शनिवार, 13 जनवरी 2018

कोरेगांव विवाद और जातिभेदी राजनीति

नया वर्ष चाहे अंग्रेजी हो या भारतीय; पर उत्सवप्रिय भारतीय उसे जोरशोर से मनाते हैं। लेकिन 2018 का प्रारम्भ एक कटु विवाद के साथ हुआ है। वह है पुणे के पास कोरेगांव में एक युद्ध की 200 वीं वर्षगांठ पर हुआ जातीय संघर्ष। एक जनवरी, 1818 के इस युद्ध के बारे में सबका अपना-अपना दृष्टिकोण है; पर यह निश्चित है कि इससे भारत में अंग्रेजों की जड़ें मजबूत हुईं। यद्यपि 1757 में हुए पलासी के युद्ध में जीत से उनका प्रभाव तो बढ़ ही गया था; पर कोरेगांव की यह लड़ाई निर्णायक सिद्ध हुई।

एक समय सिक्खों की तरह मराठे भी भारत की प्रमुख शक्ति थे। 1760-61 में पानीपत की लड़ाई हुई। उसमें अहमद शाह अब्दाली से पराजय के बाद यह शक्ति कमजोर होकर महाराष्ट्र तक ही सिमट गयी। कोरेगांव की लड़ाई भी उन्होंने गिरे हुए मनोबल से लड़ी थी। वहां हुए पराभव से यह शक्ति स्थायी रूप से कुंठित हो गयी और अंग्रेजी राज प्रबल हो गया। इससे मराठों के साथ ही अन्य बड़े राजाओं की हिम्मत भी टूट गयी। फिर उन्होंने अंग्रेजों से सीधा संघर्ष नहीं किया। यद्यपि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर गढ़मंडल की रानी अवन्तीबाई जैसे अपवाद भी हैं। अधिकांश छोटे राजे, रजवाड़ों और जमीदारों ने भी अंग्रेजों का मुकाबला किया। जनजातीय (वनवासी) समूहों ने भी अपनी सीमित शक्ति और परम्परागत हथियारों के बलपर डटकर मुकाबला किया; पर बड़ों ने एक बार कंधे झुकाये, तो फिर वे झुके ही रहे।

उन दिनों महाराष्ट्र में शिवाजी के वंशज अर्थात क्षत्रिय मराठों का शासन था; पर वास्तविक शक्ति उनके प्रधानमंत्री अर्थात पेशवा के हाथों में थी। ये पेशवा मराठी ब्राह्मणों के चितपावन गोत्र से होते थे। राजकाज का केन्द्र पुणे का शनिवार बाड़ा था। शिवाजी के पौत्र छत्रपति शाहू जी के मन में समाज के दुर्बल और निर्धन वर्ग के प्रति बहुत प्रेम था। उन्होंने ही सबसे पहले अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। इसलिए इन वर्गों में प्रभाव रखने वाले नेता और दल उन्हें बहुत मानते हैं। मायावती ने उ.प्र. में मुख्यमंत्री बनने पर लखनऊ के किंग जार्ज मैडिकल कॉलिजके बाहर शाहू जी की भव्य धातु प्रतिमा लगवाकर उसका नाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिजकर दिया था। 

लेकिन शाहू जी के उत्तराधिकारी इतने उदार नहीं थे। पेशवाओं के मन में भी निर्धन वर्ग के प्रति कोई प्रेम और सम्मान नहीं था। कहते हैं कि उन्हें अपनी कमर में झाड़ू बांधकर तथा गले में थूक के लिए लोटा लटकाकर चलना पड़ता था। इसलिए वे क्षत्रिय मराठों और ब्राह्मण पेशवाओं से घृणा करने लगे। ये लोग भी शरीर और स्वभाव से वीर थे। शाहू जी के समय तक इन्हें सेना में लिया जाता था; पर फिर यह बंद हो गया।

अब उनके पास न शिक्षा थी, न व्यापार और न ही खेती। अतः उनके सामने खाने-कमाने और अपने परिवार को पालने की बड़ी समस्या आ गयी। अंग्रेजों की नीति सदा बांटों और राज करोकी रही है। उन्होंने इस मजबूरी का लाभ उठाने के लिए सेना में महार रेजिमेंटबना दी। अतः इन वर्गों के युवक फौज में भर्ती होने लगे। इस प्रकार अंग्रेजों ने इनके मन में शासक वर्ग के प्रति भरी घृणा को एक संगठित रूप दे दिया।

उन दिनों नियमित सेनाएं बहुत कम होती थीं। युद्ध की स्थिति में राजा की ओर से मुनादी होने पर इच्छुक लोग सेना में भर्ती हो जाते थे। पड़ोसी राज्यों या देशों से भी लोग आ जाते थे। उनका मुख्य उद्देश्य धनलाभ ही होता था। जो राजा या जमींदार उन्हें भरती कर ले, वे उसके लिए ही लड़ते थे। युद्ध में घायल या मृत्यु होने पर खेती की जमीनें दी जाती थीं। लूट में भी कुछ हिस्सा मिल जाता था। युद्ध के बाद सैनिकों को गांव और बिरादरी में सम्मान मिलता था। नियमित सेना की प्रथा भारत में विदेशियों की देखादेखी ही आयी है।

कोरेगांव युद्ध में मराठा सेना के अग्रणी दस्ते में अधिकांश अरबी मुसलमान थे। उस सेना में महाराष्ट्र के अन्य निर्धन वर्ग के हिन्दू भी थे। अंग्रेजों की सेना में महारों के साथ ही बंगाल और मद्रास के निर्धन वर्गों के लोग भी थे। मालिकों के नजरिये से ये मराठों और अंग्रेजों का, जबकि सैनिकों के नजरिये से ये महारों और मुसलमानों का युद्ध था। अंग्रेज अपनी सत्ता स्थायी करने के लिए चाहते थे कि जातिभेद के ये बीज पेड़ बन जाएं। इसलिए उन्होंने वहां एक स्मारक बना दिया। उसमें 27 महार और 22 अन्य (कुल 49) सैनिकों के नाम लिखे हैं।

तुलसी बाबा ने कहा है, ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’’ इसीलिए सब इस युद्ध को अपने-अपने चश्मों से देख रहे हैं; पर यह निर्विवाद है कि इसमें अंग्रेज जीते और भारत की हानि हुई। अतः इसे किसी जाति, वर्ग या समुदाय की जीत कहना उचित नहीं है।

कैसा दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों के जाने के 70 साल बाद भी हम जातियों के नाम पर लड़ रहे हैं। जातिवाद को मिटाना आसान नहीं है; पर हम जातिभेद को तो मिटा ही सकते हैं। जन्म के कारण किसी को ऊंचा या नीचा मानना केवल अपराध ही नहीं, पाप भी है। इस मिटाने के लिए हमें अपनी चुनाव प्रणाली बदलनी होगी। क्योंकि यह जातिभेद को हिंसक जातीय संघर्ष की ओर बढ़ा रही है। 1947 के बाद का परिदृश्य इसका गवाह है। कोरेगांव विवाद को बढ़ाने के पीछे भी भारतद्वेषी गुटों की राजनीति ही है, और कुछ नहीं।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

मकर संक्रांति और पानीपत का युद्ध

मकर संक्रांति के साथ जुड़ें प्रसंगों में सबसे महत्वपूर्ण है 1761 ई. में हुआ पानीपत का युद्ध। यद्यपि इसमें मराठा सेनाएं हार गयीं; पर उसके बाद पश्चिम से कोई शत्रु दिल्ली तक नहीं आ सका। विजयी अहमदशाह अब्दाली ने भी वापस काबुल जाने में ही अपनी खैर समझी। यह युद्ध महाराष्ट्र नहीं, बल्कि दिल्ली की रक्षार्थ हुआ था। युद्ध से पूर्व अब्दाली ने सदाशिव भाऊ को संदेश भेजा था कि यदि वे पंजाब को सीमा मान लें, तो वह सन्धि को तैयार है; पर भाऊ ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत की सीमा अटक तक है।

छत्रपति शिवाजी के पौत्र शाहूजी के पेशवा बाजीराव ने दक्षिण में अर्काट तथा फिर बंगाल, बिहार, उड़ीसा में विजय प्राप्त की। 40 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु से इस अभियान को धक्का लगा। अतः नेपाल और यमुना के मध्य क्षेत्र पर रोहिले और पठान काबिज हो गये। 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद उसका सहयोगी अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान का अमीर बन गया। 

बाजीराव के बाद उनके 19 वर्षीय पुत्र नानासाहब पेशवा बने। उनके नेतृत्व में मराठों ने 1750 में पठानों और रोहिलों को हराया तथा मुल्तान, सिन्ध, पंजाब, राजपूताना, रुहेलखंड आदि की चैथ वसूली के अधिकार प्राप्त कर लिये। इससे चिंतित नजीबुद्दौला, बेगम मलका जमानी और मौलवी वलीउल्लाह ने ‘इस्लाम खतरे में’ कहकर नवाबों, निजाम और जमीदारों से सम्पर्क किया। अहमदशाह अब्दाली को भी पत्र लिखकर भारत में ‘दारुल इस्लाम’ की स्थापना को कहा। उन्होंने लिखा कि मराठा, जाट और सिखों को हराने का निर्णय ‘जन्नत की अदालत’ में हुआ है। दिल्ली की मुगल सल्तनत मराठों के हाथ का खिलौना है। अतः वे इसे नष्ट करें और नादिरशाह की तरह वापस जाने की बजाय यहीं राज्य करें। 

अब्दाली निमन्त्रण पाकर भारत की ओर बढ़ने लगा; पर हर बार उसे पंजाब ने टक्कर दी। 1744 से 1750 तक उसने पांच बार हमला किया। ऐसे में जब मराठों ने दिल्ली के मुगल दरबार की नाक में नकेल डाली, तो सिख बहुत खुश हुए। रघुनाथराव पेशवा के नेतृत्व में मराठा सेना जब पंजाब पहुंची, तो शालीमार बाग (लाहौर) में भव्य स्वागत समारोह हुआ। 

1753-54 में अब्दाली ने दिल्ली तक आकर मराठों को पीछे हटा दिया। यह सुनकर रघुनाथराव पेशवा पुणे से चल दिये। उन्होंने शिन्दे तथा होल्कर के साथ दिल्ली पर कब्जा कर अपनी मर्जी से राजा, वजीर तथा सेनापति बनाये। इससे नाराज होकर राजा सूरजमल मल्हारराव होल्कर से भिड़ गये; पर दूरदर्शी रघुनाथराव ने उनसे सन्धि कर आगरा तथा निकटवर्ती क्षेत्र पर उनके अधिकार को पूर्ववत मान लिया।

रघुनाथराव के वापस होते ही 1756 में अब्दाली फिर आ गया। होली के दो दिन बाद (1.3.1757) उसने मथुरा में तीर्थयात्रियों के खून से होली खेली। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह ने उससे टक्कर ली। 2,000 सशस्त्र नागा साधुओं सहित 10,000 हिन्दू तथा 20,000 अफगानी मारे गये। अब्दाली ने आगरा पर हमलाकर सूरजमल से जुर्माना वसूलने का विफल प्रयास भी किया। इसी समय फैले हैजे से उसके सैनिक मरने लगे। अतः दिल्ली में गद्दी पर अपने मोहरे बैठाकर वह काबुल लौट गया।

यह सुनकर रघुनाथराव फिर उत्तर भारत की ओर आये। उन्होंने मेरठ, सहारनपुर, रोहतक और दिल्ली पर कब्जाकर अपनी पसंद के लोग सत्ता में बैठाये। फिर वे पंजाब गये और पटियाला राज्य के सेनापति आलासिंह जाट के साथ सरहिन्द को जीता। इस युद्ध में हजारों अफगान सैनिक मरे। अब्दाली द्वारा नियुक्त अधिकारी काबुल भाग गये। रघुनाथराव ने अटक तक भगवा झंडा फहरा दिया। 

अब्दाली का प्रतिनिधि नजीबुद्दौला भयवश मराठों की जी-हुजूरी करने के साथ ही बेगम मलका जमानी तथा मौलवी वलीउल्लाह के साथ बार-बार अब्दाली को फिर भारत आने को पत्र लिख रहा था। उसने मराठों के प्रतिनिधि दत्ताजी शिन्दे को बंगाल विजय के लिए प्रेरित कर उनकी सेना को वर्षाकाल में उफनती गंगा और यमुना के बीच फंसा दिया। इधर अब्दाली भी दिल्ली की ओर चल दिया था। दत्ताजी की सेनाएं बुराड़ी-जगतपुर (वर्तमान दिल्ली) में थी। इस प्रकार वे नजीब और अब्दाली की सेनाओं के बीच घिर गये। वे इस धोखे से बहुत नाराज थे और नजीब को दंड देना चाहते थे। अतः उन्होंने पूरी ताकत से हमला बोल दिया।

10 जनवरी, 1760 को हुए युद्ध में नजीब की सहायता को कुतुबशाह और अहमदखान बंगश भी आ गये। दत्ताजी को गोली लगी और वे घोड़े से गिर पड़े। इस पर कुतुबशाह हाथी से उतरकर बोला, ‘‘क्यों पटेल, मुसलमानों से फिर लड़ोगे ?’’ निडर दत्ताजी ने उत्तर दिया, ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे।’’ कुतुबशाह ने काफिर कहकर लात मारी और उनका सिर काटकर अब्दाली को भेंट करने ले गया। युद्ध में दत्ताजी ने भले ही वीरगति पाई; पर उनका वीर वाक्य ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे’’ महाराष्ट्र के घर-घर में गूंज गया।

यह समाचार पुणे पहुंचने पर सदाशिवराव भाऊ तथा नानासाहब पेशवा के बड़े पुत्र विश्वासराव के नेतृत्व में सेना को इधर भेजा गया। भाऊ ने उत्तर के हिन्दू राजे-रजवाड़ों तथा मुस्लिम सूबेदारों, नवाबों आदि को पत्र लिखकर विदेशी अब्दाली के विरुद्ध सहयोग मांगा; पर कोई साथ नहीं आया। उधर नजीबखान, लखनऊ के नवाब नासिरुद्दौला, फरुखाबाद-बरेली के अहमदखान बंगश, पीलीभीत के मीरबेग आदि ने कुरान के सामने कसम ली कि वे दिल्ली की सत्ता दक्षिण (अर्थात मराठों) के पास नहीं जाने देंगे। 

दत्ताजी के निधन से बिखरी मराठा सेना सदाशिव और विश्वासराव के आने की खबर सुनकर फिर एकत्र होने लगी। सूरजमल भी इनके साथ आ गये। उन्होंने एक अगस्त, 1760 को फिर दिल्ली जीत ली। कुछ दिन बाद मराठा छावनी में ‘श्रीमंत विश्वासराव पेशवा का दरबार’ आयोजित हुआ। अब्दाली उन दिनों अनूपशहर तथा शुजाउद्दौला यमुना पार छावनी डाले था। वर्षाकाल के कारण युद्ध संभव नहीं था। अतः दोनों पक्ष सर्दी की प्रतीक्षा करने लगे।

दरबार की सूचना पाकर मौलवी वलीउल्लाह तथा नजीबुद्दौला ने मुसलमानों से इस हिन्दू राज्य को मिटाने का आह्नान किया। कुछ मुस्लिम जागीरदार मराठों के साथ भी थे। इससे नाराज होकर सूरजमल वापस भरतपुर चले गये। यद्यपि पानीपत के युद्ध तक तथा उसके बाद भी उन्होंने शस्त्र, अन्न, वस्त्र व नकद राशि से मराठों की सहायता की। उनकी रानी किशोरी ने इसमें विशेष रुचि ली।

मौसम ठीक होते ही भाऊसाहब ने हमला कर दिया। कुंजपुरा के युद्ध में कुतुबशाह, अब्दुल समदखान और किलेदार निजाबत खान पकड़े गये। भाऊसाहब ने दत्ताजी का बलिदान याद कर कुतुबशाह और समदखान के कटे सिर अब्दाली को भेज दिये। इससे क्रुद्ध अब्दाली पानीपत आ गया। भाऊसाहब भी एक नवम्बर, 1760 को वहां पहुंच गये। 22 नवम्बर को जनकोजी शिन्दे ने हमला किया। इसमें अब्दाली की भारी क्षति हुई। इसके जवाब में सात दिसम्बर (अमावस्या) की रात में अब्दाली ने हमला बोला। इसमें भी मराठों की जीत हुई; पर सेनापति बलवन्तराव मेहन्दले मारे गये। पति के शव के साथ उनकी पत्नी रात में ही चिता पर चढ़ गयी।

इन दोनों युद्धों की क्षति से अब्दाली चिंतित हो गया। उधर मराठे भी राशन और रसद के अभाव तथा ठंड से परेशान थे। भाऊसाहब ने 14 जनवरी, 1761 को प्रातः दस बजे हमला किया। तोपों की मार से विरोधियों को धकेलते हुए वे दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। इससे चिंतित अब्दाली ने अपनी बेगमों को हटाने के लिए घोड़े तैयार कराये तथा भागते सैनिकों को साहस दिलाकर फिर आगे भेजा। 

इसी बीच मराठा तोपखाने का नायक इब्राहिम खान गारदी तथा गोली लगने से घोड़े पर सवार विश्वासराव मारे गये। इससे सेना में भगदड़ मच गयी। सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए दोनों हाथों में तलवार लेकर सेनापति भाऊ शत्रुओं में घुस गये। इसी समय अब्दाली ने अपने सुरक्षित 6,000 ऊंटसवार बंदूकधारी सैनिक भेज दिये। उन्हांेने ढूंढ-ढूंढकर भाऊ, जनकोजी शिन्दे, तुकोजी शिन्दे आदि को मार डाला। इससे मराठे नेतृत्वविहीन हो गये और अब्दाली जीत गया।

इस युद्ध में लगभग 50,000 मराठा सैनिक तथा इतने ही अन्य लोग मारे गये। महाराष्ट्र का कोई परिवार ऐसा नहीं था, जिसने अपना कोई परिजन न खोया हो। जीत के बावजूद अब्दाली की हिम्मत टूट गयी और वह काबुल लौट गया। विजेता होने पर भी उसने वहां से अनेक उपहारों के साथ अपना दूत पुणे की राजसभा में सन्धिवार्ता हेतु भेजा। 

इस युद्ध का एक कटु और दुःखद सत्य यह है कि मराठों का साथ देने की बजाय राजस्थान के रजवाड़े अब्दाली की जीत से प्रसन्न हुए। सूरजमल युद्ध से अलग तो रहे; पर इसके परिणाम से वे भी दुखी हुए। एक विद्वान ने लिखा है कि यदि यह युद्ध न होता, तो 1947 के बाद दिल्ली भारत की बजाय पाकिस्तान की राजधानी होती। ऐसे में आज भी यह निर्णय करना कठिन है कि इस युद्ध का वास्तविक विजेता कौन था ?

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

सुधार अंदर से ही होता है

दुनिया का कोई भी धर्म, मत, पंथ, सम्प्रदाय, मजहब, समाज, संस्था या संगठन ऐसा नहीं है, जिसमें समय के अनुसार कुछ सुधार या परिवर्तन न हुआ हो। कुछ में यह स्वाभाविक रूप से हुआ, तो कुछ में भारी खून खराबे के बाद। स्थिरता और जड़ता मृत्यु के प्रतीक हैं, तो परिवर्तन जीवन का। इसीलिए परिवर्तन को प्रकृति का नियम कहा गया है। 

पिछले दिनों भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना घटी है। मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में एक साथ तीन तलाक कहकर अपनी बीवी को छोड़ देने की कुरीति प्रचलित है। इसे ‘तलाक ए बिद्दत’ कहते हैं। अब मुंह से बोलने की बजाय फोन या चिट्ठी से भी यह काम होने लगा है। यद्यपि दुनिया के कई देश इसे छोड़ चुके हैं; पर भारत के मुसलमान अभी लकीर के फकीर ही बने हैं। उनके मजहबी नेता कहते हैं कि अल्ला के बनाए कानून में फेरबदल नहीं हो सकती; पर वे इस पर चुप रहते हैं कि यदि ये अल्ला का कानून है, तो मुस्लिम देशों ने इसे क्यों छोड़ दिया; क्या वहां के मुसलमान और उनके नेता मूर्ख हैं ? इसलिए किसी मुस्लिम विद्वान ने ठीक ही कहा है कि ये अल्ला का नहीं, मुल्ला का कानून है, जिसकी व्याख्या हर मुल्ला अपने हिसाब से कर देता है। 

भारत में लाखों महिलाएं इस कुप्रथा की शिकार होकर बच्चों के साथ धक्के खा रही हैं। उनकी पीड़ा को अब तक किसी ने नहीं समझा। बरसों पहले इंदौर की 62 वर्षीय वृद्धा शाहबानो का प्रकरण हुआ था। न्यायालय ने उसके पति को आदेश दिया कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता दे। इस पर मुसलमानों ने आसमान सिर पर उठा लिया। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण उन्हें लोकसभा में 3/4 बहुमत मिला था। इसके बावजूद वे मुसलमानों के शोर से डर गये और इसके विरुद्ध कानून बनवा दिया। इससे मुसलमान महिलाओं का मनोबल गिर गया। उन्होंने इस जलालत को अपनी नियति मान लिया; पर अंदर ही अंदर आग सुलगती रही। इसके बाद कई सरकारें आयीं; पर किसी में इस विषय को छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। 

कहते हैं कि 12 साल में घूरे के भी दिन फिरते हैं; लेकिन मुसलमान महिलाओं के दिन फिरने में 40 साल गये। 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। मोदी ऊपर से भले ही कठोर दिखते हों; पर अंदर से वे बहुत ही संवेदनशील हैं। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की इस पीड़ा को समझा। इसी का परिणाम है कि लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित हो गया है। अब राज्यसभा की बारी है। यद्यपि वहां भा.ज.पा. और रा.ज.ग. की संख्या कम है; पर जैसे कांग्रेस ने लोकसभा में साथ देकर अपनी पुरानी गलती मानी है, आशा है वह राज्यसभा में भी ऐसा ही करेगी। 

इस कानून के बनने से भारत के मुस्लिम समाज का बहुत भला होगा। इससे महिलाओं और समझदार पुरुषों का आत्मविश्वास जगेगा कि यदि वे प्रयास करते रहें, तो सफलता मिलती ही है। यद्यपि पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ मुल्ला और उनके समर्थक शोर मचा रहे हैं; पर अब उन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं है। क्योंकि अब मुस्लिम समाज के अंदर से ही परिवर्तन की आवाज उठी है। शासन तो बाहर से उसे समर्थन दे रहा है। पिछली बार ऐसा नहीं था। तब शाहबानो अकेली पड़ गयी थी और शासन भी मुल्लाओं के तलवे चाटने वाला था। अतः समाज सुधार का यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

सच तो यह है कि समाज सुधार की आवाज जब तक समाज के अंदर से नहीं उठती, तब तक शासन कुछ खास नहीं कर सकता। केवल कानून से कुछ नहीं होता। भारत में कानून तो दहेज, बाल विवाह और भ्रूण हत्या के विरुद्ध भी हैं। फिर भी ये हो रहे हैं। क्योंकि समाज अभी इसे मानने को तैयार नहीं है। कानून तो तब काम करता है, जब कोई उसके विरुद्ध खड़ा हो। यदि बहुमत कुरीति के पक्ष में हो, तो आसानी से कोई विरोध का साहस भी नहीं करता।

इसलिए यह बड़े हर्ष की बात है कि इस बार जहां एक ओर मुस्लिम महिलाएं ताल ठोक कर खड़ी हैं, वहां बड़ी संख्या में मुसलमान पुरुष भी उनका साथ दे रहे हैं। शिया तो खुलकर इस कुप्रथा के विरोध में हैं। अब केवल सुन्नी बचे हैं। शासन और समाज का दबाव जैसे-जैसे बढ़ेगा, उन्हें भी अक्ल आ जाएगी। आखिर अयोध्या के श्रीराममंदिर विवाद पर भी वे पीछे हट ही रहे हैं। वे समझ गये हैं कि न्याय और जनमत दोनों उसके विरुद्ध है। अतः इज्जत से पीछे हटने में ही समझदारी है। यही बात तीन तलाक की कुप्रथा के साथ होगी। 

इस्लाम चूंकि एक मजहब है। इसलिए वहां कोई भी परिवर्तन आसान नहीं है। यद्यपि मजहब तो ईसाई भी है; पर शिक्षा के प्रसार से उनकी सोच बदली है। आशा है इस प्रकरण से शिक्षा लेकर अब समझदार मुसलमान आगे आकर उन मजहबी नेताओं को ठुकराएंगे, जो उन्हें कूपमंडूक बनाए रखना चाहते हैं। चूंकि इसी से उनकी राजनीतिक दुकान चलती है। 

एक बार परिवर्तन और समाज सुधार की लहर चली, तो वह कब और कैसे आंधी बन जाएगी, पता ही नहीं लगेगा। अभी तो प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही पारित हुआ है। कानून बनने की मंजिल अभी काफी दूर है; पर अभी से बहुविवाह, बुर्का, हलाला, और कुर्बानी जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध मुसलमान बोलने लगे हैं। आशा है उनकी यह मुहिम भी शीघ्र पूरी होगी। चूंकि कोई भी सुधार तभी होता है, जब उसकी शुरुआत अंदर से हो है। तीन तलाक के विरुद्ध कानून इस मामले में मील का पत्थर बनने वाला है।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

कांग्रेस मुक्त भारत के लिए दो कदम और

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव की धूल बैठ चुकी है। मैदानी भागों में पहाड़ की अपेक्षा धूल और गुबार कुछ अधिक ही उठता है। ऐसा ही इस बार भी हुआ। चुनाव तो दोनों राज्यों में थे; पर शोर गुजरात का अधिक हुआ। इस चक्कर में लोग हिमाचल प्रदेश को भूल ही गये। 

असल में कांग्रेस वालों ने चुनाव से पहले ही मान लिया था कि हिमाचल में इस बार हमें हारना है। इसलिए उन्होंने वहां ताकत ही नहीं लगायी। राहुल बाबा भी एक दिन चक्कर लगाकर चले गये। मैडम जी तो घर से निकली ही नहीं। वैसे उनके आने से होना भी क्या था ? वहां लोग वीरभद्र सिंह को जानते और पहचानते हैं। वोट भी उनके नाम पर ही पड़ता है। इसीलिए कांग्रेस ने मजबूर होकर पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के बावजूद 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह पर ही दांव लगाया। उन्होंने इस चुनाव को अपनी आखिरी पारी बताकर सहानुभूति बटोरनी चाही; पर जनता ने उनकी बजाय मोदी की अपील पर भरोसा किया। हां, वीरभद्र सिंह ने अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को विधायक बनवा दिया। इससे स्पष्ट है कि अगले चुनाव में वंशवादी कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी वही होंगे।  

यद्यपि भा.ज.पा. की जीत तो हुई; पर खीर में कंकड़ भी पड़ गया। चूंकि उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल खुद चुनाव हार गये। कुछ लोगों का कहना है कि इसके लिए उन्हें नेता घोषित करने में देर तथा उनके चुनाव क्षेत्र की बदल जिम्मेदार है। अर्थात यह भूल केन्द्रीय नेतृत्व की है। इसका दोष मोदी को दें या अमित शाह और मुख्यमंत्री पद की लालसा पाले केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा को; पर इससे नुकसान तो हुआ ही है। जो भी हो, अब पांच बार के विधायक जयराम ठाकुर वहां मुख्यमंत्री बन गये हैं। यह निर्णय उचित ही है। केन्द्र से राज्य और राज्य से केन्द्र में भेजना ठीक नहीं है। यद्यपि राजनीतिक मजबूरियों के कारण यह द्रविड़ प्राणायाम प्रायः सभी दलों को करना पड़ता है।

जहां तक गुजरात की बात है, वहां के चुनाव पर पूरे भारत की ही नहीं, पाकिस्तान और चीन तक की निगाहें थीं। सब यह जानने को उत्सुक थे कि मोदी और शाह अपने घरेलू राज्य में भा.ज.पा. को फिर से जिता सकते हैं या नहीं। दूसरी ओर सब राहुल बाबा की योग्यता भी जांचना चाहते थे। कांग्रेस वाले भी उन्हें इस जीत से पार्टी की अध्यक्षता का उपहार देना चाहते थे; पर पहले ही कौर में हिमाचल के साथ गुजरात की मक्खी भी आ गयी। सिर मुंडाते ही ओले पड़ गये। न मंदिर दर्शन काम आया और न जनेऊ का प्रदर्शन। यद्यपि वोट और सीटें बढ़ने से हार का दुख कुछ कम हो गया। फिर भी हार तो हार ही है। यद्यपि कांग्रेसी चमचे इसे ही उनकी जीत बता रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि राहुल बाबा और उनके खानदानी चमचे अब भी कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं।

जो लोग वहां कांग्रेस की सीट और वोट बढ़ने को उपलब्धि मान रहे हैं, वे भूलते हैं कि यह वस्तुतः हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर तथा जिग्नेश मेवाणी नामक उन युवा नेताओं की उपलब्धि है, जिनकी बैसाखी के सहारे राहुल बाबा 77 सीटों तक पहुंचे हैं। इनके बिना कांग्रेस 50 से भी नीचे रह जाती। कांग्रेस को अधिकांश सीटें पटेल बहुल सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र से ही मिली हैं। अर्थात ये सीटें हार्दिक की हैं, कांग्रेस की नहीं। 2019 के लोकसभा तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ये तीनों कांग्रेस के साथ रहेंगे, यह सोचना दूर की कौड़ी ही है। कांग्रेस की ताकत इसी से आंकी जा सकती है कि मुख्यमंत्री पद के दावेदार उसके चारों बड़े नेता (शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोधवाडिया, सिद्धार्थ पटेल तथा तुषार चौधरी) चुनाव हार गये। 

इसमें तो कोई संदेह नहीं है कि इस बार भा.ज.पा. के लिए यह चुनाव काफी कठिन था। एक ओर मोदी की राज्य में अनुपस्थिति तथा पांच बार की सत्ता के कारण कुछ नाराजगी, तो दूसरी ओर देश और विदेश स्थित मोदी विरोधियों के सहयोग और शह पर चल रहे जातिवादी आंदोलन। फिर भी मोदी के अथक परिश्रम, भारी लोकप्रियता और अमित शाह के जमीनी संगठन कौशल ने बाजी मार ली। यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप ही है कि वोट बढ़ने के बाद भी सीटें घट जाती हैं। सवा प्रतिशत वोट बढ़ने के बावजूद भा.ज.पा. को 16 सीटों की हानि हुई तथा ढाई प्रतिशत की वृद्धि से कांग्रेस को इतना ही लाभ।

गुजरात का चुनाव तीखे शाब्दिक बाणों के लिए भी याद किया जाएगा। चाहे कांग्रेस नेता और सर्वोच्च न्यायालय में बाबर के पैरोकार कपिल सिब्बल द्वारा श्रीराम मंदिर का विवाद टालने का दुराग्रह हो या मणिशंकर अय्यर का मोदी को नीच कहने वाला बयान। इनसे चुनावी प्रचार का स्तर गिरा ही है। उधर मोदी ने भी मणि बाबू के घर पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ हुए भोज को खूब उछाला। इस चक्कर में सज्जनता के कलियुगी अवतार मनमोहन सिंह भी फंस गये। अब चुनावी घात-प्रतिघात मान कर इस अध्याय को बंद कर देना ही उचित है। 

इस चुनाव के कुछ अन्य पक्ष भी हैं। काफी समय से गुजरात जातीय प्रपंचों से मुक्त था; पर कांग्रेस ने तीन जातीय नेताओं के सहारे राज्य को फिर से इस गंदगी में धकेलने का प्रयास किया। कांग्रेस की हार से यह षड्यंत्र विफल तो हुआ है; पर इसका कुछ खराब असर तो रहेगा ही। भा.ज.पा. के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के लिए भी यह चिंता का विषय है। उन्हें यह गंदगी दूर करने के लिए नये सिरे से योजनाबद्ध प्रयास करने होंगे। अन्यथा 2019 के चुनाव में यह रोग फिर सिर उठाएगा। दूसरी ओर कांग्रेस और उसके नेताओं को यह बात समझ में आ गयी कि सरकार हिन्दुओं के वोट से ही बनती है। इसलिए इस बार राहुल बाबा ने मजारों की बजाय मंदिरों में माथा टेका। गुजरात का यह संदेश दूर तक जाएगा और सभी दलों में मुल्ला टोपी, रोजा इफ्तार और कब्रों पर चादर चढ़ाने जैसे ढकोसले कम हो जाएंगे।

कई महत्वपूर्ण संदेश भा.ज.पा. के लिए भी हैं। यह स्पष्ट है कि उसकी लाज अमदाबाद, बड़ोदरा और सूरत जैसे बड़े नगरों ने बचायी है। गांवों में किसान और युवाओं की नाराजगी उसके प्रति साफ नजर आयी है। अतः भा.ज.पा. को इस ओर ध्यान देना ही होगा। मोदी ने भा.ज.पा. कार्यालय में दिये गये भाषण में इसकी चर्चा की भी है। जिग्नेश मेवाणी को मुसलमान ताकतें इतना सहयोग क्यों कर रही हैं, यह भी समझना होगा। यह दोस्ती हिन्दू समाज और विशेषकर उसके निर्धन (दलित) वर्ग के लिए सदा घातक ही सिद्ध हुई है। भा.ज.पा. ने विजय रूपाणी और नितिन पटेल की जोड़ी पर फिर से भरोसा किया है। पिछला समय इनके लिए सीखने का था; पर इस बार ये दोनों निश्चित ही गुजरात में कुछ करके दिखाएंगे।

कांग्रेस वाले और उनके पिछलग्गू विश्लेषक गुजरात और हिमाचल के परिणामों की व्याख्या चाहे जैसे करें; पर भारत कांग्रेसमुक्ति की दिशा में दो कदम और आगे बढ़ गया है। अगले कदम के लिए कर्नाटक भी प्रतीक्षा में है।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

खेलों की संस्कारशाला अर्थात संघ की शाखा

भोजन, पानी और हवा की तरह खेल भी व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। बालपन में तो यह उसका अधिकार ही है। बच्चे मुख्यतः शारीरिक प्रधान खेल खेलते हैं, जबकि बड़े होने पर उसमें कुछ मानसिक खेल भी जुड़ जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताओं में खेलों को महत्व दिया गया है। अनेक प्राचीन नगरों की खुदाई में बच्चों के खिलौने तथा शतरंज, चौपड़ आदि मिले हैं। बचपन में भगवान श्रीकृष्ण ने तो जानबूझ कर यमुना में गेंद फेंक दी थी और फिर उस बहाने कालिया नामक दुर्दम्य गुंडे (नाग) का ही नाश कर दिया।

सभ्यता एवं सम्पन्नता के विकास के साथ उपकरण आधारित खेल बने। इनमें क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबाल, बास्केट बॉल, बैडमिंटन, टेनिस, लॉन टेनिस आदि उल्लेखनीय हैं। इन सबका विकास पश्चिम में ही हुआ। टी.वी. के जीवंत प्रसारण तथा महंगी प्रतियोगिताओं ने इन्हें लोकप्रिय बनाया है। क्रिकेट इसमें सबसे आगे है। फिल्मी कलाकारों की तरह उसके खिलाड़ियों का नाम और चेहरा भी बिकता है। इसीलिए विराट कोहली की शादी टी.वी. पर खूब चली। सचिन तेंदुलकर को कांग्रेस ने इसीलिए ‘भारत रत्न’ दिया और राज्यसभा में भी भेजा। कम्प्यूटर और मोबाइल के विकास ने भी खेलों में क्रान्ति की है। बच्चे हों या बड़े, सब उन पर उंगलियां चलाते हुए अपना समय काटते हैं और साथ में अपनी आंखें भी खराब करते हैं। इन खेलों का कितना उपयोग है, यह बहस का विषय है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। संघ के काम का आधार एक घंटे की शाखा है। इसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। शाखा में यद्यपि योग, आसन, सूर्यनमस्कार जैसे शारीरिक तथा गीत, सुभाषित, अमृत वचन, चर्चा आदि बौद्धिक कार्यक्रम भी होते हैं; पर विद्यार्थी और युवा शाखा में 40-45 मिनट बिना उपकरण वाले खेल ही होते हैं। उपकरण न होने से इनमें कुछ खर्च नहीं होता। अतः गरीब हो या अमीर, सब इन्हें खेल सकते हैं। मैदान पर चूने, ईंट के टुकड़े या फिर चप्पल आदि से ही सीमा रेखा बनाकर ये खेल हो जाते हैं। 

सच तो ये है ये बहुरंगी खेल ही शाखा के प्राण हैं। इनके आकर्षण में बंधकर ही बच्चे शाखा में आते हैं। भले ही संघ का विचार उन्हें बाद में समझ आता है। शाखा में तरुण, बाल, शिशु आदि अलग-अलग समूह (गण) में खेलते हैं। खेल कराने वाला ‘गणशिक्षक’ कहलाता है; पर ये खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनकी विशेषता संस्कार देने की क्षमता भी है। इनसे स्वयंसेवक के मन पर संस्कार पड़ते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखायी देते हैं। स्वयंसेवक में कई गुणों का भी विकास होता है। 

इन खेलों का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है। ‘हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा’ की तरह क्रिया के मामूली परिवर्तन से नया खेल बन जाता है। ये खेल सैकड़ों हैं तथा हर क्षेत्र में इनके अलग नाम हैं। खेलों के नाम में राम, हनुमान, गणेश, कृष्ण तथा कश्मीर, इसराइल, चीन आदि जोड़ने से स्वयंसेवक के मन में जिज्ञासा पैदा होती है, जिसका समाधान बड़े लोग करते हैं। कुछ खेलों के नाम तथा उनके प्राप्त गुणों की चर्चा करना यहां उचित रहेगा।

शाखा में कई खेल दो या अधिक दल बनाकर होते हैं। कबड्डी, बैठी खो, रस्सा या दंड खींच, बंदी बनाना, घोड़ा कबड्डी, डमरू दौड़, टैंक युद्ध, चीन की दीवार जैसे खेलों में खिलाड़ी अपनी टीम को जिताने का प्रयास करते हैं। अतः उनमें टीम भावना एवं नेतृत्व क्षमता का विकास होता है। शेर बकरी, बंदा बैरागी जैसे खेलों में एक खिलाड़ी साहस एवं कुशलता से बाकी 15-20 लोगों के बीच में घुसता  और निकलता है। सब उसकी पीठ पर घूंसे लगाते हैं। संगठन की जंजीर, हिन्दू बनाना, स्वर्गारोहण जैसे खेलों से संगठन की भावना मजबूत होती है। गणेश छू, हनुमान की पूंछ, अंधे की लाठी आदि मनोरंजन प्रधान खेल हैं। 

शक्ति परिचय, मुर्गा युद्ध, हाथी युद्ध, घुड़सवार युद्ध तथा एक टांग की दौड़, उल्टी दौड़, मेढक दौड़, भालू दौड़, हाथी दौड़, बिच्छू दौड़, हनुमान कूद, गोरैया दौड़, तीन टांग की दौड़.. जैसे द्वंद्व के खेलों से स्वयंसेवक की निजी ताकत का पता लगता है। संख्या कम होने पर त्रिभुज या छोटा गोला बनाकर यज्ञकुंड, मेरा घर, रक्षक जैसे कई खेल होते हैं। शिविर आदि में संख्या 100 या इससे भी अधिक होती है। ऐसे में मैदान पर चक्रव्यूह, कच्छप व्यूह, चतुर्व्यूह आदि बनाकर सबको दो सेनाओं में बांटकर खेल होता है। सभी आयु और कद-काठी के लोग मिलकर पिरामिड भी बनाते हैं।

शाखा पर 40-45 मिनट में प्रायः 10-12 खेल हो जाते हैं। इसके लिए दक्ष, आरम्, एकशः सम्पत्, गण विभाग आदि आज्ञाओं द्वारा बार-बार रचना बनती एवं बदलती है। इनसे अनुशासन का विकास होता है। खेल में खिलाड़ी की लम्बाई के आधार पर ही टीमें बनती हैं। हर जाति, आयु और वर्ग के खिलाड़ी साथ मिलकर दूसरी टीम से संघर्ष करते हैं। इससे स्वयंसेवक के मन में समरसता की भावना पैदा होती है। खेल समाप्ति पर ‘कौन जीता, संघ जीता’ के उद्घोष से प्रतिद्वंद्विता का मनो-मानिल्य मिट जाता है। ताली बजाकर मस्ती में उत्साहवर्धक गीत गाने से पसीने के साथ ही खेल की थकान भी दूर हो जाती है। इससे उत्साह एवं आनंद का वातावरण बन जाता है।

वर्षा या ठंड में कमरे में बैठकर या भागदौड़ के खेलों से थककर बौद्धिक खेल खेलते हैं। इनसे मनोरंजन के साथ ही बुद्धि का विकास भी होता है। अंत्याक्षरी, सूचना, मुक्ताक्षरी, प्रश्नोत्तरी, उल्टी गिनती, खाएंगे, चिड़िया उड़, काला सफेद, ऐसा करो वैसा करो, नेता की खोज, डाकघर, मछली की आंख.. आदि ऐसे ही खेल हैं।

खेलों के बीच में स्थानीय भाषा-बोली में कई तरह के नारे और उद्घोष भी बोले जाते हैं। इनसे देशभक्ति, हिन्दुत्व प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता आदि विचार मन में दृढ़ होते हैं। भारत माता की-जय। वन्दे-मातरम्। हर हर-बम बम। रुद्र देवता-जय जय काली।  जय शिवाजी-जय भवानी। अलग है भाषा अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश। जय हो-विजय हो। संगठन में-शक्ति है। संघे शक्ति-कलौयुगे। जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वो कश्मीर हमारा है; जो कश्मीर हमारा है-वो सारे का सारा है। हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे। हिन्दू हिन्दू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे। हिन्दू हिन्दू-भाई भाई। एक दो तीन चार-भारत मां की जय जयकार। अन्न जहां का-हमने खाया, वस्त्र जहां के-हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे। आदि। 

शाखा पर खेल होते हैं; पर वह खेल क्लब नहीं है। इसका कारण खेलों से प्राप्त संस्कार हैं। इसीलिए संघ की शाखा से बड़े खिलाड़ी तो नहीं; पर देश के प्रति प्रेम और समर्पण रखने वाले अनुशासित नागरिक जरूर निर्माण हो रहे हैं। संघ का उद्देश्य भी तो यही है।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

मानव और प्रकृति में संतुलन

इन दिनों प्रायः देश के किसी ने किसी भाग से गांव में घुस आये बाघ, हाथी आदि जंगली जानवरों की चर्चा होती रहती है। बस्ती के आसपास मित्र की तरह रहने वाले कुत्ते और बंदरों का आतंक भी यदा-कदा सुनने को मिलता रहता है। इन्हें मारने पर पशुप्रेमी संस्थाएं शोर करती हैं। अतः कुछ राज्य सरकारें इनकी नसबंदी करा रही हैं। इससे लाभ होगा या हानि, यह तो 20-25 साल बाद ही पता लगेगा।

मानव और पशु-पक्षियों का साथ सदा ही रहा है। भारतीय और विदेशी साहित्य में इनकी पर्याप्त चर्चा है। सृष्टि में शाकाहारी से लेकर मांसाहारी तक, लाखों तरह और आकार-प्रकार के प्राणी हैं। उनमें से कई का तो हमें अभी तक पता ही नहीं है। जैसे शरीर में कई अंग दिखायी देते हैं, तो कई नहीं। कुछ छोटे हैं, तो कुछ बड़े। फिर भी हर अंग का अपना महत्व एवं उपयोग है। सब एक-दूजे पर आश्रित हैं। यही स्थिति विभिन्न जीव-जंतुओं की है। इसलिए कुछ जीवों को सृष्टि से पूरी तरह मिटा देने के प्रयास कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता।

एक बार चीन सरकार ने तय किया कि छोटी चिड़ियां बहुत अन्न खा लेती हैं, अतः उन्हें मार दिया जाए। एक निश्चित दिन सब लोग अपनी छतों पर आ गये। शोर मचाकर चिड़ियों को उड़ाया गया। जैसे ही वे थककर बैठने लगतीं, लोग उन्हें फिर उड़ा देते। कुछ ही घंटों में करोड़ों चिड़ियां मर गयी; पर अन्न की बर्बादी उस साल पहले से भी अधिक हुई। क्योंकि वे चिड़ियां अन्न के साथ ही खेती के लिए हानिकारक कीड़े भी खा लेती थीं। चिड़ियों के मरने से कीड़ों की संख्या बहुत बढ़ गयी और वे पूरी फसल खा गये। ऐसे उदाहरण विश्व इतिहास में एक नहीं, हजारों हैं।

लेकिन अब एक ओर मानव जनसंख्या, तो उसके साथ ही भौतिक सुविधाओं की अंधी होड़ भी लगातार बढ़ रही है। अतः जल और जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से विनाश किया जा रहा है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है तथा पशु भी मजबूरी में हिंसक और उपद्रवी हो रहे हैं।

लगभग 15 साल पुरानी बात है। मैं उन दिनों लखनऊ में रहता था तथा गरमी में खुली छत पर सोता था। इससे सुबह उठते समय शरीर बहुत प्रफुल्लित रहता था। वहां पंखे की जरूरत नहीं पड़ती थी, अतः बिजली भी बचती थी; पर अचानक उस मोहल्ले में आने वाले बंदरों की संख्या बहुत बढ़ गयी। वे दिन के साथ रात में भी आने लगे। मैं एक बरतन में वहां पानी रखने लगा, जिससे उसे पीकर वे लौट जाएं; पर प्रायः वे छत पर ही डेरा डाल देते थे। अतः मुझे कूलर लगाकर अंदर सोने पर मजबूर होना पड़ा। कारण ढूंढने पर पता लगा कि लगभग पांच कि.मी. दूर का जंगल साफ कर एक नयी कालोनी बन रही है। अतः उस जंगल में बसे बंदर परेशान होकर शहर में आ रहे हैं।

बिल्कुल यही स्थिति हाथियों और बाघ आदि की है। मनुष्य अपने आवास, व्यापार या मनोरंजन के लिए जंगल में घुस रहा है, तो जानवर कहां जाएं ? उनके पास तो कोई घर, दुकान या खेती नहीं होती। जंगल ही उनके रहने और खाने का सहारा है। देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश की सड़कों पर प्रायः हाथी आ जाते हैं। उनके आते ही वाहन चुपचाप पीछे हटकर खड़े हो जाते हैं। जल स्तर गिरने से कई जंगलों में तालाब सूख गये हैं। अतः प्यासे पशु मीलों दूर गंगा तक आ जाते हैं। मांसाहारी पशु रात में शिकार करते हैं और दिन में सोते हैं; पर दिन में उन जंगलों की सड़कों पर वाहन दौड़ने लगे हैं। पर्यटक उनकी नींद खराबकर फोटो खींचते हैं। कई जंगलों में होटल बने हैं। वहां शादी या पार्टी में कानफोड़ संगीत से भी पशु परेशान होते हैं। जहां जंगलों में रेल लाइनें हैं, वहां भी यही समस्या है।

ऐसी समस्याओं का हल दो और दो चार जैसा सरल नहीं है। विकास केे लिए सड़क और रेलगाड़ियां जरूरी हैं। बढ़ती जनसंख्या के लिए घर भी चाहिए। शहरीकरण के रुकने की भी कोई संभावना नहीं है। अतः हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना सीखना होगा। जितना हम ले रहे हैं, उससे कुछ अधिक उसे नहीं लौटाएंगे, तो हमारी भावी पीढ़ियों को बहुत कष्ट भोगने होंगे। यद्यपि विज्ञान कई चीजों का उत्तर ढूंढ लेता है; पर कई बार आज का समाधान 25 साल बाद नयी समस्या बन जाता है।

1965 के युद्ध के समय अमरीका ने हमें गेहूं देने से मना कर दिया था। तब हम अन्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं थे। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व ने कृषि वैज्ञानिकों को चुनौती दी। इससे हुई ‘हरित क्रांति’ से हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो हुए, पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों से खेतों की उर्वरता घट गयी। अतः हर बार अपेक्षाकृत अधिक खाद आदि लगने लगीं। रासायनिक अन्न और चारे से मानव और पशुओं में नये रोग आ गये। कम समय की फसलों से पानी का खर्च बढ़ गया। अतः जल की समस्या आ गयी। अब सब परेशान हैं कि क्या करें ?

यही हाल बढ़ती गरमी का है। इससे निबटने को विज्ञान ने फ्रिज और ए.सी. आदि बना दिये। अतः हर कार, घर और दफ्तर में ए.सी. लगने लगे हैं; पर अब ध्यान आ रहा है कि जितने ए.सी. लग रहे हैं, गरमी उतनी ही बढ़ रही है। सूर्य और धरती के बीच की ओजोन परत लगातार छीज रही है। हिमानियों के पिघलने से समुद्र आगे बढ़कर निकटवर्ती नगरों और देशों को निगल रहे हैं। अतः चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की बात होने लगी है।

इस बारे में हिन्दू चिंतन सही दिशा दिखाता है। भारत में अच्छा खाना-पहनना कभी मना नहीं था। देवताओं को 56 व्यंजनों का भोग लगता था। आम आदमी की थाली में भी चार-छह चीजें रहती थीं। सोने-चांदी के बरतनों का प्रयोग भी होता ही था। आज भी बच्चे के अन्नप्राशन पर चांदी के छोटे चम्मच, कटोरी या गिलास देते हैं। मंदिर में अष्टधातु की मूर्तियां, स्वर्ण मुकुट और आभूषण आम बात हुआ करती थी; लेकिन उपभोग पर संयम का चाबुक भी था। ‘ईशोपनिषद’ में सृष्टि की हर चीज को ईश्वर की बताकर ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ (त्यागपूर्वक उपभोग करो) कहा गया है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने का अर्थ यही है।

एक 75 वर्षीय बुजुर्ग को अखरोट का पेड़ लगाते देख एक यात्री ने आश्चर्य से कहा, ‘‘बाबा, तुम्हारे पांव शमशान की ओर मुड़े हैं। 40 साल बाद जब यह पेड़ फलेगा, तब तुम कहां होगे ?’’ बुजुर्ग ने हंसकर कहा, ‘‘मैंने बचपन और जवानी में जिन पेड़ों के अखरोट खाये थे, वे मेरे दादा और पिता ने लगाये थे। ये पेड़ में अपने नाती-पोतों के लिए लगा रहा हूं।’’

कहानी भले ही छोटी हो, पर उसका अर्थ गहरा है। प्रकृति के साथ चलने का अर्थ केवल अपनी नहीं, अपनों की चिंता करना भी है। केवल आज नहीं, तो कल और परसों के बारे में सोचना भी है। इसलिए भारत की हर समस्या अमरीका या इंग्लैंड की तरह हल नहीं होगी। विकास का अर्थ बड़ा घर और गाड़ी; बिजली, पानी और शराब का अधिक उपभोग; कपड़े, गहने या जूतों से भरे कमरे नहीं है। विकास का अर्थ है मानव और प्रकृति के बीच संतुलन। भगवान ने हमारी तरह ही पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को भी बनाया है। इनका संरक्षण, संवर्धन और इनके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का काम सृष्टि में सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी होने का दावा करने वाले मनुष्य का ही है।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

भारी धुंध और गोवंशीय खेती

इन दिनों दिल्ली और पूरा उत्तर भारत भारी धुंध से परेशान है। प्रशासन ने कई जगह अगले आदेश तक छोटे बच्चों के स्कूल बंद करा दिये हैं। सांस तथा फेफड़े के मरीजों को विशेष सावधानी रखने तथा अधिकाधिक तरल पदार्थ लेने को कहा जा रहा है। सुबह टहलने जाने वालों को भी कुछ दिन घर पर ही रहने की सलाह दी गयी है। अनेक सार्वजनिक कार्यक्रम निरस्त किये जा रहे हैं।

आजकल टी.वी. पर जो समाचार आ रहे हैं, उनमें हजारों लोग मुंह पर रूमाल या कपड़े का मास्क लगाये दिखते हैं। कई तरह के छोटे, बड़े और सुंदर डिजायनों वाले मास्क भी बाजार में खूब बिकने लगे हैं। धुंध से बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। रेलगाड़ियां अत्यधिक देरी से चल रही हैं। हवाई सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। अतः सरकारी कामकाज भी ढीला पड़ गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार इसका दोष हरियाणा और पंजाब की सरकारों पर मढ़ दिया है। उनका कहना है कि वहां के किसान खेत में पड़ी पराली को जला रहे हैं। इससे भारी धुआं पैदा हो रहा है, जो दिल्ली और आसपास तक आकर यहां के लोगों का जीना दूभर कर रहा है। चौराहे के सिपाही तथा दुकानदार सबसे अधिक परेशान हैं। वे जाएं तो जाएं कहां ? 

केजरीवाल साहब का कहना है कि इन राज्यों की सरकारों को चाहिए कि वे इस पराली को खरीद लें; पर अत्यधिक बुद्धिमान इस महापुरुष ने कभी खेती तो की नहीं। वे गेहूं और धान में या ईख और बाजरे की फसल में अंतर नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें पता ही नहीं कि यह पराली दो-चार नहीं करोड़ों टन होती है। कोई सरकार इसे नहीं खरीद सकती। उनके बजट में इसका प्रावधान ही नहीं होता। और यदि खरीद भी ले, तो वह इसे रखेगी कहां और इसका होगा क्या ?

कुछ लोग विदेशी तर्ज पर दिल्ली में हैलिकॉप्टर से पानी छिड़कने की सलाह दे रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि चार-छह दिन में यह धुआं स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। ऐसा होते ही एक साल के लिए यह शोर भी दब जाएगा। दिल्ली सरकार ने फिर कुछ दिन के लिए निजी कारों को सम-विषम संख्या के अनुसार चलाने का आदेश दिया है। सब लोग चिंतित तो हैं; पर वे इस समस्या के मूल में जाना नहीं चाहते। यदि इस पर ध्यान दें, तो केवल धुंध ही नहीं, और भी कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। 

भारत को गांव और खेती प्रधान देश माना जाता है; पर पिछले कुछ सालों से खेती के प्रति लोगों का रुझान घट रहा है। किसानों के बच्चे भी अब गांव में रहना और खेती करना नहीं चाहते। हल चलाना, पशुओं की सानी करना और गोबर में हाथ डालना अब पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया है। अतः वे सब शहरों में रहकर कोई नौकरी करना चाहते हैं। परिवार भी छोटे हो रहे हैं। शिक्षा प्राप्त करना तो अच्छा है; पर यह शिक्षा हमें खेती और पशुपालन से दूर कर रही है, यह इसका दूसरा और खराब पहलू भी है।

भारत की खेती परम्परागत रूप से गोवंश पर आधारित थी। हर किसान के घर में उसकी जमीन के अनुपात में गाय, बैल आदि होते ही थे। इससे जहां उसके परिवार को ताजा दूध और घी मिलता था, वहां बैल खेती के काम आते थे। गोमूत्र, गोबर और खेत की खर-पतवार आदि से उत्तम खाद और कीटनाशक बनते थे। इससे खेती सस्ती पड़ती थी तथा घर का हर प्राणी स्वस्थ और व्यस्त रहता था। गोवंश घर के सदस्य की भांति ही रहते और पलते थे। खेत से उनके लिए ताजा चारा आ जाता था। गेहूं, दाल, चावल, फल आदि मनुष्य खाते थे, तो उनकी घासफूस और छिलकों से पशुओं का पेट भर जाता था। इस प्रकार सब एक-दूसरे पर आश्रित थे। कोई चीज व्यर्थ नहीं जाती थी। अतः पर्यावरण का संरक्षण होता था।

पर अब परिदृश्य काफी बदल गया है। छोटे परिवार और युवा वर्ग की उदासीनता के कारण खेती करने वाले हाथ लगातार घट रहे हैं; पर गांव में खेती की जमीन तो उतनी ही है। अतः लोग मजबूरी में पशुओं की बजाय मशीन आधारित खेती की ओर झुक रहे हैं। अब जुताई, बुआई और कटाई के लिए टैªक्टर तथा डीजल से चलने वाले हार्वेस्टर आदि यंत्र आ गये हैं। छोटे किसान भी अब एक-दो दिन के लिए किराये पर इन्हें लेकर ही काम चला रहे हैं। इनसे जहां एक ओर प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, वहां खेती भी महंगी होती जा रही है। तेल के लिए विदेशों पर निर्भरता इसका एक अन्य पहलू है। 

पहले गेहूं, धान आदि का अवशिष्ट (पराली) पशुओं के खाने के काम आता था; पर अब पशुओं के अभाव में किसानों के सामने समस्या है कि वे इसे कहां ले जाएं ? उन्हें अगली फसल के लिए खेत खाली और फिर तैयार करना है। हाथ से कटाई करने पर पौधा नीचे जड़ के पास से काटा जाता है; लेकिन मशीनों से कटाई होने पर लगभग एक फुट अवशेष खेत में ही रह जाता है। उससे निबटने का उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है और वह है इसे जलाना। आजकल पंजाब, हरियाणा आदि के हर गांव में पराली जल रही है। इससे ही दिल्ली और आसपास धुंध के बादल छाए हैं।

हमारे देश के कई अति शिक्षित और विदेशी डिग्रीधारी कृषि पंडित इस समस्या का समाधान भी दुनिया के दूसरे देशों की तर्ज पर ही करना चाहते हैं; पर हर आदमी को हर मर्ज में एक ही गोली देने से काम नहीं चलता। ऐसे ही विदेशी प्रणाली से भारत की समस्या का समाधान नहीं होगा। हमें तो अपने तरीके से ही इससे निबटना होगा; और इसका निदान गोवंश आधारित खेती ही है। इससे पराली जलने की बजाय फिर से पशुओं के पेट में जाएगी। अतः धुंध से छुटकारा मिलेगा। विदेशी तेल, बीज और कीटनाशक आदि पर निर्भरता कम होगी तथा जैविक खाद से खेत भी उर्वर होंगे। 

किसी विद्वान ने कहा है, ‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाये।’’ अर्थात ठीक से समझ-बूझकर यदि एक को साध लिया, तो सब ठीक हो जाता है; पर यदि बिना सोचे-समझे सबको साधने का प्रयास किया, तो कुछ भी हाथ नहीं आता। अतः भारत को फिर से गोवंश आधारित खेती की ओर लौटने की आवश्यकता है। इससे ही सबका कल्याण होगा।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या मुसलमान : समस्या और समाधान

रोहिंग्या मुसलमान इन दिनों केवल भारत ही नहीं, तो बंगलादेश के लिए भी सिरदर्द बन गये हैं। ये लोग मूलतः बंगलादेशी ही हैं, जो बर्मा के सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं। काम-धंधे के लिए बर्मा आते-जाते हुए हजारों परिवार वहां के अराकान या रखाइन क्षेत्र में बस गये, जो आज लाखों हो गये हैं। 

आज तो भारत, बंगलादेश और बर्मा अलग-अलग देश हैं; पर 1935 तक भारत, बर्मा और श्रीलंका का एक ही गर्वनर जनरल (वायसराय) होता था। ब्रिटिश संसद ने ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935’ से इन्हें अलग किया; पर लम्बे समय से वहां रहने के बावजूद बर्मा इन्हें अपना नागरिक नहीं मानकर अब निकाल रहा है। इसी से यह संकट उत्पन्न हुआ है। इसका कारण ये है कि कबीलाई जीवन होने के कारण हिंसा, लड़कियां उठाना और दूसरों के धर्मस्थल तोड़ना इनकी स्वाभाविक वृत्ति है।  

बर्मा एक बौद्ध देश है। बौद्ध समुदाय अहिंसक और शांतिप्रिय है। काफी समय से वे लोग इनके उपद्रव सह रहे थे; पर जब पानी सिर से ऊपर हो गया, तो उन्हें लगा कि अब भी यदि चुप रहे, तो हम अपने देश में ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे। फिर हमारी दशा ऐसी ही होगी, जैसी बंगलादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की है। अतः कुछ लोग शस्त्र लेकर इनं पर पिल पड़े। इनके नेता हैं मांडले के बौद्ध भिक्षु आशिन विराथु। वे पिछले 15 साल से इसमें लगे हैं। यद्यपि इसके लिए उन्हें 25 साल की सजा भी हुई; पर जनता के दबाव में सरकार को इन्हें सात साल बाद ही छोड़ना पड़ा। बाहर आकर ये फिर उसी काम में लग गये हैं।

पांचजन्य 1.10.2017 के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने रोहिंग्याओं को जापान के विरुद्ध लड़ने को शस्त्र दिये थे। उन्होंने कहा कि जीतने पर वे रोहिंग्याओं के लिए एक अलग मुस्लिम देश बना देंगे; लेकिन शस्त्र पाकर वे हिन्दुओं और बौद्धों का संहार करने लगे। केवल एक ही दिन (28.3.1942) में उन्होंने 20 हजार बौद्धों को मार डाला। हत्या और हिंसा का यह तांडव आगे भी चलता रहा। 

1946 में स्वतंत्र होते ही बर्मा की सेना ने इनके विरुद्ध कार्यवाही कर इनकी कमर तोड़ दी। अतः ये शांत हो गये; पर 1971 में बंगलादेश बनने पर कई आतंकी समूह बनाकर ये फिर सक्रिय हो गयेे। दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देशों ने इन्हें समर्थन और पड़ोसी बंगलादेश ने इन्हें शस्त्र दिये। इस प्रकरण के बाद आशिन विराथु सक्रिय हुए। 28.5.2012 को एक बौद्ध महिला के बलात्कार एवं हत्या से पूरा देश भड़क उठा और फिर हर बौद्ध विराथु का समर्थक बन गया।

बर्मा की राष्ट्रपति आंग सान सू की नोबेल विजेता एवं मानवाधिकारवादी हैं; पर बर्मा का जमीनी सच देखकर उन्होंने भी रोहिंग्याओं को कहा है कि वे या तो शांति से रहें या कोई दूसरा देश देख लें। बर्मा में सेना को अनेक शासकीय अधिकार भी हैं। उनकी इच्छा के बिना संसद कुछ नहीं कर सकती। सेना रोहिंग्याओं को सबक सिखाना चाहती है। अतः वह इन्हें खदेड़ रही है। इससे ये यहां-वहां भाग रहे हैं। बंगलादेश के मूल नागरिक और वहां रिश्तेदारी होने से अधिकांश लोग वहीं जा रहे हैं। कुछ समुद्री मार्ग से सऊदी अरब, यू.ए.ई. पाकिस्तान, थाइलैंड, मलयेशिया, इंडोनेशिया आदि में भी गये हैं। भारत में इनकी संख्या 40,000 से चार लाख तक कही जाती है। 

भारत में जो रोहिंग्या हैं, वे हर जगह अपने स्वभाव के अनुसार आसपास की खाली सरकारी जगह घेरकर मस्जिद और मदरसे आदि बना रहे हैं। हर दम्पति के पास छह-सात बच्चे भी हैं। अतः उनके आवास के पास गंदगी रहती है। सघन बस्तियों में उन्होंने कुछ दुकानें भी बना ली हैं। कुछ लोग मजदूरी आदि करने लगे हैं। इससे जहां एक ओर भारतीय संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है, वहां वे भारतीयों का रोजगार भी छीन रहे हैं। अर्थात जो स्थिति बंगलादेशी घुसपैठियों की है, वही क्रमशः इनकी हो रही है। अतः विस्फोटक होने से पहले ही समस्या सुलझानी होगी।

लेकिन ये हो कैसे ? सर्वप्रथम तो दुनिया के सब मुस्लिम देश अपने मजहबी भाइयों को गले लगायें। वे दो-चार हजार करके इन्हें आपस में बांट लें। भारत उन्हें वहां तक पहुंचा दे। या फिर ये सब हिन्दू या बौद्ध हो जाएं। भारत एक हिन्दू देश है। बौद्ध मत भी विशाल हिन्दू धर्म का ही अंग है। इससे भारतीयों की स्वाभाविक सहानुभूति उन्हें मिलेगी। मंदिर जाने से उनकी हिंसा और उग्रता घटेेगी। 20-30 साल में वे अपने कुसंस्कारों से मुक्त हो जाएंगे। दिल्ली में कुछ रोहिंग्या चर्च का आर्थिक और सामाजिक सहयोग पाने को ईसाई हो गये हैं। जब वे ईसाई हो सकते हैं, तो अपने पुरखों के पवित्र हिन्दू धर्म में भी आ सकते हैं। 

दूसरा रास्ता उन्हें निकालने का है। यह बात कई केन्द्रीय मंत्रियों ने कही है; पर ये आसानी से तो जाएंगे नहीं। सरकार तो कई पार्टियों की बनीं; पर आज तक बंगलादेशी घुसपैठिये वापस नहीं भेजे गये। जो बात तब सच थी, वो आज भी सच है। इसलिए सेक्यूलरों के शोर पर ध्यान न देकर सख्ती करनी होगी। भारत सरकार इन्हें पकड़कर सौ-सौ के समूह में नौकाओं में बैठा दे। मानवता के नाते साथ में कुछ दिन का खाना, पानी और बच्चों के लिए दूध आदि रखकर इन्हें भारतीय समुद्री सीमा के पार छोड़ दिया जाए। फिर जहां इनकी किस्मत इन्हें ले जाए, ये वहीं चले जाएं।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या शरणार्थी और सद्गुण विकृति

इन दिनों भारत में चर्चा गरम है कि बर्मा से आये रोहिंग्याओं को शरण दें या नहीं ? कुछ सेक्यूलरवादी पुरोधा इसके समर्थन में न्यायालय में भी गये हैं। इनका तर्क है कि भारत में सदा से ही शरणागत के संरक्षण की परम्परा रही है। अतः इस बार भी इसका पालन होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी फिलहाल इन्हें निकालने पर रोक लगा दी है।

भारतीय धार्मिक साहित्य में राजा शिबि की कथा आती है। कहते हैं कि एक बार वे दरबार में बैठे थे कि एक भयभीत कबूतर आकर उनकी गोद में छिप गया। उसके पीछे एक बाज भी आ गया। बाज ने राजा से कबूतर वापस मांगा। राजा ने यह कहकर मनाकर दिया कि शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है। बाज ने कहा कि कबूतर उसका आहार है और उसका आहार छीनना भी अधर्म है। राजा ने उसे किसी और पशु-पक्षी का मांस देना चाहा, तो बाज ने कहा कि कबूतर को बचाने के लिए किसी और को मारना भी तो अधर्म ही है।

राजा बड़े असमंजस में पड़ गया। अंततः सहमति इस पर हुई कि वह कबूतर के भार के बराबर अपना मांस दे दे। अतः तराजू के एक पलड़े में कबूतर और दूसरे में राजा अपना मांस रखने लगा; पर आधे से अधिक शरीर का मांस चढ़ने पर भी कबूतर वाला पलड़ा नीचे रहा। अतः राजा स्वयं पलड़े में बैठ गये। ऐसा होते ही पलड़ा झुक गया। आकाश से फूल बरसने लगे। कबूतर और बाज भी अपने असली रूप में आ गये। वे राजा की परीक्षा लेने आये इंद्र और अग्निदेव थे। ऐसी ही कथा श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप की भी है, जिन्होंने नंदिनी गाय की रक्षा के लिए सिंह के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। 

शरणागत की रक्षा के कुछ ताजे प्रसंग और भी हैं। दो अक्तूबर 1996 को ग्राम सामतसर (चुरू, राजस्थान) के निहालचन्द बिश्नोई ने शिकारियों की गोली से घायल एक शरणागत हिरण की प्राणरक्षा में अपनी जान दे दी। 1999 में राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें मरणोपरान्त ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया। जनसत्ता 1.5.2004 के अनुसार जिला जैसलमेर, राजस्थान के हरिसिंह राजपुरोहित ने शिकारियों से तीतर को बचाने के लिए अपने प्राण दे दिये। इंडिया टुडे 6.6.2005 के अनुसार जिला सुरेन्द्रनगर (गुजरात) के मुली कस्बे में गत 600 साल से वीर सोधा परमारों की याद में मेला होता है। यहां शरणागत घायल तीतर की रक्षार्थ सोधा और चाबड़ों में युद्ध हुआ था। इसमें 200 सोधा और 400 चाबड़ मारे गये थे। 

ये प्रसंग बताते हैं कि भारत में शरणागत की रक्षा की सुदीर्घ परम्परा है; पर इसका पालन विदेशी और विधर्मी के साथ करें या नहीं, यह भी विचारणीय है। क्योंकि यहां प्रश्न देश-रक्षा का भी है, जिसके सामने निजी प्रतिज्ञा या सम्मान बहुत छोटी चीज है। पहले देश, बाद में सब कुछ; पर कुछ लोगों ने देश और धर्म की बजाय निजी, जातीय या क्षेत्रीय सम्मान को महत्व दिया, जिससे आगे चलकर बहुत हानि हुई। वीर सावरकर ने इसे ही ‘सद्गुण विकृति’ कहा है। राजस्थान के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं।

पंडित चंद्रशेखर पाठक कृत ‘पृथ्वीराज’ के अनुसार गजनी का सुल्तान मोहम्मद गौरी और उसका चचेरा भाई मीर हुसेन दोनों एक वेश्या ‘चित्ररेखा’ के आशिक थे। मीर हुसेन इसे भगाकर भारत ले आया। उसकी याचना पर नागौर में शिकार खेल रहे पृथ्वीराज ने उसे शरण दे दी। साथ ही हिसार और हांसी की जागीर देकर उसे दरबार में अपने दाहिने हाथ की ओर बैठने का सम्मान भी दिया। पता लगने पर मो. गौरी ने इन्हें वापस मांगा; पर शरणागत रक्षक पृथ्वीराज नहीं माने। इसका दुष्परिणाम क्या हुआ, यह सबको पता है। कहते हैं कि पृथ्वीराज और गौरी के बैर का यही मुख्य कारण था।

पृथ्वीराज चौहान के वंशज और रणथंभौर के शासक हमीरदेव ने भी अलाउद्दीन खिलजी के एक विद्रोही सेनानायक मीर मोहम्मद शाह और उसके कुछ साथियों को शरण दी थी। शाह कुछ समय पहले ही मुसलमान बना था तथा अलाउद्दीन से उसके मतभेद का कारण गुजरात की लूट का बंटवारा था। इस कारण अलाउद्दीन और हमीरदेव में युद्ध हुआ। हमीरदेव, उनका पूरा परिवार, सेना और राज्य बलि चढ़ गया; पर वे पीछे नहीं हटे। तभी से ये कहावत प्रसिद्ध है - 

सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फले इक बार
तिरया तेल, हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार।

मेड़ता के शासक राव जयमल एक समय अकबर के मित्र थे। कई युद्धों में दोनों ने एक-दूसरे का साथ दिया; पर जब जयमल ने अकबर के एक विद्रोही सेनापति सर्फुद्दीन को शरण दी, तो उनके संबंध बिगड़ गये। अतः अकबर ने मेड़ता पर हमलाकर जयमल को भागने पर मजबूर कर दिया। जयमल को मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने शरण देकर बदनौर की जागीर प्रदान की। इससे अकबर मेवाड़ पर चढ़ गया। इस युद्ध में अकबर की सेना से लड़ते हुए जयमल मारा गया। उसके पुत्र कुंवर शार्दूल सिंह ने भी सर्फुद्दीन की रक्षा में वीरगति पायी, जब वह उसे नागौर से मेड़ता ला रहा था। कहते हैं, तभी से अकबर के मन में मेवाड़ राज्य के प्रति स्थायी शत्रुता के बीज पड़े। यह संघर्ष आगे महाराणा प्रताप के काल में भी जारी रहा।

इन प्रसंगों का निष्कर्ष बस इतना ही है कि यदि हिन्दू राजाओं ने शरण देते समय विदेशी और विधर्मियों की मानसिकता का ध्यान रखा होता, तो उन्हें और भारत को इतने दुर्दिन नहीं देखने पड़ते। ‘‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी..’’ ऐसी ही गलतियों के लिए कहा गया है।

यद्यपि भारत में शरण और भी कई समुदायों ने ली है। अपनी पुण्यभूमि छूटने के बाद यहूदी दुनिया भर में भटके। हर जगह उन्हें ठोकरें मिलीं। अपवाद रहा तो बस भारत। यहां उन्हें शरण भी मिली और प्रेम भी; पर वे यहां रच-बस गये। अतः संख्या में बहुत कम होते हुए भी उनका योगदान सराहनीय है। 1971 युद्ध के एक नायक जनरल जैकब यहूदी ही थे।

यही इतिहास पारसियों का है। जब वे विस्थापित होकर भारत आये, तो उनका भी स्वागत हुआ। वे यहां दूध में शक्कर जैसे घुलमिल गये। अतः मानेकशा, टाटा, नरीमन, सोहराबजी, गोदरेज आदि सैकड़ों नाम आज भारत के गौरव हैं। दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बती, श्रीलंका से तमिल और बंगलादेश से चकमा बौद्ध भी शरणार्थी होकर भारत आये हैं; पर इनके कारण भारत को कभी समस्या नहीं हुई।

लेकिन शरणार्थी के नाम पर बंगलादेश से आये मुस्लिम घुसपैठियों को देखें। ये हमारा रोजगार छीन रहे हैं तथा जहां भी हैं, वहां कानून-व्यवस्था के लिए समस्या बने हैं। दिल्ली और उसके आसपास सम्पन्न घरों में सफाई आदि करने वाली मुन्नी, चुन्नी, बबली, बेबी, सोना, गुड्डी आदि नामधारी लाखों महिलाएं बंगलादेशी हैं। वे खुद को बंगलादेश से लगे बिहार के पूर्णिया जिले की कहती हैं। पूर्णिया में बंगला आसानी से बोली और समझी जाती है; पर उनके पति, बच्चों और निवास आदि के बारे में थोड़ा गहराई से पूछें, तो असलियत पता लग जाती है। पुरुष मजदूरी और रिक्शाचालन, तो बच्चे कूड़ा-संग्रह और चोरी-उठाईगीरी में लगे हैं। वोट के लालची नेताओं ने उनके वोट, आधार और राशन कार्ड बनवा दिये हैं। इससे वे यहां के नागरिक हो गये हैं। गत 12 जुलाई, 2017 को नौएडा की ‘महागुण सोसायटी’ में घरेलू कामगार महिला के साथियों द्वारा किया गया पथराव किसी से छिपा नहीं है।

इस संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमानों पर विचार करें। आज उनकी संख्या 40 हजार हो या चार लाख; पर कल जब वे बंगलादेशियों की तरह यहां जम जाएंगे, तब क्या होगा ? अतः निष्कर्ष स्पष्ट है कि इन्हें शरण देना भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए घातक है।

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

अपने-अपने महामानव

यों तो महामानव किसी धर्म, जाति या क्षेत्र के नहीं होते, भले ही उन्होंने काम इनमें से किसी एक के लिए ही किया हो। प्रायः शासक अपने या अपने परिजनों के नाम पर सार्वजनिक योजनाओं के नाम रखते हैं। ये लोग वर्तमान भी हो सकते हैं और दिवंगत भी। देवी-देवताओं के नाम पर भी नगर या गांवों के नामकरण की लम्बी परम्परा है। राम और कृष्ण के नाम पर भारत ही नहीं, विदेशों में भी हजारों नगर हैं।

जब भारत में इस्लाम के हमले शुरू हुए, तो कुछ हमलावरों को भारत पंसद आ गया। अतः वे यहीं जम गये। उन्होंने कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर वहां शासन भी किया। यद्यपि उनके विरुद्ध भारतीय सदा लड़ते रहे। अतः ये तथाकथित बादशाह कभी चैन नहीं ले सके। ऐसा लगभग 800 साल तक चला। इस दौरान उन्होंने कुछ नये नगर बसाये, तो हजारों गांव और नगर बरबाद भी किये। आज भारत में हैदराबाद और अहमदाबाद से लेकर गाजियाबाद और फैजाबाद जैसे सैकड़ों नगर हमले और अत्याचारों की जीवित दास्तान हैं।

यही परम्परा अंग्रेजी काल में भी रही। उन्होंने पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर ‘माल रोड’ और हर नगर में ‘विक्टोरिया पार्क’ बनाये। उन दिनों माल रोड पर शाम को केवल अंग्रेजों और उनके कुत्तों को घूमने का अधिकार था। उस समय भारतीयों का प्रवेश वहां वर्जित था। यद्यपि उनका जोर विध्वंस या नाम बदल की बजाय नये स्थान विकसित कर उन्हें लैंसडौन, डलहौजी और मांटगुमरी आदि अंग्रेजी नाम देने पर अधिक रहा। आजादी मिलने पर इनमें से कई नाम बदल दिये गये। सभी विक्टोरिया पार्क ‘गांधी पार्क’ हो गये; पर इस्लामी हमलावरों द्वारा दिये गये नाम नहीं बदले गये। इसके पीछे जवाहर लाल नेहरू की दूषित मानसिकता तथा वोट बैंक की राजनीति प्रमुख कारण है। 

अंग्रेजों के जाने के बाद नामकरण का केन्द्र गांधी और नेहरू हो गये। शायद ही कोई नगर हो, जहां गांधी रोड या नेहरू कालोनी न हो। फिर यह धारा फिरोज परिवार की ओर मुड़ गयी। अतः इंदिरा मार्केट, संजय, राजीव और सोनिया विहार बन गये। एक विशेष बात यह भी है कि प्रायः बेतरतीब और बिना नक्शे के बनी अवैध बस्तियों को ये नाम दिये गये, जिससे कांग्रेस शासन में उन्हें कोई छू न सके। धीरे-धीरे वोट बैंक के लालच में नेता वहां आने लगते हैं। वे उन्हें बिजली और पानी दिलवाते हैं। इस प्रकार वह बस्ती वैध हो जाती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में तो चुनाव में अवैध बस्तियों को वैध करवाना एक बड़ा मुद्दा होता है।

लेकिन सत्ता तो सदा किसी के पास नहीं रहती। इसलिए विद्वानों ने उसे वारंगना अर्थात वेश्या कहा है। सत्ता बदलते ही नेताओं के नाम पर बनी योजनाओं के नाम भी बदलने लगते हैं। उ.प्र. में मायावती, कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के राज में कई बार जिलों के नाम बदले गये थे। इससे प्रशासन और जनता को कितनी परेशानी हुई, इससे नेताओं को कोई मतलब नहीं होता। वे तो अपने खेमे के नाम रखकर खुद को या शीर्ष नेतृत्व को खुश करना चाहते हैं।

इसीलिए स.पा. सरकार में आचार्य नरेन्द्र देव, डा. राममनोहर लोहिया और जनेश्वर मिश्र को महत्व मिलता है, तो मायावती सरकार में डा. अम्बेडकर, काशीराम, ज्योतिबा फुले, गौतम बुद्ध और महामाया जैसी विभूतियों को। भा.ज.पा. वाले डा. मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, कुशाभाऊ ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर योजनाओं के नाम रखते हैं। भा.ज.पा. वाले जानते हैं कि उनकी शक्ति का मूल स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। अतः कुछ सड़कों, अस्पतालों या योजनाओं में केशव और माधव जैसे नाम भी जुड़ जाते हैं।

सच तो यह है कि इनमें से अधिकांश महामानवों ने अपने समय में देश, धर्म और समाज की भरपूर सेवा की है। अतः इनमें से किसी के भी अवदान को नकारा नहीं जा सकता; पर जब इनके साथ राजनीति जुड़ जाती है, तो स्वाभाविक रूप से दूसरा खेमा विरोध करने लगता है। इसलिए संस्था या योजना के नामकरण में निष्पक्ष और राष्ट्रीय दृष्टि अपनानी चाहिए। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह नेता निर्विवाद हो तथा उसके साथ नरसंहार, विध्वंस, हत्या, चारित्रिक दोष, सत्ता लोलुपता, भ्रष्टाचार, वंशवाद या तानाशाही जैसे अपराध न जुड़े हों। 

इस पर एक और तरह से भी विचार करना चाहिए। जिस क्षेत्र, नगर या गांव में कोई स्कूल, बांध, सड़क या कालोनी बन रही है, उसे किसी स्थानीय लेखक, पत्रकार, वीर सैनिक, स्वाधीनता सेनानी, लोकतंत्र सेनानी, कलाकार, संत या समाजसेवी के नाम पर समर्पित करें। इससे उस क्षेत्र के लोग गौरवान्वित होंगे तथा नयी पीढ़ी उनके बारे में जानकर उन जैसा बनने का प्रयास करेगी। इससे सरकार बदलने पर नाम बदलने का दबाव भी नहीं होगा। एक महामानव के नाम पर किसी एक बड़ी योजना का नाम रख देना पर्याप्त है। हर जगह उसी का नाम हो, इसका कोई औचित्य नहीं है।

देहरादून की सैन्य अकादमी में एक प्रमुख भवन ‘परमवीर अरुण खेत्रपाल’ के नाम पर है। पासिंग आउट परेड के समय उसमें प्रवेश करते ही हर सैनिक का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। ऐसे ही सियाचिन में ‘परमवीर बाना सिंह’ के नाम पर ‘बाना पोस्ट’ है। देश भर में ऐसे सैकड़ों गांव और नगर हैं, जहां ऐसे वीर सैनिकों के नाम पर द्वार, स्कूल, सड़क और चैराहों के नाम रखे गये हैं। यह प्रयास सराहनीय है। इसी सोच पर यदि काम हो, तो किसी को आपत्ति नहीं होगी।

लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या राजनेता इस पर विचार करेंगे ?