बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

पर्यावरण संरक्षण और हमारी मानसिकता

पर्यावरण संरक्षण आजकल एक चर्चित विषय है। 15 अगस्त, 2019 को दिल्ली के लालकिले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने एकबारी (सिंगल यूज) प्लास्टिक को बंद करने का आग्रह किया है। तबसे देश भर में एक अभियान सा चल पड़ा है। कहीं जुलूस निकाल कर कपड़े के थैले बंट रहे हैं, तो कहीं प्लास्टिक की थैली में सामान देने वाले दुकानदार और ठेले वालों से जुर्माना लिया जा रहा है। कई ग्राहक भी अब कपड़े के थैले या कागज के लिफाफे में सामान देने का आग्रह करते हैं। मोदी को यह श्रेय जरूर है कि जैसे उन्होंने सफाई को राष्ट्रीय अभियान बना दिया, वैसा ही वातावरण अब प्लास्टिक के विरुद्ध बन रहा है।

लेकिन पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी डंडे से अधिक जरूरत हमारी मानसिकता बदलने की है। आज से 30-40 साल पहले हम बाजार से सब्जी या दूध लाने के लिए घर से थैला या बरतन लेकर जाते थे, फिर हमारा यह स्वभाव क्यों बदल गया ? तब इसके लिए हम पैदल चले जाते थे, फिर अब हमें दुपहिया वाहन की जरूरत क्यों होती है; थैला हाथ में लेकर जाना अब पिछड़ापन कैसे हो गया ? यह सब प्रश्न विचारणीय हैं।

जहां तक कागजी लिफाफों की बात है, तो ये ध्यान रहे कि कागज पेड़ों से बनता है। जितना अधिक लिफाफे प्रयोग होंगे, उतने ही पेड़ भी कटेंगे। मुंबई की आरे कालोनी का मामला अभी गरम है, जहां स्थानीय जनता के विरोध के बावजूद दो हजार से अधिक पेड़ कट गये। चूंकि वहां मैट्रो यात्रियों की कारों के लिए जगह बनानी है। इसलिए हमें ये समझना होगा कि लिफाफे प्लास्टिक थैली का विकल्प नहीं है। एक समय पर्यावरण प्रेमियों ने घटते पेड़ों के कारण लिफाफों का विरोध किया, तो उसके विकल्प में हल्की प्लास्टिक थैलियां आ गयीं। इनका प्रयोग इतना आसान था कि फल और सब्जी ही नहीं, दूध और गरम चाय तक लोग इसमें लाने लगे।

पर फिर इन थैलियों में भरी घरेलू गंदगी से नाले चोक होने लगे। सड़कों पर घूमते आवारा पशु इन्हें खाकर मरने लगे। प्लास्टिक सैकड़ों साल तक नष्ट नहीं होता, यह भी लोगों को पता लगा। नदी, तालाब और समुद्र की मछलियां इससे मरने लगीं; पर सरकार जहां कूड़ाघर बनाने का प्रस्ताव करती है, वहां लोग विरोध करने लगते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि थैलियों में बंद छिलके या बासी भोजन आदि सड़कर दुर्गंध और बीमारी फैलाएंगे। समस्या सरकारों के सामने भी है कि वह कूड़ा कहां फेंके ? स्थानीय निकायों के भरपूर प्रचार के बाद भी लोग गीला और सूखा कूड़ा एक ही थैली में भर देते हैं। उन्हें अलग करने और निबटाने में अधिक समय और धन लगता है। यह मानसिकता कब और कैसे बदलेगी ? 

कुछ दिन पूर्व सोनी टी.वी. के प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सुलभ इंटरनेशनल के डा. बिंदेश्वर पाठक के साथ इंदौर के कमिश्नर श्री आशीष सिंह भी आये थे। उन्होंने बताया कि वहां के लोग घर में ही गीला और सूखा कचरा अलग-अलग कर कूड़ा गाड़ी में डालते हैं। इससे शासन को कूड़ा निपटान में बड़ी सुविधा हुई और इंदौर पिछले तीन साल से भारत का सबसे अधिक साफ शहर घोषित हो रहा है। जो काम इंदौर वाले कर रहे हैं, वह हम क्यों नहीं कर सकते ?

कई लोग मुफ्तखोर स्वभाव के होते हैं। वे बाजार से सामान प्लास्टिक और अब कपड़े की थैली में ही लेते हैं। घर के बाहर खड़े सब्जी वाले से भी वे थैली में ही सामान देने को कहते हैं। सामान बेचने के लिए झक मारकर उसे ग्राहक की बात माननी पड़ती है। कई लोग सामान लाकर कपड़े की थैली भी फेंक देते हैं, जबकि वे कई महीने तक प्रयोग की जा सकती हैं। ऐसे तो ये थैलियां भी नालियों में फंसेगी और पशु उन्हें खाकर मरेंगे।

इसलिए प्लास्टिक थैली का विकल्प लिफाफा या दुकानदार से जबरन ली जाने वाली कपड़े की थैली नहीं है। इसका विकल्प तो घर से ले जाने वाली थैली या थैला ही है। अब घर में सिलाई मशीन और पुराने कपड़ों से थैले बनाने का चलन नहीं रहा; पर जेब में आने लायक कपड़े की हल्की थैलियां तो उपलब्ध ही हैं। उनमें दो-तीन किलो सामान आराम से आ जाता है। दुकानदार प्रायः उनमें ही सामान देते हैं। जरूरत उन्हें ही बार-बार प्रयोग करने की है। हमें यह भी सोचना होगा कि घर का अधिकतम कूड़ा घर में ही कैसे निबटाएं ? कुछ कार वाले यात्रा के दौरान अपना घरेलू कूड़ा सुनसान जगह फेंक देते हैं। ये समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाये जा रहे अभियान ठीक तो हैं; पर असली जरूरत हमारा मानस बदलने की है। बेकार बहता पानी; जहां पानी ठीक है, वहां भी आर.ओ.फिल्टर; मंदिर, मस्जिद, रामलीला आदि का कानफोड़ शोर; शादियों में देर रात तक बजने वाले डी.जे; धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक आयोजनों के जुलूसों से जाम होने वाली सड़कें; कर्कश हार्न; अनियोजित शहरीकरण.. आदि भी तो पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं। एकबारी (सिंगल यूज) प्लास्टिक के साथ इन पर भी विचार जरूरी है। किसी भी सामाजिक परिवर्तन में सरकार उत्प्रेरक का काम तो कर सकती है; पर मुख्य भूमिका तो जनता को ही निभानी होगी। अपनी निजी जिम्मेदारी तय किये बिना यह संभव नहीं है।

सोमवार, 23 सितंबर 2019

गोवंश और सड़कों पर जाम

अखबार में कई बार वृद्ध गोवंश से जाम सड़क, सांडों की लड़ाई और इससे घायल लोगों के चित्र आदि छपते हैं। कई लोग इसे लेकर हिन्दू संस्थाओं पर टिप्पणी करते हैं। कुछ कहते हैं कि जब से भा.ज.पा. सरकारें केन्द्र और राज्यों में आयी हैं, तबसे ये समस्या बढ़ी है। असल में पहले लोग दूधरहित गाय और बछड़े सस्ते में कसाई को बेच देते थे। हिन्दू विहीन सघन मुस्लिम मोहल्लों में गोहत्या आसानी से हो भी जाती थी। गोवंश कटते ही पूरा माल तुरंत बिक जाता था। पुलिस-प्रशासन की क्या मजाल जो इन बस्तियों में घुस सके। इस कारण यह अवैध धंधा खूब चलता था। 

कुछ पशु व्यापारी ऐसे गोवंश को बंगाल, पूर्वोत्तर या बंगलादेश की सीमा में पहुंचा देते थे। गोहत्या प्रतिबंधित न होने से वहां उनके अच्छे दाम मिल जाते थे; पर अब कई राज्यों में अवैध बूचड़खाने बंद हो गये हैं। अवैध रूप से यहां-वहां गोवंश ले जाने पर खतरा भी रहता है। कांग्रेस के समय में गोहत्या आम थी। हिन्दू भी इस मामले में हस्तक्षेप से बचते थे। चूंकि एक ओर मुसलमानों के हमले तथा दूसरी ओर पुलिस द्वारा फंसा लिये जाने का खतरा रहता था; पर अब हिन्दू जागरूक हो गये हैं। कानून और पुलिस भी उनके साथ रहती है। इसलिए गोवंश की अवैध हत्याएं घट गयी हैं; पर बेकार गोवंश का क्या हो ? उसे भी रहने की जगह, चारा-पानी और दवा चाहिए। अतः कई लोग हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए, माथे पर तिलक लगाकर उसे घर से बाहर कर देते हैं। फिर उसकी मरजी, वह जहां जाए और जो खाए। ऐसे पशु ही सड़कों पर संकट पैदा करते हैं।

पर क्या केवल गोवंश ही समस्या है ? कई लोग पालतू कुत्ते के साथ घूमने जाते हैं और सड़क या पार्क में उसे खोल देते हैं। इससे वह दौड़ते हुए कई बार काट भी लेता है। प्रायः वह खेलते हुए बच्चों या बातचीत करते बुजुर्गों के बीच घुस जाता है। इससे उन्हें बहुत परेशानी होती है। कुत्ते वाला कहता है कि हमारा डाॅगी किसी को काटता नहीं है। हमने तो पट्टा इसलिए खोला है, जिससे इसका कुछ व्यायाम हो जाए। वरना घर में पड़े-पड़े ये मोटा हो रहा है। कोई बताए कि कुत्ते का व्यायाम जरूरी है या बच्चों और बुजुर्गों का ? पर गोवंश के नाम पर हल्ला करने वाले इस विषय में मुंह सिल लेते हैं।

प्रायः दुकानदार दुकान से आगे अपना सामान लगाते हैं। उसके आगे उनका और फिर ग्राहक का वाहन भी होता है। अतः सड़क आधी ही रह जाती है। ये स्थिति पूरे दिन रहती है, तो जाम क्यों नहीं लगेगा ? त्योहार के समय तो और बुरा हाल हो जाता है। कई शहरों में अतिक्रमण के विरुद्ध कार्यवाही होती है; पर तोड़फोड़ के तुरंत बाद फिर कब्जे हो जाते हैं। मोहल्ले में घरों के आगे अतिक्रमण, निर्माण कार्य के लिए पड़ी ईंटें, बजरी और रेत, फुटपाथों पर लगे खोमचे आदि भी तो जाम के कारण हैं। लोगों पर कार तो है; पर उन्हें खड़े करने की जगह नहीं है। कई कालोनियों में रात में जाएं, तो लगता है कि कारों का मेला लगा है।

अत्यधिक वाहन भी जाम का बड़ा कारण हैं। इन दिनों कारों की कम बिक्री के आधार पर मंदी की चर्चाएं आम हैं; पर इनकी कम बिक्री तो अच्छी बात है। लोग निजी वाहन की बजाय सार्वजनिक बस, मैट्रो या टैक्सी से अधिक चलें, तो सड़कों पर भीड़ घटेगी। बड़े-बड़े स्कूल, जिनमें धनपतियों के बच्चे पढ़ते हैं, उनके खुलने और बंदी के समय सैकड़ों कारें आकर सड़क जाम कर देती हैं। इसका कोई उपाय है क्या ? और शहरों में निकलने वाले जुलूसों का तो कहना ही क्या ? अधिकांश जुलूस आयोजकों की शक्ति के प्रदर्शन का माध्यम होते हैं। हर शहर में कुछ ऐसे चैराहे होते हैं, जिनके बंद होते ही पूरा शहर जाम हो जाता है। हर जुलूस वहां से जरूर निकलता है। इन पर किसी न किसी धार्मिक समूह या राजनेता का वरद हस्त रहता है, अतः पुलिस प्रशासन भी चुप्पी साध लेता है।

शहरों में जाम सचमुच एक बड़ी समस्या है। इनसे जहां समय नष्ट होता है, वहां प्रदूषण भी फैलता है। कई छात्रों की परीक्षाएं और मरीजों की चिकित्सा छूट जाती है; पर इसके लिए वृद्ध गोवंश, हिन्दू संस्थाओं या भा.ज.पा. सरकारों को दोष देना ठीक नहीं है। जब हम बूढ़े कुत्ते और बिल्लियों को रख सकते हैं, तो फिर उस वृद्ध गोवंश को साल-दो साल रखने में क्या हर्ज है, जिससे 10-12 साल दूध और अन्न मिला है। इस पर भी विचार होना चाहिए।

शनिवार, 21 सितंबर 2019

धार्मिक या धर्माधारित राजनीति

किसी विद्वान ने कहा है कि यदि मुझसे बात करनी है, तो पहले अपनी परिभाषाएं स्पष्ट करो। असल में हर शब्द अपने उद्गम स्थल के परिवेश और परम्परा में से निकलता है; पर दूसरी भाषा में उसकी पृष्ठभूमि जाने बिना प्रयोग करने से गड़बड़ हो जाती है। धर्म भी ऐसा ही शब्द है, जिसे प्रायः मजहब या रिलीजन के समानांतर रख दिया जाता है। कुछ लोग इसे पंथ या सम्प्रदाय मान लेते हैं। जबकि वह इनसे बिल्कुल अलग और व्यापक है। 

धर्म का अर्थ है धारण करने वाला (धारयति इति धर्म)। धरती सबको धारण करती है, इसीलिए उसका नाम धरती, धरा या धरित्री पड़ा। धारना उसका धर्म है। वस्तु रखना और विरोध प्रदर्शन के लिए बैठना भी धरना कहलाता है। यदि धरती अपना धर्म छोड़ दे, तो भूकंप आ जाता है, जिससे जन-धन की भारी हानि होती है। उत्तरकाशी, लातूर, गुजरात और केदारनाथ की आपदाएं बहुत पुरानी नहीं हुई हैं। 

धरती की ही तरह हवा, पानी, आग, आकाश, सूरज, चंद्रमा, तारे आदि के अपने-अपने धर्म हैं। ये उसका पालन करते हैं, इसीलिए संसार सुरक्षित है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे ही ‘स्वधर्म’ कहा है (स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः)। माता, पिता, भाई, बहिन, गुरु, शिष्य, व्यापारी, ग्राहक, कर्मचारी, किसान, मजदूर, राजा, प्रजा, शत्रु, मित्र आदि के भी निर्धारित स्वधर्म हैं। ये इनका ठीक से पालन करें, तो अनाचार, अत्याचार और भ्रष्टाचार का नाम न रहे; पर गड़बड़ तब होती है, जब कोई व्यक्ति या समूह स्वार्थ में फंसकर स्वधर्म भूल जाता है।

धर्म की एक विशेषता यह भी है कि इसका पालन अकेले नहीं होता। इनके लिए दो का होना जरूरी है। पतिधर्म तभी सार्थक है, जब पत्नी भी हो। अविवाहित के लिए पति या पत्नी धर्म का कोई अर्थ नहीं है। ऐसे ही गुरु और शिष्य, व्यापारी और ग्राहक, राजा और प्रजा, पिता और पुत्र के धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। एक का कर्तव्य दूसरे के अधिकार की सुरक्षा करता है। माता और पिता का धर्म है अपने बच्चों के रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, मनोरंजन और संस्कार आदि का प्रबंध करना। अपने माता-पिता से ये पाना उनका अधिकार है; पर दूसरी ओर बच्चों का भी कर्तव्य है कि वे मां-बाप की सेवा और आज्ञा का पालन करें। इसी में धर्म का तत्व निहित है।

कुछ लोग धर्म को पूजा पद्धति से जोड़ते हैं, जो गलत है। धर्म का अर्थ है वे नियम और परम्पराएं, जिनसे समाज या उसका कोई अंग मान्यता प्राप्त करता है। इसीलिए धर्मशाला और धर्मकांटे से लेकर धर्मराज, धर्मयुद्ध, धर्मपिता और धर्मपत्नी की कल्पना भारत में ही है। क्योंकि धर्म यहां एक सुव्यवस्था है। 

लेकिन फिर हिन्दू क्या है ? मोटे तौर पर भारत में जन्मे और फूले-फले सभी मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि का समन्वित रूप ही हिन्दू है। मूर्तिपूजा, वेद, यज्ञ, खानपान आदि के बारे में इनकी अलग धारणाएं हैं। इनके अलग ग्रंथ, अवतार, देवता और पूजा पद्धतियां हैं। जन्म, विवाह और मृत्यु के अलग रिवाज हैं। ये बौद्ध, जैन, सिख, शैव, वैष्णव, कबीरपंथी, उदासी, सतनामी, आर्य समाजी, सनातनी, पौराणिक, नाथपंथी आदि सैकड़ों नामों से जाने जाते हैं। भाषा और क्षेत्र के हिसाब से भी इनके अलग नाम हैं। फिर भी ये सब हिन्दू धर्म के अटूट अंग हैं। इसलिए अपनी परम्परा मानते हुए भी ये दूसरों के विचारों का सम्मान करते हैं।

दूसरी ओर दुनिया में कई मजहब भी हैं। इनमें ईसाई और इस्लाम प्रमुख हैं। इनमें एक पैगम्बर, एक पुस्तक और एक पूजा पद्धति है। आगे चलकर इनमें भी कई मत, सम्प्रदाय और फिरके बने। मजहब के विस्तार के लिए ये सेवा से लेकर तलवार तक हर उपाय अपनाते हैं। दूसरे विचार वालों को धरती से मिटाना ये अपना कर्तव्य मानते हैं। दुनिया में युद्धों का सबसे बड़ा कारण ये मजहबी विचार ही हैं। मतभेदों के कारण ये दूसरों को ही नहीं, आपस में भी एक-दूसरे को मारते हैं। दोनों विश्व युद्ध मुख्यतः ईसाई देशों में ही हुए और आजकल इस्लामी देशों में मारकाट मची है। आत्मघाती विस्फोटों से मुसलमान अपने मुसलमान भाइयों को ही मार रहे हैं। क्योंकि ये मजहब के अनुयायी हैं, धर्म के नहीं। 

धर्म और राजनीति की चर्चा होते ही लोग धर्म का अर्थ पंथ, सम्प्रदाय या मजहब से लगाकर इसका विरोध करने लगते हैं। राजनीति में पंथ, सम्प्रदाय या मजहब की घुसपैठ नहीं होनी चाहिए; पर इसका अर्थ राजनीति का अधार्मिक होना भी नहीं है। तब तो न राजा का कोई धर्म रहेगा और न प्रजा का। अतः पांथिक या मजहबी राजनीति की बजाय धर्माधारित राजनीति की स्थापना उचित है। 

भारत में धर्म और राजनीति में सदा समन्वय रहा है। राजा गद्दी पर बैठते समय ‘अदंडोयस्मि’ (मैं अदंडनीय हूं) कहता था। इस पर धर्मगुरु उसके सिर से पलाश की छड़ी लगाकर कहता था ‘धर्म दंडयोसि’ (धर्म तुम्हें सजा दे सकता है।) अर्थात धर्म राजनीति से ऊपर था; पर धर्माचार्य राजकाज में दखल नहीं देते थे। वे वनों में रहते थे तथा बहुत जरूरी होने पर ही राजा के पास आते थे। राजा भी उनसे मिलने जाने पर अपने शस्त्र, घोड़े, अंगरक्षक आदि आश्रम से बाहर ही छोड़ देता था। इस प्रकार दोनों में संतुलन बना रहता था।

पर ईसाई और इस्लाम मजहबों के उदय और दुनिया जीतने की उनकी चाहत ने इन दोनों में घालमेल कर दिया। मजहबी नेता राजा और सेनाओं को आदेश देने लगे। मौलवी और पादरियों के कहने पर लाखों निरपराध लोग मार दिये गये या उन्हें जबरन अपने मजहब में लाया गया। सिंध, पंजाब, बंगाल, गोवा और केरल में जो हुआ, उससे इतिहास कलंकित ही हुआ है। भारत और पड़ोसी देशों में जले हुए पुस्तकालय, टूटे हुए मठ, मंदिर और गुरुद्वारे इसके गवाह हैं। ये राजनीति में मजहबी घालमेल के दुष्परिणाम हैं।

छठे सिख गुरु हरगोविंदजी ने इस्लामी अत्याचार बढ़ते देखकर अध्यात्म आधारित पंथ को वीर रूप देने के लिए दो तलवारें (मीरी और पीरी) धारण कीं। इससे पंथ में नवजीवन का संचार हुआ। दसवें गुरु गोविंदसिंहजी ने देश और धर्म की रक्षा के लिए खालसा सजाकर पूरी कौम को सिंह बना दिया। उन्होंने राजनीति को पंथ के आदर्शों पर चलने का निर्देश दिया। काफी समय तक ऐसा हुआ भी; पर फिर पंथ और सत्ता की राजनीति में घालमेल होने लगा। संपूर्ण पंजाब को इससे बहुत कष्ट झेलने पड़े।

जैसे दूध का चीनी से मेल लाभकारी है; पर चीनी जैसी दिखने वाली टाटरी से नहीं। धर्म और राजनीति में भी ऐसा ही संबंध और संतुलन चाहिए। इसमें ऐसे लेखक, शिक्षाविद, दार्शनिक, समाजसेवी और धर्माचार्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिनके मन में स्वयं विधायक, सांसद या मंत्री बनने की आकांक्षा न हो। राजा का संन्यासी होना तो ठीक है; पर संन्यासी का राजा होना नहीं। इसलिए धार्मिक और धर्माधारित राजनीति में अंतर करना होगा।

सोमवार, 9 सितंबर 2019

दुनिया मनदी जोरां नूं..

साहित्य में कहावतों का बड़ा महत्व है। उनके माध्यम से बड़ी बात को भी छोटे में कहा जा सकता है। पंजाबी में एक कहावत है - दुनिया मनदी जोरां नूं, लख लानत कमजोरां नूं। (दुनिया दमदार को ही मानती है, इसलिए कमजोर पर लाख लानत है।) ऐसा ही अर्थ प्रकट करने वाली कुछ कहावतें और भी हैं। जैसे - उगते सूरज को अघ्र्य देना, जहां दम वहां हम, जहां मिलेगी तवा परात वहीं कटेगी सारी रात, हवा देखकर रुख बदलना, जैसी ढपली वैसा राग.. आदि। भारत के राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है।

इसका ताजा उदाहरण देखिए। गत 30 अगस्त, 2019 को एक बड़े मुस्लिम नेता मौलाना अरशद मदनी दिल्ली में झंडेवाला स्थित संघ कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत से मिलने पहुंचे। इस भेंट का अधिकृत ब्यौरा जारी न होने से मीडियाकर्मी अपनी-अपनी तरह से इसका विश्लेषण कर रहे हैं। 

श्री अरशद मदनी का संबंध ‘जमीअत उलेमा ए हिन्द’ और देवबंद (मूल नाम देववृंद) स्थित मुस्लिम (सुन्नी) शिक्षा के बड़े केन्द्र ‘दारुल उल उलूम’ से है। यहां के छात्र और समर्थक ‘देवबंदी’ कहलाते हैं। इस संस्था के साथ कई वाद और विवाद भी जुड़े हैं। कोई इसे आजादी के लिए लड़ने वाली संस्था कहता है, तो कोई इस्लामी आतंकियों का निर्माण और शरणस्थल। यहां के फतवे भी यदाकदा चर्चा में आ जाते हैं। इस संस्थान से जुड़े मदनी परिवार की पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में बड़ी भूमिका है। इसलिए इसका कोई न कोई सदस्य सदा सांसद या विधायक रहता ही है।  

इस परिवार के ही एक नेता श्री अरशद मदनी दिल्ली में श्री मोहन भागवत से मिलने गये थे। वे वहां क्यों और किसके माध्यम से गये और वहां क्या बात हुई, यह विषय गौण है। सच तो यह है कि ताकत की तरफ सब झुकते ही हैं। इन दिनों भारत की राजनीति में भा.ज.पा. का झंडा चढ़ा हुआ है। यह भी सब जानते हैं कि भा.ज.पा. के पीछे असली ताकत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है। इसलिए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जैसे लोग संघ से लड़ने की बात कहते हैं, वहां उनकी ही पार्टी के कई लोग भा.ज.पा. से संपर्क बढ़ा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि अब कांग्रेस में जान नहीं रही और भा.ज.पा. की ताकत लगातार बढ़ रही है।

वैसे संघ या उसकी समविचारी संस्थाओं के प्रति उन लोगों का प्रेम नया नहीं है, जो कभी संघ के प्रबल विरोधी होते थे। 1975 में इंदिरा गांधी ने अपनी भ्रष्ट सत्ता को बचाने तथा संजय गांधी को स्थापित करने के लिए देश में आपातकाल लगा दिया। विपक्षी नेताओं को जेल में डालकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। लोकतंत्र की इस हत्या के विरुद्ध संघ के नेतृत्व में अहिंसक संघर्ष हुआ। 1977 के लोकसभा चुनाव में संघ ने पूरी जान लगा दी। अतः कांग्रेस हार गयी। तानाशाह इंदिरा गांधी और उनके साहबजादे भी खेत रहे। लोकतंत्र जीता और मोरारजी भाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। 

इस दौरान पूरे देश ने संघ की ताकत को देखा। संघ की उपेक्षा या विरोध करने वालों को विश्वास ही नहीं होता था कि शाखा पर कबड्डी खेलने वाले जरूरत पड़ने पर जेल भी जा सकते हैं। इसलिए कुछ लोग जिज्ञासावश, तो कुछ उसकी शक्ति के कारण संघ की ओर आकर्षित हुए। उसी दौरान दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी भी संघ कार्यालय पर सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस से मिलने आये थे। भेंट के कुछ देर बाद उन्होंने कहा कि नमाज का समय हो रहा है, इसलिए मैं चलूंगा। बालासाहब ने उनसे कुछ देर और रुकने का आग्रह करते हुए कहा कि आप चाहें, तो यहीं नमाज पढ़ लें। बुखारी की आंखें फैल गयीं। वे तो संघ को मुसलमानों का दुश्मन समझते थे; पर यहां तो ऐसा कुछ नहीं था। अंततः बुखारी ने वहीं नमाज पढ़ी और फिर दोनों में आगे बात भी हुई।

पर कुछ समय बाद जनता पार्टी में शामिल सत्तालोलुप कांग्रेसियों और समाजवादियों के कारण जनता सरकार गिर गयी और इंदिरा गांधी फिर सत्ता में आ गयीं। ऐसा होते ही बुखारी महोदय फिर संघ को गाली देने लगे। कुल मिलाकर बात ताकत की ही है। संघ तो सब पंथ, सम्प्रदाय और मजहब वालों से संपर्क बनाकर रखता है; पर बहुत से लोग उसकी ओर तभी आकर्षित होते हैं, जब भा.ज.पा. सत्ता में होती है। सुदर्शनजी इस दिशा में काफी सक्रिय थे। उनके आग्रह पर संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेशजी के संरक्षण में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ का गठन हुआ, जो समझदार, शिक्षित और देशप्रेमी मुसलमानों की एक सशक्त संस्था है। अटलजी के शासन के दौरान कई बड़े ईसाई पादरी भी सुदर्शनजी से मिलने आये थे। 

सुदर्शनजी के निधन पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई श्रद्धांजलि सभा में इमामों की एक बड़ी संस्था के मुखिया डा. उमेर अहमद इलियासी भी आये थे। उन्होंने वहां अपने श्रेष्ठ हिन्दू पूर्वजों को याद कर कहा कि हम विदेशी नहीं, सौ प्रतिशत भारतीय मुसलमान हैं। उन्होंने पिछले दिनों हरिद्वार में स्वामी सत्यमित्रानंदजी की श्रद्धांजलि सभा में भी भारत माता की जय के नारे लगवाये और गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग की। उस सभा में श्री मोहन भागवत के अलावा कई राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी उपस्थित थे।

राजनीति में विचारधारा गौण होने से ‘आयाराम गयाराम’ अब आम हो गया है। इन दिनों भा.ज.पा. में जिस तरह थोक में कांग्रेस और अन्य दलों के नेता आ रहे हैं, उससे संघ और भा.ज.पा. की वैचारिक शुचिता के आग्रही लोग भी चिंतित हैं। आज भा.ज.पा. के साथ जो लोग गठबंधन में शामिल हैं, उनमें से अधिकांश कांग्रेस की गोद में भी बैठ चुके हैं; पर अब भा.ज.पा. का झंडा बुलंद देखकर वे उसकी जी हुजूरी कर रहे हैं। बात वही ताकत की है।

इसलिए जो लोग श्री मदनी के संघ कार्यालय जाने पर हैरान हैं, भगवान उन्हें लम्बी उम्र दे। चूंकि उन्हें ऐसे कई प्रसंग अभी और देखने हैं। संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक (स्व.) मोरोपंत पिंगले कहते थे कि कहीं सौर ऊर्जा संयंत्र लगा हो, तो बिजली खुद ही पैदा होने लगती है। ऐसे ही शाखा और उसके कार्यक्रमों से भी संगठन रूपी बिजली पैदा होती है। 

दुनिया चाहे जो कहे, पर शाखाओं से निर्मित संगठन की ये ऊर्जा सब ओर फैल चुकी है। अंधों को ये भले ही न दिखे, पर उसकी आंच तो उन्हें भी लग ही रही है। वह दिन दूर नहीं, जब बुखारी, मदनी, ओवैसी, नकवी, सईद, शेख, खान, अंसारी और कुरैशी....आदि अपने हिन्दू गोत्र बताते हुए अयोध्या में कारसेवा करते मिलेंगे; पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि सज्जन हिन्दू शक्ति के निर्माण में लगे लोग राजनीतिक चमक दमक में फंसकर अपना मूल काम न भूल जाएं। क्योंकि किसी ने ठीक ही कहा है - दुनिया मनदी जोरां नूं।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

युद्ध और मनोबल

किसी भी लड़ाई में शारीरिक दमखम और अस्त्र-शस्त्रों के साथ मनोबल का भी बहुत महत्व होता है। आजकल तकनीक का भी उपयोग होने लगा है। अतः उसके महत्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। फिर भी मनोबल की भूमिका तो है ही। इसके कई उदाहरण इतिहास में प्रसिद्ध हैं। 

एक राजा दूसरे राज्य पर हमला करने से पूर्व सैनिकों के साथ अपनी कुलदेवी के मंदिर में गया। वहां पूजा के बाद उसने जेब से एक सिक्का निकालकर सैनिकों से कहा कि इसे उछालने पर यदि देवी का चित्र ऊपर आया, तो हम जीतेंगे, अन्यथा नहीं। जब उसने सिक्का उछाला, तो देवी का चित्र ही ऊपर आया। इससे सैनिकों का उत्साह बढ़ गया और कम संख्या होते हुए भी वे जीत गये। बाद में पता लगा कि यह राजा की एक चाल थी। वास्तव में उस सिक्के के दोनों ओर देवी का ही चित्र बना था।

ऐसे ही एक राजा जब लड़ने गया, तो शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करते ही उसका पैर फिसल गया। उसने हाथ का सहारा लेकर स्वयं को किसी तरह गिरने से बचाया। इससे सैनिक हताश हो गये; पर राजा ने कहा कि मेरी उंगली में पहनी हुई राजमुद्रा की छाप इस भूमि पर लग गयी है। यह ईश्वरीय संकेत है कि यह भूमि तो हमारी हो गयी। अब युद्ध तो केवल औपचारिकता मात्र है। इससे सैनिक उत्साह में आ गये और युद्ध जीत लिया गया।

ऐसे उदाहरण अनेक हैं। परीक्षा के दिनों में छात्र, मैच से पहले खिलाड़ी, बच्चों की बीमारी में माताएं और नौकरी के लिए इंटरव्यू देने वाले युवा मनोबल बढ़ाने के लिए कई तरह की पूजा और टोने-टोटके भी करते हैं। इससे लाभ होता है या नहीं, ये तो वही जानें; पर मन का प्रभाव शरीर और बुद्धि पर पड़ता जरूर है। इसीलिए ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत’ की बात कही गयी है।

भारतीय राजनीति में इन दिनों जो हो रहा है, उसमें भी दो बड़े दलों के मनोबल का स्पष्ट प्रभाव दिख रहा है। सत्ताधारी भा.ज.पा. का मनोबल नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में आकाश पर है, तो कांग्रेस का मनोबल ‘इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा की तरह पूरी तरह तितर-बितर हो चुका है।

2014 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ। इसके बाद सोनिया मैडम ने खानदानी पार्टी की कमान अपने पुत्र राहुल को सौंप दी। इससे कुछ समय कांग्रेस में उत्साह पैदा हुआ। लोगों को लगा कि युवा अध्यक्ष नये सिरे से पार्टी का गठन करेंगे; पर नये और पुरानों की लड़ाई में पार्टी कहीं की नहीं रही।

यद्यपि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा। म.प्र., छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने भा.ज.पा. से सत्ता छीन ली। इससे कांग्रेस वालों को लगा कि अब 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा; पर क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें महत्व नहीं दिया। हर क्षत्रप अपने राज्य में कांग्रेस को दो-चार सीट देकर टरकाना चाहता था। अतः कांग्रेस को पूरी ताकत झोंकने पर भी कुल जमा 52 सीटें ही मिलीं। यानि ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे।’’ जो तीन राज्य उसने जीते थे, वहां भी उसकी नाक कट गयी।

तबसे कांग्रेस का मनोबल रसातल में पहुंच गया। पार्टी के सर्वेसर्वा ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। दो महीने से अधिक हो गये, दल का कोई मुखिया ही नहीं है। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि अपनी बात किससे कहें ? अतः सांसद और विधायक भी कांग्रेस छोड़ रहे हैं। जिस बस में चालक ही न हो, उसमें बैठने वाला मूर्ख ही कहलाएगा। यही हाल कांग्रेस का है। कर्नाटक और गोवा में जो हुआ, वह नेतृत्व के नाकारापन का ही परिणाम है। अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है।

दूसरी ओर भा.ज.पा. का मनोबल आसमान पर है। वहां नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बाद अब जगत प्रकाश नड्डा और नये संगठन मंत्री बी.एल.संतोष के आने से कार्यकर्ता उत्साहित हैं। लोकसभा में पहले से भी अधिक सीटें जीतना आसान नहीं होता; पर यह हुआ है। अब लोगों को लग रहा है कि कहीं म.प्र. और राजस्थान की सरकारें भी न गिर जाएं। हाथी का पांव पड़ने से कितनी हड्डियां टूटेंगी, कौन जाने ?

बची खुची कसर देश के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पूरी कर रही है। तीन तलाक पर हर मुसलमान महिला और समझदार पुरुष सरकार के साथ है; पर पार्टी नेतृत्व शतुरमुर्ग की तरह मिट्टी में सिर दबाकर खतरा टलने की प्रतीक्षा में है। अनुच्छेद 370 का विषय पिछले 70 साल से सुलग रहा है। लोगों की तीन पीढि़यां कश्मीर समस्या के हल की बात सुनते हुए बीत गयीं। हजारों सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। छह लाख हिन्दू घाटी से निष्कासित होकर नरक भोग रहे हैं; पर  मुसलमान वोटों के लालची किसी दल ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 

पर अब शासन ने कठोर निर्णय लेकर उस पेड़ को ही काट दिया, जिस पर आतंकवादी पनप रहे थे। जनभावना इस समय परिवारवाद के भी विरुद्ध है। अतः सारा देश इस निर्णय से खुश है; पर मुखियाविहीन कांग्रेस को समझ ही नहीं आ रहा कि वे क्या करें ? जिसे लोकसभा में नेता बनाया, उस अधीररंजन चैधरी का अपनी जुबान पर ही नियंत्रण नहीं है। पार्टी के मालिक सोनिया मैडम और राहुल बाबा उदासीन हैं। अतः पार्टीजन अपनी इच्छा और समझ से व्यवहार कर रहे हैं।

असल में कांग्रेस कई साल से जमीनी सच से कोसों दूर है। इसलिए पार्टी के पुराने और प्रबुद्ध नेता इस विषय पर शासन का समर्थन कर रहे हैं। जर्नादन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अभिषेक मनु सिंघवी, दीपेन्द्र हुड्डा, डा. कर्णसिंह आदि छोटे नेता नहीं हैं। इनमें से कई तो राहुल के जन्म से पहले से ही कांग्रेस में हैं। राज्यसभा में तो पार्टी के सचेतक भुवनेश्वर कालिता ही पार्टी छोड़ गये; पर राहुल बाबा अपनी दुनिया में मस्त हैं। संसद का सत्र समाप्त हो गया है। हो सकता है वे तन-मन और दिमाग की ठंडक के लिए फिर विदेश चले जाएं।

सच तो ये है कि देश भर में कांग्रेस के हर नेता और कार्यकर्ता का मनोबल गिरा हुआ है। अतः हर राज्य में अराजकता का माहौल है। इसका लाभ भा.ज.पा. वाले उठा रहे हैं। अनुच्छेद 370 के नाम पर बाकी दलों में भी असंतोष पनप रहा है। इसलिए कुछ नेता इसे हटाने की बजाय हटाने की प्रक्रिया पर आपत्ति कर रहे हैं। कुछ पार्टियों ने इसके विरोध में वोट देने की बजाय सदन से बहिष्कार कर अपनी नाक बचाने का प्रयास किया है।

दुनिया चाहे जो कहे, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के इस मास्टर स्ट्रोक ने हर दल की बखिया उधेड़ दी है। अब उनके आगे कुआं है और पीछे खाई। अतः भा.ज.पा. का मनोबल चरम पर है और उसे आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी सफलता मिलनी निश्चित है।

बुधवार, 7 अगस्त 2019

आधी रहे न पूरी पावे

हर व्यक्ति की तरह हर राजनीतिक दल का भी अपना मूल चरित्र या स्वभाव होता है। इसे उसकी आत्मा या प्राणतत्व भी कह सकते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे ‘स्वधर्म’ कहा है। (स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः)। इसकी जड़ें उसके इतिहास और भूगोल में रहती हैं। अतः वह चाह कर भी इससे हट नहीं सकता। तीन तलाक और अनुच्छेद 370 पर संसद में जो हुआ, उसने एक बार फिर इसे सही सिद्ध कर दिया है। 

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की चर्चा करें। यद्यपि किसी समय यह आजादी के लिए संघर्ष करने वालों का एक मंच थी; पर लाल, बाल, पाल और गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक परिदृश्य से विदा होने के बाद कांग्रेस पूरी तरह गांधीजी के हाथ में आ गयी। इसके बाद कांग्रेस में मुस्लिम तुष्टीकरण का नया अध्याय शुरू हो गया।  

भारत से कोई मतलब न होते हुए भी खिलाफत आंदोलन का समर्थन, केरल में निरपराध हिन्दुओं पर मुस्लिम मोपलाओं के अत्याचारों का समर्थन कर उन्हें वीर मोपला कहना, मोहम्मद अली जिन्ना की जी हुजूरी, मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गोहत्या पर चुप्पी, झंडा कमेटी की सर्वसम्मत राय के बावजूद भगवे झंडे की बजाय तिरंगे को राजकीय ध्वज बनाना, देश का मजहब के आधार पर विभाजन, मजहबी दंगों में हिन्दुओं को पिटने, लुटने और मरने के बावजूद पाकिस्तान में ही बने रहने की सलाह; पर बिहार में मुसलमानों पर मार पड़ते ही उनकी रक्षा में जा पहुंचना, कश्मीर पर हमला करने के बाद भी पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. देने का दुराग्रह..जैसे सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं।

गांधीजी की इस परम्परा को उनके परम शिष्य और उत्तराधिकारी जवाहर लाल नेहरू ने आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने मित्र शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर में राजा बनाने के लिए महाराजा हरिसिंह को निर्वासन दे दिया। इतने पर ही संतोष नहीं, तो अनुच्छेद 370 और फिर धारा 35 ए लाकर पूरे राज्य को उनकी बपौती बना दिया। अयोध्या में श्रीराममंदिर का विषय सोमनाथ की तरह हल हो सकता था; पर उनका रवैया सदा ढुलमुल ही रहा। गोरक्षा को वे बेकार की बात मानते थे। हिन्दी की बजाय वे उर्दू के परम हिमायती थे। हिन्दू कोड बिल में तो उन्होंने रुचि ली; पर मुस्लिम समाज में सुधार और महिलाओं की दशा सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया।

इंदिरा गांधी का समय कुछ अपवाद रहा। शायद इसका कारण संजय गांधी का प्रभाव हो; पर राजीव गांधी ने फिर यही लीक पकड़ ली। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद उन्होंने मुल्लाओं को खुश करने के लिए संसद में कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के हितों पर फिर कुठाराघात कर दिया। उनके पास लोकसभा में 403 सदस्य थे। वे चाहते तो इस बारे में सर्वसम्मत कानून बन सकता था; पर मुस्लिम तुष्टीकरण कांग्रेस का मूलमंत्र होने के कारण वे साहस नहीं दिखा सके। 

कुछ समय तक तो कांग्रेस को इसका लाभ मिला; पर फिर देश में हिन्दुत्व का उभार होने लगा। राम मंदिर आंदोलन इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसका लाभ उठाकर भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ने लगी; पर कांग्रेस कूपमंडूक ही बनी रही। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। अतः वह अब देश और अधिकांश राज्यों की राजनीति में अप्रासंगिक हो चली है। 

2014 के लोकसभा चुनावों में भारी पराजय के बाद बनी ए.के.एंटनी कमेटी ने कहा था कि कांग्रेस की छवि हिन्दू विरोधी और मुस्लिमों की समर्थक जैसी बन गयी है। इसे बदलने के लिए 2019 के चुनाव में राहुल गांधी सैकड़ों मंदिरों में गये। कैलास मानसरोवर यात्रा की। जनेऊ और नकली गोत्र का सहारा भी लिया। प्रियंका भी इसी लाइन पर चली; पर वे अपने दाग नहीं धो सके। इसलिए अब वे फिर से उसी तुष्टीकरण पर लौट रहे हैं, चूंकि कांग्रेस के प्राण उसी में हैं। 

लोकसभा में अनुच्छेद 370 पर हो रही बहस के दौरान राहुल ने एक ट्वीट किया, जिसमें इसे हटाने के निर्णय को मूर्खतापूर्ण कहा है। वे न जाने किस दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें आज भी लगता है कि इसे हटाने से मुसलमान नाराज हो जाएंगे और इससे कांग्रेस को नुकसान होगा; पर वे यह भूल रहे हैं कि उनके इस कदम से हिन्दू उनसे इतने दूर हो जाएंगे कि बची-खुची कांग्रेस कहीं की नहीं रहेगी। कई कांग्रेसी इसे समझ रहे हैं; पर राहुल बाबा अपनी पप्पूगिरी छोड़ने को राजी नहीं हैं। 

अब भारतीय जनता पार्टी को देखें। उसकी आत्मा हिन्दुत्व में है। अपने पूर्वावतार भारतीय जनसंघ के समय से ही वह संपूर्ण गोवंश की रक्षा, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण, समान नागरिक संहिता, भारतीय भाषाओं का सम्मान, राम मंदिर निर्माण और अवैध धर्मान्तरण पर प्रतिबंध आदि की बात करती रही है। बीच में एक समय ऐसा आया, जब लोकसभा में उसके दो ही लोग पहुंच सके। यद्यपि इसका मुख्य कारण राजीव गांधी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति थी; पर इससे भा.ज.पा. में चिंता गहरा गयी। अतः उन्होंने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया; पर यह कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरा। क्योंकि जनसंघ और भा.ज.पा. की नींव में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद है। ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम’’ वाला हाल होता देख पार्टी ने इस ढकोसले को जल्दी ही अलविदा कह दिया।

इसके बाद पार्टी ने फिर से हिन्दुत्व की राह पकड़ी। संघ ने भा.ज.पा. को गोविंदाचार्य, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चैहान, उमा भारती, नितिन गडकरी, सुशील मोदी, प्रकाश जावड़ेकर, नरेन्द्र मोदी जैसे कई युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता दिये। इनमें से कुछ प्रचारक थे, तो कुछ गृहस्थ। कुछ संघ में तो कुछ विद्यार्थी परिषद में काम कर रहे थे। अटलजी के बदले पार्टी की कमान आडवाणीजी को सौंपी गयी। इससे पार्टी में नव उत्साह का संचार हुआ।

अब आडवाणीजी के नेतृत्व में राममंदिर के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली गयी। मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक तिरंगा यात्रा हुई। इनसे परिदृश्य बदलता गया और आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार दिल्ली में स्थापित है। मोदी ने धर्मान्तरण के कारोबार में लगे एन.जी.ओ को मिल रहे विदेशी धन को रोका है। तीन तलाक के फंदे से मुस्लिम महिलाओं को मुक्त किया है तथा जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर राज्य को सच्ची आजादी दिलाई है। ये पार्टी के हिन्दुत्व के एजेंडे को और मजबूत करने वाले कदम ही हैं।

क्षेत्रीय दलों का भी यही हाल है। उ.प्र. में समाजवादी पार्टी, बिहार में नीतीश बाबू तथा बंगाल में ममता बनर्जी अपनी जीत में मुस्लिम वोटों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए तीन तलाक और 370 पर वे सरकार के साथ नहीं गये। मायावती का मूलाधार दलित वोट हैं। उन्होंने 370 पर सरकार का साथ दिया, चूंकि इससे जम्मू-कश्मीर में दलित हिन्दुओं को नागरिकता एवं अच्छी नौकरी मिल सकेगी। अन्य क्षेत्रीय दल भी इसी तरह अलग-अलग हिस्सों में बंटे हैं।

सच तो ये है कि अधिकांश नेताओं को देश या जनता की नहीं, अपनी सम्पत्ति और खानदानी सत्ता की चिंता है और इसके लिए वोट बैंक जरूरी है। जैसे कहानियों में राक्षस की जान पिंजरे में बंद किसी तोते में होती है, ऐसी ही स्थिति इन दलों की है। वे सब जानते हुए भी उन प्रतिगामी विचारों से चिपककर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। 

तीन तलाक और 370 पर देश के मूड को न समझने वाले दलों के भविष्य पर किसी ने ठीक ही कहा है - 

आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी रहे न पूरी पावे।। 

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

नेता, नीति, नीयत और नियति


संसद का काम नीति बनाना है; पर ये इस पर निर्भर है कि नेताओं की नीयत कैसी है। फिर इसी से प्रजा की नियति तय होती है। समय चाहे जो हो; पर नेता, नीति और नीयत के मेल से ही नियति का निर्माण होता है।

श्रीराम के समय को ही लें। महाराजा दशरथ बड़े प्रतापी सम्राट थे; पर बुढ़ापे में एक साथ चार पुत्र पाकर उनका मन राजकाज से उचट गया। अतः रावण जैसे राक्षस उपद्रव करने लगे। वे चाहे जिसे उठाकर ले जाते थे। चाहे जिसे मार देते थे। स्त्री हो या पुरुष, कोई सुरक्षित नहीं था; पर चक्रवर्ती होने के बावजूद दशरथ चुप रहते थे। चूंकि अब वे नीति पथ से च्युत हो गये थे।

इस ओर ध्यान गया ऋषि विश्वामित्र का। वे केवल शास्त्र के ही नहीं, शस्त्र के भी साधक थे। उनके आश्रम में केवल यज्ञ और पठन-पाठन ही नहीं, अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण और नये शस्त्रों का संधान भी होता था। इस कारण दुष्ट राक्षसों की निगाह उन पर सबसे अधिक रहती थी। वे उनके काम में बाधा डालते थे। यज्ञ विध्वंस का अर्थ यही है। विश्वामित्र चाहते, तो शस्त्रों के ज्ञाता होने के कारण वे स्वयं राक्षसों को मार सकते थे; पर वे देश को एक नया और नीतिवान नेतृत्व भी देना चाहते थे। इसके लिए उनकी दृष्टि दाशरथी राम पर गयी।

विश्वामित्र जानते थे कि पुत्रमोह से पीडि़त दशरथ का मन कमजोर है। अतः उन्होंने दशरथ के कुलगुरु वशिष्ठजी को भी इस योजना में शामिल किया और इस प्रकार युवा राम-लक्ष्मण उन्हें मिल गये। इन दोनों को विश्वामित्र ने नये आयुधों का प्रशिक्षण देकर वर्तमान समय के लिए आवश्यक नीति बतायी। निर्धन, निर्बल, वंचित और पीडि़त जनों के लिए उनके मन में संवेदना जगायी। राम और सीता का विवाह कराया, जिससे तत्कालीन दो प्रबल साम्राज्य पक्की रिश्तेदारी में बंध गये। इसी से रावण का नाश होकर रामराज्य की स्थापना हुई।

अर्थात विश्वामित्र के पास जहां नीति थी, वहां श्रीराम के पास राक्षसों के समूल नाश की नीयत। इससे सुखद परिणाम प्राप्त हुए और अगले हजारों सालों के लिए देश की नियति निश्चित हुई।

ऐसे उदाहरण अनेक हैं। चाणक्य और चंद्रगुप्त, समर्थ स्वामी रामदास और छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह और बंदा बैरागी, स्वामी विद्यारण्य और हरिहर बुक्का, स्वामी विरजानंद और दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद, डा. हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर..  जैसे नाम इतिहास में अमर हैं।

स्पष्ट है कि नेतृत्व की ठोस नीति और प्रबल नीयत के मेल से ही नियति का निर्धारण होता है। भारत में आजादी के बाद कई ऐसे निर्णायक क्षण आये, जब यदि नेता, नीति और नीयत ठीक होती, तो नियति बदल जाती। देशवासी तब हर तरह के परिवर्तन के लिए तैयार थे; पर नीतिविहीन नेतृत्व की ढिलाई से ऐसा नहीं हो सका।

1947 में लोग नेहरुजी के दीवाने थे; पर अंग्रेजी संस्कारों में पले-बढ़े नेहरू कुछ नया नहीं कर सके। वे अंग्रेजों द्वारा निर्मित लकीर के ही फकीर बने रहे। 1971 में बंगलादेश निर्माण के बाद इंदिरा गांधी के पास भी ऐसा ही मौका था; पर अधिकाधिक सत्ता की भूख और संजय को अपना वारिस बनाने के चक्कर में उन्होंने आपातकाल लगा दिया। पंजाब की सत्ता के लिए उन्होंने हिन्दुओं और सिखों में दरार डाल दी। 1984 के चुनाव में राजीव गांधी को लोकसभा में 404 सीट मिली; पर अनुभवहीन राजीव एक ओर श्रीलंका में उलझ गये, वहां बोफोर्स का कलंक लगवाकर सत्ता से भी बाहर हो गये। इन कारणों से ही दोनों की निर्मम हत्या भी हुई।

कांग्रेस और कांग्रेसियों के लम्बे शासन के बाद राजनीति ने करवट ली। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी इस समय के दो प्रमुख चेहरे थे; पर संसद में उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था। उन्हें बार-बार ऐसे नेता और दलों का सहारा लेना पड़ता था, जो हवा का रुख देखकर नजरें बदल लेते थे। अतः नीति और नीयत होते हुए भी वे कुछ खास नहीं कर सके।

पर अब देश में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का युग है। लोकसभा में भा.ज.पा को अपने बल पर पूरा बहुमत प्राप्त है। अतः सहयोगी दल चुप रहते हैं। राज्यसभा में भी बहुमत की स्थिति बन रही है। अधिकांश राज्य भगवामय हैं। उधर कांग्रेस मरणासन्न है। वहां नीति और नीयत की बात तो दूर, अभी कोई नेता ही नहीं है। ऐसे माहौल में मोदी और शाह की जोड़ी पर उन दावों और वादों को पूरा करने का दारोमदार है, जो भा.ज.पा. वाले समय-समय पर कहते रहे हैं।

फिलहाल तो लग रहा है कि मोदी और शाह के नेतृत्व में पार्टी ठीक दिशा में बढ़ रही है। पहली बार पाकिस्तान की मांद में घुसकर उसे सबक सिखाया गया है। चीन से भी डोकलाम पर सीधे मुंह बातकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया गया। अमरीका के डोनाल्ड टंªप हों या रूस के ब्लादिमिर पुतिन, सबसे मोदी ने अच्छे और सार्थक संबंध बनाये हैं। हैरानी की बात तो ये हैं कि अरब देशों में नये मंदिर बन रहे हैं। अर्थात मोदी की विदेश नीति बिल्कुल ठीक दिशा में आगे बढ़ रही है।

इधर देश के अंदर भी काम की दिशा ठीक है। अमरनाथ यात्रा पहली बार इतनी शांति से हो रही है। कश्मीर के पत्थरबाज अभी तो चुप हैं। वहां जैसी हलचल है, लगता है कि अनुच्छेद 370 और 35 ए पर कुछ ठोस निर्णय जरूर होगा। ऐसा होते ही पूरे देश के नागरिकों के लिए वहां रहना और उद्योग स्थापित करने का रास्ता खुल जाएगा। इससे जम्मू-कश्मीर में आम लोगों की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार होगा।

शरीयत के नाम पर एक साथ तीन तलाक की तलवार न जाने कब से मुस्लिम महिलाओं के सिर पर लटकी हुई थी। दुनिया के कई मुस्लिम देश इस कुप्रथा से मुक्त हो चुके हैं; पर भारत में मुस्लिम वोट के लालची नेता और दल इसे सीने से चिपकाए रहे। अब मोदी सरकार ने तीन तलाक विरोधी नियम को संसद के दोनों सदनों में पारित करा लिया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन जाएगा। वह दिन मुस्लिम महिलाओं के लिए सचमुच मुक्ति दिवसहोगा।

पर काम अभी बहुत बाकी है। अब देश को प्रतीक्षा है समान नागरिक संहिता, गोवंश की संपूर्ण रक्षा, भारतीय भाषाओं का उत्थान, अल्पसंख्यकवाद की समाप्ति, पाकिस्तान का एक और विभाजन, घुसपैठियों को देशनिकाला, कश्मीरी हिन्दुओं की घरवापसी और बहुप्रतीक्षित श्रीराम मंदिर के निर्माण की। किसी कवि ने लिखा है -

कोई चलता पदचिन्हों पर, कोई पदचिन्ह बनाता है
बस वही सूरमा दुनिया में, सदियों तक पूजा जाता है।

देश को लम्बी प्रतीक्षा के बाद ठोस नीति और सही नीयत वाले नेता मिले हैं। ऐसे में देश की स्वर्णिम नियति भी निश्चित है। मराठी में कहते हैं याचि देहि, याची डोला।अर्थात इसी देह और इन्हीं आंखों से हम अपना लक्ष्य पूरा होते देखेंगे। भगवान करे ऐसा ही हो।

सोमवार, 1 जुलाई 2019

ब.स.पा. और परिवारवाद

कुछ दिन पूर्व बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने विधिवत घोषणा कर दी कि उनका भाई आनंद और भतीजा आकाश पार्टी में नंबर दो और तीन के पद पर रहेंगे। मीडिया में इस पर खूब चर्चा हुई। कहा गया कि कभी काशीराम और मायावती कांग्रेस के परिवारवाद के खुले विरोधी थे; फिर अब ब.स.पा. को क्या हो गया; वह परिवार के दलदल में क्यों कूद पड़ी ? इसका विश्लेषण करें, तो ध्यान में आएगा कि जैसे हर इन्सान को बुढ़ापे में कुछ रोग लगते हैं, ऐसा ही राजनीतिक दलों के साथ भी होता है। परिवारवाद ऐसा ही एक रोग है।

भारतीय राजनीति में परिवारवाद नयी बात नहीं है। असल में राजनीतिक दलों में भिन्नता विचारों के आधार पर होती है। किसी समय कांग्रेस आजादी के लिए संघर्ष करने वाली एक राष्ट्रीय संस्था थी। उसके मंच पर सब विचारों के लोग आते थे। इसीलिए आजादी मिलने पर गांधीजी ने कांग्रेस भंग करने को कहा था, जिससे लोग अपने विचारों के अनुसार राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ें; पर जवाहर लाल नेहरू उनकी यह विरासत छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी की हत्या के बाद तो वे पूरी तरह निरंकुश हो गये।

1947 तक कांग्रेस और उसमें शामिल समूहों का लक्ष्य आजादी था। अतः देश की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक स्थिति; खेती और उद्योग आदि के बारे में उनके विचार किसी को पता नहीं थे। इस पर सोचने का समय भी नहीं था; पर आजादी के बाद माहौल बदल गया। अब हर दल को इन पर अपने विचार सामने रखने जरूरी थे। नेहरू स्वभाव से वामपंथी थे। यद्यपि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी भी थी; पर उसका प्रभाव कुछ खास नहीं था। अतः नेहरू के विचार को लोगों ने मान लिया और वह मृत्युपर्यन्त राज करते रहे।

आगे चलकर कांग्रेस से डा. राममनोहर लोहिया, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव आदि कई नेता अलग हुए, जिन्होंने मुख्यतः समाजवाद के नाम पर नये दल बनाये। कुछ राज्यों में ये प्रभावी भी हुए; पर इनमें से किसी की देशव्यापी पहचान नहीं बन सकी। दूसरी और राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के पक्षधर ‘भारतीय जनसंघ’ के विस्तार का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था। संघ के जमीनी विस्तार के साथ ही जनसंघ भी बढ़ता रहा। कुल मिलाकर आज भी स्थिति यही है।

लेकिन धीरे-धीरे राजनीति में विचारों का महत्व घटने लगा। सोवियत रूस के विघटन से साम्यवाद अप्रासंगिक हो गया। अमरीका का प्रभुत्व बढ़ने से दुनिया का ध्यान पूंजीवादी व्यवस्था की ओर बढ़ा। चीन ने भी साम्यवाद के खोल में पंूजीवाद अपना लिया। भारत में यद्यपि गरीबों के वोट लेने के लिए कोई दल पूंजीवाद का खुला समर्थन नहीं करता; पर सच ये है अधिकांश दल इसी राह पर चल रहे हैं।

विचारों का आधार समाप्त होने पर राजनीतिक दलों ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए परिवार को आधार बना लिया। कांग्रेस में नेहरू परिवार का प्रभुत्व था। अतः जो नेता कांग्रेस से विचारों की भिन्नता का बहाना बनाकर अलग हुए, उनके दल परिवार आश्रित हो गये। कांग्रेस तो इसके लिए बदनाम थी ही; पर बाकी दलों का भी यही हाल हो गया। परिवारवाद के नाम पर नेहरू का विरोध लोहिया ने, इंदिरा गांधी का विरोध चरणसिंह ने, चरणसिंह का विरोध मुलायम और देवीलाल ने किया; पर आज इन सबके दल निजी दुकान बन कर रहे गये हैं। शरद पवार, उद्धव और राज ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चैटाला, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, लालू और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती, फारुख अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू, स्टालिन, केजरीवाल... आदि केवल नाम नहीं, एक राजनीतिक दल भी हैं। 

इन राजनीतिक दलों की स्थिति एक गृहस्थ जैसी है, जो वर्षों परिश्रम कर मकान, दुकान, जमीन और जायदाद बनाता है। वह चाहता है कि यह सम्पदा फिर उसके बच्चों को मिले। वह ऐसी वसीयत भी कर देता है। इसी तरह घरेलू दलों के मुखिया चाहते हैं कि उनके बाद यह राजनीतिक सम्पदा उनके बच्चे संभालें। फिर राजनीति करते हुए कार्यालय, गाडि़यां, बैंक बैलेंस जैसी चल-अचल सम्पत्ति भी बन जाती है। इनका मूल्य भी अरबों रु. में होता है। दल का जमीनी अस्तित्व भले ही न हो; पर चल-अचल सम्पत्ति का तो होता ही है। उसे अपने कब्जे में रखने के लिए दल के महत्वपूर्ण पद अपने परिवार में बने रहने जरूरी हैं।

लेकिन जैसे परिवार में भाइयों और फिर उनके बच्चों में सम्पत्ति के नाम पर झगड़े होते हैं, ऐसा ही इन घरेलू दलों में भी होता है। उ.प्र. में मुलायम सिंह की राजनीतिक विरासत पर कब्जे के लिए उनके भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश में झगड़ा है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की विरासत के लिए उद्धव और राज ठाकरे में टकराव है। आंध्र में एन.टी.रामराव की विरासत उनके बेटे की बजाय दामाद चंद्रबाबू नायडू ने कब्जा ली। चैटाला परिवार में सिर फुटव्वल का कारण भी यही है। बिहार में लालू के दोनों बेटे और बड़ी बेटी पिता की विरासत के असली वारिस बनना चाहते हैं। 

एक कारण और भी है। राजनीतिक जीवन में नेताओं पर कई आर्थिक और आपराधिक मुकदमे लग जाते हैं। इनमें से कुछ असली होते हैं, तो कुछ नकली। यदि पार्टी का मालिक कोई और बन जाए, तो मुकदमों में खर्च होने वाला भारी धन कहां से आएगा ? जेल हो गयी, तो उनकी रिहाई के लिए धरने-प्रदर्शन कौन करेगा ? इसलिए जैसे भी हो; पर पार्टी का अपनी घरेलू जायदाद बने रहना जरूरी है।

यही बात मायावती के साथ है। सुना है उनके पास पार्टी के नाम पर अरबों-खरबों रु. की चल-अचल सम्पत्ति है। कई मुकदमे भी चल रहे हैं। शरीर भी ढलान पर है। नालायक वोटर चाहे कहीं भी जाए; पर पैसा तो अपने पास ही रहना चाहिए। इसलिए पार्टी का घर में बने रहना जरूरी है। अविवाहित होने से उनकी संतान तो नहीं हैं; पर भाई और भतीजे तो हैं। इसलिए उन्हें नंबर दो और तीन के पद दे दिये हैं। यद्यपि पार्टी के निर्णयों में उनकी दखल देखकर यह सबको पहले से ही पता था; पर अब विधिवत घोषणा होने से कुछ छिपाव नहीं रहा। 

सच तो ये है कि बड़े से बड़े पहलवान को भी बुढ़ापे में रोग घेरते ही हैं। उसे चलने के लिए लाठी और बाल-बच्चों का सहारा लेना ही पड़ता है। यही स्थिति घरेलू राजनीतिक दलों की है। ब.स.पा. में भी यही हुआ है। औरों को भले ही इसमें कुछ आश्चर्य लगे; पर राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह एक सामान्य बात है।

बुधवार, 19 जून 2019

कांग्रेस को चाहिए एक असली गांधी

भारतीय राजनीति में कांग्रेस लम्बे समय तक शीर्ष पर रही; पर अब उसके अवसान के दिन हैं। कांग्रेस वालों को ये कहना ठीक ही है कि वे इतनी बुरी हार पर चिंतन-मंथन कर भावी सफलता की योजना बनाएंगे; पर बीमारी का मूल कारण समझे बिना उसका स्थायी इलाज संभव नहीं है। अर्थात इस पराजय की जड़ तक पहुंचे बिना वे इसका निदान नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें थोड़ा पीछे जाकर अपनी सफलता की पृष्ठभूमि समझनी होगी।

1947 के बाद कांग्रेस की चुनावी सफलता के दो बड़े कारण थे। इसमें से पहला था गांधीजी का नेतृत्व। यद्यपि 1948 में उनकी हत्या के चार साल बाद, 1952 में पहले आम चुनाव हुए; पर उनका नाम और नैतिक आभामंडल कांग्रेस की सदा सहायता करता रहा। 

असल में अफ्रीका से लौटने से पहले ही गांधीजी यहां चर्चित हो चुके थे। सत्याग्रह की शक्ति से उन्होंने वहां अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया था। भारत आकर कांग्रेस नेता और अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर वे पूरे देश में घूमे। इस दौरान उन्होंने गरीबी का नंगा नाच देखा। अतः उन्होंने जीवन भर आधे वस्त्र पहनने का निर्णय लिया। इससे उनके आभामंडल में त्याग की एक सुनहरी किरण और जुड़ गयी। 

गांधीजी जब भारत आये, तो कांग्रेस में नेतृत्व के नाम पर खालीपन था। लाल, बाल, पाल और गोखले राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो रहे थे। नेतृत्व की इस शून्यता को गांधीजी ने भरा। धीरे-धीरे गांधीजी और कांग्रेस एक दूसरे के पर्याय हो गये। यद्यपि वे कभी पार्टी के चवन्निया सदस्य भी नहीं बने; पर उनकी इच्छा और अनुमति के बिना वहां कुछ होता नहीं था। यहां त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख जरूरी है, जहां उनकी इच्छा के विरुद्ध सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बन तो गये; पर अंततः उन्हें त्यागपत्र देना ही पड़ा। आजादी से पूर्व सभी राज्यों की कांग्रेस समितियां सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थीं। चूंकि अध्यक्ष को ही भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनना था; पर गांधीजी ने वीटो लगा दिया। इस प्रकार उन्होंने पहले सुभाष चंद्र बोस को और फिर सरदार पटेल को हटाकर जवाहर लाल नेहरू के लिए रास्ता साफ कर दिया। अर्थात कांग्रेस में कुछ नहीं होते हुए भी सर्वेसर्वा गांधीजी ही थे।

गांधीजी के नैतिक आभामंडल का एक कारण यह भी था कि वे राजनीतिक दलदल में होते हुए भी कमल की तरह उसमें लिप्त नहीं हुए। उन्होंने पार्टी या शासन में कोई पद नहीं लिया और अपने किसी परिजन को भी राजनीति में नहीं आने दिया। आजादी मिलने पर जहां नेहरू और उनके साथी जश्न में डूबे थे, वहां गांधीजी बंगाल में हो रहे मजहबी दंगों के पीडि़तों के बीच घूम रहे थे। नेहरू के लिए सत्ता ही सब कुछ थी, जबकि गांधीजी के लिए देश। इसलिए गांधीजी के नाम और काम का लाभ कांग्रेस को हमेशा मिलता रहा।

कांग्रेस की सफलता का दूसरा कारण विपक्ष के पास नेतृत्व का अभाव था। आजादी से पहले विभिन्न विचारधारा वाले सब लोग कांग्रेस के बैनर पर काम करते थे। इसीलिए 1947 में गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने को कहा था; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी पकाई खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी की हत्या से वे शासन और पार्टी दोनों के मालिक हो गये। उनकी निरंकुशता से नाराज होकर जो लोग पार्टी से निकले, उन पर भी कांग्रेस का लेबल ही लगा रहा। इसलिए वे नेहरू से बड़ी लकीर नहीं खींच सके। आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. राममनोहर लोहिया, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई आदि ऐसे ही उदाहरण हैं। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी तक यही कहानी चलती रही।

पर इसके बाद परिदृश्य बदला। देश में वह पीढ़ी आ गयी, जिसने गांधीजी को देखा नहीं था। अतः कांग्रेस का प्रभाव घटने लगा। यद्यपि राजीव गांधी को अभूतपूर्व जीत मिली; पर वह इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण थी। उधर वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर आदि का तत्कालीन नेतृत्व भी मूलतः कांग्रेसी ही था। इसलिए एक ओर असली कांग्रेसी, तो दूसरी ओर कांग्रेस से निकले कांग्रेसी। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों ने असली कांग्रेसियों को ही समर्थन देना जारी रखा।

पर आज का राजनीतिक माहौल दूसरा है। भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा नेतृत्व है, जो कभी कांग्रेस में नहीं रहा। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा तक सब ऐसे ही नेता हैं। हर राज्य में ऐसे कई युवा नेता हैं, जिनका सामाजिक प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हुआ है। नये लोग भी लगातार तैयार हो रहे हैं। कांग्रेस में अपने परिवार को, जबकि संघ में देश को सर्वोपरि मानने की शिक्षा दी जाती है। संघ अपनी सैकड़ों समविचारी संस्थाओं, हजारों शाखाओं और लाखों सेवा कार्यों से देश के हर नागरिक तक पहुंच रहा है। कांग्रेस के पास इसका कोई तोड़ नहीं है। इसलिए वह देश के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो रही है।

इसी प्रकार कांग्रेस के पीछे गांधीजी जिस नैतिक बल के प्रतिनिधि थे, वह भूमिका भी अब संघ निभा रहा है। संघ के कार्यकर्ता वोट तो देते हैं। चुनाव के समय कुछ दिन जनसंपर्क भी करते हैं; पर फिर वे अपने दैनिक शाखा और सेवा के काम में लग जाते हैं। देश में पिछले दिनों लोकसभा के चुनाव हुए और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार बनी; पर संघ वाले इस कोलाहल से दूर हैं। अपै्रल से जून तक देश भर में लगभग 150 स्थानों पर संघ शिक्षा वर्ग लगे हैं। तीन से चार सप्ताह वाले इन वर्गों में लगभग 50,000 कार्यकर्ताओं ने प्रशिक्षण पाया है। जैसे आजादी के बाद के जश्न से दूर रहकर गांधीजी बंगाल में घूम रहे थे, ऐसे ही भा.ज.पा. की चुनावी सफलता से अलिप्त रहकर संघ के कार्यकर्ता घोर गरमी में प्रशिक्षण पा रहे हैं। 

1947 में कांग्रेस के पास नेहरू जैसा नेतृत्व और गांधीजी की नैतिक शक्ति थी, जबकि विपक्ष नेतृत्वहीन था। आज इसका उल्टा है। भा.ज.पा. के पास मोदी जैसा नेतृत्व और नैतिक शक्ति से लैस रा.स्व. संघ है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व दिग्भ्रमित है। तभी तो भारी पराजय के बावजूद कांग्रेस में नेता बदलने का साहस नहीं है, जबकि भा.ज.पा. ने भारी जीत के बावजूद नया अध्यक्ष चुन लिया।

ऐसे में यदि कांग्रेस वाले अपनी पार्टी को जिन्दा करना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक पदलिप्सा से दूर रहने वाले एक नये और असली गांधीजी ढूंढने होंगे; पर क्या यह संभव है ? शायद नहीं। क्योंकि कांग्रेस में तो लोग आते ही खाने और कमाने के लिए हैं। इसलिए कांग्रेस लगातार पीछे खिसक रही है। शायद यही उसकी नियति भी है।

शुक्रवार, 14 जून 2019

राजनीति में नंबर एक और दो


राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं; पर इसमें महत्व नंबर एक या दो होने का ही है। लोग भी तीसरे या चैथे को महत्व नहीं देते।


केरल का उदाहरण लें। इस लोकसभा चुनाव में वहां कांग्रेस को 15 तथा वामपंथियों को एक सीट मिली। दूसरी ओर भा.ज.पा. 15.6 प्रतिशत वोट पाकर भी खाली हाथ रह गयी। असल में सबरीमला मंदिर में हर आयु की महिलाओं के प्रवेश से हिन्दू नाराज थे। इसके विरुद्ध भारी आंदोलन हुआ, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और भा.ज.पा. आगे रहे। हिन्दू इस लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी वामपंथियों को पीटना चाहते थे। इसका सबसे अच्छा उपाय भा.ज.पा. को वोट देना था; पर वह वहां नंबर दो पर नहीं है। उनके वोट से भा.ज.पा. के एक-दो सांसद जीत जाते; पर वोटों के विभाजन से शेष सांसद वामपंथियों के बनते। इसलिए हिन्दुओं ने दूसरे पायदान पर खड़ी कांग्रेस को वोट दिया।

केरल में वामपंथियों की लड़ाई कांग्रेस से कम और भा.ज.पा. से अधिक है। अब तक वहां सैकड़ों कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं; पर संघ और भा.ज.पा. का हौसला कायम है। त्रिपुरा और बंगाल खोने के बाद अब वामपंथी किसी कीमत पर अपने इस अंतिम किले में भा.ज.पा. को घुसने देना नहीं चाहते। इसलिए अंदरखाने वामपंथियों ने अपने लोगों को कहा कि चाहे कांग्रेस जीत जाए, पर भा.ज.पा. नहीं जीतनी चाहिए। उधर भा.ज.पा. समर्थकों ने भी वामपंथियों को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस को वोट दे दिये। यानि भा.ज.पा. के नंबर दो न होने से कांग्रेस की चांदी हो गयी। दक्षिण के अन्य राज्यों में रा.स्व.संघ और समविचारी संस्थाओं का काम ठीकठाक है; पर वह भा.ज.पा. के वोटों में नहीं बदलता, चूंकि वहां क्षेत्रीय दल ही नंबर एक और दो की लड़ाई में हैं। 

दिल्ली में कांग्रेस यदि केजरीवाल से समझौता कर लेती, तो दोनों को लोकसभा में एक-दो सीट मिल जाती; पर पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस शून्य पर रहकर नंबर तीन पर आ गयी थी। शीला दीक्षित की निगाह अपनी खोई हुई जमीन पर है। इसलिए बड़े नेताओं के दबाव के बावजूद वे अकेले लड़ीं। इससे भा.ज.पा. सातों सीट जीत गयी; लेकिन कांग्रेस नंबर दो पर आ गयी। बड़बोले केजरीवाल नंबर तीन पर पहुंच गये। संभवतः विधानसभा चुनाव में उनका राजनीतिक अंत हो जाएगा।

बंगाल में भा.ज.पा. का अस्तित्व अब तक कुछ खास नहीं था। वामपंथी गुंडागर्दी से दुखी लोगों ने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाया; पर मुख्यमंत्री बनते ही वे भी उसी राह पर चल पड़ीं। ऐसे में विपक्ष की खाली जगह भरने भा.ज.पा. आगे आयी। उसने पिछले कुछ साल में जो जमीनी संघर्ष किया, उससे लोगों का भरोसा जगा है। अतः ममता से चिढ़े वामपंथियों और कांग्रेसियों ने इस बार उसे ही वोट दिये। इससे भा.ज.पा. नंबर दो पर आ गयी और अब विधानसभा में भी उसका दावा मजबूत हो गया है। 

उ.प्र. में इस समय भा.ज.पा. नंबर एक पर है। नंबर दो के दावेदार स.पा. और ब.स.पा. दोनों हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में स.पा. को पांच सीटें मिलीं; पर मायावती खाली हाथ रह गयीं। 2017 का विधानसभा चुनाव भा.ज.पा. ने जीता। स.पा. दूसरे और ब.स.पा. तीसरे नंबर पर रही। अब मायावती और अखिलेश दोनों नंबर दो बनना चाहते हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव वे मिलकर लड़े। इसमें ब.स.पा. का पलड़ा भारी रहा। अतः मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया। चूंकि अब लड़ाई दिल्ली की नहीं, लखनऊ की है। 

जो दल भा.ज.पा. के साथ गठबंधन में हैं, वहां भी यही समस्या है। बिहार में नीतीश कुमार का कद घट रहा है; पर अब वे लालू के साथ नहीं जा सकते। उधर लगातार मजबूत हो रही भा.ज.पा. अब बड़ा भाई बनना चाहती है। नीतीश जानते हैं कि मुख्यमंत्री पद छूटते ही उनका दल टूट जाएगा और फिर उन्हें कोई नहीं पूछेगा। इसलिए वे भा.ज.पा. को आंख दिखाते रहते हैं। यदि लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी दोनों ने आधी-आधी सीटें लड़ीं, तो भा.ज.पा. आगे निकल जाएगी। इसी से नीतीश बाबू घबराये हैं। यानि गठबंधन में होते हुए भी वहां लड़ाई नंबर एक और दो की है। 

महाराष्ट्र में भी यही स्थिति है। वहां मुख्यमंत्री पद भा.ज.पा. के पास है, जिस पर शिवसेना की भी निगाह है; लेकिन भा.ज.पा. अपने संख्याबल से उसे दबाकर रखती है। शिवसेना वाले पिछला विधानसभा चुनाव अकेले लड़कर हाथ जला चुके हैं। इस लोकसभा में वे यदि अकेले लड़ते, तो एक-दो सीट ही मिलती; पर मोदी लहर में वे भी किनारे लग गये। अब विधानसभा चुनाव पास है, इसलिए वे फिर आंख तरेर रहे हैं; लेकिन एक नंबर पर बैठी भा.ज.पा. किसी कीमत पर उन्हें मुख्यमंत्री का पद नहीं देगी।

पंजाब में भा.ज.पा. अकाली दल के साथ है। भा.ज.पा. का प्रभाव शहरी हिन्दुओं में, जबकि अकालियों का ग्रामीण सिखों में है। भा.ज.पा. ने जब एक सिख (नवजोत सिंह सिद्धू) को आगे बढ़ाया, तो बादल साहब नाराज हो गये। भा.ज.पा. ने टकराव मोल नहीं लिया, अतः सिद्धू कांग्रेस में चले गये। सिद्धू का झगड़ा बादल परिवार से है; पर भा.ज.पा. अभी गठबंधन के पक्ष में है। शायद प्रकाश सिंह बादल के रहते तक तो भा.ज.पा. चुप रहेगी; पर फिर वहां भी एक नंबर के लिए दोनों में तकरार होगी। 

कहते हैं राजनीति असंभव को संभव बनाने का नाम है। केन्द्र और राज्यों में नंबर एक और दो की लड़ाई जारी है। भविष्य में कौन कहां होगा, भगवान ही जानता है।