रविवार, 20 जनवरी 2019

आरक्षण का अगला चरण, आर्थिक आरक्षण

लोकसभा के पिछले सत्र में अचानक मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव सदन में रख दिया। विपक्ष को इसकी हवा तक नहीं लगी। इसलिए वे इस पर बोलने की तैयारी भी नहीं कर सके। अपवाद में दो-चार वोटों को यदि छोड़ दें, तो लगभग सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ। 

लोकसभा के बाद यह राज्यसभा में भी पारित हो गया। वहां भी विरोध की कोई बड़ी आवाज नहीं उठी। राष्ट्रपति महोदय के हस्ताक्षर से यह कानून बन गया और कई राज्यों में इस पर काम भी शुरू हो गया। यद्यपि इससे पहले जब भी आरक्षण संबंधी बात चली, तो दोनों सदनों में खूब तीखी चर्चा, बहस, वाद-विवाद आदि हुए। सड़कों पर हिंसक हंगामे और आंदोलन हुए। मंडल रिपोर्ट लागू होने की बात पुरानी होने पर भी बहुतों को याद है। 

पर इस बार जो हुआ, वह तेजी से होने के बावजूद बहुत शांति, प्रेम और सद्भाव से हो गया। बाल की खाल खींचने वाले विपक्ष और स.पा., ब.स.पा., लो.ज.पा. जैसे जातीय दलों ने भी इसका खुला समर्थन किया। इससे यह ध्यान में आता है कि इसके पक्ष में कैसी अंतर्धारा विद्यमान थी।

पर अब कुछ लोग न्यायालय में चले गये हैं। वे पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए इसे आरक्षण की मूल भावना के विरुद्ध बता रहे हैं। क्योंकि संविधान में आरक्षण के लिए आधार जाति को बनाया गया था, गरीबी या अमीरी को नहीं। शासन के अनुसार सवर्ण हिन्दुओं के साथ गरीब मुसलमान और ईसाइयों को भी इसका लाभ मिलेगा। यह कदम मोदी को कितना लाभ पहुंचाएगा, यह तो लोकसभा चुनाव के बाद ही पता लगेगा। 

आरक्षण को संविधान में लाते समय यह बात मुख्य रूप से उठी थी कि इससे निर्धन जातियों का आर्थिक और सामाजिक स्तर ऊंचा उठेगा। निःसंदेह देश में सामाजिक आधार पर भेदभाव होता है। डा. अम्बेडकर जब बड़ोदरा राज्य में एक बड़े पद पर काम करते थे, तो चपरासी उन्हें फाइलें फेंक कर देता था। चपरासी और डा. अम्बेडकर की शिक्षा और वेतन में जमीन-आसमान का अंतर था। फिर भी ऐसा होता था। चूंकि डा. अम्बेडकर महार जाति के थे। इसलिए आरक्षण में जाति को मुख्य आधार माना गया। आगे चलकर कई आयोग आरक्षण पर विचार के लिए बने। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की तथा कुछ अन्य जातियों को इसमें शामिल करने का सुझाव दिया। इसे लेकर समय-समय पर कई आंदोलन हुए हैं। 

असल में आरक्षण का विषय रोजगार से जुड़ा है। आरक्षण के चलते सरकारी नौकरी मिलने से लोगों के रहन-सहन में कुछ सालों में ही भारी अंतर दिखता है। मकान, गाड़ी, खेत, बच्चों की शिक्षा और शादी-विवाह आदि से उसकी ऊंची हैसियत प्रकट होती है। अतः कई जातियों की मांग है कि उन्हें भी इस श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ दिया जाए।

पिछले काफी समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग भी जोर पकड़ रही थी। सवर्ण जातियों में भी गरीबी तो है; पर इससे उनकी सामाजिक स्थिति पर अंतर प्रायः नहीं आता। जैसे गरीब होने पर भी डा. अम्बेडकर के चपरासी की सामाजिक स्थिति ऊंची थी; पर अब सरकारी नौकरियां घटी हैं। शहरीकरण के कारण खेती की जमीन भी कम हुई है। फिर शिक्षित युवा खेती करना भी नहीं चाहते।   

व्यापार की बात कहना तो आसान है; पर जिन परिवारों में इसकी परम्परा नहीं है, उन्हें यह कठिन लगता है। इसमें पूंजी और परिश्रम के साथ सूझबूझ भी चाहिए। शुरुआत में कुछ खतरा भी रहता है। ऐसे में बिना पूंजी और खतरे वाली सरकारी नौकरी ही बचती है; और नौकरियां हैं नहीं। क्योंकि हर जगह कम्प्यूटर और मशीन आ गयी है। पहले बहुत कम लड़कियां नौकरी करती थीं; पर शिक्षा के विस्तार और महंगी जीवन शैली के चलते वे भी नौकरी में आ रही हैं।

इसलिए आर्थिक आरक्षण की बात तो ठीक है; पर इसका दूसरा पहलू घटती नौकरियां भी है  सरकारी नौकरी में स्थायित्व के साथ अधिक वेतन, कम काम और भरपूर छुट्टियां होती हैं। जिन नौकरियों में ऊपरी पैसा खूब है, उसके लिए लोग जमीनें तक बेच देते हैं। अफसर की गुलामी और स्थानांतरण की परेशानी के बावजूद लोगों की प्राथमिकता सरकारी नौकरी ही है। इसीलिए सौ स्थानों के लिए एक लाख लोग आवेदन करते हैं। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है ?

इसलिए आर्थिक आरक्षण देने से भी समस्या हल नहीं होगी, चूंकि मुख्य चीज रोजगार है। युवाओं को यह समझना होगा कि रोजगार का अर्थ नौकरी नहीं है। अपना काम चाहे छोटा ही हो; पर वही कल बड़ा हो जाता है। यद्यपि आर्थिक आरक्षण अच्छा और जातीय आरक्षण से आगे का कदम है। यह पुराने आरक्षण को छेड़े बिना हुआ है, इसलिए स्वागत योग्य भी है; पर समस्या का पूरा समाधान तो निजी काम ही है। उससे पूरे परिवार को रोजगार मिलता है और वर्तमान ही नहीं, अगली पीढ़ी भी आर्थिक रूप से सुरक्षित रहती है। अतः युवाओं को इस दिशा में सोचना चाहिए।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू

बहुत साल पहले मोदी सूटिंग का एक विज्ञापन आता था ‘ए मैड मौड मूड मेड मोदी’। यह विज्ञापन जिसने भी बनाया, उसके दिमाग और शाब्दिक बाजीगरी को दाद देनी होगी। मोदी ब्रांड तो अब भी है; पर कारोबार बंटने से वह कमजोर पड़ गया है। यद्यपि मेरठ के पास मोदीनगर और मोदीपुरम् में अब भी कई उद्योग चल रहे हैं; पर मोदी ब्रांड में वो चमक नहीं है, जो कभी ‘रायबहादुर’ गूजरमल मोदी के जमाने में थी।

लेकिन दूसरी ओर पिछले कुछ साल में एक और मोदी बहुत मजबूत हुए हैं। वह हैं नरेन्द्र मोदी। उनका नाम भी राजनीति में एक ब्रांड बन गया है। मोदी ब्रांड का अर्थ है कठिन परिश्रम, देशहित में कठोर निर्णय लेने की क्षमता, ईमानदारी, विनम्रता, भाषण कौशल्य, स्पष्ट नीति, विदेशी नेताओं से मधुर संबंध, साहसी नेतृत्व.. आदि। यद्यपि बड़े लोगों की तुलना नहीं की जाती। क्योंकि परिस्थिति हर समय एक सी नहीं होती। फिर भी पिछले साढ़े चार साल में नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो उपलब्धियां पायी हैं, वह अभूतपूर्व हैं।

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे साढ़े चार साल राष्ट्रनीति पर ध्यान देंगे और फिर राजनीति पर। अब लोकसभा के चुनाव पास आ रहे हैं। अतः मोदी राष्ट्रनीति के साथ ही चुनावी राजनीति की ओर भी बढ़ गये हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने साल के पहले ही दिन एक बड़ी समाचार संस्था को साक्षात्कार देकर की।

साक्षात्कार में उन्होंने हर प्रश्न का साफ उत्तर दिया। यद्यपि जिनकी रोटी-रोजी ही विरोध से चलती है, उन्होंने कहा कि यह साक्षात्कार प्रायोजित था। मोदी को प्रश्न पता थे, इसलिए वे तैयारी करके आये। सच तो ये है कि इसमें कुछ गलत नहीं है। यह साक्षात्कार प्रधानमंत्री का था, झूठे आरोप लगाने वाले किसी नेता का नहीं। जो दूसरों का लिखा पढ़ते हैं और हर पत्रकार वार्ता से पहले जिन्हें सिखाना पड़ता है, उनके द्वारा इस साक्षात्कार को प्रायोजित कहना मजाक है। 

राफेल विवाद पर सरकार का मंतव्य बिल्कुल साफ है। पिछली सरकार का सौदा केवल विमान का था; पर इस बार के सौदे में उन विमानों में लगाये जाने वाले हथियार भी शामिल हैं। एक डिब्बा खाली है और दूसरा सामान सहित, तो दोनों की कीमत में अंतर तो होगा ही। यही अंतर विमान और हथियारों से लैस युद्धक विमान में है। यह बात जनता समझ रही है; पर कांग्रेस नहीं।

राफेल में कौन से हथियार लगेंगे, इसे विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं, आम आदमी नहीं। सामरिक महत्व का विषय होने के कारण यह गोपनीय है। वायुसेना के अधिकारी इससे संतुष्ट हैं। फिर भी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सब तथ्य बताये, जिसे देखकर उसने कहा कि इसमें कोई घपला नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस शोर मचा रही है। कारण बिल्कुल साफ है। उसकी चिंता का विषय देश की रक्षा नहीं, अगला चुनाव है।

मोदी एक बात और भी कह रहे हैं कि रक्षा सौदों में पहले दलाली खायी जाती थी। बोफोर्स सौदा बहुत पुराना नहीं है। वह तोप बहुत अच्छी थी, यह सच है; पर उसकी खरीद में घपला था, यह भी उतना ही सच है। उसकी ठीक जांच कांग्रेस ने नहीं होने दी। उसके अपराधियों को देश छोड़कर भागने का मौका दिया। विदेश में बंद उसके खातों से प्रतिबंध हटवाये। फिर भी वह अपने दामन को साफ कहे, तो ये मजाक ही है।

कहते हैं कि जिस सौदे में दलाली नहीं मिलती थी, उसे वे किसी बहाने से रद्द कर देते थे। इसीलिए मनमोहन सिंह के समय में कोई महत्वपूर्ण रक्षा सौदा नहीं हो सका; पर अब सौदे हो रहे हैं। व्यापारियों की बजाय सरकारों के बीच हो रहे हैं। किसी को दलाली नहीं मिली। इतना ही नहीं, पिछले दलाल भी पकड़ में आ गये हैं। इसलिए कांग्रेस बेचैन है। यही उनकी बौखलाहट का कारण है। 

एक फिल्मी गीत है, ‘‘चोरों को सारे नजर आते हैं चोर।’’ कांग्रेस को लगता है कि जैसे बोफोर्स दलाली ने राजीव गांधी की छुट्टी की थी, ऐसा ही इस बार भी होगा। तब वी.पी.सिंह ने नारा दिया था, ‘‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है।’’ इसी तर्ज पर राहुल बाबा भी ‘‘चैकीदार चोर है’’ के नारे लगा रहे हैं। 

साक्षात्कार में श्रीराम मंदिर के बारे में भी मोदी ने साफ बात कही। मंदिर बने, यह उनकी भी इच्छा है। सबकी तरह उन्हें भी पता है कि इस विवाद का निर्णय मंदिर के पक्ष में होगा। यद्यपि कानून या अध्यादेश का रास्ता भी है; पर संवैधानिक पद पर होने के कारण वे चाहते हैं कि निर्णय न्यायालय ही दे। इसलिए वे कुछ और समय तक प्रतीक्षा करना चाहते हैं; पर कांग्रेस की शह पर बाबरी वाले बार-बार सुनवाई टलवा रहे हैं। ऐसा लगता है कि यदि इस पर शीघ्र निर्णय नहीं हुआ, तो लोकसभा चुनाव की घोषणा से पूर्व मोदी अध्यादेश ले आएंगे। 

सी.बी.आई प्रमुख आलोक वर्मा प्रकरण पर भी मोदी का मन साफ है। उन्हें आलोक वर्मा से बैर नहीं है; पर वे चाहते हैं कि चूंकि दो शीर्ष लोगों पर आरोप लगे हैं, इसलिए जांच पूरी होने तक दोनों अवकाश पर रहें। आलोक वर्मा ने इसे नहीं माना। वे सर्वोच्च न्यायालय से बहाली ले आये; पर शासन के हाथ लम्बे हैं। मोदी ने उनका स्थानांतरण कर दिया। 

इस मामले में सबसे हास्यास्पद स्थिति कांग्रेस की रही। उनके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आलोक वर्मा को लाने का भी विरोध किया और हटाने का भी। क्योंकि उनका काम केवल विरोध करना है। जैसे संपत और चंपत मित्र थे; पर संपत हमेशा चंपत का विरोध करता था। एक बार चाय पीते हुए दोनों के कप में मक्खी गिर गयी। चंपत ने चाय और मक्खी दोनों फेंक दी। इस पर संपत ने चाय और मक्खी दोनों गटक लीं। यही हाल खड़गे जी और कांग्रेस का है।

गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण, पड़ोसी देशों से दुखी होकर आये हिन्दुओं के लिए नागरिकता नियम में संशोधन, जी.एस.टी. में छोटे कारोबारियों को राहत.. आदि से लगता है कि नरेन्द्र मोदी चुनावी मूड में आ गये हैं। लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। मोदी ब्रांड इस बार पहले से अधिक मजबूत होकर उभरेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

विशाल सामाजिक आयोजन है कुंभ

भारत में चार स्थानों पर प्रति बारह वर्ष बाद पूर्ण कुंभ और छह साल बाद अर्धकुंभ की परम्परा हजारों सालों से चली आ रही है। कुंभ का धार्मिक और पौराणिक महत्व तो है ही; पर इसे केवल धार्मिक आयोजन कहना उचित नहीं है। वस्तुतः कुंभ एक विराट सामाजिक आयोजन भी है। भारतीय, और विशेषकर हिन्दू समाज व्यवस्था में जो परिवर्तन हुए हैं, उनके पीछे कुंभ की बड़ी भूमिका है। 

कुंभ मेलों का इतिहास बताता है कि स्वाधीनता सेनानी भी यहां आते थे। वे यहां आकर अपने पिछले काम की समीक्षा कर अगली योजनाएं बनाते थे। इनमें से अधिकांश लोग गुप्त रूप में साधुओं के वेश में आते थे। इसलिए व्यवस्था के नाम पर विदेशी और विधर्मी प्रशासक भी इन मेलों पर गहरी निगाह रखते थे। 

आजकल यातायात के तीव्रगामी साधन बहुत बढ़ गये हैं। इसलिए अधिकांश लोग वायुयान, रेलगाड़ी, बस, कार या दुपहिया वाहनों से आकर गंगा मइया में डुबकी लगाकर एक-दो दिन में लौट भी जाते हैं। पूरे ढाई-तीन महीने, अर्थात कुंभ में पूरे समय रहने वाले तो दो प्रतिशत भी नहीं होंगे। अधिकांश साधु-संतों का भी यही हाल है।

पर पहले ऐसा नहीं था। तब लोग पैदल या बैलगाडि़यों से आते-जाते थे और फिर लम्बे समय तक कुंभ में रहते भी थे। लाखों लोग आने-जाने और कुंभ में रहने के लिए तीन-चार महीने का समय लेकर आते थे। साधु-संतों के लिए तो यह आसान था; पर गृहस्थ जन भी हर छह या बारह साल बाद ऐसा समय निकाल ही लेते थे। क्योंकि उनके मन में गंगा मां के प्रति अतिशय प्रेम था और गंगा स्नान के पीछे बहुत गहरी धर्म भावना जुड़ी थी। 

पर इस अवसर का उपयोग हिन्दू धर्म के प्रचार और प्रसार के साथ ही सामाजिक समस्याओं के बारे में चिंतन, मंथन, विचार, विमर्श और फिर निर्णय में भी होता था। साधु-संत लोग तो अपने डेरों या आश्रमों से साल भर पहले ही कुंभ के लिए निकल पड़ते थे। वे रास्ते में पड़ने वाले गांव और नगरों में कुछ-कुछ दिन ठहरते थे। हर जगह लोग श्रद्धा भाव से उनके भोजन और निवास का प्रबंध करते थे। इससे गांव वालों को जहां उनके अनुभव और प्रवचन का लाभ मिलता था, वहां उन संतों को क्षेत्र की धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की जानकारी मिलती थी। समाज में क्या परिवर्तन हो रहे हैं या होने अपेक्षित हैं, इससे उनका साक्षात्कार होता था। इस प्रकार वे सैकड़ों जगह रुकते और वहां की जानकारी लेते हुए कुंभ में पहुंचते थे।

कुंभ में भी साधु, संत और आम लोग आकर महीनों ठहरते थे। इनमें किसान, मजदूर, व्यापारी और कर्मचारी सब होते थे। सैकड़ों राजा, रजवाड़े, जमींदार और साहूकार भी आते थे। कुंभ में धार्मिक प्रवचन के साथ सामाजिक विषयों पर भी गहन चर्चा और विचार-विमर्श होता था। एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र वालों से मिलते थे। आपस में अनुभवों का आदान-प्रदान होता था। इस विमर्श में कुछ निर्णय भी लिये जाते थे। 

कुंभ से लौटकर लोग इन निर्णयों के बारे में अपने गांव में जाकर चर्चा करते थे। साधु-संत कुंभ से लौटते भी वैसे ही थे, जैसे वे आये थे। अर्थात रास्ते के गांव और नगरों में रुकते और प्रवचन करते हुए वे छह-आठ महीने में अपने आश्रम, डेरे और निवास पर पहुंचते थे। जाते समय उनका निवास कहीं और होता था तो लौटते हुए कहीं और। अर्थात इन हजारों साधु-संतों की कुंभ में जाते और लौटते हुए लाखों-करोड़ों लोगों से भेंट और वार्ता होती थी। लोगों के मन में साधु-संतों के प्रति श्रद्धा होती है। वे उनकी बात पर विश्वास करते हैं। अतः बिना किसी प्रचार माध्यम के कुंभ में हुए सामाजिक निर्णय साल भर के अंदर पूरे देश में फैल जाते थे। ये प्रक्रिया हर छठे और फिर बारहवें साल में होती थी।

एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो सकती है। भारत में 25 वर्ष तक युवक ब्रह्मचर्य का पालन कर फिर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते थे। जब लड़का 25 साल का होगा, तो लड़की भी 18-20 साल की तो होगी ही। आश्रम व्यवस्था के नाम से इसे धर्म का भी संरक्षण था; पर उसी भारत में फिर बाल विवाह क्यों होने लगे ? 

कारण बिल्कुल साफ है। जब भारत में इस्लामी हमलावर आये, तो वे कुमारी कन्याओं को उठाकर ले जाते थे। ऐसे में सब साधु-संतों और समाज शास्त्रियों ने निर्णय लिया कि अब गोदी के बच्चों की ही शादी कर दी जाए। शुभ मुहूर्त या तिथि-पत्रे के झंझट से बचने के लिए इसके लिए ‘अक्षय तृतीया’ भी निश्चित कर दी गयी। यद्यपि गौना किशोर या युवा होने पर ही होता था; पर विवाह के कारण लड़की के माथे पर सिंदूर सज जाता था। अतः कई इस्लामी हमलावर उसे बख्श देते थे। 

करोड़ों लोगों के जीवन पर स्थायी प्रभाव डालने वाले ऐसे सामाजिक निर्णय कुंभ मेलों में ही होते थे; पर इसका एक दूसरा पक्ष भी है। सैकड़ों सालों के इस्लामी प्रभाव के कारण लड़कियों की सुरक्षा के लिए स्वीकार किये गये इस उपाय ने क्रमशः कुप्रथा का रूप ले लिया। इसलिए आज भी लाखों बच्चों की शादी छुटपन में ही कर दी जाती है। इसलिए साधु-संतों और समाज शास्त्रियों ने जैसे आपत् धर्म के रूप में बाल और शिशु-विवाह की इस प्रथा को मान्य किया, वैसे ही अब इसे अमान्य भी करना चाहिए। इसका माध्यम भी कुंभ ही बन सकता है।

खानपान, छुआछूत, ऊंचनीच, पर्दा, लड़कियों को पढ़ने या बाहर न निकलने देना जैसी कई प्रथाएं अब कुप्रथा बन चुकी हैं। इन सब पर कुंभ में सख्त निर्णय हों तथा इन्हें न मानने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। यद्यपि यह काम इतना आसान नहीं है। जैसे किसी प्रथा को बनते हुए सैकड़ों साल लगते हैं, वैसे ही उसे टूटते हुए भी समय लगता है; पर इसकी प्रक्रिया लगातार चलती रहनी चाहिए। तभी कुंभ मेलों की सामाजिक सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी।

शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

पर्यावरण पर समग्रता से सोचें

सर्वोच्च न्यायालय ने दीवाली पर पटाखों के सीमित उपयोग का सुंदर निर्णय दिया है। करोड़ों लोग इनके शोर और धुएं से परेशान होते हैं; पर इसके दूसरे पक्ष की ओर भी न्यायालय, शासन और आम नागरिकों को ध्यान देना होगा। क्योंकि केवल सरकारी नियम या न्यायालय के आदेशों से देश नहीं चलता।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केरल के सबरीमला मंदिर में सब आयु की महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए; पर स्थानीय महिलाएं इस निर्णय के विरोध में रास्ता रोक कर खड़ी हो गयीं। अतः 10 से 50 वर्ष आयु वाली महिलाएं वहां नहीं जा सकीं और न्यायालय का निर्णय धरा रह गया। हिन्दू वोटों की नाराजगी के डर से सत्ताधारी वामपंथी पार्टी भी चुप रही। 

ऐसे ही बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या, कन्या शिक्षा, मृत्यु भोज, शोर.. आदि पर भी समय-समय पर न्यायालय ने कठोर निर्णय दिये हैं; पर इनका पूरी तरह पालन नहीं होता। चूंकि जनता इसके लिए मन से तैयार नहीं है। इसलिए न्यायालय और शासन के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को भी इधर ध्यान देना होगा। बड़े लोग यदि ऐसे आयोजनों में न जाएं, तो इन पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा; पर ऐसा होता नहीं है।

मैं पिछले दिनों एक आयोजन में गया। वहां सड़क पर ही विशाल कीले गाड़कर पंडाल लगा था। पक्ष और विपक्ष के कई बड़े नेता वहां आये थे। समारोह के बाद पंडाल वाले ने जब निर्ममता से वे कीले उखाड़े, तो सड़क कई जगह से छिल गयी। कुछ दिन बाद हुई वर्षा में वह पूरी तरह उखड़ गयी। तब वही आयोजक सड़क खराब होने की दुहाई देने लगे। ऐसे उदाहरण हर जगह मिलेंगे। अर्थात जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। 

जहां तक पटाखों की बात है, तो इन्हें प्रायः बच्चे ही बजाते हैं, बड़े लोग नहीं। कभी हम भी दीवाली पर बाबा जी के साथ जाकर पटाखे खरीदते थे। बड़े पटाखों की जिद भी करते थे। यही काम आज के बच्चे भी करेंगे। न्यायालय ने जिन ग्रीन पटाखों की बात कही है, क्या वे उपलब्ध हैं ? यदि नहीं, तो इस आदेश का पालन कैसे होगा ? शासन ने अपना बोझ पुलिस पर डाल दिया है। क्या वे गलियों में जाकर बच्चों को पकड़ेगे; और क्या पुलिस वालों के बच्चे पटाखे नहीं छुड़ाएंगे ?

इसलिए हर चीज को समग्रता में सोचना पड़ेगा। न्यायालय और शासन को चाहिए कि वह दीवाली के तुरंत बाद ऐसी व्यवस्था करे, जिससे भविष्य में केवल छोटे और ग्रीन पटाखे ही बनें। जब बड़े पटाखे बनेंगे ही नहीं, तो फिर वे बिकेंगे कैसे ? अर्थात बीमारी की जड़ पर प्रहार करें। फिर शोर क्या केवल दीवाली पर ही होता है। साल भर मंदिर, मस्जिद आदि में लगे भोंपू क्या शोर नहीं करते ? रात के दो बजे तक होने वाली रामलीलाओं और पूरी रात के जागरणों पर प्रशासन चुप क्यों रहता है ? क्योंकि इनसे स्थानीय नेता जुड़े रहते हैं, जिनके समर्थन के बिना पार्षद, विधायक और सांसद चुनाव नहीं जीत सकते। फिर इन पर लगाम कैसे लगेगी ?

अब शादियों का सीजन आ गया है। बारात निकलेंगी और सड़कें जाम होंगी। देर रात तक डी.जे. बजेंगे। शराब पीकर लोग नाचेंगे। क्या इनमें शोर नहीं होता ? उत्तर भारत के अलावा प्रायः शादियां दिन में ही होती हैं। कई जगह तो हस्तमिलन, शुभदृष्टि, माल्यार्पण और फेरों का समय निश्चित रहता है। जब वे विवाह सफल होते हैं, तो बाकी को क्या परेशानी है; क्या पर्यावरण का इससे कोई संबंध नहीं है ?

इन दिनों कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। प्रत्याशियों की गाड़ियां दिन भर भोंपू लगाकर प्रचार करेंगी। हर मोहल्ले में चुनाव कार्यालय बनेंगे। वहां से भी प्रचार होगा। क्या इससे स्कूली बच्चे और मरीज परेशान नहीं होंगे ? कई बार तो एक ही चौराहे पर कई प्रचार कार्यालय बन जाते हैं। उनके शोर से आसपास वालों का जीना मुश्किल हो जाता है। इस पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता ?

प्लास्टिक की थैलियों का चलन बंद होना ही चाहिए; पर इसके लिए बाजार में छापेमारी की बजाय शासन फैक्ट्रियां बंद कराए। अधिक प्रदूषण वाली गाड़ियों को सरकार क्रमशः बंद कर रही है; पर जो लोग चार कदम भी पैदल नहीं जा सकते, उनकी मानसिकता कैसे बदलेगी ? नदी जोड़ और बांध विरोधी ये नहीं बताते कि इसके बिना खेतों और बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी कैसे मिलेगा ? गांव की अपेक्षा शहरों में नहाने-धोने में पानी अधिक लगता है। क्या जनसंख्या और शहरीकरण रोकने का कोई उपाय है ? देश में हर दिन एक लाख नये वाहन बिक रहे हैं। यदि सड़कें चौड़ी नहीं होंगी, तो वे चलेंगे कहां; और बिना पेड़ काटे सड़क चौड़ी कैसे होगी ?

दिल्ली और निकटवर्ती लोग पंजाब और हरियाणा में पराली जलने से होने वाली धुंध से परेशान होने लगे हैं। खेती के अति मशीनीकरण का ये दुष्परिणाम होना ही है। दिल्ली में सम-विषम का प्रयोग भी चल नहीं सका। अर्थात यदि हम पर्यावरण पर समग्रता से नहीं सोचेंगे, तो फौरी उपाय बेकार हैं। इसके लिए शासन, प्रशासन और न्यायालय के साथ समाज को भी जागना पड़ेगा। देश में हजारों लोग प्रचार और प्रसिद्धि की इच्छा के बिना चुपचाप ये काम कर रहे हैं। उनका सम्मान तथा पर्यावरण नष्ट करने वालों का सामाजिक बहिष्कार हो, तब ही बात कुछ बन सकेगी।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

यह कुंभ प्रयागराज में..

प्रख्यात अंग्रेजी साहित्यकार विलियम शैक्सपियर ने कहा है कि ‘‘नाम में क्या रखा है ?’’ पर सच ये है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। इसीलिए 16 अक्तूबर, 2018 को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही भारतीय जनता पार्टी की उ.प्र. सरकार ने विश्व प्रसिद्ध संगम नगरी के उस पुराने नाम ‘प्रयागराज’ को बहाल कर दिया, जो युगों-युगों से प्रचलित था। मुगल शासक अकबर ने 1583 में इसे बदलकर इलाहाबाद किया था। 

1947 में देश के आजाद होने के बाद से ही सभी देशभक्त नागरिक प्रयागराज नाम के पुनर्जीवन की मांग कर रहे थे। लोगों को लगता था कि नेहरू परिवार का संबंध इस नगर से बहुत खास है। अतः नेहरू जी मान जाएंगे; पर वे ठहरे परम सेक्यूलर। वे खुद को नाम से हिन्दू, संस्कारों से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। इसलिए उन्होंने इसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दिया। 

इसके बाद जब-जब उ.प्र. में हिन्दुत्वप्रेमी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी, तब-तब इस मांग ने जोर पकड़ा। प्रयाग के हर कुंभ से पहले इसकी चर्चा होती थी; पर कभी प्रदेश में गठबंधन की मिली-जुली सरकार होती थी, तो कभी केन्द्र में। इसलिए निर्णय नहीं हो सका; पर अब लखनऊ और दिल्ली, दोनों जगह भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार है और 2019 में वहां विशाल कुंभ भी होने जा रहा है। अतः योगी सरकार ने निर्णय ले लिया।

पर इस निर्णय से कुछ सेक्यूलरों के पेट में दर्द होने लगा है। उन्होंने अपनी आदत के अनुसार इसका विरोध भी शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वे चुप रहे, तो न जाने प्रदेश और देश में कितने नाम बदल दिये जाएं ? कुछ लोग हिन्दू वोटों के भय से खुलकर तो विरोध नहीं कर रहे हैं; पर वे कह रहे हैं कि इस बारे में कोई सर्वसम्मत नीति बननी चाहिए। अन्यथा बड़ी अराजकता फैल जाएगी। 

असल में नाम परिवर्तन के पीछे राजनीति के साथ ही सामाजिक कारण भी हैं। जब भारत में विदेशी व विधर्मी हमलावर आये, तो उन्होंने कई स्थानों के नाम बदल दिये। इसका पहला उद्देश्य तो हिन्दुओं को अपमानित करना था। प्रयाग और अयोध्या को इलाहबाद और फैजाबाद करना इसी मानसिकता का परिचायक है। कोशिश तो उन्होंने हरिद्वार, मथुरा, काशी और दिल्ली को बदलने की भी की; पर उनकी वह चाल विफल हो गयी। 

नाम बदलने का दूसरा उद्देश्य खुद को या अपने किसी पूर्वज को महिमामंडित करना था। इसके लिए भी उन्होंने हजारों गांवों के नाम बदल दिये। जिस गांव या शहर के साथ ‘बाद’ लगा मिले, उसकी यही कहानी है। अकबराबाद, औरंगाबाद, हैदराबाद, सिकंदराबाद, गाजियाबाद, तुगलकाबाद, रोशनाबाद, अहमदाबाद..जैसे हजारों नाम हैं। बाद शब्द आबाद का छोटा रूप है। जैसे फैजाबाद अर्थात फैज द्वारा आबाद; पर सच ये है कि ये स्थान उन्होंने आबाद नहीं बरबाद किये हैं। इसलिए ‘फैजाबाद’ को ‘फैज बरबाद’ कहना अधिक समीचीन है। 

वामपंथियों ने आजादी के बाद कांग्रेस शासन की सहायता से छद्म बुद्धिजीवियों की एक बड़ी फौज खड़ी की है। वे कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने सैकड़ों साल तक देश में राज किया है। अतः उन्होंने नये गांव और नगर बसाये ही होंगे। उनके नाम पर प्रचलित महल, मकबरे और मस्जिदों के लिए भी यही तर्क दिया जाता है; पर वे यह नहीं बताते कि यदि अधिकांश ऐतिहासिक स्मारक मुस्लिम शासकों ने बनाये हैं, तो उनसे पहले के हिन्दू शासक क्या जंगल में रहते थे ? यदि नहीं, तो उनके महल और मंदिर कहां हैं ?

सच ये है कि ये इस्लामी हमलावर जीवन भर हिन्दू राजाओं से या फिर आपस में ही लड़ते-मरते रहे। उन्हें नया निर्माण कराने की फुरसत ही नहीं थी ? उनके साथ लड़ाकू लोग आये थे, वास्तुकार और कारीगर नहीं। अतः उन्होंने तलवार के बल पर पुराने नगर और गांवों के नाम ही बदल दिये। महल और मंदिरों में थोड़ा फेरबदल कर, उन पर आयतें आदि खुदवा कर उन्हें इस्लामी भवन घोषित कर दिया। अयोध्या से लेकर मथुरा, काशी, आगरा और दिल्ली तक की यही कहानी है। प्रसिद्ध इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तकों में इस बारे में विस्तार से लिखा है।

इस्लामी शासन के बाद जब अंग्रेज आये, तो कई शब्द वे ठीक से बोल नहीं पाते थे। अतः शासक होने के कारण उनके उच्चारण के अनुरूप मैड्रास, कैलकटा, बंबई, डेली.. आदि नाम चल पड़े। उनके जाने के बाद कई नाम ठीक किये गये हैं। अब इन्हें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली कहते हैं। कानपुर (Cawnpore), लखनऊ (Lucknow), बनारस (Benares) आदि कई नामों की वर्तनी (स्पैलिंग) भी अंग्रेजों ने बिगाड़ दी। 

कांग्रेस राज में नामों की यह धारा एक परिवार की बपौती बन गयी। अतः हर ओर गांधी, नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया नगरों की बहार आ गयी। अब तो कांग्रेस का सितारा ही डूब रहा है; अन्यथा राहुल, प्रियंका, राबर्ट और उनके बच्चों की भी लाटरी लग जाती।

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बदले गये नामों को ठीक करने में ही शासन ने रुचि क्यों दिखायी ? इसके पीछे का राजनीतिक कारण बिल्कुल साफ है। भारत में ईसाई वोटों की संख्या बहुत कम है। पूर्वोत्तर भारत के अलावा वह कहीं सघन रूप से रहते भी नहीं है। अतः उनकी नाराजगी का सत्ता के फेरबदल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; पर मुस्लिम वोटों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए सच जानते हुए भी राजनीतिक दल मुस्लिम शासकों द्वारा बदले गये नामों को नहीं छेड़ते। अब भा.ज.पा. सरकार ने ये काम शुरू किया है, तो इसके आगे बढ़ने की पूरी संभावना है।

उ.प्र. में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने ऊधमसिंह नगर, ज्योतिबाफुले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि कई नये जिले बनाये; पर लोग इन्हें यू.एस. नगर, जे.पी. नगर और जी.बी. नगर ही कहते हैं। हाथरस बनाम महामाया नगर और लखनऊ के किंग जार्ज बनाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिज के बीच तो कई बार कुश्ती हुई। अब भा.ज.पा. सरकार ने उ.प्र. में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह निर्णय ठीक है। क्योंकि 11 फरवरी, 1968 को भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी का शव वहां पर ही मिला था। फिर अब न मुगल हैं और न सराय; पर खतरा ये भी है कि यह नाम समय के प्रवाह में कहीं डी.डी.जंक्शन न हो जाए।

कई नामों के पीछे इतिहास और भाषायी गौरव भी जुड़ा होता है। अतः वे स्थायी रूप से लोगों के मुंह पर चढ़ जाते हैं; पर जुबान का भी एक स्वभाव है। वह कठिन की बजाय सरल शब्द अपनाती है। इसलिए भोजपाल, जाबालिपुरम् और गुरुग्राम क्रमशः भोपाल, जबलपुर और गुड़गांव हो गये। मंगलौर (मंगलुरू), बंगलौर (बंगलुरू), मैसूर (मैसुरू), बेलगांव (बेलगावि), त्रिवेन्द्रम (तिरुवनंतपुरम्), तंजौर (तंजावूर), कालीकट (कोझीकोड), गोहाटी (गुवाहाटी), इंदौर (इंदूर), कोचीन (कोच्चि), पूना (पुणे), बड़ोदा (बड़ोदरा), पणजी (पंजिम), उड़ीसा (ओडिसा), पांडिचेरी (पुड्डुचेरी) आदि की भी यही कहानी है। अब शासन भले ही इन्हें बदल दे; पर लोग पुराने और सरल नाम ही सहजता से बोलते हैं। 

अतः नगरों के नाम बदलने की नीति तो होनी ही चाहिए; पर इसमें विदेशी हमलावरों द्वारा परिवर्तित नाम हटाकर ऐतिहासिक नाम फिर प्रचलित करने पर समझौता न हो। इससे लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास का पुनर्स्मरण भी होगा। प्राचीन साहित्य और लोककथाओं में ये नाम उपलब्ध हैं। अंतरजाल (इंटरनेट) भी इसमें सहायक हो सकता है; पर सहज बोलचाल के कारण प्रचलित हो गये नाम बदलने की जिद ठीक नहीं है। अर्थात यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

विजयादशमी का संदेश

हर बार की तरह इस बार भी विजयादशमी का पावन पर्व फिर से आ गया है। अब नौ दिन तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होगी। रात में दुर्गा जागरण होंगे और अष्टमी या नवमी वाले दिन लोग कन्याओं का पूजन करेंगे। सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत में जय काली कलकत्ते वाली का जोर रहेगा। उत्तर भारत में नौ दिन तक रामलीलाओं का गांव-गांव और शहर-शहर में मंचन होगा और फिर आश्विन शुक्ल दशमी को बुराई और आसुरी शक्ति के प्रतीक रावण का पुतला फूंक दिया जायेगा। लोग दैवी शक्ति के स्वरूप भगवान राम की जय-जयकार कर अपने घरों को लौट जाएंगे।

लेकिन क्या विजयादशमी का केवल इतना ही प्रतीकात्मक महत्व है। क्या विजयादशमी पर केवल कुछ कर्मकांड पूरे कर लेना ही पर्याप्त है। सच तो यह है किसी भी पर्व या उत्सव को प्रचलित हुए जब काफी लम्बा समय बीत जाता है, तो उसमें कुछ जड़ता और कमियां आ जाती हैं। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि इन कमियों को दूर करने के लिए समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का भी प्रादुर्भाव होता रहा है, जो समाज के सम्मुख अपना आदर्श प्रस्तुत कर इस जड़ता को तोड़ते हैं और समाज को सही दिशा दिखाते हैं। 

विजयादशमी के साथ अनेक ऐतिहासिक प्रसंग प्रचलित हैं। सबसे पुराना प्रसंग मां दुर्गा के साथ जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि जब सारे देवता शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज और महिषासुर जैसे राक्षसों से पराजित हो गये, तो उन्होंने मिलकर उनका सामना करने का विचार किया; पर आज की तरह वहां भी पुरुषोचित अहम् तथा नेतृत्व का विवाद खड़ा हो गया। ऐसे में सब देवताओं ने एक नारी के नेतृत्व में एकजुट होकर लड़ना स्वीकार किया। इतना ही नहीं, तो उन्होंने अपने-अपने शस्त्र अर्थात अपनी सेनाएं भी उनको समर्पित कर दीं। मां दुर्गा ने सेनाओं का पुनर्गठन किया और फिर उन राक्षसों का वध कर समाज को उनके आतंक से मुक्ति दिलायी थी। 

मां दुर्गा के दस हाथ और उनमें धारण किये गये अलग-अलग शस्त्रों का यही अर्थ है। स्पष्ट ही यह कथा हमें संदेश देती है कि यदि आसुरी शक्तियों से संघर्ष करना है, तो अपना अहम् समाप्त कर किसी एक के नेतृत्व में अनुशासनपूर्वक सामूहिक रूप से संघर्ष करना होगा, तभी सफलता मिल सकती है, अन्यथा नहीं।

दूसरी घटना भगवान राम से संबंधित है। लंका के अनाचारी शासक रावण ने जब उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया, तो उन्होंने समाज के निर्धन, पिछड़े और वंचित वर्ग को संगठित कर रावण पर हल्ला बोल दिया। वन, पर्वत और गिरी-कंदराओं में रहने वाले वनवासी रावण और उसके साथियों के अत्याचारों से आतंकित तो थे; पर उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे उसका मुकाबला कर पाते। श्रीराम ने उनमें ऐसा साहस जगाया। उन्हें अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण और उनका संचालन सिखाया। और फिर उनके बलबूते पर रावण जैसे शक्तिशाली  राजा को उसके घर में जाकर पराजित किया। आज की रामलीलाओं और चित्रों में भले ही वानर, रीछ, गृद्ध आदि का अतिरंजित वर्णन हो; पर वे सब हमारे जैसे सामान्य लोग ही थे।

यह दोनों प्रसंग बताते हैं कि जब सब लोग अपने अहम् एवं पूर्वग्रह छोड़कर संगठन की छत्रछाया में आते हैं, तो उससे आश्चर्यजनक परिणाम निकलते हैं। आधुनिक युग में इसी विचार को कार्यरूप देने के लिए 1925 की विजयादशमी पर नागपुर में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की थी। इसी प्रकार नारियों को संगठित करने हेतु श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने 1936 में इसी दिन वर्धा में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना की थी।

पर समय के साथ इस पर्व के मूल उद्देश्य पर कुछ धूल आ गयी, जिसे साफ करने की आवश्यकता है। हिन्दू समाज में जहां व्यक्तिगत रूप से पालन करने के लिए तरह-तरह के व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा आदि का प्रावधान है, वहीं अधिकांश पर्व सामूहिक रूप से मनाये जाने वाले हैं। हर पर्व के साथ कुछ न कुछ सामाजिक संदेश भी जुड़ा है। नवरात्र में किये जाने वाले उपवास के पीछे शुद्ध वैज्ञानिक कारण है। इससे गर्मी और सर्दी के इस संधिकाल में पेट की मशीनरी को कुछ विश्राम देने से अनेक आतंरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है; पर कुछ लोग व्रत के नाम पर बिना अन्न की महंगी और गरिष्ठ वस्तुएं खाकर पेट ही खराब कर लेते हैं। यह शारीरिक रूप से तो अनुचित है ही, भारत जैसे निर्धन देश में नैतिक दृष्टि से भी अपराध है।

इसी प्रकार नवरात्र में मां दुर्गा के जागरण के नाम पर इन दिनों जो होता है, वह बहुत ही घिनौना है। सारी रात बड़े-बड़े ध्वनिवर्द्धक लगाकर पूरे मौहल्ले या गांव की नींद खराब करने को धर्म कैसे कहा जा सकता है ? गंदे फिल्मी गानों की तर्ज पर बनाये गये भजनों से किसी के मन में भक्तिभाव नहीं जागता। जागरण मंडली में गाने-बजाने वालों का स्वयं का चरित्र कैसा होता है, नवरात्र के दौरान भी क्या वे दुर्व्यसनों से दूर रहते हैं, इसे कोई नहीं देखता। शादी-विवाह में संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले युवक और युवतियां ही इन दिनों भजन गायक बन जाते हैं। उनका उद्देश्य भक्तिभाव जगाना नहीं, पैसा कमाना होता है।

वस्तुतः दुर्गा पूजा और विजयादशमी शक्ति की सामूहिक आराधना के पर्व हैं। मां दुर्गा के हाथ में नौ प्रकार के शस्त्र हैं। नवरात्र का अर्थ है कि गांव या मौहल्ले के युवक मां दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सम्मुख किसी विशेषज्ञ के निर्देशानुसार शस्त्र-संचालन का अभ्यास करें। इस प्रकार नौ दिन तक नौ तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण प्राप्त कर विजयादशमी के दिन पूरे गांव और नगर के सामने उनका सामूहिक प्रदर्शन करें। महाराष्ट्र में शिवाजी के गुरु समर्थ स्वामी रामदास द्वारा स्थापित अखाड़ों में यही सब होता था। इनके बल पर ही शिवाजी ने औरंगजेब जैसे विदेशी और विधर्मी को धूल चटाई थी। 

उस समय खड्ग, शूल, गदा, त्रिशूल, चक्र, परिध, धनुष-बाण, कृपाण आदि प्रचलित थे, इसलिए मां दुर्गा के हाथ में वही परम्परागत शस्त्र दिखायी देते हैं; पर आजकल जो आधुनिक शस्त्रास्त्र व्यवहार में आ गये हैं, उनका भी अभ्यास करने की आवश्यकता है। शस्त्रों की पूजा करने का यही व्यावहारिक अर्थ है; पर दुर्भाग्य से जातिवाद की प्रबलता के कारण इसे क्षत्रियों का पर्व बताकर शेष समाज को इससे काटने का प्रयास हो रहा है। इसी प्रकार कुछ राजनेता और दल भगवान राम की विजय को उत्तर भारत की दक्षिण पर विजय बताकर इसे देश बांटने का उपकरण बनाना चाहते हैं।

नवरात्रों में अष्टमी या नवमी पर होने वाले कन्यापूजन का भी बड़ा भारी सामाजिक महत्व है। आजकल इसका स्वरूप भी व्यक्तिगत हो गया है। हर व्यक्ति अपने आसपास या रिश्तेदारों की कन्याओं को अपने घर बुलाकर उनके पूजन की औपचारिकता पूरी कर लेता है, जबकि यह भी समाजोत्सव है। गांव की सब कुमारी कन्याओं को किसी एक स्थान पर एकत्रकर गांव के प्रत्येक युवक एवं गृहस्थ को उसके पांव पूजने चाहिए। वर्ष में एक बार होने वाला यह कार्यक्रम जीवन भर के लिए मन पर अमिट संस्कार छोड़ता है। जिसने भी कन्याओं के पांव पूजे हैं, वह आजीवन किसी लड़की से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। यौन अपराधों को रोकने में केवल यही एक पर्व देश के सब कानूनों से भारी है। सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति माता का भाव जगाने वाले इस पर्व को सब एक साथ मनायें, यही अपेक्षित है।

इन दिनों दूरदर्शन के बढ़ते प्रभाव के कारण क्षेत्र या प्रान्त विशेष में होने वाले उत्सव पूरे भारत में होने लगे हैं। इनमें पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित दुर्गा पूजा, उड़ीसा की जगन्नाथ रथ यात्रा, महाराष्ट्र की गणेश पूजा, पंजाब के देवी जागरण, उत्तर भारत की रामलीला आदि उल्लेखनीय हैं। विजयादशमी पर दुर्गा पूजा एवं फिर उन प्रतिमाओं का विसर्जन निकटवर्ती जल में करते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज से सौ साल पूर्व भारत की जनसंख्या बीस करोड़ ही थी और नदी, ताल आदि में भरपूर पानी रहता था। आज जनसंख्या सवा अरब से ऊपर है। नदियों में जल का स्तर कम हो गया है और तालाबों की भूमि पर बहुमंजिले भवन खड़े हो गये हैं। ऐसे में जो जल शेष है, वह प्रदूषित न हो, इस पर विचार अवश्य करना चाहिए।

इसलिए प्रतिमा बनाते समय उसमें प्राकृतिक मिट्टी, रंग तथा सज्जा सामग्री का ही प्रयोग करें। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग आदि का प्रयोग उचित नहीं है। विसर्जन से पूर्व ऐसी अप्राकृतिक सामग्री को उतार लेने में कोई बुराई नहीं है। विसर्जन के कई दिन बाद तक घाट स्नान योग्य नहीं रहते। उस जल की निवासी मछलियां इस दौरान बड़ी संख्या में मर जाती हैं। अतः पूजा समितियों को इनकी सफाई की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

कुछ अतिवादी सोच के शिकार लोग मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने की मांग करते हैं। वे भूल जाते हैं कि मूर्ति-निर्माण और विसर्जन हिन्दू चिंतन का अंग है, जो यह दर्शाता है कि मूर्ति की तरह ही यह शरीर भी मिट्टी से बना है, जिसे एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है। विसर्जन के समय निकलने वाली शोभायात्रा से अन्य नागरिकों को परेशानी न हो, यह भी आयोजकों को ध्यान रखना चाहिए। इस दिशा में कानून कुछ खास नहीं कर सकता; अतः हिन्दू धर्माचार्यों को आगे आकर लोगों को सही दिशा दिखानी होगी। वैसे लोग स्वयं ही जाग्रत हो रहे हैं; पर इसकी गति और तेज होनी चाहिए।

यदि विजयादशमी से जुड़े इन प्रसंगों को सही अर्थ में समझकर हम व्यवहार करें, तो यह पर्व न केवल हमें व्यक्तिगत रूप से अपितु सामाजिक रूप से भी जागरूक करने में सक्षम है। रावण, कंुभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन करते समय अपनी निजी और सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और कालबाह्य हो चुकी रूढ़ियों को भी जलाना होगा। आज विदेशी और विधर्मी शक्तियां हिन्दुस्थान को हड़पने के लिए जैसे षड्यन्त्र कर रही हैं, उनका सामना करने का सही संदेश विजयादशमी का पर्व देता है। आवश्यकता केवल इसे ठीक से समझने की ही है।

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

क्या आप भी पचास के हो रहे हैं ?


पिछले दिनों हमारे पड़ोस में श्रीरामकथा का आयोजन था। कथावाचक घर-गृहस्थी वाले अच्छे विद्वान और संत पुरुष थे। प्रतिदिन एक घंटा वे अपने आवास पर लोगों से मिलते थे। उसमें लोग अपनी निजी जिज्ञासा, समस्या आदि की चर्चा करते थे। गुप्ता जी अब 55 साल के हो गये हैं। अवकाश प्राप्ति में कुछ ही वर्ष बचे हैं। उन्होंने इसके बाद की अपनी चिन्ताओं के बारे में कुछ जिज्ञासा रखी। इसका उत्तर संत जी ने जो दिया, उसका सार संक्षेप निम्न है। यह केवल गुप्ता जी ही नहीं, बाकी सबके लिए भी उपयोगी है।

जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती है, लोगों का आपकी ओर देखने का दृष्टिकोण बदलने लगता है। आपके सफेद होते जा रहे बाल, बढ़ते जा रहे पेट, चाल में आते धीमेपन और माथे पर बढ़ती जा रही लकीरों को देखकर लोग समझ जाते हैं कि आप भी 50 के आस-पास पहुंचने लगे हैं। इस आयु में सामान्यतः हर व्यक्ति अपनी बेटी की शादी, बेटे के काम-धंधे आदि के बारे में चिंतित होता है। यह ठीक भी है। क्योंकि इस दायित्व को ठीक से निबटाये बिना आप अगले सफर की ओर सफलतापूर्वक नहीं चल सकते।

50 का होते-होते व्यक्ति को और एक बात की ओर ध्यान देना चाहिए; और वह यह कि वह 60 साल का हो जाने के बाद क्या करेगा ? अर्थात अपने जीवन के तीसरेपन में, जब वह नौकरी से सेवानिवृत हो जाएगा; यदि वह व्यवसायी है, तो जब उसके लड़के-बच्चे काम संभाल लेंगे। यदि आप महिला हैं, तो जब आपकी पुत्रवधू घर पर आ जाएगी.. आदि। निःसंदेह अगले कदम का आधार पिछला कदम ही होता है। इसलिए यदि आप 50 पार कर रहे हैं, तो कुछ बातों की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।

अवकाशप्राप्ति के बाद का जीवन सुख-चैन से व्यतीत करने का सबसे अच्छा मार्ग है स्वयं को किसी सामाजिक, धार्मिक सेवाकार्य में व्यस्त रखना। इससे आपका घर, कारोबार, स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा सब ठीक बने रहेंगे; पर इसके लिए 50 वर्ष के होते ही कुछ तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण अपने मन की तैयारी है। विचार करें कि हमें अवकाशप्राप्ति के बाद किस संस्था से जुड़ना है। यदि ऐसी कोई संस्था आपके आसपास है, तो बहुत अच्छा; अन्यथा आप अपने समविचारी चार-छह मित्रों के साथ ऐसी संस्था बना सकते हैं। अच्छा तो यह रहेगा कि अपने परिचय की संस्थाओं में कुछ समय लगाना शुरू करें, वहां की रीति-नीति और कार्यशैली को समझें। इनमें से जो पति-पत्नी दोनों के मन, बुद्धि और स्वभाव के अनुकूल हो, उसका चयनकर अवकाशप्राप्ति के बाद उसमें ही पूरा समय लगायें।

यह जरूरी नहीं कि वह संस्था आपके घर के आसपास या नगर में ही हो। भारत में हजारों तीर्थ और धर्मस्थल हैं, जहां अनेक प्रकार की धार्मिक और सेवा संबंधी गतिविधियां चलती हैं। इनमें से भी किसी के साथ आप सम्बद्ध हो सकते हैं। 50 से 60 वर्ष के बीच का समय इसमें लगाएं। चयनित संस्था के बारे में पति-पत्नी दोनों की सहमति आवश्यक है। अपनी आवष्यकताएं सीमितकर स्वयं पर कम से कम खर्च करंें। पति-पत्नी दोनों मिलकर विचार करें और फिर निष्चयपूर्वक एक ही कमरे में, पर अलग-अलग सोने का नियम बनाएं।

यहां तक पहुंचते-पहुंचते शरीर कुछ शिथिल होने लगता है; पर आसन-व्यायाम और ध्यान आदि से शरीर को अधिकाधिक स्वस्थ बनाये रख सकते हैं। अब अपने आहार-विहार में भी कुछ परिवर्तन कर लेना चाहिए। अन्न का प्रयोग तीन के बदले दो बार तथा सब्जी, सलाद, फल, दूध आदि का प्रयोग अधिक करना ठीक रहेगा। मसालेदार भोजन, सिगरेट या शराब जैसी कोई आदत है, तो उसे अब छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। प्रातः या सायंकाल का तीन-चार कि.मी. का भ्रमण सदा ही ठीक रहता है; पर अब तो इसे दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना लें। किसी बीमारी की उपेक्षा न करें; पर शरीर में हो रहे आयुगत परिवर्तनों से परेशान भी न हों। स्वयं को अपने अगले कार्य और जीवन के लिए तैयार करना प्रारम्भ कर दें।

अवकाशप्राप्ति के बाद पति-पत्नी दोनों को सामान्य जीवनयापन में कठिनाई न हो, इसके लिए समुचित धन का प्रबन्ध भी अवश्य कर लेना चाहिए। निजी संस्थाओं के बदले सरकारी बैंक पर ही भरोसा करना ठीक है। केवल अपने खाने-पीने के लिए ही नहीं, तो बेटी के घर आने पर, किसी शादी-विवाह में जाने पर लेन-देन के जो दायित्व निभाकर हर दम्पति को प्रसन्नता होती है, उसकी भी व्यवस्था कर लें। यद्यपि भविष्य क्या होगा, कोई नहीं जानता, फिर भी किसी आकस्मिक संकट का विचार भी कर लेना चाहिए।

यदि आप अवकाशप्राप्ति के बाद भी अपने बच्चों के साथ ही रह रहे हैं, तो अपने लिए अपेक्षाकृत छोटे स्थान को चुन लें; जिससे बेटे, बहू और उनके बच्चों को कष्ट न हो। पुत्र और पुत्रवधू को अपनी तरह से घर चलाने दें, बार-बार टोककर घर का वातावरण अषांत न करें। घर-बाजार के अधिकांश कार्य उन्हें ही सौंप दें। भौतिक वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग उन्हें ही करने दें। उनकी इच्छा के आगे अपनी इच्छाएं त्याग दें, अपनी आवश्यकता भी उन्हीं को बताएं। निश्चय जानिए, वे प्रसन्नतापूर्वक उसे पूरा करेंगे।

अपनी चल-अचल सम्पत्ति के संबंध में किसी विश्वस्त वकील और एक-दो घनिष्ठ मित्रों से परामर्शकर उसकी लिखित वसीयत बना लें। यथासंभव बच्चों की भी उसमें सहमति लें; पर यदि कोई समस्या हो, तो भी वसीयत बनाएं अवश्य। इससे आप अनेक प्रकार के मानसिक तनाव से मुक्त रहेंगे तथा बाद में बच्चों में झगड़ा नहीं होगा।

ध्यान रहे, हर व्यक्ति को 50 ही नहीं, 60 का भी होना है। उसे आज नहीं तो कल अवकाश भी लेना ही है। यदि उसकी तैयारी ठीक से की, तो न केवल आपका, बल्कि आपके बच्चों का जीवन भी अच्छा बीतेगा। इसके साथ-साथ आपके अनुभव से देश, धर्म और समाज का भी कुछ भला अवश्य होगा। और जब परमपिता परमेश्वर का बुलावा आयेगा, तो आप संतोष के साथ वहां भी जा सकेंगे।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

फाकाकशी और मस्ती के वे दिन


यह बात अटल जी के राजनीति में आने से पहले की है। उन दिनों लखनऊ से मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य, दैनिक स्वदेश और सांयकालीन तरुण भारत भी निकलते थे। अब पांचजन्य दिल्ली से, स्वदेश मध्यप्रदेश से तथा तरुण भारत महाराष्ट्र में कई स्थानों से निकलता है। यद्यपि इन सबमें और लोग भी थे; पर मुख्य जिम्मेदारी अटल जी की ही थी। अतः वे दिन भर इसी में डूबे रहते थे।

कई बार वे दोपहर भोजन के लिए नहीं पहुंचते थे, तो प्रांत प्रचारक भाऊराव उन्हें बुलाने आ जाते थे। उनके आग्रह पर अटल जी कागजों से जूझते हुए कहते थे, ‘‘भोजन करने गया, तो अखबार नहीं निकलेगा।’’ भाऊराव एक-दो बार फिर आग्रह करते थे। लेकिन फिर वही उत्तर। अतः उस दिन अटल जी और भाऊराव दोनों ही भूखे रह जाते थे।

उन दिनों संघ की तथा इन पत्र-पत्रिकाओं की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी। दरी पर रखे कुछ लोहे के ट्रंकों में सब सामग्री रहती थी। उन पर कागज रखकर ही सम्पादकी, प्रूफ रीडिंग आदि होती थी। प्रचारक होने के नाते अटल जी बिना किसी वेतन के काम करते थे। राष्ट्रधर्म के कोषाध्यक्ष से उन्होंने एक बार कहा, ‘‘पांच रुपये दीजिए। नयी चप्पल लेनी है।’’ स्वभाव से अति कठोर कोषाध्यक्ष जी उस दिन अच्छे मूड में थे। उन्होंने पैसे दे दिये।

अटल जी ने वचनेश जी के साथ बाजार में पहले दो भुट्टे खाये और फिर लस्सी पी। इसमें काफी पैसा खर्च हो गया। वचनेश जी ने पूछा, ‘‘अब चप्पल कैसे लोगे ?’’ अटल जी ने मस्ती में जवाब दिया, ‘‘अभी इतनी खराब नहीं हुई है। मोची से ठीक करा लेते हैं, तो कुछ दिन और चल जाएगी।’’ अर्थात फाकाकशी के दौर में भी मस्ती का अभाव नहीं था। इसी के बल पर संघ और बाकी सब काम खड़े हुए।

1989 में नारायण दत्त तिवारी उ.प्र. में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के एक वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी (भैया साहब) को उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने एक लाख रु. वाला अपना सर्वोच्च भारत-भारतीसम्मान देने की घोषणा की। 14 सितम्बर हिन्दी दिवसपर कार्यक्रम होना था; पर उससे एक दिन पूर्व 13 सितम्बर को मुख्यमंत्री ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित कर दिया। राज्य के हिन्दी प्रेमियों में आक्रोश की लहर दौड़ गयी। लखनऊ निवासी भैया साहब प्रखर हिन्दी सेवी थे। उन्होंने इसके लिए अंग्रेजों की नौकरी ठुकरा दी थी। वृद्धावस्था के कारण इन दिनों वे बिस्तर पर थे। उन्होंने इस निर्णय के विरोध में भारत भारती सम्मान ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैंने अपने जीवन में एक लाख रु. कभी एक साथ नहीं देखे; पर देश विभाजक उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाना मुझे स्वीकार नहीं है। पूरे राज्य में हड़कम्प मच गया।

भैया जी राष्ट्रधर्म और पांचजन्य के नियमित लेखक रहे थे। अतः अटल जी उनका बड़ा आदर करते थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि हम जनता की ओर से भैया साहब को सम्मानित करेंगे। उनके आह्नान पर एक लाख रु. से भी अधिक धन एकत्र हो गया। फिर अटल जी ने सार्वजनिक सभा में भैया जी के पुत्र को वह राशि भेंट की तथा घर जाकर भैया जी को जनता भारत भारतीसम्मान प्रदान किया।

यह घटना 10 मई, 2003 की है। दिल्ली में पांचजन्य की ओर से संसद के बालयोगी सभागार में नचिकेता सम्मान का कार्यक्रम था। राष्ट्रधर्म में सहायक संपादक के नाते मैं भी वहां उपस्थित था मंच पर प्रधानमंत्री अटल जी भी थे। कुछ दिन पूर्व ही कुछ पत्रकारों ने षड्यंत्रपूर्वक भा.ज.पा. के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को जाल में फंसाया था। अटल जी ने पहला वाक्य कहा, ‘‘मैं आजकल पुरस्कार बांट रहा हूं और तिरस्कार बटोर रहा हूं।’’ पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया। अटल जी का चेहरा बता रहा था कि उन्हें इस घटना से कितना दुख पहुंचा है।

रात में प्रधानमंत्री निवास पर भोजन करते हुए मैंने बताया कि मैं पांचजन्य में छह लाइनों का छोटा सा कॉलम भी लिखता हूं। अटल जी ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘हां, मैं उसे पढ़ता हूं।’’ मेरे जैसे छोटे लेखक को इतनी तारीफ ही काफी थी। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अटल जी, बातें और यादें


बात संभवतः सितम्बर 1983-84 की है। मैं उन दिनों बरेली में प्रचारक था। पश्चिमी उ.प्र. के सभी जिला प्रचारकों की एक बैठक मथुरा में हुई। स्व. दीनदयाल उपाध्याय का पैतृक गांव नगला चंद्रभान मथुरा जिले में ही है। उनके निधन के बाद वहां उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष मेला होता है। अनेक तरह के सेवा और ग्राम्य विकास के काम भी चल रहे हैं। उनकी पैतृक झोंपड़ी को संरक्षित करते हुए एक स्मृति भवन बनाया गया है। उसका संचालन जो समिति करती है, उन दिनों उसके अध्यक्ष अटल जी ही थे।

बैठक के अंतिम दिन उन कार्यों को देखने और समझने के लिए सभी जिला प्रचारक वहां गये थे। उस दिन समिति की बैठक भी थी। अतः अटल जी भी आये हुए थे। उनके साथ सभी प्रचारकों की गपशप और प्रश्नोत्तर हुए। उन दिनों पंजाब में आतंक का बोलबाला था। उस पर लिखी अपनी कविता ‘‘दूध में दरार पड़ गयी, खून क्यों सफेद हो गया, भेद में अभेद खो गया...’’ भी अटल जी ने सुनायी। भाऊराव भी वहां उपस्थित थे। काफी अनौपचारिक वातावरण था।

इसके बाद सबने साथ-साथ भोजन किया। ब्रज की प्रसिद्ध दाल, बाटी, चूरमा आदि बना था। गांव के भी कई लोग वहां थे। अटल जी सबसे बड़ी सहजता से मिल रहे थे। एक सज्जन के साथ एक छोटा बालक भी था। अटल जी ने उससे नाम पूछा। उसने नाम बताकर कहा - राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, शिशु मोर्चा। अटल जी ने पूछा, ‘‘तुम अध्यक्ष हो, तो तुम्हारे बाकी साथी कहां हैं ?’’ उसे जो सिखाकर लाया गया था, उसमें ये प्रश्न शामिल नहीं था। अतः वह बालसुलभ सहजता से बोला, ‘‘मोय का पतो।’’ इस पर अटल जी और बाकी सब लोग खूब हंसे।

अटल जी राष्ट्रधर्मके प्रथम सम्पादक रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री रहते हुए वे राष्ट्रधर्म कार्यालय में आये भी थे; पर प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे आयें, ऐसी हम सबकी इच्छा थी। लखनऊ के सांसद होने के नाते वे प्रायः लखनऊ आते भी थे। एक बार राजभवन में उनसे मिलकर हम लोगों ने बड़ा आग्रह किया। दबाव बनाने के लिए हम श्री वचनेश त्रिपाठी को भी साथ ले गये थे। वचनेश जी उनसे बड़े थे। अतः वे उनका बहुत आदर करते थे और उनकी बात टालते नहीं थे। कुछ देर तो वे चुप रहे, फिर बोले, ‘‘भाई मेरे आने से पूरे मोहल्ले वाले परेशान हो जाएंगे।’’ हमने उन्हें राष्ट्रधर्म का ताजा अंक, लोकहित प्रकाशन की कुछ पुस्तकें भेंट की और लौट आये।

एक बार पता लगा कि उनका कार्यक्रम बन गया है। सप्ताह भर पहले से कई तरह के सुरक्षाकर्मी राष्ट्रधर्म कार्यालय में आने-जाने लगे। वहां और आसपास रहने वालों की सूचियां बनने लगीं। सड़कें साफ होने लगीं। एक दिन दिल्ली से सीधे बातचीत के लिए एक हॉटलाइन फोनभी लग गया। हम सब बड़े उत्साहित थे; पर दो दिन पूर्व फिर कार्यक्रम निरस्त हो गया। पता लगा कि प्रधानमंत्री के विशेष सुरक्षा दस्ते ने इतनी पतली गली में आने की अनुमति नहीं दी। पश्चिमी उ.प्र. में एक कहावत है, ‘‘काणी के ब्याह को सौ जोक्खो..।’’ यहां भी ऐसा ही हुआ।

प्रधानमंत्री रहते हुए वे लखनऊ में राष्ट्रधर्म के किसी विशेषांक का लोकार्पण करें, हमारी यह इच्छा भी अधूरी ही रही। लखनऊ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन सर्वेसर्वा तैयार ही नहीं होते थे, और उनकी सहमति के बिना अटल जी का कार्यक्रम नहीं बनता था। जैसे-तैसे एक बार यह तय हुआ कि लखनऊ संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में ही अटल जी एक विशेषांक का लोकार्पण करें। सब तैयारी हो गयी; पर उस दिन अटल जी बीमार हो गये और दिल्ली से आये ही नहीं। क्या कहें, हमारा भाग्य ही साथ नहीं दे रहा था -

किस्मत की खूबी देखिये, टूटी कहां कमन्द
दो चार हाथ जब कि लबे बाम रह गया।।

वर्ष 2006 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रापर राष्ट्रधर्म ने एक विशेषांक निकाला। उन दिनों अटल जी प्रधानमंत्री नहीं थे। उनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रहता था। अतः उसका लोकार्पण दिल्ली में भा.ज.पा. के केन्द्रीय कार्यालय में ही हुआ। अटल जी के साथ आडवाणी जी भी मंच पर थे। उस दिन अटल जी ने लिखित भाषण पढ़ा। जिनकी वाणी पर सरस्वती विराजती हो, उन्हें लिखा हुआ भाषण पढ़ता देख हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर ध्यान में आ गया कि अब उनका स्वास्थ्य ही नहीं, स्मृति भी उतार पर है। इसके बाद तो वे सार्वजनिक जीवन से दूर ही होते गये।

भारतीय राजनीति के उस तेजस्वी नक्षत्र को मेरी श्रद्धांजलि।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दलित

दलित शब्द कब, कहां और क्यों प्रचलित हुआ, इस पर कई मत हैं। प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था के बावजूद दलित नहीं थे। कहते हैं कि भारत में इस्लामी हमलावरों ने कुछ लोगों का दलन और दमन कर उन्हें घृणित कामों में लगाया। आज भी किसी चीज को बुरी तरह तोड़ने को दलना ही कहते हैं। दाल और दलिया शब्द यहीं से बना है। 

सैकड़ों साल तक ऐसा होने पर ये लोग ‘दलित’ कहलाने लगे, जबकि ये प्रखर हिन्दू थे। इनमें से अधिकांश क्षत्रिय थे और इनके राज्य भी थे; पर फिर इनकी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शैक्षिक दशा बिगड़ती गयी और ये अलग-थलग पड़ गये। अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक इन भेदों को और बढ़ाया। आजकल सरकारी भाषा में इस वर्ग को अनुसूचित जाति कहते हैं। 

आजादी के बाद सबने सोचा था कि ये स्थिति बदलेगी; पर वोट के लालची सत्ताधीशों ने कुछ नहीं किया। अब चूंकि ये बहुत बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं, इसलिए सब दलों की इन पर निगाह है। अतः कांग्रेस वाले भा.ज.पा. को और भा.ज.पा. वाले कांग्रेस को दलित विरोधी बताते हैं। 

इन दिनों राहुल बाबा भा.ज.पा. को कोसते हुए संघ को भी उसमें लपेट लेते हैं। यद्यपि इससे उन्हीं का नुकसान हो रहा है। वो संघ को जितना गाली देंगे, संघ वाले चुनाव में उतनी ताकत से कांग्रेस का विरोध करेंगे। इसका दुष्परिणाम 2014 में वे देख ही चुके हैं। गत नौ अगस्त को भी राहुल बाबा ने एक रैली में संघ को दलित विरोधी कहा।  

संघ यद्यपि इस सामाजिक विभाजन को ठीक नहीं मानता; पर जमीनी सच तो ये है ही। इसलिए ‘जाति तोड़ो’ जैसे राजनीतिक आंदोलन चलाने की बजाय संघ इनकी आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति सुधारने का प्रयास कर रहा है। अपने गली-मोहल्ले के लोगों के सुख-दुख में सहभागी होना स्वयंसेवक का स्थायी स्वभाव है। इसीलिए विरोधी विचार वाले भी उसका आदर करते हैं। 

आपातकाल के बाद संघ का नाम और काम बढ़ने पर सेवा कार्यों को संगठित रूप दिया गया। सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस का इस पर बहुत जोर था। 1989 में संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की जन्मशती वर्ष का केन्द्रीय विचार सेवा ही था। अतः संघ की रचना में भी ‘सेवा विभाग’ शामिल कर हर राज्य में ‘सेवा भारती’ आदि संस्थाओं का गठन किया गया। 

ये संस्थाएं नगर तथा गांवों की निर्धन बस्तियों में शिक्षा, चिकित्सा तथा संस्कार के काम करती हैं। डा. हेडगेवार जन्मशती के अवसर पर ‘सेवा निधि’ एकत्र कर कार्यकर्ताओं की एक विशाल मालिका तैयार की गयी। इनके बल पर आज स्वयंसेवक डेढ़ लाख से भी अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। 

कुछ संस्थाएं ग्राम्य विकास के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। संघ के अलावा भी देश भर में हजारों संस्थाएं सच्चे मन से सेवा में संलग्न हैं। इनमें समन्वय बना रहे तथा वे एक-दूसरे के अनुभव का लाभ उठाएं, इसके लिए ‘राष्ट्रीय सेवा भारती’ का गठन हुआ है। अब हर राज्य में ‘सेवा संगम’ आयोजित किये जाते हैं। इनमें सैकड़ों संस्थाएं अपने स्टाॅल तथा प्रदर्शिनी आदि लगाती हैं। इससे छोटी संस्थाओं को भी पहचान मिलती है। हर पांचवे साल इनका राष्ट्रीय सम्मेलन भी होता है। 

अधिकांश हिन्दू मंदिर तथा धार्मिक संस्थाएं भी कुछ सेवा के काम करती हैं। इन्हें जोड़ने के लिए कई राज्यों में हिन्दू आध्यात्मिक मेले प्रारम्भ हुए हैं। सेवा निजी ही नहीं, सामाजिक साधना भी है। अतः कई संस्थाएं बनाकर स्वयंसेवक समाज की जरूरत के अनुसार काम कर रहे हैं। 

वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, भारत विकास परिषद, विद्यार्थी परिषद, दीनदयाल शोध संस्थान, भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, विवेकानंद केन्द्र आदि का इनमें विशेष योगदान है। इनके द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास से रोजगार, ग्राम एवं कृषि विकास, कुरीति निवारण, नारी उत्थान और स्वावलम्बन, गो संवर्धन जैसे हजारों प्रकल्प चलाये जा रहे हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियां इनसे विशेष रूप से लाभान्वित होती हैं।

संघ के कार्यकर्ता जिस निर्धन बस्ती में काम करते हैं, वहां अपनी राजनीतिक दुकान लगाये नेता उनका विरोध करते हैं; पर कुछ समय बाद बस्ती के लोग उन नेताओं को ही भगा देते हैं। क्योंकि सेवा के कार्य से उस बस्ती वालों का ही भला होता है। राहुल बाबा चाहे जितना चिल्लाएं; पर संघ का काम इन बस्तियों में लगातार बढ़ रहा है।