्ति के बल पर इस क्षेत्र में नयी गाथाएं लिखकर अपने जीवन को कलंकित कर रहे थे।

देवकांत बरुआ उन दिनों कांग्रेस के एक बड़े नेता थे। उन्होंने उस दौरान चमचाकर्म की सभी सीमाएं पार कर एक नया नारा दिया था। इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा। अर्थात इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है। यद्यपि उनका नारा ज्यादा समय नहीं चल पाया। 1977 में लोकसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव हुए। तब भारत तो बच गया, पर इंदिरा गांधी और उनके साहबजादे धराशायी हो गये। जनता ने दोनों के मुख पर इतनी कालिख पोत दी कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया। बेचारे कांग्रेस को तो क्या जिताते, खुद ही हार गये। इस प्रकार देश के माथे से आपातकाल रूपी वह कलंक हटा।

अब न देवकांत बरुआ हैं और न ही इंदिरा और संजय गांधी। एक भगवान के पास चले गये और बाकी दोनों को भगवान ने खुद ही बुला लिया। पर खुद को खुदा और सत्ता का जन्मजात मालिक समझने वाले उस राज परिवार के वंशज अभी विद्यमान हैं। सोनिया परिवार के गुलचिराग राहुल बाबा ने अपनी मम्मीश्री को कई साल तक तरसाया और आखिरकार लाखों कांग्रेसियों पर अहसान करते हुए वे सोनिया कांग्रेस के खानदानी अध्यक्ष बन ही गये। वैसे तो कहा गया कि वे अध्यक्ष चुने गये हैं; पर किसी ने ये नहीं बताया कि उस कुर्सी के लिए दूसरा या तीसरा प्रत्याशी कौन था और उसे कितने वोट मिले ?

उन्हीं अध्यक्ष जी ने 20 जुलाई को मोदी सरकार के विरुद्ध रखे गये अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में बोलते हुए सीना ठोककर कहा कि मैं ही कांग्रेस हूं और मैं सबको कांग्रेस बना दूंगा। बात तो उन्होंने शिवजी की भी की; पर गनीमत है खुद को शिव नहीं कहा। मुझे अपने गांव का एक सड़कछाप मदारी याद आया, जो छुट्टी के समय हमारे स्कूल के रास्ते में प्रायः तमाशा दिखाता मिलता था। वह अपनी टोपी में से चूहा निकालकर दर्शकों को डराता था कि यदि उसे मनचाहे पैसे नहीं दिये गये, तो वह सबको चूहा बना देगा। कई बच्चे उसके जाल में फंस कर उसे कुछ पैसे दे देते थे।

श्रीमान अध्यक्ष जी इतने पर ही शांत नहीं हुए। वे जबरन प्रधानमंत्री मोदी के गले जा लगे और फिर अपनी सीट पर आकर न जाने किसे आंख मारने लगे। सदन में पुरुष भी थे और हर उम्र की महिलाएं भी। सदन की अध्यक्ष भी एक सम्मानित महिला ही हैं; पर कांग्रेस के महावतार बाबा छिछोरेपन से बाज नहीं आये। सारा सदन यह देखकर भौचक रह गया। यद्यपि कुछ पुराने कांग्रेसी चमचे इसे धर्म और संस्कृति की परम्परा बता रहे हैं; पर वे यह स्पष्ट नहीं कर सके कि जबरन गले पड़ना धर्म और संस्कृति है या आंख मारना।

ऐसा लगता है कि राहुल बाबा अब बौरा गये हैं। जिस कुर्सी के वे योग्य नहीं थे, उस पर जबरन उन्हें बैठना पड़ गया है। उनके खानदान के अलावा कोई दूसरा उस कुर्सी पर बैठे, ये उन्हें और उनकी मम्मीश्री को स्वीकार नहीं है। इसलिए उनका दिमागी संतुलन बिगड़ गया है। कुछ दिन पूर्व उन्होंने कहा था कि कांग्रेस देश में आखिरी पायदान पर खड़े हर व्यक्ति के साथ है। काश, कोई उन्हें ये समझाये कि उनकी इन अनर्गल बातों से लोकसभा में कांग्रेस सैकड़ा से दहाई और फिर इकाई की ओर बढ़ते हुए आखिरी पायदान पर ही पहुंच रही है। 

हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में रावण, कंस और हिरण्यकशिपु आदि की चर्चा है, जो खुद को भगवान कहते थे। वैसे थे तो वे आम मानव ही; पर अपने अहंकार और कुकर्मों के कारण उन्हें राक्षस कहा गया। वे कहते थे कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश को छोड़कर सब उनकी ही पूजा करें। जो उनकी बात नहीं मानता था, या उन्हें समझाने का प्रयास करता था, उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था। यद्यपि ऐसे सभी अहंकारियों का अंत बुरा ही हुआ। कुछ ऐसा ही परिदृश्य देश में फिर से दिखायी दे रहा है। एक नेताजी ने खुद को कांग्रेस का महावतार घोषित कर दिया है। ऐसे में उन्हें शीशा दिखाने या सही बात समझाने की हिम्मत किसमें है; और कोई समझाने की कोशिश भी करे, तो जिसकी ऊपरी मंजिल खाली हो, वह समझेगा कैसे ?

ऐसा लगता है इन महावतार बाबा को फिर कुछ दिन विदेश में गुप्त प्रवास, आराम और इलाज की जरूरत है। तब मामले में शायद कुछ सुधार हो। वे परेशान न हों। देश की चिन्ता करने के लिए मोदी जी हैं और कांग्रेस के लिए ऊपर वाला।