शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

युद्ध और मनोबल

किसी भी लड़ाई में शारीरिक दमखम और अस्त्र-शस्त्रों के साथ मनोबल का भी बहुत महत्व होता है। आजकल तकनीक का भी उपयोग होने लगा है। अतः उसके महत्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। फिर भी मनोबल की भूमिका तो है ही। इसके कई उदाहरण इतिहास में प्रसिद्ध हैं। 

एक राजा दूसरे राज्य पर हमला करने से पूर्व सैनिकों के साथ अपनी कुलदेवी के मंदिर में गया। वहां पूजा के बाद उसने जेब से एक सिक्का निकालकर सैनिकों से कहा कि इसे उछालने पर यदि देवी का चित्र ऊपर आया, तो हम जीतेंगे, अन्यथा नहीं। जब उसने सिक्का उछाला, तो देवी का चित्र ही ऊपर आया। इससे सैनिकों का उत्साह बढ़ गया और कम संख्या होते हुए भी वे जीत गये। बाद में पता लगा कि यह राजा की एक चाल थी। वास्तव में उस सिक्के के दोनों ओर देवी का ही चित्र बना था।

ऐसे ही एक राजा जब लड़ने गया, तो शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करते ही उसका पैर फिसल गया। उसने हाथ का सहारा लेकर स्वयं को किसी तरह गिरने से बचाया। इससे सैनिक हताश हो गये; पर राजा ने कहा कि मेरी उंगली में पहनी हुई राजमुद्रा की छाप इस भूमि पर लग गयी है। यह ईश्वरीय संकेत है कि यह भूमि तो हमारी हो गयी। अब युद्ध तो केवल औपचारिकता मात्र है। इससे सैनिक उत्साह में आ गये और युद्ध जीत लिया गया।

ऐसे उदाहरण अनेक हैं। परीक्षा के दिनों में छात्र, मैच से पहले खिलाड़ी, बच्चों की बीमारी में माताएं और नौकरी के लिए इंटरव्यू देने वाले युवा मनोबल बढ़ाने के लिए कई तरह की पूजा और टोने-टोटके भी करते हैं। इससे लाभ होता है या नहीं, ये तो वही जानें; पर मन का प्रभाव शरीर और बुद्धि पर पड़ता जरूर है। इसीलिए ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत’ की बात कही गयी है।

भारतीय राजनीति में इन दिनों जो हो रहा है, उसमें भी दो बड़े दलों के मनोबल का स्पष्ट प्रभाव दिख रहा है। सत्ताधारी भा.ज.पा. का मनोबल नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में आकाश पर है, तो कांग्रेस का मनोबल ‘इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा की तरह पूरी तरह तितर-बितर हो चुका है।

2014 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ। इसके बाद सोनिया मैडम ने खानदानी पार्टी की कमान अपने पुत्र राहुल को सौंप दी। इससे कुछ समय कांग्रेस में उत्साह पैदा हुआ। लोगों को लगा कि युवा अध्यक्ष नये सिरे से पार्टी का गठन करेंगे; पर नये और पुरानों की लड़ाई में पार्टी कहीं की नहीं रही।

यद्यपि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा। म.प्र., छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने भा.ज.पा. से सत्ता छीन ली। इससे कांग्रेस वालों को लगा कि अब 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा; पर क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें महत्व नहीं दिया। हर क्षत्रप अपने राज्य में कांग्रेस को दो-चार सीट देकर टरकाना चाहता था। अतः कांग्रेस को पूरी ताकत झोंकने पर भी कुल जमा 52 सीटें ही मिलीं। यानि ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे।’’ जो तीन राज्य उसने जीते थे, वहां भी उसकी नाक कट गयी।

तबसे कांग्रेस का मनोबल रसातल में पहुंच गया। पार्टी के सर्वेसर्वा ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। दो महीने से अधिक हो गये, दल का कोई मुखिया ही नहीं है। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि अपनी बात किससे कहें ? अतः सांसद और विधायक भी कांग्रेस छोड़ रहे हैं। जिस बस में चालक ही न हो, उसमें बैठने वाला मूर्ख ही कहलाएगा। यही हाल कांग्रेस का है। कर्नाटक और गोवा में जो हुआ, वह नेतृत्व के नाकारापन का ही परिणाम है। अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है।

दूसरी ओर भा.ज.पा. का मनोबल आसमान पर है। वहां नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बाद अब जगत प्रकाश नड्डा और नये संगठन मंत्री बी.एल.संतोष के आने से कार्यकर्ता उत्साहित हैं। लोकसभा में पहले से भी अधिक सीटें जीतना आसान नहीं होता; पर यह हुआ है। अब लोगों को लग रहा है कि कहीं म.प्र. और राजस्थान की सरकारें भी न गिर जाएं। हाथी का पांव पड़ने से कितनी हड्डियां टूटेंगी, कौन जाने ?

बची खुची कसर देश के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पूरी कर रही है। तीन तलाक पर हर मुसलमान महिला और समझदार पुरुष सरकार के साथ है; पर पार्टी नेतृत्व शतुरमुर्ग की तरह मिट्टी में सिर दबाकर खतरा टलने की प्रतीक्षा में है। अनुच्छेद 370 का विषय पिछले 70 साल से सुलग रहा है। लोगों की तीन पीढि़यां कश्मीर समस्या के हल की बात सुनते हुए बीत गयीं। हजारों सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। छह लाख हिन्दू घाटी से निष्कासित होकर नरक भोग रहे हैं; पर  मुसलमान वोटों के लालची किसी दल ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 

पर अब शासन ने कठोर निर्णय लेकर उस पेड़ को ही काट दिया, जिस पर आतंकवादी पनप रहे थे। जनभावना इस समय परिवारवाद के भी विरुद्ध है। अतः सारा देश इस निर्णय से खुश है; पर मुखियाविहीन कांग्रेस को समझ ही नहीं आ रहा कि वे क्या करें ? जिसे लोकसभा में नेता बनाया, उस अधीररंजन चैधरी का अपनी जुबान पर ही नियंत्रण नहीं है। पार्टी के मालिक सोनिया मैडम और राहुल बाबा उदासीन हैं। अतः पार्टीजन अपनी इच्छा और समझ से व्यवहार कर रहे हैं।

असल में कांग्रेस कई साल से जमीनी सच से कोसों दूर है। इसलिए पार्टी के पुराने और प्रबुद्ध नेता इस विषय पर शासन का समर्थन कर रहे हैं। जर्नादन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अभिषेक मनु सिंघवी, दीपेन्द्र हुड्डा, डा. कर्णसिंह आदि छोटे नेता नहीं हैं। इनमें से कई तो राहुल के जन्म से पहले से ही कांग्रेस में हैं। राज्यसभा में तो पार्टी के सचेतक भुवनेश्वर कालिता ही पार्टी छोड़ गये; पर राहुल बाबा अपनी दुनिया में मस्त हैं। संसद का सत्र समाप्त हो गया है। हो सकता है वे तन-मन और दिमाग की ठंडक के लिए फिर विदेश चले जाएं।

सच तो ये है कि देश भर में कांग्रेस के हर नेता और कार्यकर्ता का मनोबल गिरा हुआ है। अतः हर राज्य में अराजकता का माहौल है। इसका लाभ भा.ज.पा. वाले उठा रहे हैं। अनुच्छेद 370 के नाम पर बाकी दलों में भी असंतोष पनप रहा है। इसलिए कुछ नेता इसे हटाने की बजाय हटाने की प्रक्रिया पर आपत्ति कर रहे हैं। कुछ पार्टियों ने इसके विरोध में वोट देने की बजाय सदन से बहिष्कार कर अपनी नाक बचाने का प्रयास किया है।

दुनिया चाहे जो कहे, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के इस मास्टर स्ट्रोक ने हर दल की बखिया उधेड़ दी है। अब उनके आगे कुआं है और पीछे खाई। अतः भा.ज.पा. का मनोबल चरम पर है और उसे आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी सफलता मिलनी निश्चित है।

बुधवार, 7 अगस्त 2019

आधी रहे न पूरी पावे

हर व्यक्ति की तरह हर राजनीतिक दल का भी अपना मूल चरित्र या स्वभाव होता है। इसे उसकी आत्मा या प्राणतत्व भी कह सकते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे ‘स्वधर्म’ कहा है। (स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः)। इसकी जड़ें उसके इतिहास और भूगोल में रहती हैं। अतः वह चाह कर भी इससे हट नहीं सकता। तीन तलाक और अनुच्छेद 370 पर संसद में जो हुआ, उसने एक बार फिर इसे सही सिद्ध कर दिया है। 

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की चर्चा करें। यद्यपि किसी समय यह आजादी के लिए संघर्ष करने वालों का एक मंच थी; पर लाल, बाल, पाल और गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक परिदृश्य से विदा होने के बाद कांग्रेस पूरी तरह गांधीजी के हाथ में आ गयी। इसके बाद कांग्रेस में मुस्लिम तुष्टीकरण का नया अध्याय शुरू हो गया।  

भारत से कोई मतलब न होते हुए भी खिलाफत आंदोलन का समर्थन, केरल में निरपराध हिन्दुओं पर मुस्लिम मोपलाओं के अत्याचारों का समर्थन कर उन्हें वीर मोपला कहना, मोहम्मद अली जिन्ना की जी हुजूरी, मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गोहत्या पर चुप्पी, झंडा कमेटी की सर्वसम्मत राय के बावजूद भगवे झंडे की बजाय तिरंगे को राजकीय ध्वज बनाना, देश का मजहब के आधार पर विभाजन, मजहबी दंगों में हिन्दुओं को पिटने, लुटने और मरने के बावजूद पाकिस्तान में ही बने रहने की सलाह; पर बिहार में मुसलमानों पर मार पड़ते ही उनकी रक्षा में जा पहुंचना, कश्मीर पर हमला करने के बाद भी पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. देने का दुराग्रह..जैसे सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं।

गांधीजी की इस परम्परा को उनके परम शिष्य और उत्तराधिकारी जवाहर लाल नेहरू ने आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने मित्र शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर में राजा बनाने के लिए महाराजा हरिसिंह को निर्वासन दे दिया। इतने पर ही संतोष नहीं, तो अनुच्छेद 370 और फिर धारा 35 ए लाकर पूरे राज्य को उनकी बपौती बना दिया। अयोध्या में श्रीराममंदिर का विषय सोमनाथ की तरह हल हो सकता था; पर उनका रवैया सदा ढुलमुल ही रहा। गोरक्षा को वे बेकार की बात मानते थे। हिन्दी की बजाय वे उर्दू के परम हिमायती थे। हिन्दू कोड बिल में तो उन्होंने रुचि ली; पर मुस्लिम समाज में सुधार और महिलाओं की दशा सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया।

इंदिरा गांधी का समय कुछ अपवाद रहा। शायद इसका कारण संजय गांधी का प्रभाव हो; पर राजीव गांधी ने फिर यही लीक पकड़ ली। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद उन्होंने मुल्लाओं को खुश करने के लिए संसद में कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के हितों पर फिर कुठाराघात कर दिया। उनके पास लोकसभा में 403 सदस्य थे। वे चाहते तो इस बारे में सर्वसम्मत कानून बन सकता था; पर मुस्लिम तुष्टीकरण कांग्रेस का मूलमंत्र होने के कारण वे साहस नहीं दिखा सके। 

कुछ समय तक तो कांग्रेस को इसका लाभ मिला; पर फिर देश में हिन्दुत्व का उभार होने लगा। राम मंदिर आंदोलन इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसका लाभ उठाकर भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ने लगी; पर कांग्रेस कूपमंडूक ही बनी रही। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। अतः वह अब देश और अधिकांश राज्यों की राजनीति में अप्रासंगिक हो चली है। 

2014 के लोकसभा चुनावों में भारी पराजय के बाद बनी ए.के.एंटनी कमेटी ने कहा था कि कांग्रेस की छवि हिन्दू विरोधी और मुस्लिमों की समर्थक जैसी बन गयी है। इसे बदलने के लिए 2019 के चुनाव में राहुल गांधी सैकड़ों मंदिरों में गये। कैलास मानसरोवर यात्रा की। जनेऊ और नकली गोत्र का सहारा भी लिया। प्रियंका भी इसी लाइन पर चली; पर वे अपने दाग नहीं धो सके। इसलिए अब वे फिर से उसी तुष्टीकरण पर लौट रहे हैं, चूंकि कांग्रेस के प्राण उसी में हैं। 

लोकसभा में अनुच्छेद 370 पर हो रही बहस के दौरान राहुल ने एक ट्वीट किया, जिसमें इसे हटाने के निर्णय को मूर्खतापूर्ण कहा है। वे न जाने किस दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें आज भी लगता है कि इसे हटाने से मुसलमान नाराज हो जाएंगे और इससे कांग्रेस को नुकसान होगा; पर वे यह भूल रहे हैं कि उनके इस कदम से हिन्दू उनसे इतने दूर हो जाएंगे कि बची-खुची कांग्रेस कहीं की नहीं रहेगी। कई कांग्रेसी इसे समझ रहे हैं; पर राहुल बाबा अपनी पप्पूगिरी छोड़ने को राजी नहीं हैं। 

अब भारतीय जनता पार्टी को देखें। उसकी आत्मा हिन्दुत्व में है। अपने पूर्वावतार भारतीय जनसंघ के समय से ही वह संपूर्ण गोवंश की रक्षा, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण, समान नागरिक संहिता, भारतीय भाषाओं का सम्मान, राम मंदिर निर्माण और अवैध धर्मान्तरण पर प्रतिबंध आदि की बात करती रही है। बीच में एक समय ऐसा आया, जब लोकसभा में उसके दो ही लोग पहुंच सके। यद्यपि इसका मुख्य कारण राजीव गांधी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति थी; पर इससे भा.ज.पा. में चिंता गहरा गयी। अतः उन्होंने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया; पर यह कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरा। क्योंकि जनसंघ और भा.ज.पा. की नींव में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद है। ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम’’ वाला हाल होता देख पार्टी ने इस ढकोसले को जल्दी ही अलविदा कह दिया।

इसके बाद पार्टी ने फिर से हिन्दुत्व की राह पकड़ी। संघ ने भा.ज.पा. को गोविंदाचार्य, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चैहान, उमा भारती, नितिन गडकरी, सुशील मोदी, प्रकाश जावड़ेकर, नरेन्द्र मोदी जैसे कई युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता दिये। इनमें से कुछ प्रचारक थे, तो कुछ गृहस्थ। कुछ संघ में तो कुछ विद्यार्थी परिषद में काम कर रहे थे। अटलजी के बदले पार्टी की कमान आडवाणीजी को सौंपी गयी। इससे पार्टी में नव उत्साह का संचार हुआ।

अब आडवाणीजी के नेतृत्व में राममंदिर के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली गयी। मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक तिरंगा यात्रा हुई। इनसे परिदृश्य बदलता गया और आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार दिल्ली में स्थापित है। मोदी ने धर्मान्तरण के कारोबार में लगे एन.जी.ओ को मिल रहे विदेशी धन को रोका है। तीन तलाक के फंदे से मुस्लिम महिलाओं को मुक्त किया है तथा जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर राज्य को सच्ची आजादी दिलाई है। ये पार्टी के हिन्दुत्व के एजेंडे को और मजबूत करने वाले कदम ही हैं।

क्षेत्रीय दलों का भी यही हाल है। उ.प्र. में समाजवादी पार्टी, बिहार में नीतीश बाबू तथा बंगाल में ममता बनर्जी अपनी जीत में मुस्लिम वोटों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए तीन तलाक और 370 पर वे सरकार के साथ नहीं गये। मायावती का मूलाधार दलित वोट हैं। उन्होंने 370 पर सरकार का साथ दिया, चूंकि इससे जम्मू-कश्मीर में दलित हिन्दुओं को नागरिकता एवं अच्छी नौकरी मिल सकेगी। अन्य क्षेत्रीय दल भी इसी तरह अलग-अलग हिस्सों में बंटे हैं।

सच तो ये है कि अधिकांश नेताओं को देश या जनता की नहीं, अपनी सम्पत्ति और खानदानी सत्ता की चिंता है और इसके लिए वोट बैंक जरूरी है। जैसे कहानियों में राक्षस की जान पिंजरे में बंद किसी तोते में होती है, ऐसी ही स्थिति इन दलों की है। वे सब जानते हुए भी उन प्रतिगामी विचारों से चिपककर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। 

तीन तलाक और 370 पर देश के मूड को न समझने वाले दलों के भविष्य पर किसी ने ठीक ही कहा है - 

आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी रहे न पूरी पावे।। 

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

नेता, नीति, नीयत और नियति


संसद का काम नीति बनाना है; पर ये इस पर निर्भर है कि नेताओं की नीयत कैसी है। फिर इसी से प्रजा की नियति तय होती है। समय चाहे जो हो; पर नेता, नीति और नीयत के मेल से ही नियति का निर्माण होता है।

श्रीराम के समय को ही लें। महाराजा दशरथ बड़े प्रतापी सम्राट थे; पर बुढ़ापे में एक साथ चार पुत्र पाकर उनका मन राजकाज से उचट गया। अतः रावण जैसे राक्षस उपद्रव करने लगे। वे चाहे जिसे उठाकर ले जाते थे। चाहे जिसे मार देते थे। स्त्री हो या पुरुष, कोई सुरक्षित नहीं था; पर चक्रवर्ती होने के बावजूद दशरथ चुप रहते थे। चूंकि अब वे नीति पथ से च्युत हो गये थे।

इस ओर ध्यान गया ऋषि विश्वामित्र का। वे केवल शास्त्र के ही नहीं, शस्त्र के भी साधक थे। उनके आश्रम में केवल यज्ञ और पठन-पाठन ही नहीं, अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण और नये शस्त्रों का संधान भी होता था। इस कारण दुष्ट राक्षसों की निगाह उन पर सबसे अधिक रहती थी। वे उनके काम में बाधा डालते थे। यज्ञ विध्वंस का अर्थ यही है। विश्वामित्र चाहते, तो शस्त्रों के ज्ञाता होने के कारण वे स्वयं राक्षसों को मार सकते थे; पर वे देश को एक नया और नीतिवान नेतृत्व भी देना चाहते थे। इसके लिए उनकी दृष्टि दाशरथी राम पर गयी।

विश्वामित्र जानते थे कि पुत्रमोह से पीडि़त दशरथ का मन कमजोर है। अतः उन्होंने दशरथ के कुलगुरु वशिष्ठजी को भी इस योजना में शामिल किया और इस प्रकार युवा राम-लक्ष्मण उन्हें मिल गये। इन दोनों को विश्वामित्र ने नये आयुधों का प्रशिक्षण देकर वर्तमान समय के लिए आवश्यक नीति बतायी। निर्धन, निर्बल, वंचित और पीडि़त जनों के लिए उनके मन में संवेदना जगायी। राम और सीता का विवाह कराया, जिससे तत्कालीन दो प्रबल साम्राज्य पक्की रिश्तेदारी में बंध गये। इसी से रावण का नाश होकर रामराज्य की स्थापना हुई।

अर्थात विश्वामित्र के पास जहां नीति थी, वहां श्रीराम के पास राक्षसों के समूल नाश की नीयत। इससे सुखद परिणाम प्राप्त हुए और अगले हजारों सालों के लिए देश की नियति निश्चित हुई।

ऐसे उदाहरण अनेक हैं। चाणक्य और चंद्रगुप्त, समर्थ स्वामी रामदास और छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह और बंदा बैरागी, स्वामी विद्यारण्य और हरिहर बुक्का, स्वामी विरजानंद और दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद, डा. हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर..  जैसे नाम इतिहास में अमर हैं।

स्पष्ट है कि नेतृत्व की ठोस नीति और प्रबल नीयत के मेल से ही नियति का निर्धारण होता है। भारत में आजादी के बाद कई ऐसे निर्णायक क्षण आये, जब यदि नेता, नीति और नीयत ठीक होती, तो नियति बदल जाती। देशवासी तब हर तरह के परिवर्तन के लिए तैयार थे; पर नीतिविहीन नेतृत्व की ढिलाई से ऐसा नहीं हो सका।

1947 में लोग नेहरुजी के दीवाने थे; पर अंग्रेजी संस्कारों में पले-बढ़े नेहरू कुछ नया नहीं कर सके। वे अंग्रेजों द्वारा निर्मित लकीर के ही फकीर बने रहे। 1971 में बंगलादेश निर्माण के बाद इंदिरा गांधी के पास भी ऐसा ही मौका था; पर अधिकाधिक सत्ता की भूख और संजय को अपना वारिस बनाने के चक्कर में उन्होंने आपातकाल लगा दिया। पंजाब की सत्ता के लिए उन्होंने हिन्दुओं और सिखों में दरार डाल दी। 1984 के चुनाव में राजीव गांधी को लोकसभा में 404 सीट मिली; पर अनुभवहीन राजीव एक ओर श्रीलंका में उलझ गये, वहां बोफोर्स का कलंक लगवाकर सत्ता से भी बाहर हो गये। इन कारणों से ही दोनों की निर्मम हत्या भी हुई।

कांग्रेस और कांग्रेसियों के लम्बे शासन के बाद राजनीति ने करवट ली। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी इस समय के दो प्रमुख चेहरे थे; पर संसद में उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था। उन्हें बार-बार ऐसे नेता और दलों का सहारा लेना पड़ता था, जो हवा का रुख देखकर नजरें बदल लेते थे। अतः नीति और नीयत होते हुए भी वे कुछ खास नहीं कर सके।

पर अब देश में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का युग है। लोकसभा में भा.ज.पा को अपने बल पर पूरा बहुमत प्राप्त है। अतः सहयोगी दल चुप रहते हैं। राज्यसभा में भी बहुमत की स्थिति बन रही है। अधिकांश राज्य भगवामय हैं। उधर कांग्रेस मरणासन्न है। वहां नीति और नीयत की बात तो दूर, अभी कोई नेता ही नहीं है। ऐसे माहौल में मोदी और शाह की जोड़ी पर उन दावों और वादों को पूरा करने का दारोमदार है, जो भा.ज.पा. वाले समय-समय पर कहते रहे हैं।

फिलहाल तो लग रहा है कि मोदी और शाह के नेतृत्व में पार्टी ठीक दिशा में बढ़ रही है। पहली बार पाकिस्तान की मांद में घुसकर उसे सबक सिखाया गया है। चीन से भी डोकलाम पर सीधे मुंह बातकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया गया। अमरीका के डोनाल्ड टंªप हों या रूस के ब्लादिमिर पुतिन, सबसे मोदी ने अच्छे और सार्थक संबंध बनाये हैं। हैरानी की बात तो ये हैं कि अरब देशों में नये मंदिर बन रहे हैं। अर्थात मोदी की विदेश नीति बिल्कुल ठीक दिशा में आगे बढ़ रही है।

इधर देश के अंदर भी काम की दिशा ठीक है। अमरनाथ यात्रा पहली बार इतनी शांति से हो रही है। कश्मीर के पत्थरबाज अभी तो चुप हैं। वहां जैसी हलचल है, लगता है कि अनुच्छेद 370 और 35 ए पर कुछ ठोस निर्णय जरूर होगा। ऐसा होते ही पूरे देश के नागरिकों के लिए वहां रहना और उद्योग स्थापित करने का रास्ता खुल जाएगा। इससे जम्मू-कश्मीर में आम लोगों की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार होगा।

शरीयत के नाम पर एक साथ तीन तलाक की तलवार न जाने कब से मुस्लिम महिलाओं के सिर पर लटकी हुई थी। दुनिया के कई मुस्लिम देश इस कुप्रथा से मुक्त हो चुके हैं; पर भारत में मुस्लिम वोट के लालची नेता और दल इसे सीने से चिपकाए रहे। अब मोदी सरकार ने तीन तलाक विरोधी नियम को संसद के दोनों सदनों में पारित करा लिया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन जाएगा। वह दिन मुस्लिम महिलाओं के लिए सचमुच मुक्ति दिवसहोगा।

पर काम अभी बहुत बाकी है। अब देश को प्रतीक्षा है समान नागरिक संहिता, गोवंश की संपूर्ण रक्षा, भारतीय भाषाओं का उत्थान, अल्पसंख्यकवाद की समाप्ति, पाकिस्तान का एक और विभाजन, घुसपैठियों को देशनिकाला, कश्मीरी हिन्दुओं की घरवापसी और बहुप्रतीक्षित श्रीराम मंदिर के निर्माण की। किसी कवि ने लिखा है -

कोई चलता पदचिन्हों पर, कोई पदचिन्ह बनाता है
बस वही सूरमा दुनिया में, सदियों तक पूजा जाता है।

देश को लम्बी प्रतीक्षा के बाद ठोस नीति और सही नीयत वाले नेता मिले हैं। ऐसे में देश की स्वर्णिम नियति भी निश्चित है। मराठी में कहते हैं याचि देहि, याची डोला।अर्थात इसी देह और इन्हीं आंखों से हम अपना लक्ष्य पूरा होते देखेंगे। भगवान करे ऐसा ही हो।

सोमवार, 1 जुलाई 2019

ब.स.पा. और परिवारवाद

कुछ दिन पूर्व बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने विधिवत घोषणा कर दी कि उनका भाई आनंद और भतीजा आकाश पार्टी में नंबर दो और तीन के पद पर रहेंगे। मीडिया में इस पर खूब चर्चा हुई। कहा गया कि कभी काशीराम और मायावती कांग्रेस के परिवारवाद के खुले विरोधी थे; फिर अब ब.स.पा. को क्या हो गया; वह परिवार के दलदल में क्यों कूद पड़ी ? इसका विश्लेषण करें, तो ध्यान में आएगा कि जैसे हर इन्सान को बुढ़ापे में कुछ रोग लगते हैं, ऐसा ही राजनीतिक दलों के साथ भी होता है। परिवारवाद ऐसा ही एक रोग है।

भारतीय राजनीति में परिवारवाद नयी बात नहीं है। असल में राजनीतिक दलों में भिन्नता विचारों के आधार पर होती है। किसी समय कांग्रेस आजादी के लिए संघर्ष करने वाली एक राष्ट्रीय संस्था थी। उसके मंच पर सब विचारों के लोग आते थे। इसीलिए आजादी मिलने पर गांधीजी ने कांग्रेस भंग करने को कहा था, जिससे लोग अपने विचारों के अनुसार राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ें; पर जवाहर लाल नेहरू उनकी यह विरासत छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी की हत्या के बाद तो वे पूरी तरह निरंकुश हो गये।

1947 तक कांग्रेस और उसमें शामिल समूहों का लक्ष्य आजादी था। अतः देश की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक स्थिति; खेती और उद्योग आदि के बारे में उनके विचार किसी को पता नहीं थे। इस पर सोचने का समय भी नहीं था; पर आजादी के बाद माहौल बदल गया। अब हर दल को इन पर अपने विचार सामने रखने जरूरी थे। नेहरू स्वभाव से वामपंथी थे। यद्यपि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी भी थी; पर उसका प्रभाव कुछ खास नहीं था। अतः नेहरू के विचार को लोगों ने मान लिया और वह मृत्युपर्यन्त राज करते रहे।

आगे चलकर कांग्रेस से डा. राममनोहर लोहिया, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव आदि कई नेता अलग हुए, जिन्होंने मुख्यतः समाजवाद के नाम पर नये दल बनाये। कुछ राज्यों में ये प्रभावी भी हुए; पर इनमें से किसी की देशव्यापी पहचान नहीं बन सकी। दूसरी और राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के पक्षधर ‘भारतीय जनसंघ’ के विस्तार का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था। संघ के जमीनी विस्तार के साथ ही जनसंघ भी बढ़ता रहा। कुल मिलाकर आज भी स्थिति यही है।

लेकिन धीरे-धीरे राजनीति में विचारों का महत्व घटने लगा। सोवियत रूस के विघटन से साम्यवाद अप्रासंगिक हो गया। अमरीका का प्रभुत्व बढ़ने से दुनिया का ध्यान पूंजीवादी व्यवस्था की ओर बढ़ा। चीन ने भी साम्यवाद के खोल में पंूजीवाद अपना लिया। भारत में यद्यपि गरीबों के वोट लेने के लिए कोई दल पूंजीवाद का खुला समर्थन नहीं करता; पर सच ये है अधिकांश दल इसी राह पर चल रहे हैं।

विचारों का आधार समाप्त होने पर राजनीतिक दलों ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए परिवार को आधार बना लिया। कांग्रेस में नेहरू परिवार का प्रभुत्व था। अतः जो नेता कांग्रेस से विचारों की भिन्नता का बहाना बनाकर अलग हुए, उनके दल परिवार आश्रित हो गये। कांग्रेस तो इसके लिए बदनाम थी ही; पर बाकी दलों का भी यही हाल हो गया। परिवारवाद के नाम पर नेहरू का विरोध लोहिया ने, इंदिरा गांधी का विरोध चरणसिंह ने, चरणसिंह का विरोध मुलायम और देवीलाल ने किया; पर आज इन सबके दल निजी दुकान बन कर रहे गये हैं। शरद पवार, उद्धव और राज ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चैटाला, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, लालू और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती, फारुख अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू, स्टालिन, केजरीवाल... आदि केवल नाम नहीं, एक राजनीतिक दल भी हैं। 

इन राजनीतिक दलों की स्थिति एक गृहस्थ जैसी है, जो वर्षों परिश्रम कर मकान, दुकान, जमीन और जायदाद बनाता है। वह चाहता है कि यह सम्पदा फिर उसके बच्चों को मिले। वह ऐसी वसीयत भी कर देता है। इसी तरह घरेलू दलों के मुखिया चाहते हैं कि उनके बाद यह राजनीतिक सम्पदा उनके बच्चे संभालें। फिर राजनीति करते हुए कार्यालय, गाडि़यां, बैंक बैलेंस जैसी चल-अचल सम्पत्ति भी बन जाती है। इनका मूल्य भी अरबों रु. में होता है। दल का जमीनी अस्तित्व भले ही न हो; पर चल-अचल सम्पत्ति का तो होता ही है। उसे अपने कब्जे में रखने के लिए दल के महत्वपूर्ण पद अपने परिवार में बने रहने जरूरी हैं।

लेकिन जैसे परिवार में भाइयों और फिर उनके बच्चों में सम्पत्ति के नाम पर झगड़े होते हैं, ऐसा ही इन घरेलू दलों में भी होता है। उ.प्र. में मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत पर कब्जे के लिए उनके भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश में झगड़ा है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की विरासत के लिए उद्धव और राज ठाकरे में टकराव है। आंध्र में एन.टी.रामराव की विरासत उनके बेटे की बजाय दामाद चंद्रबाबू नायडू ने कब्जा ली। चैटाला परिवार में सिर फुटव्वल का कारण भी यही है। बिहार में लालू के दोनों बेटे और बड़ी बेटी पिता की विरासत के असली वारिस बनना चाहते हैं। 

एक कारण और भी है। राजनीतिक जीवन में नेताओं पर कई आर्थिक और आपराधिक मुकदमे लग जाते हैं। इनमें से कुछ असली होते हैं, तो कुछ नकली। यदि पार्टी का मालिक कोई और बन जाए, तो मुकदमों में खर्च होने वाला भारी धन कहां से आएगा ? जेल हो गयी, तो उनकी रिहाई के लिए धरने-प्रदर्शन कौन करेगा ? इसलिए जैसे भी हो; पर पार्टी का अपनी घरेलू जायदाद बने रहना जरूरी है।

यही बात मायावती के साथ है। सुना है उनके पास पार्टी के नाम पर अरबों-खरबों रु. की चल-अचल सम्पत्ति है। कई मुकदमे भी चल रहे हैं। शरीर भी ढलान पर है। नालायक वोटर चाहे कहीं भी जाए; पर पैसा तो अपने पास ही रहना चाहिए। इसलिए पार्टी का घर में बने रहना जरूरी है। अविवाहित होने से उनकी संतान तो नहीं हैं; पर भाई और भतीजे तो हैं। इसलिए उन्हें नंबर दो और तीन के पद दे दिये हैं। यद्यपि पार्टी के निर्णयों में उनकी दखल देखकर यह सबको पहले से ही पता था; पर अब विधिवत घोषणा होने से कुछ छिपाव नहीं रहा। 

सच तो ये है कि बड़े से बड़े पहलवान को भी बुढ़ापे में रोग घेरते ही हैं। उसे चलने के लिए लाठी और बाल-बच्चों का सहारा लेना ही पड़ता है। यही स्थिति घरेलू राजनीतिक दलों की है। ब.स.पा. में भी यही हुआ है। औरों को भले ही इसमें कुछ आश्चर्य लगे; पर राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह एक सामान्य बात है।

बुधवार, 19 जून 2019

कांग्रेस को चाहिए एक असली गांधी

भारतीय राजनीति में कांग्रेस लम्बे समय तक शीर्ष पर रही; पर अब उसके अवसान के दिन हैं। कांग्रेस वालों को ये कहना ठीक ही है कि वे इतनी बुरी हार पर चिंतन-मंथन कर भावी सफलता की योजना बनाएंगे; पर बीमारी का मूल कारण समझे बिना उसका स्थायी इलाज संभव नहीं है। अर्थात इस पराजय की जड़ तक पहुंचे बिना वे इसका निदान नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें थोड़ा पीछे जाकर अपनी सफलता की पृष्ठभूमि समझनी होगी।

1947 के बाद कांग्रेस की चुनावी सफलता के दो बड़े कारण थे। इसमें से पहला था गांधीजी का नेतृत्व। यद्यपि 1948 में उनकी हत्या के चार साल बाद, 1952 में पहले आम चुनाव हुए; पर उनका नाम और नैतिक आभामंडल कांग्रेस की सदा सहायता करता रहा। 

असल में अफ्रीका से लौटने से पहले ही गांधीजी यहां चर्चित हो चुके थे। सत्याग्रह की शक्ति से उन्होंने वहां अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया था। भारत आकर कांग्रेस नेता और अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर वे पूरे देश में घूमे। इस दौरान उन्होंने गरीबी का नंगा नाच देखा। अतः उन्होंने जीवन भर आधे वस्त्र पहनने का निर्णय लिया। इससे उनके आभामंडल में त्याग की एक सुनहरी किरण और जुड़ गयी। 

गांधीजी जब भारत आये, तो कांग्रेस में नेतृत्व के नाम पर खालीपन था। लाल, बाल, पाल और गोखले राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो रहे थे। नेतृत्व की इस शून्यता को गांधीजी ने भरा। धीरे-धीरे गांधीजी और कांग्रेस एक दूसरे के पर्याय हो गये। यद्यपि वे कभी पार्टी के चवन्निया सदस्य भी नहीं बने; पर उनकी इच्छा और अनुमति के बिना वहां कुछ होता नहीं था। यहां त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख जरूरी है, जहां उनकी इच्छा के विरुद्ध सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बन तो गये; पर अंततः उन्हें त्यागपत्र देना ही पड़ा। आजादी से पूर्व सभी राज्यों की कांग्रेस समितियां सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थीं। चूंकि अध्यक्ष को ही भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनना था; पर गांधीजी ने वीटो लगा दिया। इस प्रकार उन्होंने पहले सुभाष चंद्र बोस को और फिर सरदार पटेल को हटाकर जवाहर लाल नेहरू के लिए रास्ता साफ कर दिया। अर्थात कांग्रेस में कुछ नहीं होते हुए भी सर्वेसर्वा गांधीजी ही थे।

गांधीजी के नैतिक आभामंडल का एक कारण यह भी था कि वे राजनीतिक दलदल में होते हुए भी कमल की तरह उसमें लिप्त नहीं हुए। उन्होंने पार्टी या शासन में कोई पद नहीं लिया और अपने किसी परिजन को भी राजनीति में नहीं आने दिया। आजादी मिलने पर जहां नेहरू और उनके साथी जश्न में डूबे थे, वहां गांधीजी बंगाल में हो रहे मजहबी दंगों के पीडि़तों के बीच घूम रहे थे। नेहरू के लिए सत्ता ही सब कुछ थी, जबकि गांधीजी के लिए देश। इसलिए गांधीजी के नाम और काम का लाभ कांग्रेस को हमेशा मिलता रहा।

कांग्रेस की सफलता का दूसरा कारण विपक्ष के पास नेतृत्व का अभाव था। आजादी से पहले विभिन्न विचारधारा वाले सब लोग कांग्रेस के बैनर पर काम करते थे। इसीलिए 1947 में गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने को कहा था; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी पकाई खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी की हत्या से वे शासन और पार्टी दोनों के मालिक हो गये। उनकी निरंकुशता से नाराज होकर जो लोग पार्टी से निकले, उन पर भी कांग्रेस का लेबल ही लगा रहा। इसलिए वे नेहरू से बड़ी लकीर नहीं खींच सके। आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. राममनोहर लोहिया, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई आदि ऐसे ही उदाहरण हैं। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी तक यही कहानी चलती रही।

पर इसके बाद परिदृश्य बदला। देश में वह पीढ़ी आ गयी, जिसने गांधीजी को देखा नहीं था। अतः कांग्रेस का प्रभाव घटने लगा। यद्यपि राजीव गांधी को अभूतपूर्व जीत मिली; पर वह इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण थी। उधर वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर आदि का तत्कालीन नेतृत्व भी मूलतः कांग्रेसी ही था। इसलिए एक ओर असली कांग्रेसी, तो दूसरी ओर कांग्रेस से निकले कांग्रेसी। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों ने असली कांग्रेसियों को ही समर्थन देना जारी रखा।

पर आज का राजनीतिक माहौल दूसरा है। भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा नेतृत्व है, जो कभी कांग्रेस में नहीं रहा। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा तक सब ऐसे ही नेता हैं। हर राज्य में ऐसे कई युवा नेता हैं, जिनका सामाजिक प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हुआ है। नये लोग भी लगातार तैयार हो रहे हैं। कांग्रेस में अपने परिवार को, जबकि संघ में देश को सर्वोपरि मानने की शिक्षा दी जाती है। संघ अपनी सैकड़ों समविचारी संस्थाओं, हजारों शाखाओं और लाखों सेवा कार्यों से देश के हर नागरिक तक पहुंच रहा है। कांग्रेस के पास इसका कोई तोड़ नहीं है। इसलिए वह देश के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो रही है।

इसी प्रकार कांग्रेस के पीछे गांधीजी जिस नैतिक बल के प्रतिनिधि थे, वह भूमिका भी अब संघ निभा रहा है। संघ के कार्यकर्ता वोट तो देते हैं। चुनाव के समय कुछ दिन जनसंपर्क भी करते हैं; पर फिर वे अपने दैनिक शाखा और सेवा के काम में लग जाते हैं। देश में पिछले दिनों लोकसभा के चुनाव हुए और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार बनी; पर संघ वाले इस कोलाहल से दूर हैं। अपै्रल से जून तक देश भर में लगभग 150 स्थानों पर संघ शिक्षा वर्ग लगे हैं। तीन से चार सप्ताह वाले इन वर्गों में लगभग 50,000 कार्यकर्ताओं ने प्रशिक्षण पाया है। जैसे आजादी के बाद के जश्न से दूर रहकर गांधीजी बंगाल में घूम रहे थे, ऐसे ही भा.ज.पा. की चुनावी सफलता से अलिप्त रहकर संघ के कार्यकर्ता घोर गरमी में प्रशिक्षण पा रहे हैं। 

1947 में कांग्रेस के पास नेहरू जैसा नेतृत्व और गांधीजी की नैतिक शक्ति थी, जबकि विपक्ष नेतृत्वहीन था। आज इसका उल्टा है। भा.ज.पा. के पास मोदी जैसा नेतृत्व और नैतिक शक्ति से लैस रा.स्व. संघ है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व दिग्भ्रमित है। तभी तो भारी पराजय के बावजूद कांग्रेस में नेता बदलने का साहस नहीं है, जबकि भा.ज.पा. ने भारी जीत के बावजूद नया अध्यक्ष चुन लिया।

ऐसे में यदि कांग्रेस वाले अपनी पार्टी को जिन्दा करना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक पदलिप्सा से दूर रहने वाले एक नये और असली गांधीजी ढूंढने होंगे; पर क्या यह संभव है ? शायद नहीं। क्योंकि कांग्रेस में तो लोग आते ही खाने और कमाने के लिए हैं। इसलिए कांग्रेस लगातार पीछे खिसक रही है। शायद यही उसकी नियति भी है।

शुक्रवार, 14 जून 2019

राजनीति में नंबर एक और दो


राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं; पर इसमें महत्व नंबर एक या दो होने का ही है। लोग भी तीसरे या चैथे को महत्व नहीं देते।


केरल का उदाहरण लें। इस लोकसभा चुनाव में वहां कांग्रेस को 15 तथा वामपंथियों को एक सीट मिली। दूसरी ओर भा.ज.पा. 15.6 प्रतिशत वोट पाकर भी खाली हाथ रह गयी। असल में सबरीमला मंदिर में हर आयु की महिलाओं के प्रवेश से हिन्दू नाराज थे। इसके विरुद्ध भारी आंदोलन हुआ, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और भा.ज.पा. आगे रहे। हिन्दू इस लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी वामपंथियों को पीटना चाहते थे। इसका सबसे अच्छा उपाय भा.ज.पा. को वोट देना था; पर वह वहां नंबर दो पर नहीं है। उनके वोट से भा.ज.पा. के एक-दो सांसद जीत जाते; पर वोटों के विभाजन से शेष सांसद वामपंथियों के बनते। इसलिए हिन्दुओं ने दूसरे पायदान पर खड़ी कांग्रेस को वोट दिया।

केरल में वामपंथियों की लड़ाई कांग्रेस से कम और भा.ज.पा. से अधिक है। अब तक वहां सैकड़ों कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं; पर संघ और भा.ज.पा. का हौसला कायम है। त्रिपुरा और बंगाल खोने के बाद अब वामपंथी किसी कीमत पर अपने इस अंतिम किले में भा.ज.पा. को घुसने देना नहीं चाहते। इसलिए अंदरखाने वामपंथियों ने अपने लोगों को कहा कि चाहे कांग्रेस जीत जाए, पर भा.ज.पा. नहीं जीतनी चाहिए। उधर भा.ज.पा. समर्थकों ने भी वामपंथियों को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस को वोट दे दिये। यानि भा.ज.पा. के नंबर दो न होने से कांग्रेस की चांदी हो गयी। दक्षिण के अन्य राज्यों में रा.स्व.संघ और समविचारी संस्थाओं का काम ठीकठाक है; पर वह भा.ज.पा. के वोटों में नहीं बदलता, चूंकि वहां क्षेत्रीय दल ही नंबर एक और दो की लड़ाई में हैं। 

दिल्ली में कांग्रेस यदि केजरीवाल से समझौता कर लेती, तो दोनों को लोकसभा में एक-दो सीट मिल जाती; पर पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस शून्य पर रहकर नंबर तीन पर आ गयी थी। शीला दीक्षित की निगाह अपनी खोई हुई जमीन पर है। इसलिए बड़े नेताओं के दबाव के बावजूद वे अकेले लड़ीं। इससे भा.ज.पा. सातों सीट जीत गयी; लेकिन कांग्रेस नंबर दो पर आ गयी। बड़बोले केजरीवाल नंबर तीन पर पहुंच गये। संभवतः विधानसभा चुनाव में उनका राजनीतिक अंत हो जाएगा।

बंगाल में भा.ज.पा. का अस्तित्व अब तक कुछ खास नहीं था। वामपंथी गुंडागर्दी से दुखी लोगों ने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाया; पर मुख्यमंत्री बनते ही वे भी उसी राह पर चल पड़ीं। ऐसे में विपक्ष की खाली जगह भरने भा.ज.पा. आगे आयी। उसने पिछले कुछ साल में जो जमीनी संघर्ष किया, उससे लोगों का भरोसा जगा है। अतः ममता से चिढ़े वामपंथियों और कांग्रेसियों ने इस बार उसे ही वोट दिये। इससे भा.ज.पा. नंबर दो पर आ गयी और अब विधानसभा में भी उसका दावा मजबूत हो गया है। 

उ.प्र. में इस समय भा.ज.पा. नंबर एक पर है। नंबर दो के दावेदार स.पा. और ब.स.पा. दोनों हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में स.पा. को पांच सीटें मिलीं; पर मायावती खाली हाथ रह गयीं। 2017 का विधानसभा चुनाव भा.ज.पा. ने जीता। स.पा. दूसरे और ब.स.पा. तीसरे नंबर पर रही। अब मायावती और अखिलेश दोनों नंबर दो बनना चाहते हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव वे मिलकर लड़े। इसमें ब.स.पा. का पलड़ा भारी रहा। अतः मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया। चूंकि अब लड़ाई दिल्ली की नहीं, लखनऊ की है। 

जो दल भा.ज.पा. के साथ गठबंधन में हैं, वहां भी यही समस्या है। बिहार में नीतीश कुमार का कद घट रहा है; पर अब वे लालू के साथ नहीं जा सकते। उधर लगातार मजबूत हो रही भा.ज.पा. अब बड़ा भाई बनना चाहती है। नीतीश जानते हैं कि मुख्यमंत्री पद छूटते ही उनका दल टूट जाएगा और फिर उन्हें कोई नहीं पूछेगा। इसलिए वे भा.ज.पा. को आंख दिखाते रहते हैं। यदि लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी दोनों ने आधी-आधी सीटें लड़ीं, तो भा.ज.पा. आगे निकल जाएगी। इसी से नीतीश बाबू घबराये हैं। यानि गठबंधन में होते हुए भी वहां लड़ाई नंबर एक और दो की है। 

महाराष्ट्र में भी यही स्थिति है। वहां मुख्यमंत्री पद भा.ज.पा. के पास है, जिस पर शिवसेना की भी निगाह है; लेकिन भा.ज.पा. अपने संख्याबल से उसे दबाकर रखती है। शिवसेना वाले पिछला विधानसभा चुनाव अकेले लड़कर हाथ जला चुके हैं। इस लोकसभा में वे यदि अकेले लड़ते, तो एक-दो सीट ही मिलती; पर मोदी लहर में वे भी किनारे लग गये। अब विधानसभा चुनाव पास है, इसलिए वे फिर आंख तरेर रहे हैं; लेकिन एक नंबर पर बैठी भा.ज.पा. किसी कीमत पर उन्हें मुख्यमंत्री का पद नहीं देगी।

पंजाब में भा.ज.पा. अकाली दल के साथ है। भा.ज.पा. का प्रभाव शहरी हिन्दुओं में, जबकि अकालियों का ग्रामीण सिखों में है। भा.ज.पा. ने जब एक सिख (नवजोत सिंह सिद्धू) को आगे बढ़ाया, तो बादल साहब नाराज हो गये। भा.ज.पा. ने टकराव मोल नहीं लिया, अतः सिद्धू कांग्रेस में चले गये। सिद्धू का झगड़ा बादल परिवार से है; पर भा.ज.पा. अभी गठबंधन के पक्ष में है। शायद प्रकाश सिंह बादल के रहते तक तो भा.ज.पा. चुप रहेगी; पर फिर वहां भी एक नंबर के लिए दोनों में तकरार होगी। 

कहते हैं राजनीति असंभव को संभव बनाने का नाम है। केन्द्र और राज्यों में नंबर एक और दो की लड़ाई जारी है। भविष्य में कौन कहां होगा, भगवान ही जानता है।

बुधवार, 12 जून 2019

विपक्षहीन राजनीति का दौर


2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 52 सीटें मिली हैं। कुल सीटों के दस प्रतिशत से कम होने के कारण उसे इस बार भी विपक्षी दल का दर्जा नहीं मिलेगा। अन्य किसी दल को भी इतनी सीट नहीं मिलीं। अतः कई राजनीतिक विश्लेषक चिंतित हैं। मजबूत विपक्ष न हो, तो सत्तापक्ष निरंकुश हो जाता है। अंग्रेजी कहावत है, ‘‘Power currupts & absolute power currupts absolutely.”

भारत में तीन राजनीतिक दलों की पहुंच पूरे देश में किसी न किसी रूप में रही है। ये हैं कम्यूनिस्ट, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी; पर वामपंथ सिकुड़ते हुए अब केरल तक सीमित रह गया। वहां भी इस लोकसभा में उसकी दुर्दशा के संकेत उसके लिए भयावह हैं। भा.ज.पा. सब ओर तेजी से बढ़ रही है, जबकि उसी अनुपात में कांग्रेस पीछे खिसक रही है।

कांग्रेस को इस बार दक्षिण ने सहारा दिया, अन्यथा वह 40 पर ही सिमट जाती। केरल में हिन्दू संगठनों ने सबरीमला मुद्दे पर जो माहौल बनाया, उसका लाभ भा.ज.पा. की बजाय कांग्रेस को मिला। तमिलनाडु में उसे मिली सीटों का कारण द्रमुक के साथ हुआ तालमेल है। कांग्रेस की अपनी सीट तो बस पंजाब में हैं। यद्यपि विश्लेषक उन्हें राहुल की बजाय अमरेन्द्र सिंह की सीटें मानते हैं। उधर तेलंगाना में मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने 12 कांग्रेस विधायकों को अपने पक्ष में मिला लिया। आंध्र में जगनमोहन को मिले बंपर बहुमत ने भी विपक्ष की जगह छीन ली है। इसलिए चिंताजनक प्रश्न यही है कि क्या भारत में विपक्षहीन राजनीति का दौर आ रहा है; और इसके परिणाम क्या होंगे ?

कई लोगों का मत है कि जैसे एक समय कांग्रेस में से टूटकर कई पार्टियां बनीं और उन्होंने ही केन्द्र और राज्यों में विपक्ष की भूमिका निभायी, ऐसा ही भा.ज.पा. के साथ भी होगा। भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हुई। उसकी विचारधारा विदेश प्रेरित, लोकतंत्र विरोधी और हिंसा की समर्थक है। यद्यपि भारत में उन्हें मजबूरी में चुनाव लड़ने पड़ते हैं। जिन देशों से उन्हें प्रेरणा मिलती थी, वह सोवियत रूस बिखर गया और चीन साम्यवादी खोल में पूंजीवादी हो गया। जब आधार ही नहीं रहा, तो भवन ने टूटना ही है। इसीलिए भारत में वामपंथ पचासों खेमों में बंट गया। कुछ राजनीति कर रहे हैं और शेष हिंसा। अर्थात वामपंथ अंतिम सांसे ले रहा है।

कांग्रेस का चरित्र नेहरू परिवार के कारण व्यक्तिवादी हो गया। अतः उससे निकले दल भी इसी प्रवृत्ति के हैं। एक पीढ़ी तक तो उनका काम ठीक चलता है; फिर बच्चों में घरेलू सम्पत्ति की तरह दल पर कब्जे के लिए भी कलह होती है। समाजवाद और सेक्यूलरवाद का मुखौटा लगाये मुलायम सिंह, लालू यादव, ओमप्रकाश चैटाला, चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार, नीतीश कुमार आदि मूलतः कांग्रेसी ही हैं। इनमें से अधिकांश घरेलू कलह में उलझे हैं। नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और मायावती अविवाहित हैं। अतः उनके दल उनके साथ ही तिरोहित हो जाएंगे; या फिर खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थीकी तरह नाम ही बचेगा।

भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज भारतीय जनसंघ का गठन नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने किया था; पर जनसंघ कभी घरेलू दल नहीं बना, चूंकि उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघका नैतिक बल था। कांग्रेस से निकले नेताओं के दल विभिन्न राज्यों में पनप गये; पर जनसंघ या भा.ज.पा. से निकले नेता सफल नहीं हो सके। उन्हें जैसे उडि़ जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आवेकी तरह फिर वहीं आना पड़ा।

इसका सबसे पहला प्रयास बलराज मधोक ने किया। वे जनसंघ के अध्यक्ष थे। 1947-48 में कश्मीर बचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बड़ा योगदान रहा है। उस समय वे वहां प्रांत प्रचारक थे। अर्थात जनसंघ से उनके वैचारिक मतभेद नहीं थे; पर वे अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद नहीं करते थे। कानपुर अधिवेशन में वे फिर अध्यक्ष बनना चाहते थे; पर कार्यकर्ताओं की इच्छा नहीं थी। अतः उन्होंने पार्टी छोड़ दी। फिर उन्होंने बहुत हाथ-पैर मारे; पर सफल नहीं हुए। आपातकाल के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टीमें हो गया और फिर भा.ज.पा. का उदय हुआ। बलराज मधोक भी राजनीति छोड़कर फिर रा.स्व.संघ के कार्यक्रमों में आने लगे।

कुछ ऐसा ही प्रयास उ.प्र. में कल्याण सिंह ने किया। वे एक जमीनी नेता रहे हैं। अतः भा.ज.पा. सरकार में वे मुख्यमंत्री बने; पर उनकी कुरसी हथियाने के इच्छुक लोगों की पहुंच प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक थी। अतः उन्हें हटाकर पहले रामप्रकाश गुप्ता और फिर राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बन गये। इससे नाराज होकर कल्याण सिंह ने अपनी पार्टी बनायी और अपने धुर विरोधी मुलायम सिंह से हाथ मिला लिया; पर सफल नहीं हुए। कल्याण सिंह अब राजस्थान के राज्यपाल हैं और उनका बेटा राजवीर सिंह उ.प्र. से भा.ज.पा. सांसद।

कल्याण सिंह की तरह उमा भारती भी जमीनी नेता हैं। 2003 में उन्होंने म.प्र. को कांग्रेस से छीना था। मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही हुबली कांड के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा; पर उससे बरी होने पर उन्हें उनकी कुरसी नहीं दी गयी। यह उनके साथ स्पष्ट अन्याय था। नाराज होकर उन्होंने भारतीय जनशक्ति पार्टीबनायी; पर सफल नहीं हुईं। अंततः वे फिर भा.ज.पा. में शामिल होकर अटलजी और नरेन्द्र मोदी के साथ केन्द्रीय मंत्री बनीं।

गुजरात में भा.ज.पा. को जमाने में नरेन्द्र मोदी और शंकर सिंह बाघेला ने अथक परिश्रम किया। बाघेला मुख्यमंत्री बनना चाहते थे; पर वरिष्ठता के कारण बने केशुभाई पटेल। इससे नाराज होकर उन्होंने सरकार गिरायी; पर मोदी जैसे खिलाड़ी से वे पार नहीं पा सके। उन्होंने भी अपना दल बनाया; पर गुजरात के राजनीतिक बियाबान में खो गये। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने भी भा.ज.पा. को चोट तो पहुंचाई; पर वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके और अब फिर भा.ज.पा. में ही हैं।

इन प्रकरणों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि भा.ज.पा. से अलग होने वाले सफल नहीं हुए, जबकि कांग्रेस से अलग होने वाले अधिकांश लोग सफल हो गये। इसका कारण दोनों के स्वभाव का अंतर है। कांग्रेस पिछले 50 साल से एक खानदानी पार्टी है। उसके वोटर को भी यह खराब नहीं लगता; पर भा.ज.पा. का वोटर व्यक्ति की बजाय संगठन और विचार को महत्व देता है। इसलिए भा.ज.पा. में से ही सक्षम विपक्ष निकलने का विचार केवल भ्रम है।

लेकिन विपक्ष की जरूरत का यक्ष प्रश्न फिर भी विद्यमान है। कम्यूनिस्ट अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं। कांग्रेस में उस परिवार से पीछा छुड़ाने का दम नहीं है, जो उसकी बरबादी का कारण है; और भा.ज.पा. में से निकला विपक्ष सफल नहीं हो सकता। तो क्या देश में अब विपक्षहीन राजनीति चलेगी ? इसके लाभ और हानि पर सबको सोचना चाहिए।

बुधवार, 5 जून 2019

अब अलोकतांत्रिक दलों की बारी


2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी हार सामान्य घटना नहीं है। यह इस बात की प्रतीक है कि अब भारतीय राजनीति में कांग्रेस जैसे विचारहीन और अलोकतांत्रिक दलों के दिन पूरे हो रहे हैं।

1947 से पहले कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में आजादी के लिए अहिंसक संघर्ष करने वाले सभी लोगों और समुदायों का एक मंच थी। इसीलिए आजादी के बाद उन्होंने इसे भंग करने का सुझाव दिया था, जिससे लोग अपने विचारों के अनुसार राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ें। फिर जनता जिसे चुने, वह देश चलाये; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी इससे बहुत दुखी थे। उनकी हत्या देश के लिए दुखद थी; पर इससे नेहरू की लाटरी खुल गयी। क्रमशः इस परिवार ने पार्टी पर कब्जा कर लिया। तब से कांग्रेस पार्टी नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और अब मैडम सोनिया परिवार की बंधक है।

कांग्रेस का इतिहास रहा है कि जिस किसी ने इस प्रथम परिवार से आगे बढ़ने की कोशिश की, उसे पटरी से उतार दिया गया। गांधीजी ने कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में लोकतांत्रिक विधि से अध्यक्ष चुने गये सुभाष चंद्र बोस को साल भर भी टिकने नहीं दिया। उन्हें भय था कि जनता और सेना में लोकप्रिय सुभाष बाबू कहीं जवाहर लाल नेहरू से आगे न निकल जाएं। फिर उन्होंने कुशल प्रशासक और राज्यों से समर्थन प्राप्त सरदार पटेल को पीछे कर नेहरू को प्रधानमंत्री बनवा दिया। नेहरू ने भी राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, मालवीयजी, डा. अम्बेडकर, आचार्य कृपलानी जैसे योग्य नेताओं को सदा हाशिये पर ही रखा।

उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। उन्होंने यही व्यवहार मोरारजी देसाई, के.कामराज, जगजीवनराम, नीलम संजीव रेड्डी आदि के साथ किया। इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद राजीव ने कांग्रेस के अनुभवी और वरिष्ठतम नेता प्रणव मुखर्जी को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैडम सोनिया के कारण शरद पवार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, के.चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी आदि पार्टी से बाहर हुए। आज ये सब नेता और उनके दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के विकल्प बन चुके हैं।

राहुल के कारण हेमंत बिस्व शर्मा ने पार्टी छोड़ी और अब वे पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस की जड़ंे खोद रहे हैं। कई बार अपमानित होकर पंजाब के कैप्टेन अमरिन्द्र सिंह ने जब पार्टी छोड़ने की धमकी दी, तब जाकर उन्हें पिछली विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया। अन्यथा वहां भी कांग्रेस साफ हो जाती। पूरे देश में जमीनी नेता कांग्रेस से दूर जा रहे हैं, चूंकि इस परिवार को यह पसंद नहीं है कि कोई इनसे आगे निकल सके।

इस कांग्रेसी कुसंस्कृति से निकले बाकी दलों का भी यही हाल है। मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव, अजीत सिंह, शरद यादव, रामविलास पासवान, ओमप्रकाश चैटाला, चंद्रबाबू नायडू, देवेगोड़ा, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती आदि ऐसे ही नाम हैं। सत्ता के साथ रहना ही इनकी एकमात्र नीति है। मायावती, प्रकाश सिंह बादल, ठाकरे और करुणानिधि के पुत्र स्टालिन जैसे एक व्यक्ति एक पार्टीके पुरोधा जब तक जीवित हैं, तब तक पार्टी उनकी जेब में रहेगी। उसके बाद उसमें टूट-फूट तय है। हमारा लोकतंत्र ऐसे ही अलोकतांत्रिक, घरेलू और जातीय दलों के कंधे पर आगे बढ़ रहा है। इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे ?

इस बारे में अपवाद दो ही दल हैं। एक हैं वामपंथी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। कई टुकड़ों में बंटा वामपंथ लगातार सिकुड़ रहा है, चूंकि वह धर्मविरोधी और हिंसाप्रेमी है। भारतीय जनता धर्मप्राण है और वह राजनीतिक हिंसा पसंद नहीं करती। इसलिए जैसे ही उसे विकल्प मिलता है, वह वामपंथ को खारिज कर देती है। बंगाल में यह विकल्प ममता बनर्जी, त्रिपुरा में भा.ज.पा. और केरल में कांग्रेस बन गयी है।

जहां तक भा.ज.पा. की बात है, उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुछ नियंत्रण रहता है। इसीलिए पहले जनसंघ और आज भा.ज.पा. लोकतांत्रिक बनी हुई है। उसका कोई अध्यक्ष एक-दूसरे का रिश्तेदार नहीं हैं। घरेलू दलों में सबको पता है कि नेताजी जब तक चाहेंगे, तब तक अध्यक्ष रहेंगे और उसके बाद उनका बेटा या बेटी इस कुरसी पर बैठेगा। भा.ज.पा. में नया अध्यक्ष बनना तय है; पर वह कौन होगा, कहना कठिन है। उसके नाम पर चिंतन और मंथन हो रहा है। संभवतः जुलाई में यह तय हो सकेगा।

2019 के चुनाव में यद्यपि कई घरेलू दलों को सफलता मिली है। इनमें नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी और स्टालिन के नाम विशेष हैं; पर ये भी अधिक दिन नहीं टिक सकेंगे। भारत में कांग्रेस के कारण घरेलू दलों का प्रादुर्भाव हुआ है। अब जैसे-जैसे कांग्रेस का अवसान हो रहा है, वैसे-वैसे ये दल भी अंत को प्राप्त होंगे। बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव में यदि भा.ज.पा. जीत गयी, तो ममता की पार्टी टूट जाएगी। बिहार में लालू और उ.प्र. में मुलायम का जलवा समाप्ति पर है। बिना किसी बैसाखी के नीतीश कुमार भी बेकार हैं। उड़ीसा में नवीन बाबू और पंजाब में प्रकाश सिंह बादल भी अब बुजुर्ग हो चले हैं। उनके जाते ही उनके दल भी बिखर जाएंगे। दक्षिण में ऐसे दलों को समाप्त होने में शायद थोड़ा समय और लगेगा। यद्यपि कर्नाटक से इसकी शुरुआत हो चुकी है।

असल में कांग्रेस ने प्रथम परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कभी किसी क्षेत्रीय नेता को नहीं उभरने दिया; पर भा.ज.पा. में राज्यों के नेताओं केे भी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावनाएं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह (उ.प्र.), नितिन गडकरी (महाराष्ट्र), लालकृष्ण आडवानी, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह (गुजरात), कुशाभाऊ ठाकरे (म.प्र.), बंगारू लक्ष्मण और वेंकैया नायडू (आंध्र), जना कृष्णमूर्ति (तमिलनाडु)...आदि इसके उदाहरण हैं। अतः भा.ज.पा. के केन्द्र और इन राज्यों में प्रभावी होने पर ये घरेलू और जातीय दल भी समाप्त होंगे।

राज्य या क्षेत्रीय दल सदा बुरे नहीं होते; पर जब वे अपने परिवार, जाति, जिले या राज्यहित के आगे देशहित को भूल जाते हैं, तब उनका अस्तित्व देश के लिए घातक हो जाता है। दुर्भाग्यवश अधिकांश दलों की स्थिति यही है। वे कांग्रेस के साथ हों या भा.ज.पा. के; पर अब इन क्षेत्रीय, जातीय, घरेलू और अलोकतांत्रिक दलों के दिन सीमित रह गये हैं।

भारत में सरकार बनाने और चलाने के लिए तो नियम हैं; पर राजनीतिक दलों के निर्माण और संचालन के नियम नहीं है। अलोकतांत्रिक दलों के कारण हमारा लोकतंत्र तमाशा बन कर रह गया है। भा.ज.पा. को इस बार बंपर बहुमत मिला है। अगले साल राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जाएगा। यदि वह साहसपूर्वक कुछ ऐसे नियम बनाये, जिससे सब दलों में आतंरिक लोकतंत्र बहाल हो सके, तो देश का बहुत भला होगा।

सोमवार, 3 जून 2019

कांग्रेस और सोनिया परिवार का भविष्य

भारत में हर पांच वर्ष में होने वाला लोकतंत्र का महापर्व सम्पन्न हो चुका है। चुनाव हो गये, परिणाम आ गये। बंगाल में हिंसा हुई। जिन्हें हार का डर था, उन्होंने वोट मशीनों को लेकर खूब हल्ला किया; पर गिनती के बाद अब वे अपने बाल नोच रहे हैं। भा.ज.पा. को पहले से भी अधिक सीटें मिली। जैसे गेहूं के साथ खरपतवार को भी पानी लग जाता है, वैसे ही रा.ज.ग. के उसके साथियों को भी फायदा हुआ; पर आठ सीटें बढ़ने के बावजूद कांग्रेस की लुटिया डूब गयी, इसमें कोई संदेह नहीं है।


इस बीच मोदी सरकार बनी और मंत्रियों ने काम संभाल लिया। अब वे सरकारी काम में व्यस्त हैं। उधर कांग्रेस अपने भविष्य के लिए चिंतित है। राहुल बाबा की मुख्य भूमिका वाला नाटक ‘त्यागपत्र’ मंचित हो रहा है। उन्होंने फरमान जारी किया है कि एक महीने में कांग्रेस अपना नया अध्यक्ष ढूंढ ले, जो सोनिया परिवार से न हो। इशारा सीधे-सीधे प्रियंका वाड्रा की ओर है। उन्हें लाये तो इस आशा से थे कि उ.प्र. में कुछ सीट बढ़ेंगी; पर छब्बे बनने के चक्कर में चैबेजी दुब्बे ही रह गये। पिछली बार दो सीट मिली थी, जो घटकर इस बार एक ही रह गयी। अपनी खानदानी सीट पर ही बेचारे अध्यक्षजी बुरी तरह हार गये। किसी ने ठीक ही कहा है -

न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम
न इधर के रहे न उधर के रहे।।

सच तो ये है कि यदि भा.ज.पा. पांच साल पहले स्मृति ईरानी की ही तरह किसी दमदार व्यक्तित्व को रायबरेली में लगा देती, तो कांग्रेस की मम्मीश्री को भी लेने के देने पड़ जाते; पर उनकी किस्मत बेटाजी के मुकाबले कुछ ठीक थी। लेकिन बुरी तरह हारने के बावजूद बेटाजी की मानसिकता अब भी खुदाई सर्वेसर्वा वाली है। यदि वे अध्यक्ष रहना नहीं चाहते, तो पार्टीजन किसे चुनें, इससे उन्हें क्या मतलब है; पर उन्हें पता है कि यह सब नाटक है, जो कुछ दिन में शांत हो जाएगा। इसके बाद पार्टी फिर से मां-बेटा और बेटी-दामाद के अधीन हो जाएगी।

कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, ये शीशे की तरह साफ है। उत्तर भारत में उसका सफाया हो चुका है। उसे इस बार जो सीट मिली हैं, उनमें से पंजाब की सीटें वस्तुतः अमरिन्द्र सिंह की सीटें हैं। अगर कल वे किसी कारण से पार्टी छोड़ दें, या अपना निजी दल बना लें, तो वहां कांग्रेस को कोई पानी देने वाला भी नहीं बचेगा। और इस बात की संभावना भरपूर है। क्योंकि राहुल के दरबार में केवल चमचों को ही पूछा जाता है, जबकि कैप्टेन अमरिन्द्र सिंह जमीनी नेता हैं। फौजी होने के कारण वे काम में विश्वास रखते हैं, चमचाबाजी में नहीं।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीते थे। इससे उसके हौसले बुलंद थे। राहुल को लगता था कि इन तीनों राज्यों से कम से कम कांग्रेस को 50 सीटें मिल जाएंगी; पर मिली केवल तीन। कमलनाथ ने एक तीर से दो शिकार किये। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को और भावी मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को निबटा दिया। दिग्विजय का तो अब कोई भविष्य नहीं है; पर सिंधिया के भा.ज.पा. में चले जाने की पूरी संभावना है।

राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की आपसी लड़ाई ने खेल बिगाड़ दिया। पायलट चाहते थे कि अशोक गहलोत की नाक थोड़ी छिले, जिससे वे पूरे मुख्यमंत्री बन सकें; पर जनता ने दोनों की नाक ही काट ली। अब म.प्र. और राजस्थान की सरकारों पर भी खतरा मंडरा रहा है। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भूपेश बघेल ने अच्छा प्रदर्शन किया था। कांग्रेस को असली जीत तो वहीं मिली थी; पर मोदी लहर के चलते लोकसभा चुनाव में बाजी पलट गयी।

कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन लचर रहा। अब वहां की सरकार भी खतरे में है। कांग्रेस की इज्जत केवल केरल में बची, जहां मुस्लिम लीग का उसे समर्थन था। राहुल भी सुरक्षित सीट की तलाश में वायनाड इसीलिए गये थे। शेष दक्षिण में तेलंगाना में तीन और तमिलनाडु में द्रमुक के समर्थन से उसे आठ सीट मिली हैं। अर्थात पंजाब, केरल और तमिलनाडु के अलावा सभी जगह कांग्रेस को औरों द्वारा छोड़ी गयी जूठन से ही संतोष करना पड़ा है। 30-40 और उससे अधिक सीटों वाले राज्य में एक या दो सीट जूठन ही तो है।

अब प्रश्न यह है कि कांग्रेस की यह दुर्दशा क्यों हुई ? उत्तर भी सीधा सा है कि इसका कारण लचर नेतृत्व है। असल में कांग्रेस गांधी-नेहरू और अब सोनिया परिवार की जकड़ से बाहर आना नहीं चाहती। इंदिरा गांधी के समय से ही पार्टी को इस परिवार ने बंधक बना रखा है। जैसे लम्बे समय तक पिंजरे में बंद पक्षी पिंजरा खुलने पर भी बाहर नहीं निकलता, यही हालत कांग्रेस वालों की हो गयी है। उनका मनोबल गिर चुका है। इस परिवार से हटकर जो लोग कांग्रेस में आगे बढ़े, उनका अपमान कौन भूल सकता है ? सीताराम केसरी को पार्टी के कार्यालय में धक्के देकर कुर्सी से हटाया गया था। नरसिंहराव के शव तक को भी कांग्रेस दफ्तर में नहीं आने दिया गया था। मनमोहन सिंह केबिनेट के निर्णय को प्रेस वार्ता में राहुल ने फाड़ दिया था। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष बनकर अपमानित होने से अच्छा चुपचाप रहकर जो लाभ मिल सके, उसे उठाना ही है। इसीलिए मनोबल से शून्य सब कांग्रेसी फिर से राहुल को ही अध्यक्ष बने रहने के लिए हुआं-हुआं कर रहे हैं।

सच तो ये है कि सोनिया परिवार भी कांग्रेस से कब्जा नहीं छोड़ सकता। कांग्रेस भले ही रसातल में हो; पर उसके पास अथाह सम्पत्ति तो है ही। यदि कोई और अध्यक्ष बन गया, और उसने सोनिया परिवार को इस सम्पदा से बेदखल कर दिया; तो फिर ये लोग कहां जाएंगे ? सोनिया परिवार के हर सदस्य पर घोटालों के कारण जेल का खतरा मंडरा रहा है। यदि राहुल अध्यक्ष बने रहेंगे, तो उनके जेल जाने पर पूरी पार्टी हंगामा करेगी; और यदि वे अध्यक्ष न रहे, तो कोई क्यों चिल्लाएगा ? इसलिए चाहे जो हो; पर राहुल ही पार्टी के अध्यक्ष बने रहेंगे; और यदि कोई कुछ दिन के लिए खड़ाऊं अध्यक्ष बन भी गया, तो पैसे की पावर सोनिया परिवार के हाथ में ही रहेगी।

इसलिए फिलहाल तो कांग्रेस और राहुल दोनों का भविष्य अंधकार में ही है। केरल के अलावा पूरे देश में किसी राज्य में कांग्रेस सांसदों की संख्या दहाई में नहीं है। कांग्रेस वाले इतने निराश हो चुके हैं कि उन्होंने एक महीने तक टी.वी. की वार्ताओं में भी जाने से मना कर दिया है। ठीक भी तो है; अध्यक्षजी की मूर्खताओं के लिए वे गाली क्यों खाएं ?

यद्यपि लोकतंत्र में सबल विपक्ष का होना भी जरूरी है; पर कांग्रेस जिस तरह लगातार सिकुड़ और सिमट रही है, वह चिंताजनक है। अतः जो जमीनी और सचमुच देश से प्यार करने वाले कांग्रेसी हैं, उन्हें एक साथ मिलकर सोनिया परिवार के विरुद्ध विद्रोह करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि सबसे पहले वे कांग्रेस में लोकतंत्र बहाल करें। सोनिया परिवार भारत में रहे या विदेश में; संसद में रहे या जेल में। उसे अपने हाल पर छोड़ दें। चूंकि व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश है।

पर क्या वे ऐसी हिम्मत करेंगे ? कांग्रेस का भविष्य इसी से तय होगा। 

रविवार, 31 मार्च 2019

भा.ज.पा. के साहसी निर्णय

पूरे देश में लोकसभा चुनाव की गरमी पूरे यौवन पर है। प्रत्याशियों की घोषणाएं हो रही हैं। हर दिन दलबदल के समाचार सुर्खियां बन रहे हैं। इस दल से उसमें तथा उससे इसमें आने को स्वार्थी नेतागण दलबदल की बजाय दिलबदल कह रहे हैं; पर सच्चाई सबको पता है। आयाराम-गयाराम की राजनीति भारत में नयी नहीं है। ऐसे अवसरवादी लोगों के लिए ही ‘‘जहां मिलेगी तवा परात, वहीं कटेगी सारी रात’’ वाली कहावत बनी है।


इस चुनावी दौर में वंशवाद भी अपने पूरे वीभत्स रूप में प्रकट होता है। किसी का टिकट काटकर उसकी पत्नी या बेटे को देना आम बात है। वंशवादी राजनीति की नींव भारत में कांग्रेस ने डाली। मोतीलाल नेहरू ने राजनीति छोड़ते समय गांधी जी से यह वचन ले लिया था कि भविष्य में वे हर जगह जवाहरलाल को महत्व देंगे। इसका रहस्य क्या था, ये तो पता नहीं; पर गांधी जी ने इस वचन को आजीवन निभाया। इससे देश को कितनी हानि हुई, इसका संपूर्ण विश्लेषण अभी बाकी है; पर इतना निश्चित है कि कांग्रेस में यह बीमारी इंदिरा गांधी, संजय, राजीव, सोनिया, राहुल और अब प्रियंका तक निर्बाध रूप से चल रही है।

इसकी देखादेखी देश के अधिकांश राजनीतिक दल आज निजी जागीर बन कर रह गये हैं। अखिलेश यादव, मायावती,  अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल, लालू यादव, ओमप्रकाश चैटाला, रामविलास पासवान, चंद्रबाबू नायडू, के.चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, शरद पवार, उद्धव ठाकरे.. आदि केवल नाम नहीं, एक पार्टी भी हैं। इनकी इच्छा ही वहां आदेश माना जाता है। इनके पैर छुए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता। ये बात दूसरी है कि पीढ़ी बदलते ही पार्टी में जूतमपैजार होने लगती है और फिर उसे टूटते देर नहीं लगती। उ.प्र. में मुलायम परिवार, हरियाणा में चैटाला परिवार, महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। आंध्र में चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर की विरासत कब्जा ली, जबकि एन.टी.रामाराव के बेटे पीछे रह गये।

कुछ दलों में परिवार की विरासत के साथ ही जातीय  या मजहबी किलेबंदी भी पूरी है। एक जाति या मजहब का एक दल। मायावती, पासवान, अखिलेश, नीतीश, लालू आदि का अपने जाति पर कब्जा है। ये जहां रहेंगे, उनके सजातीय वोट भी वहां चले जाते हैं। इसलिए चुनाव के समय बने गठबंधन केवल जातीय वोटों का जोड़तोड़ ही होते हैं। वहां न समान विचारधारा है और न कार्यक्रम। अजीत सिंह, महबूबा, उमर अब्दुल्ला, औवेसी, राजभर जैसे कई छुटभैये नेता किसी एक राज्य के कुछ जिलों में प्रभाव रखते हैं। चुनाव में इनकी पूछ भी बढ़ जाती है।

इसी तरह राजनेताओं के लिए उम्र कुछ अर्थ नहीं रखती। वह एक बढ़ती संख्या मात्र है। यदि भावना में बहकर उनके मजहबी, जातीय या क्षेत्रीय वोटर गोलबंद हो जाते हैं, तो वे मरते दम तक चुनाव लड़ सकते हैं। बुढ़ापा भगाने की सर्वश्रेष्ठ दवा चुनाव ही है। देवेगोड़ा, मुलायम सिंह, मनमोहन सिंह, नरसिंहराव, अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल आदि उदाहरण सामने हैं।

ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह के नेतृत्व में कुछ नये और शुभ संकेत दिये हैं। उन्होंने वंशवाद और मरते दम तक की जाने वाली राजनीति पर गहरी चोट की है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अपने मंत्रिमंडल में उन लोगों को रखा, जिनकी आयु 75 वर्ष से कम थी। अब उन्होंने ऐसे सांसदों को फिर से टिकट नहीं दिया, जो इस आयुसीमा से अधिक के हो गये हैं। लालकृष्ण आडवानी, भुवनचंद्र खंडूरी, भगतसिंह कोश्यारी की सीटों पर नये प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं। कलराज मिश्र ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। मुरली मनोहर जोशी चुप हैं; पर यह स्पष्ट है कि उन्हें भी टिकट नहीं मिलेगा।

उत्तराखंड में खंडूरी जी का संबंध कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के परिवार से है। यद्यपि वे भी चरणसिंह की तरह दलबदल के उस्ताद थे। इस परिवार में विजय बहुगुणा, साकेत बहुगुणा, रीता बहुगुणा जोशी और खंडूरी जी की बेटी आजकल भा.ज.पा. की ओर से राजनीति में  सक्रिय है। खंडूरी जी चाहते थे कि भा.ज.पा. उनके बेटे मनीष को उनकी जगह सांसद का चुनाव लड़ाये; पर पार्टी ने मना कर दिया। अतः उसने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इसमें परिवार की कितनी शह है, यह तो समय ही बताएगा।

वंशवादी कांग्रेस में तो अधिकांश टिकट घूमफिर कर कुछ परिवारों में ही बंट जाते हैं। भा.ज.पा. में यद्यपि निचले स्तर पर तो वंशवाद है; पर शीर्ष नेतृत्व इससे मुक्त है। काफी समय से यह तो साफ था कि आडवाणी जी इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे; पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, इस बारे में कई चर्चाएं थीं। उनका बेटा राजनीति से दूरी बनाकर अपने कारोबार में व्यस्त रहता है; पर उनकी बेटी प्रतिभा सामाजिक और राजनीतिक कामों में सक्रिय है। वह दिल्ली और गांधीनगर में प्रायः पिता के साथ दिखायी भी देती है। लोग सोचते थे कि वह उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी होगी; पर इससे भा.ज.पा. में भी शीर्ष नेतृत्व पर वंशवाद का आरोप लग जाता। अतः आडवाणी जी ने इसके लिए साफ मना कर दिया।

आडवाणी जी पर आज पार्टी में भले ही कोई जिम्मेदारी न हो; पर भा.ज.पा. को दो से 200 तक पहुंचाने में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। उन्हें राजनीति में आदर्श माना जाता है। एक समय तो अटल जी की बजाय भा.ज.पा. में उन्हें ही संघ का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता था। इसलिए आडवाणी जी और भा.ज.पा. के वर्तमान नेतृत्व का यह निर्णय बहुत ही अच्छा है। इससे देश भर के पार्टीजनों को स्पष्ट संदेश गया है।

भा.ज.पा. को आगे बढ़कर कुछ नियम और भी बनाने चाहिए। जैसे एक परिवार से एक ही व्यक्ति चुनावी राजनीति में रहे। इससे मेनका गांधी, राजनाथ सिंह और डा. रमन सिंह जैसों को तय करना होगा कि राजनीति में उन्हें रहना है या उनके बेटों को। इसी तरह चुनावी राजनीति में आने और जाने की आयुसीमा का निर्धारण भी जरूरी है। कई समाजशास्त्रियों का मत है कि यह 50 और 75 होनी चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कुछ करने के लिए 25 साल कम नहीं होते। महिलाओं का एक तिहाई प्रतिनिधित्व भी होना ही चाहिए।

यद्यपि ऐसे नियम बनाने के लिए सब दलों की सहमति और संविधान में संशोधन जरूरी है; पर किसी भी चीज की शुरुआत कहीं से तो होती ही है। भा.ज.पा. ने वंशवाद और चुनावी राजनीति में आयुसीमा पर एक बड़ी लाइन खींची है। यह जितनी दूर तक जाएगी, देश का उतना ही भला होगा।