शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

वे किस ग्रह के आदिवासी हैं ?

कुछ लोग बातचीत या लेखन में प्रायः कुछ विशेष रंग-रूप वाले लोगों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग करते हैं। सच तो यह है कि अंग्रेजों ने उनमें और शेष भारतवासी हिन्दुओं में फूट डालने के लिए यह शब्द गढ़ा था। उन्होंने कहा कि भारत के शहरों और गांवों में रहने वाले हिन्दू तो आर्य हैं, जो बाहर से आये और व्यापार तथा खेती पर अधिकार कर लिया। उन्होंने यहां के मूल निवासियों को वन और पर्वतों में खदेड़ दिया। अंग्रेजों ने कई इतिहासकारों को अपने जाल में फंसाकर यह सिद्धान्त पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल करा लिया। इस कारण गुलामी काल में हम यही पढ़ते और समझते रहे।

पर अंग्रेजों के जाने के बाद भी इतिहास की इस भयानक भूल को सुधारा नहीं गया। यह सिद्धान्त पूर्णतः भ्रामक है। जैसे नगरों में रहने वाले नगरवासी हैं, वैसे ही ग्रामवासी, पर्वतवासी और वनवासी भी हैं। मौसम, खानपान और काम के प्रकार से लोगों के रंग-रूप में परिवर्तन भले ही हो जाए; पर इससे वे किसी और देश के वासी नहीं हो जाते। श्रीराम ने लाखों वर्ष पूर्व इन्हीं वन और पर्वतवासियों को साथ लेकर तब से सबसे बड़े आतंकवादी रावण को मारा था।

श्रीराम और श्रीकृष्ण का वंशज होने के नाते मैं तो स्वयं को इसी भारतभूमि का आदिवासी मानता हूं। मेरे पुरखे लाखों-करोड़ों वर्ष से यहीं रह रहे हैं। जो अंग्रेज और अंग्रेजपरस्त इतिहासकारों के झूठे सिद्धान्तों पर विश्वास कर स्वयं को भारत का आदिवासी नहीं मानते, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि वे किस देश, दुनिया या ग्रह के आदिवासी हैं; वे कितने साल या पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं; वे कब तक इस पावन धरा पर बोझ बन कर रहेंगे और अपने पुरखों के संसार में ही क्यों नहीं चले जाते ?

बुधवार, 28 जुलाई 2010

गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम

दिल्ली में होने वाले गुलाममंडल खेलों के उद्घाटन, समापन आदि के लिए बना जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम भी अंततः तैयार हो ही गया। इसका नाम नेहरू स्टेडियम बिल्कुल ठीक ही रखा गया है, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में गुलाम परम्पराओं को जीवित रखने के सबसे बड़े अपराधी नेहरू ही हैं।

वे स्वयं को गर्वपूर्वक भारत में अंतिम अंग्रेज कहते थे। इसी प्रकार वे स्वयं को जन्म से हिन्दू, कर्म से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। जो लोग इस तमाशे के समर्थक हैं, वे सब नेहरूवादी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। मणिशंकर अय्यर ने जीवन में बस यही अच्छा काम किया है कि वे इस सर्कस के विरोधी हैं।

इस तमाशे पर कितना धन खर्च हो रहा है, यह ठीक-ठीक किसी को नहीं पता। 15 से लेकर 50 हजार करोड़ रु0 तक की बात लोग कह रहे हैं। इससे भारत के हर विकास खंड में एक चिकित्सालय और विद्यालय तथा हर जिले में एक खेल स्टेडियम बन सकता था; पर गांव और गरीब किसी की प्राथमिकता में तो हो...। पांच करोड़ रु0 तो केवल ए.आर.रहमान को ही दिया जा रहा है, जो उद्घाटन कार्यक्रम में कुछ देर गीत-संगीत प्रस्तुत करेंगे।

दुर्भाग्यवश भारत के सभी बड़े नेता, राजनीतिक दल तथा संस्थाएं चुप हैं। उन्हें डर है कि इससे कहीं युवा शक्ति उनसे नाराज न हो जाए। वे भूलते हैं कि जींसधारी आधुनिक युवक भले ही कितने फैशनपरस्त हों; क्रिकेट, सिनेमा या कैरियर के लिए भले ही वे दीवाने हों; पर उनके मन में देशभक्ति की आग विद्यमान है। यदि उन्हें ठीक से बात समझाएं, तो यह आग शीघ्र ही दावानल बन सकती है।

छह दिसम्बर, 1992 और अयोध्या को याद करें। जिन युवकों को बुजुर्ग लोग नालायक बताते नहीं थकते थे, उन्होंने कुछ घंटो में ही बाबरी गुलामी के उस कलंक को ढहा दिया था। यदि सही नेतृत्व द्वारा आह्नान किया जाए, तो यही फैशनपरस्त युवक बड़े से बड़ा बलिदान देने में पीछे नहीं हटेंगे।

हर्ष की बात है कि स्वामी रामदेव जी ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। यदि वे आह्नान करें, तो इस मुद्दे पर करोड़ों भारतवासी उनके साथ आ सकते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि स्वामी जी ने नेतृत्व में तीन अक्तूबर, 2010 (रविवार) को दिल्ली के देशभक्त नागरिक सत्याग्रह करें। वे सुबह से ही सड़कें जाम कर किसी खिलाड़ी, नेता या दर्शक को उद्घाटन कार्यक्रम में न जानें दें। विश्व भर का मीडिया उस दिन यहां होगा। उनके माध्यम से दुनिया देखेगी कि ‘हम भारत के लोग’ इस गुलामी के चोगे को उतार फेंकना चाहते हैं।

यदि स्वामी रामदेव जी अभी से तीन अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में रहकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने की घोषणा कर दें, तो गुलाममंडल खेलों के विरुद्ध वातावरण बनने लगेगा। दिल्ली के आसपास के लाखों लोग भी उस दिन यहां आ जाएंगे। दो अक्तूबर गांधी जी का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयोग किया था। अंग्रेज रानी की गुलामी में सम्पन्न होने वाले ‘गुलाममंडल सर्कस’ के विरुद्ध इस शस्त्र को एक बार फिर आजमाने की जरूरत है।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

क्या तिरंगे से भगवा रंग हटाएंगे ?

इन दिनों कुछ समाचार पत्र और दूरदर्शन चैनल ‘भगवा आतंक’ का राग गा रहे हैं। उनकी पीठ पर कौन है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसके द्वारा वे सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति को ही अपमानित करना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि नयी पीढ़ी के मन में भगवे रंग के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाए, जिससे वे मंदिर, गुरुद्वारे, मठ, संन्यासी आदि को देखते ही नाक-मुंह सिकोड़ने लगें।

पिछले रविवार को एक सज्जन अपने बच्चों को दिल्ली का एक सरकारी भवन दिखा रहे थे। वहां तिरंगा झंडा भी शान से फहरा रहा था। अचानक उनके आठ वर्षीय बच्चे ने पूछा - पापा, इस झंडे में सबसे ऊपर यह भगवा आतंक क्यों है ?

भगवे रंग को आतंक का प्रतीक सिद्ध करने को कटिबद्ध कांग्रेस सरकार और वाममार्गी बुद्धिजीवियों से मेरा एक ही प्रश्न है कि वे तिरंगे झंडे को इस भगवा आतंक से कब मुक्त कराएंगे; इसके लिए वे कोई अभियान क्यों नहीं चलाते ?

सी.बी.आई - कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन

किसी ने सूचना अधिकार के अन्तर्गत भारत सरकार से यह जानना चाहा है कि भोपाल गैस नरसंहार के बाद जिन दिनों एंडरसन भारत आकर फिर अपने देश ससम्मान भेज दिया गया, उन दिनों राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह से किस-किस ने भेंट की थी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किस-किस से फोन पर बात की थी।

सरकार ने बताया है कि जैलसिंह ने उन दिनों एंडरसन नामक किसी व्यक्ति से भेंट नहीं की थी और राजीव गांधी की फोन वार्ताओं का रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। क्या इस बारे में कोई सी.बी.आई जांच करेगी कि प्रधानमंत्री कार्यालय से वह रिकार्ड कब, कैसे, किसने और क्यों गायब किया ?

देश को पूरा विश्वास है कि इसे भी बोफोर्स दलाली के दस्तावेजों की तरह कालीन के नीचे दबा दिया जाएगा, क्योंकि सी.बी.आई का असली अर्थ सेंट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन नहीं, कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन है।

कपिल सिब्बल कहां के मंत्री हैं ?

केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार उनका मंत्रालय 35 डालर कीमत का एक ऐसा लेपटाप बनवा रहा है, जो छात्रों के लिए बहुत उपयोगी होगा। मैं समझ नहीं पाया कि वे भारत सरकार में मंत्री हैं या अमरीका सरकार में ? भारत की मुद्रा तो रुपया है डालर नहीं। फिर वे उस उपकरण की कीमत डालर में क्यों बता रहे हैं ? सिब्बल महोदय डालर को रुपये में बदलना नहीं जानते होंगे, यह तो मैं नहीं मानता; पर यह जरूर लगता है कि उनका दिल और दिमाग भारत की बजाय अमरीका में अधिक बसता है।

सोमवार, 26 जुलाई 2010

इस बार दादा उम्मीद से हैं

‘उम्मीद से हैं’ एक कहावत है, जिसका अर्थ घर-गृहस्थी वाले अच्छी तरह समझते हैं। घर-परिवार में किसी बहू-बेटी के उम्मीद से होने की सूचना मिलते ही सब ओर प्रसन्नता छा जाती है। महिलाएं इशारों-इशारों में पूरे मोहल्ले में यह संदेश पहुंचा देती हैं। आसपास मिठाई बांटी जाती है। घर में विशेष पूजा होती है। पूरा घर और मोहल्ला सक्रिय हो उठता है।

बुजुर्ग महिलाएं उम्मीद वाली को घरेलू दवाएं, सावधानियां और टोने-टोटके जैसे सुझाव बिन मांगे देने लगती हैं। घर वाले पहले महीने, फिर सप्ताह और दिन गिनने लगते हैं। इस दौरान हर गतिविधि का केन्द्र वह उम्मीद वाली हो जाती है और असली मेहनत करने वाले को कोई चाय तक नहीं पूछता।

लेकिन यहां हम परिवार की नहीं, देश की उम्मीदों की बात कर रहे हैं। मैडम जी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली इस सरकार में महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है, उतनी तेजी से तो बांस भी नहीं बढ़ता। इससे उन सब उम्मीदों पर पानी फिर गया है, जिनके चलते जनता ने उन्हें चुना था। दूसरी ओर जले पर नमक छिड़कते हुए ये बेरहम नेता बार-बार ऐसे वक्तव्य देते हैं कि उम्मीदों के घड़े को फोड़ लेने की इच्छा होने लगती है।

शरद पवार को ही लें। वे कृषि मंत्री हैं या क्रिकेट मंत्री, यह आक्टोपस पाल से पूछो। कोढ़ में खाज की तरह वे हर कुछ दिन बाद दूरदर्शन पर आकर बताते हैं कि अगले सप्ताह दालों के दाम घटने की उम्मीद है। मैं एक पाव टमाटर पर हाथ रखकर सच कहता हूं कि जब-जब उन्होंने ऐसा कहा, तब-तब दालों के दाम चढ़ गये। पिछले दिनों उन्होंने दूध के दामों पर टिप्पणी की। लोग समझ गये कि अब काली चाय पीने के दिन आ गये हैं।

सब्जी, फल, चीनी हो या आटा और चावल, इस महंगाई मंत्री के कारण सबमें आग लगी है। सरकार चाहे जो कहे; पर जनता को उनसे कोई उम्मीद नहीं है। बहुत से लोगों का रक्तचाप और दिल की धड़कन तो उनका चित्र देखकर ही बढ़ जाती है। उनके चेहरे से बच्चे तो डरते ही थे; पर अब आम आदमी भी मुंह फेर लेता है। कुछ लोग तो उन्हें देखते ही ‘महंगाई डायन’ वाला गीत गाने लगते हैं। कल एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि क्या पुरुष भी डायन होते हैं ? शरद पवार के कारण बात यहां तक पहुंच जाएगी, इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।

लेकिन हम भारत के लोग सदा से आशावादी हैं। पिछले साल वाणिज्य मंत्री कमलनाथ की बातों से कुछ उम्मीद जगी थी कि शायद अब महंगाई कुछ घट जाए; पर उसे भी नौ क्या दस महीने हो गये। बार-बार दिल्ली की ओर ध्यान लगाया। कई बार कान का मैल साफ किया कि शायद अब थाली बजने की आवाज आये; पर कुछ नहीं। एक बार फिर निराशा ही हाथ लगी।

शीला दीक्षित के अनुसार दिल्ली वालों के पास पैसा बढ़ा है, तो महंगाई बढ़ने में क्या बुरा है ?

ऐसी गर्मी में प्रधानमंत्री महोदय ने मन को बहुत ठंडक पहुंचाई। उन्होंने भी उम्मीद जाहिर की कि हर हाल में दो-तीन महीने में महंगाई पर काबू पा लेंगे; पर अगले ही दिन तेल और गैस के दाम बढ़ गये। उनके अनुसार यह गरीब जनता के हित में ही है। क्या वे बताएंगे कि गरीबों के हित में वे अगला कदम कब उठाएंगे ?

इस सरकार में दादा प्रणव मुखर्जी सबसे समझदार आदमी हैं। असल में सरकार तो वही चला रहे हैं; पर नाम मनमोहन सिंह और मैडम जी का होता है। मैं जन्म से ही गंभीर प्रवृत्ति का आदमी होने के कारण दादा से बहुत प्रभावित हूं। कल वे दूरदर्शन पर कह रहे थे कि इस बार अच्छे मानसून के कारण उन्हें उम्मीद है कि फसल अच्छी होगी और सर्दियों तक खाद्य पदार्थों के दाम घट जाएंगे। जब से मैंने उनका वक्तव्य सुना है, तब से मैं जेब पकड़े बैठा हूं। शरद पवार, कमलनाथ, मैडम और मनमोहन जी तो उम्मीदों की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। ले देकर प्रणव बाबू की चुप्पी का सहारा था; पर अब वे भी...।

पर फिर भी हम निराशावादी क्यों बनें ? हमें अच्छा ही सोचना चाहिए। क्योंकि इस बार और कोई नहीं, खुद दादा उम्मीद से हैं। खुदा खैर करे।