सोमवार, 7 जून 2010

हिन्दू नेताओं पर हमलों का सबक

डा0 प्रवीण तोगड़िया और श्री श्री रविशंकर की तुलना करें, तो कई समानताएं और कई असमानताएं मिलेंगी। दोनों हिन्दू हित के लिए काम कर रहे हैं। सदा मुस्कुराते रहने वाले, श्वेत वस्त्रधारी रविशंकर जी संन्यासी हैं और बंगलौर के पास अपने आश्रम को केन्द्र बनाकर काम करते हैं। पूरे विश्व में उनके करोड़ों अनुयायी हैं, जो उनकी प्रेरणा से जाति, पंथ, धर्म, मजहब और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर निर्धनों और निर्बलों की सेवा करते हैं। कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी उनके नाम की चर्चा हुई है। वे किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं। इसलिए हर दल में उनके समर्थक हैं। उनकी वाणी और व्यवहार सदा विनम्रता और सौम्यता से परिपूर्ण रहता है।

दूसरी ओर कैंसर के प्रख्यात शल्य चिकित्सक डा. तोगड़िया विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव हैं। चिकित्सा कार्य से अवकाश लेकर वे अपना पूरा समय हिन्दू संगठन और जागृति में लगा रहे हैं। कर्णावती (अमदाबाद) में उनका परिवार रहता है। वे भी किसी राजनीतिक दल से सम्बद्ध नहीं हैं; पर वे ऐसे हिंसावादी दलों के प्रखर विरोधी हैं, जिनकी निष्ठा भारत से बाहर है, जो मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण को ही अपना ध्येय समझते हैं। अतः उनके कई प्रशंसक, तो कई विरोधी भी हैं। अपनी स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध डा0 तोगड़िया हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, वामपंथी और सेक्यूलरों के बीच समान तेवर से बोलते हैं।

हां, एक ताजी समानता इन दोनों में और भी है। गत 28 मई को भाग्यनगर (हैदराबाद) में डा0 प्रवीण तोगड़िया पर हमला हुआ और 30 मई को बंगलौर में श्री रविशंकर पर।

विश्व हिन्दू परिषद सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में काम करने वाला संगठन है। उसके कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण शिविर देश और विदेश में समय-समय पर होते रहते हैं। ऐसे ही एक शिविर में भाग लेकर डा0 तोगड़िया हैदराबाद में एक कार्यकर्ता के घर रात में भोजन करने के लिए गये थे। उनका वहां कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं था। डा0 तोगड़िया एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। उन्हें फोन और ई.मेल से प्रायः धमकियां मिलती रहती हैं। इस नाते उन्हें पुलिस की सुरक्षा प्राप्त है। उनके आवागमन तथा कार्यक्रमों की सूचना पुलिस-प्रशासन को पहले से रहती है।

उस कार्यकर्ता के घर पहुंचते ही कुख्यात गुंडे सलीम जावेद के नेतृत्व में डंडे, पत्थर और तलवारें लिये लगभग 200 मुसलमानों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। वे अपना प्रिय जेहादी नारा ‘अल्ला हो अकबर’ लगा रहे थे। उनका इरादा क्या है, यह एकदम साफ दिखाई दे रहा था। वे डा0 तोगड़िया की हत्या करना चाहते थे। पुलिस बार-बार सूचना देने पर भी 45 मिनट बाद पहुंची और तब डा0 तोगड़िया बाहर निकल सके।

30 मई की शाम को बंगलौर में अपने दैनिक सत्संग से लौटते समय श्री रविशंकर पर एक व्यक्ति ने गोली चलाई। वे तो बच गये; पर उनका एक शिष्य घायल हो गया। श्री रविशंकर जी ने अपराधी को क्षमा कर उसे सत्संग में आने का निमन्त्रण दिया है। पुलिस यहां भी लीपापोती कर रही है। गृहमंत्री ने तो इसे उनके शिष्यों की ही लड़ाई बता दिया। सही बात तो पूरी जांच से ही पता लगेगी; पर तब तक उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गयी है।

इन दोनों घटनाओं में भी कुछ समानता तथा असमानता हो सकती है; पर यहां एक अन्य विषय की चर्चा करना उचित रहेगा, जिसका ऐसी घटनाओं से गहरा संबंध है।

भारत संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इसका अर्थ यह है कि शासन किसी धर्म के प्रति कोई विशेष मोह या विरोध नहीं दिखाएगा; पर आजादी के बाद से सभी सरकारों का व्यवहार देखें, तो साफ होता है कि हिन्दू संन्यासी, धर्माचार्य, तीर्थ, यात्रा, धाम, मंदिर और सामाजिक कार्यों के प्रति शासन का व्यवहार सदा उपेक्षा और विरोध का रहा है। जबकि मुसलमान और ईसाई संस्था, पादरी, मुल्ला, मजार, मस्जिद, मदरसे, कब्रिस्तान और चर्च आदि के प्रति शासन सदा उदारता दिखाता रहा है। इसके एक नहीं, हजारों उदाहरण दिये जा सकते हैं। हर नगर और गांव में ऐसे प्रकरण मिलेंगे, जिनसे यह बात पुष्ट होती है।

शासन का व्यवहार चाहे जो हो; पर इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि इस बारे में हिन्दू धर्माचार्यों का व्यवहार कैसा है; वे इस बारे में कैसी प्रतिक्रिया करते हैं; इस परिस्थिति को बदलने के लिए उनकी ओर से कितना और कैसा प्रयास होता है ? इसका उत्तर बहुत कटु है; पर उसे जानना ही होगा।

जब भारत पर विदेशी आक्रमण हुए, तब भी साधु, संन्यासी, मंदिर और समाजसेवियों की कमी नहीं थी। अपवादों को यदि छोड़ दें, तो प्रायः ये लोग इन आक्रमणों के प्रति उदासीन रहे। ‘कोउ नृप होय, हमें का हानि’ की रट लगाकर समाज के ये प्रबुद्ध लोग अपने अध्ययन और अध्यात्म में डूबे रहे। अतः देश तो पराधीन हुआ ही, इनके मठ-मंदिर भी नहीं बचे। आद्य शंकराचार्य ने दशनाम संन्यासी परम्परा इन आक्रमणों के प्रतिकार के लिए ही स्थापित की थी, जो समय के अनुसार स्वयं को न बदल पाने के कारण अब अपनी तेजस्विता खो चुकी है।

क्या इन साधु, संन्यासियों, कथावाचकों, प्रवचनकर्ताओं, महंतों आदि की दशा आज भी ऐसी नहीं है; समाज के प्रति सरोकार का अर्थ क्या केवल गोशाला, पत्रिका, आश्रम, मंदिर, छोटा या बड़ा अस्पताल चलाना मात्र है; जब देश और धर्म की अस्मिता पर ही संकट हो, तब इनका मौन क्या उचित है ?

पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं पर ध्यान दें। दीपावली की रात में कांची के पूज्य शंकराचार्य जी गिरफ्तारी, जन्माष्टमी पर स्वामी लक्ष्मणानंद की निर्मम हत्या, आसाराम बापू और मां अमृतानंदमयी पर निराधार आरोप, और अब डा0 तोगड़िया और श्री रविशंकर पर हमला। इन घटनाओं पर धर्मक्षेत्र में बड़े माने जाने वाले नामों की प्रतिक्रिया क्या है ?

देश में ऐसे सैकड़ों प्रवचनकार और कथावाचक हैं, जिन्हें सुनने देश-विदेश में हजारों लोग आते हैं। दूरदर्शन पर लगातार उनके प्रवचन चलते रहते हैं। वायुयान हो या जलयान, वे हर जगह योग और धर्म बेचते हैं। कई चैनल तो इनके बल पर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं; पर इन घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रिया क्या रही ? यहां जानबूझ कर गोरक्षा, श्री रामजन्मभूमि, रामसेतु और अमरनाथ आंदोलन की चर्चा नहीं की गयी है। क्योंकि इनके पीछे स्पष्टतः संघ और विश्व हिन्दू परिषद का नेतृत्व था; पर अन्य समय पर इन धर्माचार्यों की चुप्पी क्या संकेत करती है ?

क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि ये धर्माचार्य भी उन हिन्दू राजाओं जैसे ही हैं, जो पड़ोसी पर हमले को उसकी निजी समस्या मान कर चुप रहते थे। क्या ये उन हिन्दू सेठों की तरह नहीं हैं, जो माल बेचते समय यह नहीं सोचते थे कि यह भारतीय सेना के लिए जा रहा है या विदेशी सेना के लिए ? क्या अधिकांश धर्माचार्य अपने आश्रम, मठ, मंदिर, कथा और भक्तों तक सीमित होकर नहीं रह गये हैं ? क्या उनकी उदासीनता ‘कोउ नृप होय हमें का हानि’ जैसी नहीं है ?

लोकसभा चुनाव वाले दिन मुंबई से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘हिन्दू व१यस’ ने देश के 100 बड़े धर्माचार्यों को फोन कर पूछा कि क्या आपने वोट दिया ? केवल स्वामी रामदेव का उत्तर ‘हां’ में था। बाकी सबने इस छोटे काम के लिए कष्ट करना उचित नहीं समझा। यह आंकड़ा प्रकाशित कर पत्रिका के सम्पादक ने कहा कि यदि ये धर्माचार्य देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति इतने उदासीन हैं, तो इन्हें अपनी समस्याओं के लिए चिल्ल-पौं करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि इनके या इनके अनुयायियों के वोट से सरकार बनती और बिगड़ती नहीं है, तो शासन इनकी चिन्ता क्यों करे ?

प्रश्न केवल डा0 तोगड़िया या श्री रविशंकर का नहीं है। यदि अपना अस्तित्व बचाना है, तो आक्रमण चाहे किसी भी प्रकार का और किसी पर भी हो, धर्माचार्यों को उदासीनता त्यागनी होगी। इनका वैभव हिन्दू भक्तों के बल पर ही है। अतः उन्हें हर उस समस्या पर मुखर होना होगा, जिससे हिन्दू का अहित होता है। उन्हें अपने भक्तों को भी इस हेतु प्रेरित करना होगा। तटस्थता और सेक्यूलरवाद छोड़कर लाठी, गोली और जेल के लिए तैयार रहना होगा। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के शब्दों में -

समर शेष है नहीं पाप का पापी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था - तभी और केवल तभी तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब हर निर्धन और निर्बल हिन्दू की पीड़ा तुम्हें अपनी निजी पीड़ा लगे। पैर में कांटा लगने पर जैसे हाथ उसे निकालने को तत्पर होता है, जब तक वैसी ही संवेदना तुम्हारे मन में हर हिन्दू के प्रति नहीं होगी, तब तक तुम्हें स्वयं को हिन्दू कहने का अधिकार नहीं है।

कहते हैं कि बिल्ली के सामने आने पर कबूतर अपनी आंखें बंद कर लेता है; पर इससे उसकी जान नहीं बचती। हिन्दू हित के लिए काम करने वाला चाहे संन्यासी हो या गृहस्थ, किसी संस्था का हो या दल का; उस पर हुए हमले को जब तक धर्माचार्य अपने ऊपर निजी हमला नहीं मानेंगे, तब तक ये बढ़ते ही जाएंगे। आज हमला डा0 तोगड़िया या रविशंकर जी पर हुआ है, तो कल उन पर भी हो सकता है। यदि आम हिन्दू की तरह वे भी खाने-कमाने में ही लगे रहेंगे, तो बकरा हो या बकरे की अम्मा, नंबर तो सबका आना ही है।

अपने एक अशिष्ट भक्त की इस ‘छोटा मुंह, बड़ी बात’ पर क्या पूज्य धर्माचार्य ध्यान देंगे ?

पीछे हटेगा इश्क किसी....

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी आतंकवाद के सामने हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा कुछ कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार बेरोजगार दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।

ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक - किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो - यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर दिग्विजय सिंह अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल आदि से जोड़ रहे हैं। इसके लिए उन्होंने तथा उनकी सेक्यूलर मंडली ने ‘हिन्दू आतंकवाद’ नामक शब्द खोजा है। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैल रहे इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। और इस समय कांग्रेस का सबसे प्रमुख एजेंडा यही है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र, सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।

सच तो यह है कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता। आतंकवाद का हिन्दुओं के संस्कार और व्यवहार से कोई तालमेल नहीं है। वैदिक, रामायण या महाभारत काल में ऐसे लोगों को असुर या राक्षस कहते थे। वे निरपराध लोगों को मारते थे, उन्हें गुलाम बनाते थे। इसे ही साहित्य की भाषा में कह दिया गया कि वे लोगों को खा लेते थे; पर वर्तमान आतंकवादी उनसे भी बढ़कर हैं। ये विधर्मियों को ही नहीं, स्वधर्मियों और स्वयं को भी मार देते हैं। आत्मघाती हमले लिट्टे और प्रभाकरण की देन हैं। प्रभाकरण ईसाई था, यह सबको पता है। इन दिनों हो रहे अधिकांश हमले आत्मघाती हैं, जिनमें हर धर्म, वर्ग और आयु के लोग मर रहे हैं। स्पष्ट है कि यह आतंक उस राक्षसी आतंक से भिन्न है।

वस्तुतः हिन्दू चिंतन में आतंक नाम की चीज ही नहीं है। वहां तो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना और भोजन से पूर्व गाय, कुत्ते और कौए के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है। ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र को तो शासन ने भी अपना लिया है। अपनी रोटी खाना प्रकृति, दूसरे की रोटी खाना विकृति और अपनी रोटी दूसरे को खिला देना संस्कृति है। यह संस्कृति हर हिन्दू के स्वभाव में है। ऐसे लोग आतंकवादी नहीं हो सकते; पर मुसलमान वोटों के लिए एक-दो दुर्घटनाओं के बाद कुछ सिरफिरों को पकड़कर उसे हिन्दू आतंकवाद नाम दिया जा रहा है। यह ब्रिटिश सरकार की ‘इम्पीरियल पुलिस’ जैसा व्यवहार है, जिसमें कहीं भी झगड़ा या दंगा होने पर दोनों ओर के लोगों को पकड़ लिया जाता था।

दिग्विजय सिंह संघ या विश्व हिन्दू परिषद की कार्यप्रणाली को न समझते हों, यह असभंव है। वे लश्कर, सिमी या हजारों नामों से काम करने वाले इन आतंकी गिरोहों को न जानते हों, यह भी असंभव है; पर आखों पर जब काला चश्मा लगा हो, तो फिर सब काला दिखेगा ही।

संघ को समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। देश भर में हर दिन सुबह-शाम संघ की लगभग 50,000 शाखाएं सार्वजनिक स्थानों पर लगती हैं। इनमें से किसी में भी जाकर या उसे देखकर संघ को समझ सकते हैं। शाखा में प्रारम्भ के 40 मिनट शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। बुजुर्ग लोग आसन करते हैं, तो नवयुवक और बालक खेल व व्यायाम। इसके बाद वे कोई देशभक्ति पूर्ण गीत बोलते हैं। किसी महामानव के जीवन का कोई प्रसंग स्मरण करते हैं और फिर भगवा ध्वज के सामने पंक्तियों में खड़े होकर भारत माता की वंदना के साथ एक घंटे की शाखा सम्पन्न हो जाती है।

मई-जून मास में देश भर में संघ के एक सप्ताह से 30 दिन तक के प्रशिक्षण वर्ग होते हैं। प्रत्येक में 100 से लेकर 1,000 तक शिक्षार्थी भाग लेते हैं। इन्हें प्राथमिक शिक्षा वर्ग तथा संघ शिक्षा वर्ग कहते हैं। इनमें औसत 50,000 युवक प्रतिवर्ष सहभागी होते हैं। इनके समापन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जनता तथा पत्रकार आते हैं। प्रतिदिन समाज के प्रबुद्ध एवं प्रभावी लोगों को बुलाकर संघ की कार्यपद्धति को निकट से देखने का अवसर दिया जाता है। आज तक किसी शिक्षार्थी, शिक्षक या नागरिक ने नहीं कहा कि उसे इन शिविरों में हिंसक गतिविधि दिखाई दी है।

एक मजेदार बात यह भी है कि संघ पर आतंकवादी होने का आरोप लगाने वाले लोग पहले संघ वालों की लाठी को देखकर हंसते थे। वे कहते थे कि इससे ए.के.47 का सामना कैसे होगा; पर अब उन्हें वही लाठी खतरनाक लग रही है।

संघ के स्वयंसेवक देश में हजारों संगठन तथा संस्थाएं चलाते हैं। इनके प्रशिक्षण वर्ग भी वर्ष भर चलते रहते हैं। इनमें भी लाखों लोग भाग ले चुके हैं। विश्व हिन्दू परिषद वाले सत्संग और सेवा कार्यों का प्रशिक्षण देते हैं। बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी वाले नियुद्ध (जूडो, कराटे) तथा एयर गन से निशानेबाजी भी सिखाते हैं। इससे मन में साहस का संचार होकर आत्मविश्वास बढ़ता है। इन शिविरों के समापन कार्यक्रम भी सार्वजनिक होते हैं। संघ और संघ प्रेरित संगठनों का व्यापक साहित्य प्रायः हर बड़े नगर के कार्यालय पर उपलब्ध है। अब तक हजारों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा करोड़ों पुस्तकें बिकी होंगी। किसी पाठक ने यह नहीं कहा कि उसे इस पुस्तक में से हिंसा की गंध आती है।

संघ प्रेरित संस्थाओं की अर्थ व्यवस्था भी खुली होती है। वे समाज से पैसा लेते हैं तथा प्रतिवर्ष उसका अंकेक्षण किया जाता है। सच तो यह है कि जिस व्यक्ति, संस्था या संगठन का व्यापक उद्देश्य हो, जिसे हर जाति, वर्ग, अवस्था और आर्थिक स्थिति वाले, नगर और ग्राम के लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ना हो, वह हिंसक हो ही नहीं सकता। हिंसावादी होने के लिए गुप्तता अनिवार्य है और संघ का सारा काम खुला, सार्वजनिक और संविधान की मर्यादा में होता है। संघ पर 1947 के बाद तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। उस समय कार्यालय पुलिस के कब्जे में थे। तब भी उन्हें वहां से कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।

दूसरी ओर आतंकी गिरोह गुप्त रूप से काम करते हैं। वे इस्लामी हों या ईसाई, नक्सली हों या माओवादी; सब भूमिगत रहकर काम करते हैं। उनके पर्चे किसी बम विस्फोट या नरसंहार के बाद ही मिलते हैं। उनके प्रशिक्षण शिविर पुलिस, प्रशासन या जनता की नजरों से दूर घने जंगलों में होते हैं। ये गिरोह जनता, व्यापारी तथा सरकारी अधिकारियों से जबरन धन वसूली करते हैं। न देने वाले की हत्या इनके बायें हाथ का खेल है। ऐसे सब गिरोहों को बड़ी मात्रा में विदेशों से भी धन तथा हथियार मिलते हैं।

पिछले दिनों अजमेर, मालेगांव, गोवा या हैदराबाद जैसी कुछ घटनाएं प्रकाश में आयी हैं। यद्यपि अभी इनकी जांच चल रही है और सत्य कब तक सामने आयेगा, कहना कठिन है। इनके साथ ‘अभिनव भारत’ या ‘सनातन’ जैसी संस्थाओं का नाम आ रहा है। इनका संघ या विश्व हिन्दू परिषद से कोई संबंध नहीं है। यदि कुछ लोग इन घटनाओं में पकड़ में आये हैं, जो संघ के कार्यकर्ता रहे हैं, उनसे पूछताछ में ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह निन्दनीय कार्य उन्होंने अपनी इच्छा से किया होगा। इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं, संघ नहीं। क्योंकि संघ कभी किसी हिंसक कार्य का समर्थन नहीं करता।

संघ का जन्म हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए हुआ है। और हिंसा से विघटन पैदा होता है, संगठन नहीं। संघ मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण का विरोधी है। वह उस मनोवृति का भी विरोधी है, जिसने देश को बंाटा और अब अगले बंटवारे के षड्यन्त्र रच रहे हैं। इसके बाद भी संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। वह मुसलमान तथा ईसाइयों में से भी अच्छे लोगों को खोज रहा है। संघ किसी को अछूत नहीं मानता। उसे सबके बीच काम करना है और सबको जोड़ना है। ऐसे में वह किसी वर्ग, मजहब या पंथ के सब लोगों के प्रति विद्वेष रखकर नहीं चल सकता।

इसलिए हिन्दू आतंकवाद या उससे संघ परिवार के संगठनों को जोड़ना केवल और केवल एक षड्यन्त्र है। यह खिसियानी बिल्ली के खंभा नोचने का प्रयास मात्र है। दिग्विजय सिंह हों या उनकी महारानी, वे आज तक किसी इस्लामी आतंकवादी को फांसी नहीं चढ़ा सके हैं। अब हिन्दू आतंकवाद का नाम लेकर वे इस तराजू को बराबर करना चाहते हैं। उनका यह षड्यन्त्र हर बार की तरह इस बार भी विफल होगा।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि संघ हर चोट के बाद पहले से अधिक सबल हुआ है। 1948, 1975 और 1992 का उदाहरण बहुत पुराना नहीं है। यदि कांग्रेस फिर संघ वालों को आजमाना चाहे, तो उसका स्वागत है।

हमने चिराग रख दिया तूफां के सामने
पीछे हटेगा इश्क किसी इम्तहां से क्या ?