सोमवार, 9 अगस्त 2010

संघर्ष, मुठभेड़ और युद्ध

सामान्य रूप से ये तीनों शब्द लगभग एक से लगते हैं; पर इनमें बड़ा अंतर है। ये अलग-अलग संदर्भ में प्रयोग होते हैं और इसीलिए इनके नियम भी अलग-अलग ही हैं।

खेल के मैदान में दो खिलाड़ी या दल जीतने के लिए भिड़ते हैं। खेल में कई बार, और अंतिम समय में तो प्रायः चरम संघर्ष की स्थिति आ ही जाती है। खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं। अत्यधिक उत्साह के कारण कभी-कभी कुछ नियम विरुद्ध कार्य (फाउल) भी हो जाते हैं। ऐसे में निर्णायक (रेफरी) गलती करने वाले को चेतावनी देता है और कभी-कभी उसे मैदान से बाहर भी भेज देता है। कई बार तो खेल में हार-जीत भी इसी कारण हो जाती है।

लेकिन संघर्ष के इस दौर के बाद भी खिलाड़ियों के मन में एक दूसरे के प्रति द्वेष या शत्रुता नहीं होती, क्योंकि वे खेल के नियम और अनुशासन से बंधे होते हैं। इसलिए कोई भी जीते या हारे; पर अंततः खेल भावना ही विजयी होती है।

दूसरे शब्द मुठभेड़ की यदि व्याख्या करें, तो यह विरोधियों में होती है। इसका कारण वैचारिक भी हो सकता है और धन, धरती या अन्य कोई स्वार्थ भी। इसमे दोनों पक्ष एक-दूसरे को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि भी पहुंचाते हैं; लेकिन इन दोनों के ऊपर देश का संविधान है। यदि कोई न्यायालय की शरण ले, तो गलती करने वाले को दंड भुगतना पड़ता है। कहीं-कहीं लोग सरकार की शरण में जाने की बजाय अपनी जातीय या क्षेत्रीय पंचायत में चले जाते हैं। वह भी अर्थदंड, गांव या जाति बहिष्कार आदि सजा देकर मामले को निबटा देती है।

लेकिन युद्ध इन सबसे बहुत बड़ी चीज है। युद्ध करने वाले न संविधान को मानते हैं और न ही नैतिकता या खेल भावना को। उनका उद्देश्य तो दूसरे पक्ष को अधिकाधिक शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुंचाकर उनका मनोबल तोड़ना और उनके जन-धन पर अधिकार करना होता है। दो देशों में होने वाले युद्ध इसी श्रेणी में आते हैं। सामान्यतः यदि कोई दूसरे की हत्या कर दे, तो उसे आजीवन कारावास या फांसी होती है, जबकि युद्ध में शत्रुओं को मारने वाले को सम्मानित किया जाता है।

इस दृष्टि से हम अपने देश के वर्तमान घटनाक्रम को देखें। क्या नक्सलवादी कम्युनिस्टों द्वारा देश में मचाया जा रहा तांडव युद्ध से कम है; क्या मुस्लिम आतंकियों द्वारा किये जा रहे जेहादी विस्फोट युद्ध नहीं हैं; क्या घुसपैठ द्वारा जनसंख्या बढ़ाकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने का षड्यन्त्र युद्ध नहीं है; क्या कश्मीर घाटी से सब हिन्दुओं को खाली हाथ भगाने के बाद उसे पूर्णतः पाकिस्तान बना देने का प्रयास युद्ध नहीं है; इनके पीछे चीन हो या पाकिस्तान या फिर अमरीका; क्या येन-केन-प्रकारेण इनका सिर कुचलना अपराध है ?

दुनिया भर में इसका उत्तर चाहे जो हो; चाणक्य और भर्तृहरि के नीति श्लोक चाहे जो कहें; भगवान श्रीकृष्ण ने गीता और महाभारत में चाहे जो कहा और किया हो; पर हमारी परम सेक्यूलर सरकारों का दृष्टिकोण इस बारे में सदा आत्मघाती ही रहा है। इसीलिए ये समस्याएं घटने की बजाय तेजी से बढ़ रही हैं। यानि ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।’

बात बिलकुल साफ है कि बंगलादेशी घुसपैठिये, पाक प्रेरित आतंकवादी और नक्सलवादी कम्युनिस्ट हमारे शत्रु हैं। वे लगातार भारतवासियों को मार रहे हैं। हमारी पुलिस, सी.आर.पी.एफ, बी.एस.एफ और सेना लड़ तो रही है; पर युद्ध घोषित न होने से उनके हाथ बंधे हैं। अतः हमें भी इनके विरुद्ध युद्ध घोषित कर सेना को खुली छूट देनी चाहिए। अब काम पुलिस या अर्धसैनिक बलों से नहीं चलेगा। यदि मौका मिले, तो 1965, 1971 या करगिल दोहराना सेना के लिए कठिन नहीं है। वह कुछ ही दिन में शत्रुओं को समूल नष्ट कर सकती है।

एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि युद्ध के समय सीमावर्ती क्षेत्र को भी खाली करा लिया जाता है। इसके बाद भी यदि कोई वहां रहे, तो उसकी हानि की जिम्मेदार सेना नहीं होती। यही स्थिति इस युद्ध में भी है। जो लेखक, पत्रकार, वकील या साधुवेशी लोग शत्रुओं के लिए सहानुभूति या आर्थिक साधन जुटा रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि इस युद्ध में अपने जानमाल की हानि के जिम्मेदार वही हैं, शासन या सेना नहीं।

दिल्ली, मुंबई या कोलकाता के वातानुकूलित क्लब और होटलों में गोष्ठी करने वाले कुछ भ्रष्ट बुद्धिवादियों के मन भले ही अपने इन साथियों के लिए धड़कते हों; पर आम नागरिक के मन में इनके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। उसकी दृष्टि में ये सब एक ही थैली के चट्ट-बट्टे हैं। उसका बस चले, तो अपराधियों के साथ इन तथाकथित बुद्धिवादियों का भी एनकाउंटर कर दे।

लेकिन बलिहारी है भारत देश की, जहां देशभक्तों का अपमान और सेक्यूलरों का सम्मान होता है। कश्मीर घाटी में 32 दांतों के बीच जीभ की तरह काम कर रहे सैनिक एक ओर पत्थरबाजों और आतंकियों के निशाने पर हैं, तो दूसरी ओर शासन-प्रशासन के। वे गोली चलाएं, तो प्रदेश और देश का शासन उन्हें गरियाता है, और न चलाएं तो पत्थर और गोलीबाज उनकी जान ले लें। गुजरात को देखें, तो नापाक पाकिस्तान में बैठे आकाओं के निर्देश पर चलने वाले अपराधियों को मारकर राज्य को आतंक से मुक्त कराने वाले जेल में हैं, जबकि उन माफिया गिरोहों के समर्थक मंूछों पर ताव दे रहे हैं। ऐसे में कौन भविष्य में इन आतंकवादियों के विरुद्ध युद्ध करेगा ?

इस पीड़ा को कोई पंजाब को पाकिस्तान प्रेरित खालिस्तानी आतंकवादियों से मुक्त कराने वाले पुलिस अधिकारी के.पी.एस गिल से पूछे। वे बताते हैं कि घोर अंधकार के उन काले दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का वरदहस्त उनकी पीठ पर था। उन्होंने खूंखार आतंकियों की हिट लिस्ट बनाकर अपने साथियों को खुली छूट दी; पर आतंक समाप्ति के बाद उन जांबाज पुलिस वालों पर ही मुकदमे ठोक दिये गये। मजबूरी में कुछ ने आत्महत्या कर ली और कुछ आज भी जेल में सड़ रहे हैं। यह युद्ध को संघर्ष या मुठभेड़ समझने का ही दुष्परिणाम है।

इसलिए यदि हमें देश को इन घुसपैठियों, नक्सलवादी कम्युनिस्टों और इस्लामी आतंकियों से मुक्त कराना है, तो इनके विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ना होगा। छुटपुट संघर्ष, मुठभेड़ या वार्ताओं से काम बनने वाला नहीं है। भारत की जनता हर बार की तरह इस बार भी तन, मन और धन से सहयोग करेगी; पर एक बार शासन वोट राजनीति की मानसिकता से ऊपर उठकर युद्ध घोषित तो करे।