बुधवार, 3 मई 2017

विपक्षी एकता की (अ)संभावनाएं

विपक्षी एकता की खिचड़ी पकाने के प्रयास फिर से हो रहे हैं। 1947 के बाद केन्द्र और राज्यों में प्रायः कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता था। विपक्ष के नाम पर कुछ जनसंघी, तो कुछ वामपंथी ही सदनों में होते थे। 1967 में डा. राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के प्रयास से पहली बार यह खिचड़ी पकी और उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी दलों की संयुक्त सरकारें बनीं। तबसे ही विपक्षी एकता की बात चल पड़ी।

लेकिन तबसे गंगा-यमुना में न जाने कितना पानी बह चुका है। 1975 के आपातकाल में इंदिरा गांधी ने विपक्ष के अधिकांश तथा अपनी पार्टी के भी कुछ विद्रोही नेताओं को जेल में बंद कर दिया। वहां इन नेताओं के पास कुछ काम नहीं था। यह भी पता नहीं था कि बाहर निकलेंगे या नहीं ? ऐेसे में फिर से दिल मिलने लगे। कहते भी हैं कि दुख मिलाता है और सुख दूर करता है। अतः विपक्षी एकता की खिचड़ी फिर पकने लगी। इस बार इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इंदिरा गांधी ने सत्ता को सदा अपने परिवार की चेरी बनाये रखने के लिए देश में तानाशाही थोपी थी; पर इसके साथ उसने संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया। संघ प्रत्यक्ष राजनीति तो नहीं करता; पर स्वयंसेवक उन दिनों प्रायः ‘भारतीय जनसंघ’ में सक्रिय थे, जो धीरे-धीरे कांग्रेस का स्थान ले रहा था। इंदिरा गांधी को उसकी धूर्त मंडली ने कहा कि जहां से जनसंघ को शक्ति मिल रही है, उस संघ को कुचल दो। इंदिरा गांधी ने यही किया; पर प्रतिबंध और लोकतंत्र की हत्या के विरोध में संघ ने देश भर में जन जागरण एवं सत्याग्रह किया। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) छद्म वेष में जेल में बंद नेताओं से मिले और उन्हें साथ आने को कहा। अधिकांश नेता भयभीत थे; लेकिन 1977 में चुनाव घोषित होने पर उन्होंने साहस जुटाया और फिर जो हुआ, वह इतिहास में लिखा है।

इस विपक्षी एकता के नाम पर ‘जनता पार्टी’ बनी। इसमें परदे के पीछे संघ और परदे के आगे श्री जयप्रकाश नारायण की बड़ी भूमिका थी। लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनसंघ को भी कुछ मंत्रीपद मिले। यद्यपि उनके काम और त्याग के हिसाब से ये कम थे। जेल में सर्वाधिक लोग संघ-जनसंघ के ही थे; पर विपक्षी एकता बनाये रखने के लिए वे चुप रहे। जयप्रकाश जी को राष्ट्रपति बनने का आग्रह किया गया; पर वे नहीं माने। संघ भी संगठन और सेवा के पुराने काम में लग गया। अर्थात विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोग स्वयं राजनीति से बाहर ही रहे। 

पर यह विपक्षी एकता शीघ्र ही बिखर गयी। चरणसिंह और जगजीवन राम लड़ने लगे कि मंत्रिमंडल में नंबर दो कौन है ? आखिर दोनों को उपप्रधानमंत्री बनाकर राजी किया गया। फिर राजनारायण, मधु लिमये, चंद्रशेखर जैसे समाजवादियों ने जनसंघ वालों पर दबाव डाला कि वे संघ से नाता तोड़ें। कुछ मूर्ख तो संघ को ही भंग करने को कहने लगे; पर जनसंघ वालों ने साफ कह दिया कि यह संबंध मां-बेटे जैसा अटूट है। इस पर पार्टी और सरकार में खूब तकरार हुई। 

इधर इंदिरा गांधी मौका ताक रही थी। उन्होंने सत्तालोलुप चरणसिंह को दाना डाला और उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर सरकार गिरा दी। भारत में वही एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जो एक भी दिन संसद नहीं गये। इसके बाद फिर चुनाव हुए। जनता पार्टी टूट चुकी थी। जनसंघ घटक ने ‘भारतीय जनता पार्टी’ बना ली। इससे विपक्षी एकता की आत्मा नष्ट हो गयी। इंदिरा गांधी ने नारा दिया कि सत्ता उन्हें दें, जो सरकार चला सकें। अतः जनता ने उन्हें बहुमत दे दिया।

यह विपक्षी एकता क्यों नहीं चली ? एक तो इसमें अधिकांश सत्ता के भूखे कांग्रेसी और झगड़ालू समाजवादी थे। असली विपक्ष तो केवल जनसंघ ही था; पर ये लोग उसके ही पीछे पड़ गये। उन्हें डर था कि संघ के जमीनी काम से जनसंघी सब ओर छा जाएंगे और भविष्य में हमारे बच्चे मुंह ही ताकते रहेंगे। दूसरा नेताओं को कुरसी के लिए लड़ता देख जयप्रकाश जी उदासीन हो गये। अतः विपक्षी एकता की दुकान बंद हो गयी।

इसके बाद विपक्षी एकता का प्रयास विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय में हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में राजीव गांधी तीन चौथाई बहुमत से प्रधानमंत्री बने; पर वे बोफोर्स की दलाली में फंस गये। इस पर वी.पी.सिंह ने विद्रोह का झंडा उठा लिया। उनके पीछे एक बार फिर सारा विपक्ष आ गया। इस बार दलों के विलय की बजाय एक मोरचा बनाया गया। इसे सफलता मिली और 1989 में वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री बन गये।

पर वी.पी.सिंह आते ही मुस्लिम तुष्टीकरण के गीत गाने लगे। इधर विश्व हिन्दू परिषद का श्रीराम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था। उधर देवीलाल ने वी.पी.सिंह की नाक में दम कर रखा था। उससे छुटकारे के लिए वी.पी.सिंह ने मंडल कमीशन की धूल खा रही रिपोर्ट जारी कर दी। देश में आरक्षण विरोधी आग लग गयी; पर अपने ओ.बी.सी. वोट मजबूत होते देख वी.पी.सिंह खुश थे। मुस्लिम वोट के लिए उन्होंने श्रीरामरथ के यात्री लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इससे भा.ज.पा. ने समर्थन वापस ले लिया। अब कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने; पर कुछ समय बाद कांग्रेस ने हाथ खींच लिया। 1991 में हुए नये चुनावों के बीच ही राजीव गांधी की हत्या हो गयी। उस सहानुभूति के बल पर कांग्रेस एक बार फिर जीत गयी और नरसिंहराव प्रधानमंत्री बन गये। विपक्षी एकता की पतीली फिर चूल्हे से उतर गयी।

यहां भी बात वही थी कि विपक्षी एकता की बात करने वालों का असली उद्देश्य कांग्रेस को हटाना नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री बनना था; और ऐसे लोग कई थे। इसलिए कांग्रेस के हटते ही ये आपस में लड़ने लगते थे। 

कुछ ऐसा ही माहौल इस समय भी है। अब भा.ज.पा. और नरेन्द्र मोदी की दुंदुभि बज रही है। अतः इनके विरोध की हांडी चढ़ाने का प्रयास हो रहा है; पर क्या इनके पास नानाजी देशमुख और जयप्रकाश नारायण जैसे सत्ता को ठुकराने वाले लोग हैं ? क्या सबको जोड़ने में अदृश्य गोंद की भूमिका निभाने वाला संघ जैसा कोई सेवाभावी संगठन है ? परिदृश्य तो उल्टा ही है। मृतप्रायः कांग्रेस के मालिक राहुल बाबा प्रधानमंत्री पद पर अपना पुश्तैनी हक समझते हैं। उधर नीतीश कुमार बिहार की जीत से खुद को असली दावेदार मानने लगे हैं। दावा तो अरविंद केजरीवाल का भी था; पर इन दिनों उनकी झाड़ू ही टूट के कगार पर है।

कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है; पर अभी तो विपक्षी एकता का प्रयास असंभावनाओं का तमाशा ही लगता है।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

फर्क डी.एन.ए. का है

इन दिनों देश भर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य देशभक्त संस्थाओं के लोग केरल में हो रही राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध शांतिपूर्ण धरने एवं प्रदर्शन कर रहे हैं। यों तो पिछले 50 साल से वामपंथी हमलों में वहां सैकड़ों कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। हजारों लोग अंग-भंग तथा नष्ट हो चुके कारोबार के कारण कष्ट भोग रहे हैं। मार्क्सवादी शासन में ये हिंसा और बढ़ जाती है। पिछले कुछ समय से यही हो रहा है। भारत में संघ और कम्यूनिस्टों में टकराव नयी बात नहीं है। आजादी से पहले संघ का काम बहुत कम था; पर जैसे-जैसे वह बढ़ा, उनमें टकराव शुरू हो गया। इसका कारण है दोनों के डी.एन.ए. में मूलभूत अंतर। 

संघ की स्थापना 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की। वे जन्मजात देशभक्त थे। यह देशभक्ति किसी दुर्घटना या अंग्रेजों द्वारा किये गये दुर्व्यवहार से नहीं उपजी थी। यह उन्हें मां के दूध और घरेलू संस्कारों से मिली थी। आठ साल की अवस्था में उन्होंने रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की 60 वर्षगांठ पर स्कूल में बंटी मिठाई को कूड़े में फेंक दिया था। सरकारी भवनों पर हुई सजावट देखने से भी उन्होंने मना कर दिया था। सीताबर्डी के किले पर लगे यूनियन जैक को उतारने का भी उन्होंने बालसुलभ प्रयास किया था। प्रतिबंध के बावजूद अपने विद्यालय में ‘वन्दे मातरम्’ गुंजाया था। कोलकाता में पढ़ते समय क्रांतिकारियों के साथ और वहां से आकर कांग्रेस में काम किया। संघ की स्थापना से पहले और बाद में भी वे जेल गये। उनके मन में गुलामी की पीड़ा थी। अतः स्वाधीनता प्राप्ति की आग हर स्वयंसेवक के मन में भी जलने लगी।

संघ का डी.एन.ए. सौ प्रतिशत भारतीय है। उसने अपने प्रतीक और आदर्श भारत से ही लिये। भगवे झंडे को गुरु माना। देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना तन, मन और धन लगाने वाले सभी जाति, वर्ग, क्षेत्र, आयु और लिंग के महामानवों को अपने दिल में जगह दी। हिन्दू संगठन होते हुए भी अन्य मजहब या विचार वालों से द्वेष नहीं किया। उन्हें समझने तथा शिष्टता से अपनी बात समझाने का प्रयास किया। शाखा के साथ-साथ निर्धन और निर्बल बस्तियों में सेवा के लाखों प्रकल्प खोले। अतः संघ धीरे-धीरे पूरे भारत में छा गया और लगातार बढ़ रहा है।

दूसरी ओर भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना भी 1925 में मानवेन्द्र नाथ राय ने कानपुर में की थी; पर उनकी जड़ें तथा आस्था केन्द्र सदा भारत से बाहर ही रहे। उनका नाम भी ‘भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी’ न होकर ‘भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी’ है। आज तक उन्होंने यह गलती ठीक नहीं की है। आजादी के आंदोलन के समय उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और सुभाष चंद्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा। 1962 में चीनी सेनाओं के स्वागत में बैनर लगाये। चीन के तानाशाह नेता माओ को अपना भी नेता कहा। ये देशद्रोह नहीं तो और क्या है ?

ऐसे लोग दिल्ली के जे.एन.यू. और जाधवपुर वि.वि. आदि में देश की बरबादी के नारे लगाते हुए आज भी मिलते हैं। कश्मीर में आतंकी के मरने पर वे छाती पीटते हैं और नक्सलियों द्वारा भारतीय जवानों की निर्मम हत्या पर जश्न मनाते हैं। उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में बंगलादेशी घुसपैठियों को आसानी से शरण मिलती है। वे स्वयं को राष्ट्रीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय मानते हैं। रूस, चीन, क्यूबा जैसे देश उनके खुदा हैं। उनके आदर्श हैं मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे गेवारा जैसे नेता, जिन्होंने लाखों लोगों को मारकर अपने देश में तानाशाही स्थापित की। इसलिए हिंसा और असहिष्णुता इनके डी.एन.ए. में शामिल है।

कम्यूनिस्ट भूलते हैं कि धर्म भारतीयों के खून में समाया है। जन्म से मृत्यु तक हर व्यक्ति के जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है; पर वे उसे अफीम बताते हैं। वे भूल गये कि रूस, चीन आदि में धर्म नहीं मजहब प्रभावी था। मजहबी नेताओं की जीवन के हर क्षेत्र में अनावश्यक घुसपैठ के विरुद्ध वहां विद्रोह हुए। धर्म और मजहब के अंतर को न समझने के कारण भारत को भी उन्होंने मजहबी चश्मे से ही देखा। लगातार गलत नंबर के चश्मे के प्रयोग से अब तो उनकी आंखें ही खराब हो गयी हैं। उन्हें हिन्दुओं का हर काम गलत दिखता है। वे राममंदिर, गोरक्षा और संस्कृत के विरोधी हैं; पर चर्चों में भ्रष्टाचार और मुस्लिम सामाजिक कुरीतियां उन्हें नहीं दिखती।

कैसा आश्चर्य है कि इतने साल बीतने पर भी उन्हें कोई सही भारतीय प्रतीक और आदर्श नहीं मिला। वे भगतसिंह को तो मानते हैं; पर उनके प्रिय गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ को नहीं। बसंती रंग से वे ऐसे भड़कते हैं, जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड। साहित्य में वे प्रेमचंद को तो मानते हैं, पर उनके धर्म और गोमाता प्रेम को नहीं। वे धर्म का विरोध तो करते हैं; पर वोट के लालच में दुर्गा पूजा भी मनाते हैं। यह ढकोसला ही उनके पतन का कारण है। 

वामपंथियों को आज नहीं तो कल यह समझना होगा कि यदि उन्हें भारत जैसे हिन्दू बहुल देश में अपना अस्तित्व बचाना है, तो भारतीय जड़ों से जुड़ना होगा। कई समझदार वामपंथियों ने जीवन के संध्याकाल में यह माना भी है। भारत में हर विचार और मजहब का सम्मान हुआ है। यहां यहूदी और पारसी भी बाहर से आये; पर उन्होंने भारतीयता को अपना लिया। इसलिए उनका तो विकास हुआ ही, देश के विकास में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। 

लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या वामपंथी अपने विदेशी डी.एन.ए. को छोड़कर ‘भारत माता की जय’ बोलेंगे ? अभी तो ऐसा नहीं लगता। आगे की भगवान जाने।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

केरल में बढ़ती हिंसा चिंताजनक

प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, देश के पहले संपूर्ण साक्षर राज्य केरल को ‘भगवान की धरती’ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अपने फरसे से जो भूभाग समुद्र में से बाहर निकाला था, वह केरल ही है; पर इन दिनों यह राज्य वामपंथी शासन की शह पर खुलेआम हो रही देशभक्तों की हत्याओं से दुखी है। मुख्यतः इनके शिकार हो रहे हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता। 

केरल में संघ का काम 1942 में शुरू हुआ था। 1940 में संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार के निधन के बाद सैकड़ों युवक संघ कार्य के विस्तार के लिए निकले। उनमें से दादाराव परमार्थ और दत्तोपंत ठेंगड़ी केरल आये। जैसे-जैसे काम बढ़ा, राष्ट्रविरोधियों के पेट में दर्द होने लगा। केरल में मुस्लिम, ईसाई और वामपंथी तीनों संघ का विरोध करते हैं। 629 ई. में अरब के बाहर पहली मस्जिद के लिए जमीन केरल में चेरामन पेरुमल राजा ने ही दी थी। ईसाइयों का काम भी यहां बहुत पुराना है। इन दोनों ने वहां धर्मान्तरण भी खूब किया है।

इस धर्मान्तरण में हिन्दू समाज की एक कुरीति की भी बड़ी भूमिका रही है। काफी समय तक हिन्दुओं को समुद्र यात्रा मना थी। शायद किसी बड़ी दुर्घटना के कारण यह नियम बना हो। क्रमशः नौका विज्ञान उन्नत हुआ और नौसेनाएं बनीं; पर यह नियम नहीं बदला। लेकिन मुसलमान समुद्र यात्रा पर जाते थे और दूसरे देशों से धन कमा कर लाते थे। वहां के लोग भी यहां आकर व्यापार करते थे।

यह देखकर हिन्दू भी जाग्रत हुए; पर धार्मिक मान्यता का क्या हो ? कुछ लोगों ने इसका रास्ता ये निकाला कि घर के एक युवक को मुसलमान बना दें। इससे धर्म का बंधन नहीं रहेगा और धन आ जाएगा; पर इसका भारी विरोध हुआ और ऐसे युवकों के विवाह में बाधा आने लगी। अतः रास्ताप्रेमियों ने मामा की कन्या से विवाह (दक्षिणे मातुले कन्या) को स्वीकृति दे दी। कुछ ने बाहर से आये युवा मुस्लिम व्यापारियों को ही दामाद बना लिया। ये दामाद ही मापिल्ला (मोपला) कहलाये। क्रमशः ये धनवान होते गये और उनका अलग वर्ग बन गया। 

कहावत है कि नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है। ऐसे ही ये मोपला भी कट्टर होते गये। 1920-21 में खिलाफत के लिए हजारों मोपला तुर्की गये थे; पर वहां से लुट-पिटकर लौटने पर उन्होंने मालाबार क्षेत्र में भारी उपद्रव किया। हजारों हिन्दुओं को मारा और हजारों को मुसलमान बनाया। हिन्दू महिलाओं से बलात्कार हुआ; पर गांधी जी ने आलोचना करने की बजाय उन्हें ‘माई ब्रेव मोपला ब्रदर्स’ कहा। वीर सावरकर का उपन्यास ‘मोपला’ इसी घटना पर केन्द्रित है। 

केरल के मुसलमान आज भी बड़ी संख्या में खाड़ी देशों में काम-धंधे के लिए जाते हैं। इससे उनके घर तथा मस्जिदें सम्पन्न हुई हैं। मुसलमानों की भाषा, बोली और रहन-सहन पर भी अरबी प्रभाव दिखने लगा है। यह चिंताजनक ही नहीं, दुखद भी है। देश विभाजन की अपराधी मुस्लिम लीग को देश में अब कोई नहीं पूछता, पर जनसंख्या और धनबल के कारण केरल में आज भी उनके विधायक और सांसद जीतते हैं।  

केरल में ईसाई भी समुद्री मार्ग से ही आये। फिर उन्होंने अपनी चिरपरिचित शैली में चर्च, स्कूल और अस्पताल आदि खोले। इससे उनका धर्मान्तरण का धंधा चलने लगा। इसमें दोष हिन्दुओं का भी है। केरल में जातिभेद बहुत गहराई तक फैला था। एक जाति का व्यक्ति दूसरी जाति वाले से कितनी दूरी पर चलेगा, इसके नियम बने हुए थे। कुछ लोगों को कमर में पीछे की ओर झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था, जिससे उनके चलने से गंदी हुई सड़क साफ होती चले। कुछ लोगों को थूकने के लिए गले में लोटा बांधकर चलना होता था, जिससे सड़क अपवित्र न हो जाए। इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने केरल को ‘जातियों का पागलखाना’ कहा था। इसका लाभ उठाकर मिशनरियों ने लाखों निर्धन और निर्बल लोगों को ईसाई बनाया। उनका यह षड्यंत्र आज भी जारी है।

भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हुई। स्वयं को राष्ट्रीय की बजाय अंतरराष्ट्रीय मानने वाले कम्यूनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन में भारत की पीठ में छुरा मारा और अंग्रेजों का साथ दिया; पर आजादी के बाद रूस और चीन की प्रेरणा और पैसे से ये दल बढ़ने लगे। नेहरू जी का झुकाव वामपंथ, और विशेषकर रूस की ओर था ही। 1962 में चीन के आक्रमण के समय कम्युनिस्टों ने बंगाल में चीनी सेना के स्वागत वाले पोस्टर लगाये। उन्होंने चीन के नेता माओ को अपना भी नेता कहा। 

1962 के बाद नेहरू जी का चीन से तो मोहभंग हुआ, पर रूस से नहीं। इंदिरा गांधी भी रूस के प्रति उदार रहीं। कांग्रेस की टूट और 1975 के आपातकाल में वामपंथियों ने उनका साथ दिया। इससे उपकृत इंदिरा जी ने महत्वपूर्ण शिक्षा और संचार संस्थान उन्हें सौंप दिये। इससे बुद्धिजीवी वर्ग में वे हावी हो गये। संसद के कानून से जवाहरलाल नेहरू वि.वि. बना, जिसका सारा खर्च केन्द्र उठाता है। इस प्रकार वामपंथियों की नयी पौध तैयार होने लगी।

पर हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण वामपंथी जनता से कटते गये और राजनीतिक रूप से पिछड़ने लगे। एक समय हिन्दीभाषी राज्यों से भी वामपंथी जनप्रतिनिधि जीतते थे; पर फिर वे बंगाल, त्रिपुरा और केरल तक सिमट गये। अब बंगाली गढ़ टूटने से उनकी सांसें क्रमशः मंद पड़ रही हैं। केरल में संघ और हिन्दू कार्यकर्ताओं पर हमले इसीलिए हो रहे हैं। मार्क्सवादियों का गढ़ ‘कन्नूर’ जिला इससे सर्वाधिक पीड़ित है। 

इस हिंसा के अधिकांश शिकार वही तथाकथित निर्धन, निर्बल, दलित और पिछड़े लोग बने हैं, जो कभी कट्टर वामपंथी थे; पर फिर उसके खोखलेपन को देखकर वे संघ से जुड़ गये। इससे बौखलाए वामपंथी हिंसा पर उतर आये हैं। केरल में अब तक 250 से भी अधिक कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। मार्क्सवादी शासन में ये हत्याएं बढ़ जाती हैं। गृह मंत्रालय उनके पास होने से थाने ही हत्यारों के ठिकाने बन जाते हैं। पिछले चुनाव में वामपंथियों की जीत से भी यही हुआ है। 

हिंसा के उनके तरीके भी बर्बर हैं। स्कूल में पढ़ाते हुए अध्यापक की हत्या। वाहन में से खींचकर हत्या। हाथ-पैर बांधकर जलाना। घर, दुकान, फसल या वाहन फूंकना। घर वालों के सामने मारना, हाथ-पैर काटना, आंखें निकालना आदि। वामपंथी तथाकथित उच्च जाति और पैसे वालों को ‘वर्ग शत्रु’ कहकर शेष लोगों को उनके विरुद्ध ‘वर्ग संघर्ष’ के लिए भड़काते हैं; पर केरल में संघ ही उनका ‘वर्ग शत्रु’ है। 

संघ के काम का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम है। पूरे देश की तरह केरल में भी संघ बढ़ रहा है। शाखा और सेवा कार्यों से प्रभावित होकर सब तरह के लोग संघ में आ रहे हैं। अतः वामपंथियों की जमीन खिसक रही है। सेवा और संस्कार के क्षेत्र में वे संघ के सामने नहीं टिकते। अतः उनके पास हिंसा ही एकमात्र रास्ता है; पर इतिहास गवाह है कि विचारों की लड़ाई विचारों से ही लड़ी जाती है। वामपंथ के दिन लद चुके हैं। बंगाली किला टूट गया है। अब केरल की बारी है। आज नहीं तो कल उन्हें यह बात माननी ही होगी।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

अभियानों से नहीं सुधरेगी व्यवस्था

राजनेताओं के लिए मीडिया में बने रहना जरूरी है। दो दिन अखबार में चित्र न छपे, तो उनका पेट खराब हो जाता है। रक्तचाप और दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। इसके लिए वे न जाने कैसे-कैसे पापड़ बेलते हैं। जब से नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता की बात कही है, तबसे झाड़ू लेकर फोटो खिंचाना नेताओं का शगल बन गया है। फिर भी ढाक के पात तीनही हैं। असल में अभियान या प्रचार से जागरूकता तो आती है; पर स्थायी व्यवस्था न होने पर फिर सब ठप्प हो जाता है।

कुछ उदाहरणों से ये बात स्पष्ट होगी। जयप्रकाश नारायण अपनी युवावस्था में गांधी, विनोबा और सर्वोदय से जुड़े। एक बार वे अपने कुछ साथियों को लेकर पास के गांव में गये। गांव बहुत गंदा था। जयप्रकाश जी तथा साथियों ने गांव वालों को सफाई को महत्व समझाया और वहां सफाई भी की। कुछ दिन बाद जयप्रकाश जी फिर वहां गये, तो गंदगी देखकर चौंक गये। उन्होंने पूछा, तो लोग उन्हें ही दोष देने लगे कि वे दोबारा सफाई के लिए क्यों नहीं आये ? जयप्रकाश जी ने सिर पकड़ लिया। गांव वालों ने उन्हें सफाई कर्मचारी समझ लिया था। यह घटना बताती है कि यदि लोगों का सफाई का स्वभाव और स्वप्रेरित व्यवस्था नहीं बनेगी, तो बात नहीं बनेगी। जयप्रकाश जी ने उन्हें फिर समझाया कि ‘‘सफाई करने से अधिक जरूरी सफाई रखना’’ है।

ऐसा ही एक उदाहरण पुरानी टिहरी का है, जो अब बांध में डूब चुकी है। वहां सीवर व्यवस्था न होने के कारण लोग घरों में पुराने किस्म के शौचालय प्रयोग करते थे। कई लोग सुबह निवृत्त होने के लिए गंगा तट पर आ जाते थे। इससे पड़ोसियों तथा वहां टहलने वालों को बड़ी परेशानी होती थी। अतः शहर के कुछ बुजुर्गों ने एक टीम बनायी और फिर हर दिन सुबह आठ-दस बुजुर्ग हाथ में डंडा और गले में सीटी डालकर तट पर आने लगे। जो कोई व्यक्ति तट के पास बैठने लगता, वे उसे डंडा दिखाकर दूर जाने को कहते थे। यदि वह नहीं मानता, तो वे सीटी बजाकर सब साथियों को बुला लेते थे। इतने लोगों को देखकर उसे भागना ही पड़ता था। बदतमीजी दिखाने वाले की डंडा परेड भी की जाती थी। इस व्यवस्था से कुछ ही दिन में पूरा गंगा तट साफ रहने लगा।

पिछले दिनों मैंने गंगा तट पर बसे एक छोटे नगर के बारे में पढ़ा। वहां भी घाटों पर गंदगी रहती थी। इस पर वहां के कुछ समाजसेवी लोगों ने नगर के स्कूल, बाजार, मंदिर, मस्जिद, धर्मशाला, जातीय पंचायतों आदि से सम्पर्क कर 52 टीम बनायीं। सफाई के लिए रविवार सुबह दो घंटे तय किये गये। एक टीम को वर्ष में एक बार 25 लोगों के साथ वहां आना होता है। इस प्रकार साल में 52 बार सफाई होने से तट साफ रहने लगा। लोगों में इतना उत्साह रहता है कि 25 के बदले 50 से भी अधिक लोग आ जाते हैं। महिला, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सब सफाई करते हैं। ये दो उदाहरण बताते हैं कि अभियान से नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाने से सफाई रहती है।

बाजारों में एक अजीब दृश्य दिखता है। लोग सुबह दुकान खोलते समय सफाई करते हैं और फिर कूड़ा सड़क पर डाल देते हैं। घरों में भी प्रायः ऐसा होता है। अब कई जगह नगरपालिकाएं सप्ताह में दो बार कूड़ागाड़ी भेजने लगी हैं; पर लोगों को आज नहीं तो कल समझना होगा कि सफाई करने की नहीं रखने की चीज है। ऐसी वस्तुएं प्रयोग करें, जो फिर काम आ सकें। घर का कूड़ा घर में ही खपाना या नष्ट करना होगा। वरना समस्या बढ़ती ही जाएगी।

मेरे एक मित्र का निजी स्कूल है। वहां शनिवार को अंतिम वेला में सब छात्र अपनी कक्षा साफ करते हैं। अध्यापक भी उनके साथ लग जाते हैं। 25-30 बच्चे घंटे भर में पूरी कक्षा चमका देते हैं। महीने के अंतिम कार्यदिवस पर सब अध्यापक और लिपिक आदि भी अपने कक्ष साफ करते हैं। प्राचार्य और प्रबंधक भी इसमें अपवाद नहीं हैं। चूंकि बच्चे और अध्यापक स्वयं सफाई करते हैं, तो वे गंदगी फैलाने से भी परहेज करते हैं। सफाई से पढ़ाई पर भी अच्छा परिणाम हुआ। यदि यह व्यवस्था हर सरकारी और निजी विद्यालय तथा कार्यालय में हो, तो चमत्कार हो सकता है। मोहल्ले और बाजारों में भी महीने में एक बार सब सामूहिक सफाई करें, तो सफाई के साथ आपसी प्रेम बढ़ेगा तथा लोग गंदगी करने से भी बचेंगे।

भारत में निजी सफाई का तो लोग काफी ध्यान रखते हैं; पर सार्वजनिक स्थानों का नहीं। लोग सोचते हैं कि इसके लिए सफाई कर्मचारी है। जब सरकार उसे पैसे दे रही है, तो फिर हम हाथ और कपड़े गंदे क्यों करें ? यहां तक कि सफाई करने वालों की एक अलग जाति ही बना दी गयी है। जिन गांधी जी की जयंती से नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियानशुरू किया है, उनके आश्रम में लोग अपने कपड़े और बरतन ही नहीं, शौचालय भी साफ करते थे। उन दिनों फ्लश के शौचालय नहीं होते थे। इससे छुआछूत की बीमारी पनपती ही नहीं थी।

यदि हमें देश स्वच्छ रखना है, तो एक-दो दिन के अभियान या फोटोबाजी से कुछ नहीं होगा। इसके लिए तो प्रचार और प्रसिद्धि से दूर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बनाकर उसमें शीर्षस्थ व्यक्ति को भी लगातार योगदान देना होगा। यदि 20-25 साल ऐसा हुआ, तो यह स्वभाव बन जाएगा। क्योंकि सफाई करने से नहीं, रखने से आती है।

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

राजनीति की अनिवार्य बुराई : जातिवाद

राजनीति की परिभाषा देश और विदेश के विद्वानों ने कई तरह से की है। अरस्तू ने यों तो हर विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं; पर उनकी ख्याति पॉलिटिक्सनामक ग्रंथ से ही हुई है। भारत में मनु, चाणक्य, विदुर और भर्तृहरि की नीतियां राजनीति में आधार के रूप में प्रयोग की जाती हैं। सरल शब्दों में कहें, तो राजनीति का अर्थ है आंतरिक और बाहरी बाधाओं से अपने क्षेत्र की रक्षा करते हुए नागरिकों का जीवन सुखी बनाना। यहां नागरिकों का अर्थ सब लोगों से है, चाहे उनकी जाति, वंश, लिंग, आयु, रंग, क्षेत्र और काम कुछ भी हो।

परिभाषाएं तो अपनी जगह हैं; पर शासक और उसके आसपास के लोगों के स्वभाव के कारण कुछ भेदभाव सदा से ही होता रहा है। पहले लोग इसे राजतंत्र की एक अनिवार्य बुराई मानते थे। इसलिए आजादी के बाद जब लोकतंत्र की स्थापना हुई, तो भारतवासियों को लगा कि अब शायद देश की राजनीति से जाति और क्षेत्रवाद का विष समाप्त हो जाएगा; पर 70 साल बीतने के बाद लगता है कि समाप्त होना तो दूर, ये बीमारी लगातार बढ़ रही है। यहां तक कि इनमें संतुलन बनाकर रखना ही राजनीति में सफलता की गारंटी है। उत्तर प्रदेश के ताजे चुनाव इसे बहुत स्पष्ट करते हैं।

उ.प्र. में भारतीय जनता पार्टी को रिकार्डतोड़ बहुमत मिला है। चुनाव की तैयारी के दौरान भा.ज.पा. की रणनीति बनाने वाले समझ गये थे कि चाहे जो हो, पर प्रदेश की जनसंख्या के दस प्रतिशत यादव वोट मुख्यतः अखिलेश के पाले में ही जाएंगे। इसी प्रकार दस प्रतिशत जाटव बिरादरी पूरी तरह मायावती के साथ है। 20 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुस्लिम वोटरों के बारे में काफी समय से यह मान्यता है कि वे चाहे कुएं में वोट डाल दें, पर भा.ज.पा. के साथ नहीं जाएंगे। इन बिन्दुओं के आधार पर ही भा.ज.पा. ने रणनीति बनायी और उसके परिणाम से मायावती, अखिलेश और राहुल बाबा के सपने ध्वस्त हो गये।

भा.ज.पा. ने जहां एक ओर संगठन में (यादव रहित) पिछड़े वर्ग तथा (जाटव रहित) अनु.जाति आदि को महत्व दिया, वहां टिकट वितरण में भी इनका पूरा ध्यान रखा। चुनाव से पूर्व उसने दूसरे दलों से चुन-चुनकर इन जातियों के प्रमुख लोगों को तोड़कर अपने साथ मिलाया। इससे अन्य दलों का मनोबल टूटा तथा भा.ज.पा. की जातीय गोलबंदी मजूबत हुई। उसने पिछड़े वर्ग के 123 प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाया; पर उनमें यादवों की संख्या केवल आठ थी। इसी प्रकार उसने अनुसूचित जाति और जनजाति की सुरक्षित सीटों पर 85 प्रत्याशी उतारे, जिनमें केवल 20 जाटव थे।

उ.प्र. में यादव समाज संख्या, लाठी, खेतीहर जमीन के साथ ही शिक्षा से भी लैस है। आरक्षण तथा सुरक्षा कानूनों के कारण जाटव भी काफी आगे बढ़े हैं। स.पा. और ब.स.पा. के शासन में सत्ता का वरदहस्त भी इन्हीं दोनों वर्गों पर रहता आया है। अतः इनकी दंबगई और प्रगति से दुखी शेष पिछड़े वर्ग के साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति के वे सब लोग खुलकर भा.ज.पा. के साथ आ गये, जो इनके कारण स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते थे।

इसी रणनीति के अन्तर्गत भा.ज.पा. ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। यद्यपि विरोधियों द्वारा इसकी बहुत आलोचना हुई। राजनाथ सिंह और उमा भारती जैसे बड़े नेताओं ने भी चुनाव प्रचार के दौरान दबी जुबान से इसे अनुचित कहा; पर अमित शाह के नेतृत्व में काम कर रहे चुनाव के रणनीतिकार अपनी नीति पर दृढ़ रहे। मुसलमान जहां एक ओर भ्रमित होकर मायावती और अखिलेश के पाले में बंट गये, वहां तीन तलाकके शरीयती नियमों से दुखी महिलाओं ने चुपचाप बड़ी संख्या में भा.ज.पा. का साथ दिया। मुस्लिम युवा भी मजहबी फतवेबाजों को ठुकरा कर विकासपुरुष मोदी के पक्ष में आ गये। इससे बाजी पलट गयी। अब मायावती, अखिलेश और राहुल बाबा मूढ़ पकड़कर कागज पर अपने वोटों को जोड़ और घटा रहे हैं। पर ‘‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।’’ जातीय आंकड़ों की सीढ़ी चढ़कर सत्ता पाने वाले भूल गये कि अब उनके सामने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे चतुर खिलाड़ी हैं। इन दोनों ने जातिवाद का जहर फैलाने वाले दलों को उनके अखाड़े में उनके ही दांव से मात दे दी।

चुनाव प्रचार में भी भा.ज.पा. ने जातीय संरचना का ध्यान रखा। राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, सिद्धार्थनाथ सिंह (क्षत्रिय), कलराज मिश्र, दिनेश शर्मा (ब्राह्मण), केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य (पिछड़े), उमा भारती (लोध), संतोष गंगवार, अनुप्रिया पटेल (कुर्मी), संजीव बालियान (जाट).. आदि नेताओं को उनके प्रभाव वाली सीटों पर प्रचार के लिए भेजा गया। इसका मतदाताओं में अच्छा संदेश गया। दूसरी ओर स.पा. में अखिलेश यादव, ब.स.पा. में मायावती तथा कांग्रेस में राहुल के अलावा कोई अन्य नेता प्रचार के लायक ही नहीं समझा गया। अतः एक नेता वाले ये दल धराशायी हो गये और चहुंदिश भगवा पताका फहरा गयी।

मुख्यमंत्री बनाते समय भी भा.ज.पा. ने जातीय संतुलन का ध्यान रखा। गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ की छवि प्रखर और उग्र हिन्दू की है। संभवतः इसीलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। पर वे क्षत्रिय वर्ग से भी हैं, अतः उनके साथ पिछड़े वर्ग से केशवप्रसाद मौर्य तथा दिनेश शर्मा (ब्राह्मण) को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है।

कैसा आश्चर्य है कि जातिवाद का विरोध करने वाले सभी दल चुनाव आते ही जातीय जोड़तोड़ में लग जाते हैं। ऐसे में जातिवाद को राजनीति की अनिवार्य बुराईकहना शायद ठीक ही होगा। 

रविवार, 12 मार्च 2017

मोदी लहर में सब साफ

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों ने बता दिया है कि देश में इस समय सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वस्त नेता नरेन्द्र मोदी ही हैं। सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी; जनता ने उनके हर निर्णय को शिरोधार्य किया है। मोदी हर संघर्ष में सेनापति की तरह आगे रहकर नेतृत्व करते हैं। अमित शाह का संगठन कौशल और रणनीतिक सूझबूझ भी निर्विवाद है। कांग्रेस में कैप्टेन अमरिंदर सिंह जनाधार वाले नेता, जबकि राहुल बाबा एक बार फिर पप्पू सिद्ध हुए हैं। अखिलेश और मायावती को जो चोट लगी है, उसे वे कभी नहीं भूल सकेंगे। केजरीवाल का बड़बोलापन काम नहीं आया। चुनावी विशेषज्ञ प्रशांत किशोर का प्रबंध धरा रह गया। बादल परिवार का भ्रष्टाचार पंजाब में भा.ज.पा. को भी ले डूबा।

उत्तर प्रदेश - उ.प्र. के चुनावों पर देश ही नहीं, दुनिया भर की निगाह थी। कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है। निःसंदेह उ.प्र. ने 2019 के लिए मोदी का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। जहां तक अखिलेश की बात है, वह अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे थे। परिवार में हुआ झगड़ा स्वाभाविक हो या प्रायोजित; पर अमरीका में बैठकर उनकी रणनीति बनाने वाले फेल हो गये हैं। घरेलू झगड़ा और राहुल का साथ, दोनों कदम आत्मघाती सिद्ध हुए। शिवपाल ने भी अखिलेश को हराने में पूरा जोर लगाया। अब शिवपाल का अलग समाजवादी दल भी शीघ्र ही देखने को मिल सकता है।

अखिलेश ने हार तो तभी मान ली थी, जब उन्होंने राहुल से हाथ मिलाया था। वे यह नहीं समझ सके कि कांग्रेस डूबती नाव है और राहुल बेकार कप्तान। फिर भी उन्होंने गठबंधन किया। यद्यपि इससे उन्हें लाभ ही हुआ। गठबंधन के बिना अखिलेश की सीट इससे भी आधी रह जातीं और कांग्रेस साफ हो जाती। अखिलेश और राहुल को शायद यह समझ आ गया होगा कि लोग उनके चेहरे देखकर मन बहलाने तो आते हैं, पर वोट नहीं देते।

अब ब.स.पा. की बात करें। मायावती का जातीय समीकरण कागजों पर तो बहुत अच्छा था, पर वह जमीन पर नहीं उतर सका। नोटबंदी से उन्हें भारी नुकसान हुआ। चुनाव के लिए रखे अरबों रुपये एक ही रात में रद्दी हो गये। अतः उनका चुनाव अभियान फीका रहा। यद्यपि नुकसान स.पा. को भी हुआ, पर सत्ता ने इसकी भरपाई कर दी। अब ब.स.पा. में विद्रोह और टूट की पूरी संभावना है। मायावती का राजनीतिक भविष्य भी अब समाप्त सा लगता है।

जहां तक भा.ज.पा. की बात है, तो उनका पूरा अभियान मोदी केन्द्रित था और उसकी कमान सीधे अमित शाह के हाथ में थी। यद्यपि बिहार का ऐसा ही अभियान सफल नहीं हुआ था। उससे मोदी और अमित शाह ने काफी कुछ सीखा होगा। फिर बिहार और उ.प्र. की परिस्थिति अलग है। भा.ज.पा. ने बड़े जातीय समूहों की बजाय छोटे समूहों को साथ लिया। इससे उसे लाभ हुआ। प्रदेश में मुस्लिम वोटबैंक का मिथक भी टूटा है। मुस्लिम महिलाओं ने भी चुपचाप भा.ज.पा. का साथ दिया है। इससे औरतों को पैर की जूती समझने वाले मजहबी नेताओं को नानी याद आ गयी है। लगता है देश अब जाति, मजहब और वंशवादी राजनीति के कोढ़ से उबर रहा है। 

पंजाब - उ.प्र. की तरह पंजाब भी एक बड़ा राज्य है। वहां बादल परिवार दस साल से सत्ता में था। भा.ज.पा. की भूमिका वहां छोटे सहयोगी की थी। इस बार माहौल बादल परिवार के विरुद्ध था। इससे कांग्रेस को लाभ हुआ; पर यह जीत वस्तुतः अमरिंदर सिंह की जीत है। यद्यपि राहुल ने उन्हें खूब अपमानित किया। फिर भी वे पार्टी में बने रहे। अंततः उन्हें ही चुनाव की कमान सौंपी गयी। सत्ता विरोध का लाभ आपाको भी हुआ। एक समय तो मीडिया उसे विजेता कह रहा था; पर उसकी जीत बहुत दुखद होती। क्योंकि उसकी पीठ पर देश और विदेश में बैठे खालिस्तानियों का हाथ है। सीमावर्ती राज्य में उस जैसी अराजक पार्टी का शासन बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकता था। इस नाते वहां कांग्रेस की जीत ठीक ही है।

भा.ज.पा. को शुरू से ही बादल विरोधी रुझान दिख रहा था। फिर भी उसने साथ नहीं छोड़ा। इसके दो कारण हैं। एक तो दोनों का साथ पुराना है। दूसरा भा.ज.पा. वहां शहरी हिन्दुओं की पार्टी है, तो अकाली ग्रामीण सिखों की। दोनों का मेल वहां सामाजिक सद्भाव का समीकरण बनाता है। इसे बचाने के लिए निश्चित हार का खतरा उठाकर भी भा.ज.पा. अकालियों के संग रही। यदि भा.ज.पा. महाराष्ट्र की तरह वहां भी अलग से सब सीटों पर लड़ती, तो सबसे आगे रहती। लोगों को मोदी और भा.ज.पा. पर विश्वास है, पर बादल परिवार के बोझ ने नाव डुबो दी। अब भा.ज.पा. को चाहिए कि वह ग्रामीण सिखों में से नेतृत्व ढूंढकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये। इससे अगले सभी चुनावों में उसे सफलता मिलेगी।

उत्तराखंड - उत्तराखंड में भा.ज.पा. को दो तिहाई स्थान मिले हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत दोनों जगह से चुनाव हार गये हैं। उनका अहंकार और भ्रष्टाचार पूरी पार्टी को ले डूबा। साल भर पहले भा.ज.पा. ने सत्ता पाने के लिए पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में जाल बिछाया था, पर बात नहीं बनी। इस बार भा.ज.पा. ने उन सब विद्रोहियों को भी टिकट दिया था। भा.ज.पा. को गढ़वाल, कुमाऊं, तराई और मैदान, सब तरफ जीत मिली है। उत्तराखंड भा.ज.पा. में चार पूर्व मुख्यमंत्री हैं। अब ताज उनमें से किसी को मिलेगा या पांचवे को, यह देखना बहुत रोचक है।

गोवा - गोवा में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। भा.ज.पा. के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पर्सीकर और कई मंत्री भी हार गये हैं। इसमें भा.ज.पा. से नाराज स्वयंसेवकों की भी बड़ी भूमिका है। अर्थात आग घर के चिराग से ही लगी है। अब वहां सरकार किसकी बनेगी, यह समय ही बताएगा।

मणिपुर - मणिपुर में भा.ज.पा. के पास खोने को कुछ नहीं था। इसलिए उसे जो मिला, वह ठीक ही है। भा.ज.पा. काफी तेजी से ईसाई और जनजातीय प्रभाव वाले पूर्वोत्तर भारत में आगे बढ़ रही है। इसमें संघ द्वारा संचालित सेवा कार्यों का बड़ा योगदान है। साथ ही असम के पुराने कांग्रेसी और वर्तमान भा.ज.पा. नेता हेमंत बिस्व शर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

कुल मिलाकर इन चुनावों ने भा.ज.पा. का प्रभाव और मोदी का कद बढ़ाया है। होली के इस केसरी रंग से सभी देशप्रेमी हर्षित हैं।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

राजनीति और महिलाएं

राजनीति में महिलाओं की भूमिका की चर्चा सदा से होती रही है। प्रायः यह चुनाव में 33 से 50 प्रतिशत तक आरक्षण पर आकर टिक जाती है। कई राज्यों की पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इससे क्या सुधार हुआ, यह तो समय ही बताएगा। राजनीति में महिलाओं की भूमिका कभी परदे के पीछे होती है, तो कभी आगे। कभी महिलाएं राजसत्ता का उपयोग कर लेती हैं, तो कभी महिलाओं को वस्तु की तरह उपयोग कर राजनीति को प्रभावित किया जाता है।

रामायण काल में दशरथ की सबसे छोटी रानी कैकेयी ने अपने पुत्र भरत को राजगद्दी दिलाने के लिए युवराज पद पर बैठने जा रहे राम को 14 वर्ष का वनवास दिलवा दिया, जिससे इस दौरान भरत और उसकी संतानों की पूरी पकड़ राज्यतंत्र पर हो जाए। दूसरी ओर शूर्पणखा ने रावण को सीता हरण के लिए बाध्य किया। इन दोनों की भूमिका के आसपास ही पूरी रामकथा घूमती रहती है। यह राजनीति नहीं तो और क्या है ?

महाभारत काल में राजा शांतनु ने जब निषाद-कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहा, तो वह इस शर्त पर राजी हुई कि उसकी संतानें ही राजा बनेंगी। इसी कारण भीष्म को आजीवन ब्रह्मचारी रहना पड़ा। गांधारी को सदा यह दर्द रहा कि बड़े भाई धृतराष्ट्र की पत्नी होने पर भी गद्दी का उत्तराधिकारी उसका पुत्र दुर्योधन नहीं, बल्कि उसके देवर पांडु का पुत्र युद्धिष्ठिर होगा। इस महत्वाकांक्षा ने ही उसके पति और बेटों के दिमाग भ्रष्ट कर दिये। आज भी अपने विरोधी को हराने के लिए उनकी महिलाओं का अपमान किया जाता है। द्रौपदी के साथ भी यही हुआ। यह बात उसके दिमाग में बहुत गहरी बैठ गयी। अतः वनवास काल में उसने युद्धिष्ठिर को कई बार ये समझौता तोड़ने को कहा।

न समय परिरक्षणं क्षमं ते, विकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा, विदधति सोपधि सन्धिदूषणानि।।      
                               - भारवि रचित किरातार्जुनीय महाकाव्य से

(द्रौपदी कहती है कि जब शत्रु अपकार कर रहे हों, तो सन्धि की समयावधि की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। विजय पाने के इच्छुक राजा सन्धि में कमी निकाल कर उसे तोड़ देते हैं।)

जब वनवास पूरा कर पांडव वापस आये, तो कौरवों ने उन्हें राजसत्ता नहीं दी। इससे युद्ध का माहौल बनने लगा। श्रीकृष्ण यह नहीं चाहते थे। अतः वे संधि का प्रस्ताव लेकर कौरव सभा में गये; पर जाने से पहले द्रौपदी ने अपने खुले केश दिखाकर कहा कि ये दुःशासन के रक्त से गीले होने के बाद ही बंधेंगे। इससे श्रीकृष्ण के हाथ बंध गये। कौरव सभा से आकर श्रीकृष्ण ने पांडवों को सब हाल बताया। इस पर कुंती ने कहा कि जिस समय के लिए क्षत्राणियां अपने पुत्रों को जन्म देती हैं, वह समय आ गया है। इसलिए अब पीछे हटना कायरता होगी। वह प्रसंग भी प्रसिद्ध है जब युद्ध के दौरान कंुती ने कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताकर पांच में चार पांडवों के प्राण सुरक्षित कर लिये। द्रौपदी ने भी भीष्म के पास जाकर उनकी मृत्यु का रहस्य पूछ लिया।

मत्स्यकन्या, गांधारी, कुंती और द्रौपदी का व्यवहार क्या महिला राजनीति नहीं थी ? श्रीकृष्ण द्वारा कुंती को कर्ण के पास और द्रौपदी को भीष्म पितामह के पास भेजने को क्या राजनीति में महिलाओं का उपयोग नहीं कहेंगे ?

होली हमें राजा हिरण्यकशिपु, उसकी साध्वी पत्नी कयाधु, पुत्र प्रह्लाद और दुष्ट बहिन होलिका की याद दिलाती है। कयाधु समझ गयी थी कि पति को सुधारना असंभव है। अतः उसने प्रह्लाद को संस्कारित किया। भविष्य की तैयारी करते हुए सेना और शासन में अपने विश्वस्त लोगों को बैठाया। जनता को जागरूक किया। इसीलिए प्रह्लाद को मारने के सब षड्यंत्र विफल हुए; और अंततः फागुन पूर्णिमा की रात में जनता ने राजमहल पर हमला कर दिया। हिरण्यकशिपु और होलिका मारी गयी। इस प्रकार होलिका की राजनीति विफल और मां कयाधु की राजनीति सफल हुई।

राजनीति में महिलाओं के भी अच्छे और खराब प्रसंग प्रसिद्ध हैं। जीजाबाई, इंदौर की रानी अहिल्या, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, गढ़मंडल की रानी अवंतीबाई, देवल रानी, हाड़ी रानी, कित्तूर की रानी चेनम्मा आदि के नाम सुनकर सीना चौड़ा हो जाता है। दूसरी ओर सम्राट अशोक की युवा पत्नी तिष्यरक्षिता ने बड़ी रानी पद्मावती के पुत्र कुणाल पर झूठा आरोप लगाकर उसे मृत्युदंड दिलवा दिया। यद्यपि सच पता लगने पर सम्राट ने उसे भी प्राणदंड दिया। रानी सुनीति ने राजा उत्तानपाद की गोद में बड़ी रानी सुमति के पुत्र को नहीं बैठने दिया। यद्यपि इस चोट और मां के मार्गदर्शन ने उसे धु्रव का अटल स्थान दिलवा दिया। हिन्दू और मुस्लिम शासकों की पटरानी, रानी, रखैल और दासियों के बीच चलने वालों षड्यंत्रों से इतिहास के ग्रंथ तथा लोक आख्यान भरे हैं। दिल्ली के इतिहास में रजिया सुल्तान  को कुशल प्रशासक के रूप में याद किया जाता है। शाहजहां का शासन वस्तुतः नूरजहां ही चलाती थी। 1789 में फ्रांस की राज्यक्रांति में राजा के साथ उसकी अय्याश रानी मेरी एंटोयनेट को भी मृत्युदंड दिया गया था।

महिलाओं का उपयोग राजनीति साधने में भी होता है। गांधारी का धृतराष्ट्र से और सैल्यूकस की बेटी हेलन का चंद्रगुप्त से विवाह इसीलिए हुआ था। विवाह से रिश्ते ही नहीं, राजघराने भी मजबूत होते रहे हैं। कई हिन्दू घराने अपनी बहिन-बेटियां मुस्लिम शासकों को देकर सुरक्षित हो गये; पर कई स्वाभिमानी राजाओं ने इसके बजाय लड़ना और मरना स्वीकार किया। इसीलिए लोग आज चित्तौड़ के जौहर को याद करते हैं, उन कायर राजाओं को नहीं।

पश्चिम में तो प्रभावी लोगों के संग विषकन्याओं को चिपकाने का षड्यंत्र ही चलता है। विदेश में पढ़ने वाले प्रभावी घरानों के लड़कों से उनकी दोस्ती करा दी जाती है। फिर वह पत्नी बने या कुछ और, पर उससे वे सदा दबे रहते हैं। इन महिलाओं ने भी राजनीति को प्रभावित किया है। नेहरू की लेडी माउंटबेटन तथा जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक की विदेशी पत्नी से मित्रता थी। उनके दबाव से ही जम्मू-कश्मीर का विषय संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा। सिक्किम के शासक की अमरीकी पत्नी ने भारत में विलय में कई बाधाएं डालीं; पर वह विफल हुई। अतः वह अपने बच्चों के साथ महल की कीमती और महत्वपूर्ण सामग्री लेकर स्वदेश चली गयी। भारत में भी कई नेताओं की पत्नियां विदेशी हैं। उनमें से कौन स्वाभाविक रूप से आयी हैं और कौन षड्यंत्रपूर्वक, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

कई राजनीतिक महिलाएं जहां एक ओर कुशल प्रशासक सिद्ध हुई हैं, वहां तानाशाही, वंशवाद और भ्रष्टाचार के मामले में भी वे कम नहीं रहीं। इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान तोड़ा; पर कांग्रेस की टूट और आपातकाल की कालिख भी उनके ही नाम दर्ज है। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता और शशिकला के उदाहरण तो ताजे ही हैं। यहां इजराइल की गोल्डा मायर, इंग्लैंड की मार्गरेट थेचर, श्रीलंका में श्रीमाओ भंडारनायके आदि को भी याद करना होगा, जिन्होंने अपने काम से विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। 

महिलाओं की राजनीति में भागीदारी कब और कितनी हो, इस बारे में अलग-अलग राय हो सकती है; पर यह तो सच ही है कि महिलाओं को प्रकृति ने बच्चों के पालन की एक विशेष जिम्मेदारी दी है। उसे निभाते हुए, जब बच्चे मां के बिना भी रह सकें, तब उन्हें राजनीति में आना चाहिए। यदि ऐसा हो, तो फिर चुनाव में उन्हें कितने प्रतिशत स्थान मिलें, यह गौण हो जाता है। दुर्भाग्यवश इस बारे में सब दलों को जाति, वंश और मजहब के हिसाब से जिताऊ पुरुषों के घर की महिलाएं ही दिखायी देती हैं। जीतने पर उनका काम भी पुरुष ही करते हैं। इससे महिलाएं स्वयं ही दूसरे दर्जे की राजनेता बन रही हैं।


असल में राजनीति का अर्थ केवल चुनाव लड़ना ही नहीं है। सामाजिक कार्यों में भाग लेकर नीति निर्माताओं को सही निर्णय के लिए मजबूर करना भी राजनीति ही है। यदि महिलाएं इसे समझें, तो उनकी भागीदारी दस या बीस नहीं, सौ प्रतिशत हो सकती है।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

नेता जी के साथ एक दिन

ये चुनाव के दिन हैं। जिसे देखो अपनी प्रशंसा और दूसरे की बुराई करने में दिन-रात एक कर रहा है। नेता लोग दूसरे की सबसे अधिक आलोचना जिस मुद्दे पर करते हैं, वह है भ्रष्टाचार। सब दूसरे को भ्रष्टाचारी और स्वयं को ताजे दूध का धुला बताते हैं। लेकिन चुनाव जीतते ही अधिकांश लोग उसी काम में लग जाते हैं, जिसकी आलोचना कर वे चुनाव जीतते हैं।

इसे मैं अपना सौभाग्य कहूं या दुर्भाग्य, पर मेरे कई मित्र सक्रिय राजनीति में हैं। कई साल पुरानी बात है। दिल्ली में मेरा एक मित्र कई साल से पार्षद है। उसके क्षेत्र में नगरीय के साथ ही कुछ ग्रामीण क्षेत्र भी है। उससे एक बार इस बारे में चर्चा हुई, तो उसने मुझे दिन भर अपने साथ रहने को कहा, जिससे मैं उसकी कठिनाई समझ सकूं। मैंने उसकी बात मान ली। सुविधा के लिए हम उसका नाम रमेश रख लेते हैं।

दो दिन बाद बसंत पंचमी का अवकाश था। अतः मैं सुबह नहा धोकर आठ बजे उसके घर पहुंच गया। नाश्ता उसके साथ ही किया। इसके बाद हम लोग नीचे बैठक कक्ष में आ गये। वहां पहले से 20-25 लोग जमे थे। रमेश ने एक कर्मचारी उन्हें चाय आदि पिलाने के लिए रखा हुआ था। बैठक कक्ष से लगी हुई एक अलग रसोई भी थी। आगंतुकों के लिए वहीं चाय बन रही थी। चाय के साथ कुछ बिस्कुट भी थे। बहुत से लोग कुछ मिष्ठान आदि लेकर आते थे। वह सामग्री इसी रसोई में रखी जाती थी और यहीं खर्च हो जाती थी। रमेश उसे अपने घर नहीं ले जाता था। सुबह नौ बजे से एक बजे तक हम वहां बैठे रहे। कई आगंतुकों के साथ सुरक्षाकर्मी होते थे। उनके तथा गाड़ी चालकों के लिए बार-बार चाय बाहर भी जा रही थी। चाय बनने की गति देखकर मैंने अनुमान लगाया कि दिन भर में 200 कप चाय तो जरूर बनती होगी।

इस चार घंटे के दौरान सात-आठ समूह चंदा मांगने आये। किसी के मोहल्ले में जागरण हो रहा था, तो कहीं मंदिर बन रहा था। कोई अपने गांव में होने वाले किसी अन्य सामाजिक काम के लिए चंदा लेने आया था। कई लोग तो ऐसे थे, जो उनके चुनाव क्षेत्र के भी नहीं थे। मान न मान, मैं तेरा मेहमान। रमेश कभी 21 रु. से शुरू करता, तो कभी 51 रु. से; पर कोई सौ से कम में नहीं टला। दो समूहों के साथ ग्राम प्रधान भी आये थे। अतः उन्हें 501 तथा 1,100 रु. देने पड़े। रमेश ने बताया कि प्रधान जी के प्रभाव में गांव के वोट रहते ही हैं। इसलिए अच्छी रसीद कटवानी पड़ती है।

दो बजे हम लोगों ने खाना खाया और फिर बैठक में आ गये। अब एक सज्जन आये। वे पार्टी के अच्छे कार्यकर्ता थे। चुनाव के समय जी-जान से लगते भी थे। उनकी बेटी का विवाह था। उन्हें दो दिन के लिए कार चाहिए थी। उनकी इच्छा भी पूरी की गयी। रमेश ने बताया कि उसके पास तीन कार हैं। एक अपने लिए, दूसरी परिवार के लिए और तीसरी मांगने वालों के लिए। मांगने वालों को चालक और तेल सहित गाड़ी देनी पड़ती है। शादी विवाह के दिनों में तो कई बार दो गाड़ी ही मंगनी में चली जाती हैं। ऐसे में उसे अपने लिए टैक्सी मंगानी पड़ती है। रमेश के चालक ने बताया कि महीने में 20 दिन तो एक गाड़ी इन कामों में बाहर रहती ही है।

इसी तरह लोगों से मिलते हुए शाम हो गयी। उस दिन बसंत पंचमी थी। इस दिन बिना मुहूर्त देखे शादियां हो जाती हैं। रमेश के पास भी लगभग 25 निमन्त्रण पत्र आये हुए थे। उन्होंने सबसे लिए लिफाफे बनाये। उन्हें तीन भागों में बांटा। कुछ अपने बड़े बेटे को दिये और कुछ छोटे को। बाकी अपनी जेब में रखे और शाम को सात बजे निकल पड़े। उन्होंने बताया कि इन लिफाफों में शुभकामना और आशीर्वाद के लिए क्रमशः 101, 251 और 501 रु. हैं। एक लिफाफा 1,100 रु. वाला भी था। सात-आठ जगह हम लोग गये। सब जगह कुछ न कुछ खाना पड़ा। रात में बारह बजे लौटकर हम सो गये।

अगले दिन सुबह चलने से पहले जब हम नाश्ता करने बैठे, तो रमेश ने मेरी तरफ देखकर पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या विचार है, कल दिन भर में मेेरे कितने पैसे खर्च हुए होंगे ?’’ मुझे चुप देखकर बोला, ‘‘हर दिन इसी तरह 20 से 25 हजार रु. खर्च होते हैं। पार्षद के नाते हमें जो वेतन आदि मिलता है, उससे तो एक हफ्ता भी नहीं खिंच सकता। और ये तो चुनाव जीतने के बाद है। चुनाव से पहले टिकट मिल जाए, इसके लिए जो भागदौड़ और नेताओं की सेवा-टहल करनी पड़ती है, उसमें भी कई लाख रु. खर्च होते हैं। दिल्ली में इतनी तरह के नेता रहते हैं। कभी कोई आ जाता है, तो कभी कोई बुला लेता है। वे आएं या हम जाएं, पैसे तो हर बार लगते ही हैं। पेट गाड़ी का भी भरना पड़ता है और साथ चलने वालों का भी।

- और चुनाव में ?

- बस इतना ही समझ लो कि इस बार मैंने लगभग दो करोड़ रु. खर्च किये हैं।

- यानि राजनीति में भ्रष्टाचार के बिना काम नहीं चलता ?

- अपवाद तो सब जगह हैं; पर ये एक कड़वा सच है। या तो हम राजनीति छोड़ दें; पर इसमें रहना है तो फिर सौ प्रतिशत ईमानदारी से काम नहीं चलता। हम चाहें या नहीं, पर सिस्टम ऐसा बना हुआ है कि भ्रष्टाचार हो ही जाता है।

- वो कैसे ?

- वो ऐसे कि हमारे क्षेत्र में जो भी नया निर्माण हो रहा है, वह सरकारी हो या निजी, उसमें हमारा और हमसे ऊपर वालों का निश्चित हिस्सा है। वह अपने आप पहुंच जाता है। इसे लोग भ्रष्टाचार नहीं मानते। हां, इससे अधिक हम कुछ मांगें; या हिस्सा मिलने पर भी काम में बाधा डालें, तो वह भ्रष्टाचार है। इसे लोग खराब मानते हैं।

- अच्छा ?

- जी हां। हमने चुनाव जीतने के लिए जो दो करोड़ खर्च किये हैं, दो साल तो उन्हें पूरा करने में ही लगेंगे। फिर अगले तीन साल में तीन करोड़ बचाने हैं। तभी तो अगला चुनाव लड़ सकेंगे। जितना इस बार खर्च हुआ है, अगली बार उससे डेढ़ गुना खर्च होगा। आपका जनाधार कितना भी बड़ा हो, पर पैसे ना हों, तो पार्टी वाले भी नहीं पूछते। जनता भी अब नेताओं के भ्रष्टाचार पर खास ध्यान नहीं देती। अब तो लोग सोचते हैं कि चुनाव के दौरान हमें क्या मिला ? इसलिए चुनाव जीतने के लिए अच्छे हों या खराब, पर सब हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। और इस सबमें पैसा खर्च होता है। सरकारी योजनाओं के नाम पर जो लाखों-करोड़ों रुपया आता है, वह जन प्रतिनिधि की इच्छा और हस्ताक्षर के बिना खर्च नहीं होता।

- शायद इसीलिए लोग आजकल ग्राम प्रधान बनने के लिए भी लाखों रु. खर्च कर देते हैं।

- बिल्कुल ठीक कह रहे हो। एक बार कुरसी मिल जाए, फिर तो बिना कुछ किये ही पेट भरने लगता है। नीचे से लेकर ऊपर तक, शासन-प्रशासन में सौ प्रतिशत लोग यह जानते हैं और 90 प्रतिशत इसे तंत्र का एक भाग समझकर मानते भी हैं। जल में रहना है, तो मगरमच्छ से दोस्ती करनी ही पड़ती है।

- तो फिर इसका इलाज क्या है ?

- जो व्यवस्था आज है, उसमें तो कोई इलाज नहीं है। बल्कि इसके बढ़ने की ही संभावना अधिक है। जिसके हाथ में काम रुकवाने या बिगाड़ने की ताकत है, उसे घर बैठे माल पहुंच जाता है। हम तो भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारे हाथ से किसी का बुरा न हो जाए। बस..।


मैं चुपचाप वहां से चला आया। यह बात कई साल पुरानी है। उस दिन रमेश के साथ रहकर मुझे जो ज्ञान मिला, वह अकल्पनीय था। मोदी जी आजकल भारत को डिजीटल और कैशलैसबनाने में लगे हैं। उनका मत है कि इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार रुकेगा। बहुत से लोग उनके समर्थक हैं; पर कुछ लोग तुम डाल-डाल, हम पात-पातके अनुयायी भी हैं। भगवान करे मोदी जी इस मुहिम में सफल हों; पर वे होंगे या नहीं, और होंगे तो कितने, ये तो समय ही बताएगा।

रविवार, 29 जनवरी 2017

विचार और व्यवहार के बीच झूलती भारतीय राजनीति

भारतीय राजनीति और राजनेता अजीब असमंजस में हैं। विचार पर दृढ़ रहें या व्यावहारिक बनें। इन दिनों पांच राज्यों के चुनाव की गहमागहमी के बीच यह यक्षप्रश्न एक बार फिर सिर उठाकर खड़ा हो गया है।

आजादी से पहले भारत में कांग्रेस ही एकमेव दल था। उसे राजनीतिक दल कहें या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका मुख्य लक्ष्य आजादी प्राप्त करना था। इसलिए विभिन्न विचारधारा वाले नेता वहां एक साथ मिलकर काम करते थे। कांग्रेस के अंदर ही हिन्दू महासभा जैसे छोटे समूह भी थे। कुछ मुद्दों पर अलग सोच रखने के बावजूद वे स्वयं को कांग्रेस का अभिन्न अंग मानते थे। इसलिए कांग्रेस अधिवेशन के साथ उनके अधिवेशन भी उन्हीं व्यवस्थाओं के बीच सम्पन्न हो जाते थे।

गांधी जी इस बात को समझते थे। इसलिए स्वाधीनता मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया था। जिससे समाजवादी, साम्यवादी, राष्ट्रवादी या अन्य किसी वाद को मानने वाले अपना दल बनाकर जनता के बीच में जाएं। फिर जनता जिसे पंसद करेगी, वह राज्य करे। पर नेहरू जी कांग्रेस के नाम और गांधी जी की पुण्याई का मेवा खाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कांग्रेस भंग नहीं होने दी। दुर्भाग्य से गांधी जी की हत्या हो गयी और पटेल भी जल्दी ही चल बसे। इससे नेहरू कांग्रेस तथा देश के सर्वेसर्वा बन गये।

परन्तु नेहरू की निरंकुशता और परिवारवाद से परेशान होकर कई लोग उनसे छिटकने लगे और फिर उन्होंने क्रमशः अपने राजनीतिक दल बनाये; लेकिन इन सबके विचार मुख्यतः कांग्रेस जैसे मध्यमार्गी ही थे। एक निश्चित विचारधारा वाला एक ही दल था साम्यवादी; पर विदेशी प्रेरणा और हिंसाप्रिय होने के कारण उनका प्रभाव धीरे-धीरे घटता गया और वे कई टुकड़ों में बंट गये। किसी समय उनके प्रतिनिधि उ.प्र., पंजाब, बिहार आदि में भी जीतते थे; पर फिर वे बंगाल, केरल और त्रिपुरा तक सीमित होकर रह गये। अब इन सब राज्यों में भी वे सिमट रहे हैं। अर्थात एक विचार आधारित दल मृत्यु के कगार पर है। दूषित विचारधारा के कारण उसका मरण देशहित में ही है।

विचार आधारित एक दूसरा दल भारतीय जनसंघडा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बनाया। वे नेहरू जी की मुस्लिम परस्त नीतियों से नाराज थे। इस दल को शुरू से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साथ मिला। संघ यद्यपि राजनीति से दूर रहना चाहता था; पर गांधी जी हत्या के झूठे आरोप में नेहरू जी ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। तब संघ के समर्थन में एक भी व्यक्ति संसद में नहीं बोला। इससे संघ को लगा कि हमारे भी कुछ लोग संसद में होने चाहिए। कई वरिष्ठ कार्यकर्ता चाहते थे कि संघ को शाखा छोड़कर पूरी तरह राजनीति में ही उतर जाना चाहिए; पर तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी इसके पक्षधर नहीं थे। ऐसे में जब डा. मुखर्जी ने उनसे सहयोग मांगा, तो उन्होंने श्री दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, सुंदरसिंह भंडारी जैसे कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ता उन्हें दे दिये।

शुद्ध विचारधारा और संघ के तंत्र के चलते भारतीय जनसंघऔर उसका चुनाव चिन्ह दीपकशीघ्र ही लोकप्रिय हो गया। उसके नारे, ‘‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी; घर-घर में दीपक, जनसंघ की निशानी’’ ने हिन्दीभाषी क्षेत्रों में अपनी जड़ जमा ली। इसे पहली बड़ी सफलता 1967 में मिली, जब कई राज्यों में संविद सरकारें बनीं। उनमें जनसंघ भी एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल हुआ। इससे जनसंघ वालों की सादगी, प्रामाणिकता और कार्यशैली का जनता को पता लगा। इसके बावजूद उसकी छवि हिन्दी और हिन्दूवादी, ब्राह्मण और वैश्य वर्ग द्वारा समर्थित शहरी पार्टी की बनी रही।

1975 में आपातकाल लगा, तो उसके विरुद्ध हुए आंदोलन में संघ तथा जनसंघ के लोगों की सबसे बड़ी भूमिका रही। इसका लाभ 1977 में हुए चुनाव में मिला; पर उसके बाद कई राज्यों में जाति और परिवार आधारित दल बनने लगे। इसके दो कारण थे। एक तो वे जनसंघ की बढ़ती शक्ति से भयभीत थे। दूसरा इन्हें लगता था कि परिवारवादी कांग्रेस में वे कभी शीर्ष पर नहीं पहुंच सकते। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, जार्ज फर्नांडीज, शरद यादव, प्रकाश सिंह बादल, चंद्रशेखर, देवीलाल, चरणसिंह, बाल ठाकरे आदि के दल ऐसे ही हैं। ये दल कांग्रेस द्वारा खाली की जा रही जमीन घेरने लगे। नाम चाहे जो हो, पर ये सब कांग्रेस की ही वैध-अवैध संतानें हैं। जैसे कांग्रेस सत्ता के लिए कभी पंूजीवाद तो कभी साम्यवाद की गोद में बैठी दिखी, वही हाल इन दलों का भी है। विचारधारा के नाम पर इनका एक ही सिद्धांत है कि, ‘‘जहां मिलेगी तवा परात, वहीं कटेगी सारी रात।’’

आपातकाल हटने पर संघ और उसके समविचारी संगठन तेजी से बढ़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण रही विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अस्सी के दशक में आयोजित एकात्मता रथ यात्राऔर नब्बे के दशक में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन। मंदिर आंदोलन से हिन्दुत्व का भारी ज्वार उठा। अतः देश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बदल गये। इसका सीधा लाभ जनसंघ के नये अवतार भारतीय जनता पार्टी को हुआ। राज्यों के बाद अब वह केन्द्र में भी दस्तक देने लगी। कांग्रेस की जिस जमीन को पहले क्षेत्रीय दल हड़प रहे थे, वहां अब भा.ज.पा. काबिज होने लगी।

भा.ज.पा. को इस भूमिका में लाने का प्रमुख श्रेय लालकृष्ण आडवाणी को है। जब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली, तो संघ ने भी कई प्रमुख कार्यकर्ता उन्हें दिये। इनमें से अधिकांश विद्यार्थी परिषद से आये थे। उन सबने मिलकर भा.ज.पा. को आगे बढ़ाया। इसके बावजूद वह एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। यानि जो विचारधारा उसका आधार बनी, वही अब उसकी बाधा बन रही थी। अतः भा.ज.पा. ने केन्द्र में सरकार बनाने के लिए सत्तामुखी स्वभाव के कुछ घरेलू और जातीय दलों को साथ लेना प्रारम्भ किया। इसलिए समय-समय पर मायावती, पासवान, नीतीश कुमार, बादल, ठाकरे, अजीतसिंह, सोनेलाल पटेल, पटनायक आदि भा.ज.पा. के साथ आते और जाते रहे। आज स्थिति यह है कि सोनिया कांग्रेस और कम्युनिस्टों को छोड़कर शायद ही कोई दल हो, जो कभी न कभी, कहीं न कहीं, भा.ज.पा. से गले न मिला हो।

इन दलों के साथ से जहां भा.ज.पा. का जनाधार बढ़ा, वहां उनके कुछ दुर्गुण भी इधर आ गये। इससे उसके विचारों में भी कुछ नरमी आयी है। समान नागरिक संहिता, गोरक्षा, राममंदिर, भारतीय भाषा में शिक्षा आदि विषय अब पीछे छूट गये हैं। कांग्रेस तथा अन्य दलों के जिस परिवारवाद को भा.ज.पा. वाले कोसते थे, वह अब यहां भी आ गया है। कांग्रेस या अन्य दलों से भा.ज.पा. में आने वालों का अपने परिजनों के लिए टिकट मांगना समझ में आता है। संभवतः वे भा.ज.पा. में आये ही इसी शर्त पर हैं; पर उ.प्र. के दो बड़े और पुराने नेताओं द्वारा जिद करके अपने बच्चों को टिकट दिलवाना हैरान करता है। यद्यपि भा.ज.पा. में शीर्ष पर अभी परिवारवाद नहीं है; पर नीचे से वह जिस तरह ऊपर की तरफ बढ़ रहा है, वह खतरे का संकेत है।

यद्यपि मोदी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इसका स्पष्ट विरोध किया था; पर जो हुआ, वह सबके सामने है। अतः कई लोग अब पूछ रहे हैं कि क्या भा.ज.पा. ने भी सत्ता के लिए विचारधारा छोड़ दी है ? अन्य दलों से जैसे लोग आये या बुलाये जा रहे हैं, उसका अंत कहां होगा ? एक बड़े अखबार ने लिखा है कि उत्तराखंड में मुकाबला सोनिया कांग्रेसऔर मोदी कांग्रेसमें है। युद्ध में शत्रु का मनोबल तोड़ने के लिए ऐसे हथकंडे भी जरूरी हैं; पर क्या भा.ज.पा. वालों ने इसका अंतिम परिणाम सोचा है ? किसी ने लिखा है -

न खुदा ही मिला न बिसाले सनम,न इधर के रहे न उधर के रहे।


कहीं ऐसा तो नहीं कि छोटी लड़ाई जीतने के चक्कर में भा.ज.पा. वाले वैचारिक युद्ध हार जाएं ? विचार और व्यवहार का यह द्वंद्व कहां तक जाएगा, इस पर सबको चिंतन करना होगा।