बुधवार, 18 अगस्त 2010

छोटे नोटों की व्यथा-कथा

परसों मैं किसी काम से बैंक गया था। वापसी पर कोषागार के पास से निकला, तो लगा मानो वहां कुछ लोग बैठे बात कर रहे हैं। वे बार-बार अर्थनीति, विकास, घाटा, घोटाला जैसे शब्द प्रयोग कर रहे थे। पहली नजर में ऐसा लगा मानो कई बड़े अर्थशास्त्री और राजनेता बजट भाषण पर चिन्तन कर रहे हैं।

कुछ देर बाद मैं अपनी मूर्खता पर हंसा। भला अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं को यहां बैठने की क्या आवश्यकता है ? उनके लिए बड़े-बड़े पंचतारा होटल हैं, जहां ठंडे या गरम माहौल में, समयानुसार खाते और पीते हुए, व्यायाम करते और मालिश कराते हुए, दिन भर में मात्र लाख-दो लाख रुपये खर्च कर वे गरीब, गरीबी, पर्यावरण और आतंकवाद से लेकर देश की अर्थनीति पर स्थितप्रज्ञ भाव से सोच सकते हैं।

लेकिन फिर भी अंदर कुछ खुसर-पुसर तो हो ही रही थी। मैंने फिर एक बार ध्यान दिया, तो पता लगा कि वहां कुछ नोट आपस में बात कर रहे हैं। कोषागार होने के कारण वहां छोटे-बड़े सब तरह के नोट थे। वे ही आपस में सुख-दुख बांट रहे थे। छोटे नोट ज्ञानवर्धन की मुद्रा में बड़े और पुराने नोटों के पास बैठे थे।

- हाय ! आजादी से पहले के वह भी क्या दिन थे, जब लोग दस रु0 वेतन में पूरे परिवार के साथ सम्मान से जी लेते थे। आजादी के बाद भी सौ-दो सौ रु0 की बड़ी प्रतिष्ठा थी। दो रु0 जुर्माना या पांच रु0 इनाम तब कितना महत्वपूर्ण होता था ?

- हां, तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। मैं बैंक से निकलकर पहली बार जिस छात्र के पास गया था, उसे दस रु0 महीना छात्रवृत्ति मिली थी। इससे पूरे मोहल्ले में उस छात्र का कद बढ़ गया था। विद्यालय में सबने ताली बजाकर उसका स्वागत किया था; पर अब दस रु0 को कौन पूछता है ?

- मैंने सुना है कि दिल्ली में एक न्यायालय ने जब किसी पर 30,000 रु0 जुर्माना किया, तो सब ओर तहलका मच गया और उसका नाम ही तीस हजारी कोर्ट हो गया; पर आज तो 30 लाख या 30 करोड़ रुपये की भी कोई खास कीमत नहीं है।

- कैसे... ? एक दस के नोट ने पूछा।

- कैसे क्या ! पिछला लोकसभा चुनाव के आंकड़े देख लो। जितने करोड़पति इस बार संसद में आये हैं, उतने पहले कभी नहीं पहुंचे। राज्यसभा के लिए तो खुलेआम बोली लगी है। आश्चर्य तो यह है कि ये नेता स्वयं को गरीबों का समर्थक और दूसरे को पूंजीपतियों का दलाल कहते हैं। वे दूसरों को शोषक और स्वयं को शोषित बताते हैं; पर राजनीति के हमाम में सब नंगे ही हैं।

- और क्या, खुद को साम्यवादी कहने वाले भले ही नयी चप्पल तोड़कर या नया कुर्ता फाड़कर पहनते हों; पर उनके बैंक खातों में करोड़ों रुपये नकद मिलते हैं। शर्म लिहाज के बिना अब तो सब ओर खुला खेल फर्रूखाबादी है। गहने, जमीन-जायदाद और ठेकों का तो इन लोगों के पास कोई हिसाब ही नहीं है। पहले लोग सूदखोर सेठ, जमींदार और उद्योगपतियों को गाली देते थे; पर अब राजनीतिक नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनसे मीलों आगे निकल गये हैं। स्विस बैंक ऐसे लोगों के बल पर ही तो फल-फूल रहे हैं। अब तो बड़ा आदमी वही है, जिसका खाता विदेश में हो। बाकी तो सब टटपूंजिये हैं।

- अच्छा दादा ... ? पांच के नोट का मुंह आश्चर्य से खुल गया।

- और क्या; एक गरीबों के मसीहा और पुराने हड़ताली समाजवादी की करोड़ों रु0 की सम्पत्ति के लिए उनकी दो प्रिय महिलाएं झगड़ रही हैं। बाहर बीड़ी और चाय, पर घर में महंगी सिगार और शैम्पेन पीने वाले अधिकांश नेताओं का यही हाल है।

- पर सुना है कुछ दल स्वयं को बहुजन गरीबों का सबसे बड़ा और एकमात्र हितैषी बताते हैं ?

- उनकी माया तो और भी निराली है। वहां तो टिकट ही करोड़ों में बिकते हैं। जरा सोचो, जिसने दो-चार करोड़ रु0 पूजा और माला में देकर टिकट खरीदा है, वह चुनाव में कितना खर्च करेगा और जीतने के बाद कितना कमाएगा ?

- ऐसे नेताओं के पास गाड़ियां भी कितनी होंगी ?

- नहीं भैया, ये अपनी गाड़ी नहीं रखते। गरीबों के इन हमदर्दों को घूमने के लिए शासन कई गाड़ियां देता है। दो-चार में सुरक्षाकर्मी चलते हैं और दस-बीस में समर्थक। इन्हें अपनी गाड़ी की जरूरत ही कहां है ?

- यानि जनता के पैसे से ये नेता जनता की ही छाती पर ये मूंग दलते हैं; पर दूरदर्शन पर आकर तो ये कहते हैं कि बजट गरीबों के लिए ही बनाया जा रहा है। सेंसेक्स चढ़ रहा है, मुद्रास्फीति उतर रही है। महंगाई भी बस घटने की वाली है।

- बेटा, सेंसेक्स चाहे चढ़े या उतरे, मुद्रास्फीति बढ़े या घटे; पर गरीबों की हालत सुधरने वाली नहीं है, क्योंकि गरीब और गरीबी इन नेताओं के लिए भाषण और वोट बटोरने का चीज है। इनके लिए विकास में हाथ बंटाने का अर्थ भ्रष्टाचार के गटर में नहाना है। अब रिश्वत सैकड़ों या हजारों में नहीं, लाखों-करोड़ों में मेज के ऊपर ही ली और दी जाती है।

- यानी मुझे कुछ दिन बाद कोई नहीं पूछेगा ? बहुत देर से चुप एक रु0 का नोट रोता हुआ बोला।

- तुम्हें आज ही कौन पूछता है बेटा। अब तो भिखारी भी एक रु0 देने वाले को आगे जाने को कह देता है।

- तो फिर भगवान हमें उठा ले; वह हम अछूतों को आत्महत्या पर मजबूर क्यों कर रहे हैं ?

- भैया, धरती पर भगवान का नहीं, सरकार का राज है। उसे गरीबों की तरह इन छोटे-छोटे गरीब नोटों की भी कोई चिन्ता नहीं है। जहां सारे काम लाखों-करोड़ों में होते हों, वहां एक-दो या दस-बीस के फटीचर नोटों को कौन पूछता है ?

- तो अब पांच सौ और हजार के नोटों की ही पूछ होगी ?

- नोटों की इस वर्ण व्यवस्था के बारे में तो अर्थशास्त्री ही जानें। वैसे भी वे रुपये के बदले ड१लर में अधिक सोचते हैं। उनका शरीर ‘मेड इन इंडिया’ और बुद्धि ‘मेड इन अमरीका’ होती है। संग्रहालय में रखने योग्य ऐसे लोगों के कारण ही लोग अर्थनीति को अनर्थनीति कहने लगे हैं।

मुझे कोषागार के पास खड़े काफी देर हो गयी थी। इससे बैंक का चौकीदार मुझे संदेह की नजर से देखने लगा। मुझे लगा कि अब यहां से चल देना चाहिए। यदि उसने मुझे डकैती की योजना बनाने के आरोप में बंद करा दिया, तो मेरी जेब में रखे दस-बीस के नोटों पर तो पुलिसकर्मी थूकेंगे भी नहीं।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जनगणना और हम

हर दस साल बाद होने वाली जनगणना का कुछ अंश पूरा हो चुका है, जबकि मुख्य काम (संदर्भ बिन्दु) नौ से 28 फरवरी, 2011 तक होगा। इससे संबंधित दो विषय महत्वपूर्ण हैं। एक है धर्म और जाति का, जबकि दूसरा भाषा और बोली का है। इन दोनों पर विचार कर हमें अपनी भूमिका निश्चित करनी होगी।

जहां तक धर्म की बात है, हिन्दुओं से इतर लोग स्वाभाविक रूप से अपना धर्म (मजहब) मुसलमान या ईसाई लिखाएंगे। यद्यपि इनमें भी अनेक पंथ, सम्प्रदाय, जातियां आदि हैं। उनमें खून-खराबा भी होता है; पर जनगणना में वे इन भेदों को भुलाकर एक हो जाते हैं। इससे जनगणना के निष्कर्षों में इनकी संख्या बहुत अधिक दिखाई देती है।

हिन्दू होने के नाते हमें भी स्मरण रखना होगा कि हिन्दुस्थान की मिट्टी में जन्मे, पले और विकसित हुए सभी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय आदि हिन्दू ही हैं। हिन्दू एक मानवतावादी जीवन शैली है, जिसे कोई भी अपना सकता है, चाहे उसकी पूजा पद्धति, अवतार या पैगम्बर परम्परा कुछ भी हो। एक जीवित धर्म होने के नाते हिन्दू धर्म में कई बार सुधार और विकास के प्रयास हुए हैं। इसमें से ही जैन, बौद्ध, कबीरपंथी, सिख, आर्य समाज आदि पंथ और सम्प्रदायों का उदय हुआ। जैसे पिता की शक्ति उसकी संतानों में होती है, ऐसे ही हिन्दू धर्म की शक्ति उसके पंथ और सम्प्रदायों में है। इसलिए हमारा पंथ या सम्प्रदाय चाहे जो हो; पर जनगणना में हमें धर्म के वर्ग में ‘हिन्दू’ ही लिखाना चाहिए।

हो सकता है कुछ लोगों को इससे अपनी पहचान खो जाने का भय हो। यद्यपि माता-पिता अपनी संतानों को आगे बढ़ते देखकर प्रसन्न ही होते हैं। फिर भी किसी के मन में शंका हो, तो वह हिन्दू जैन, हिन्दू बौद्ध या हिन्दू सिख आदि लिखवा सकता है।

जाति का विषय भी ऐसा ही है। स्वतन्त्र भारत की जनगणना में कभी जाति नहीं पूछी गयी; पर इस बार कुछ ऐसे राजनेताओं ने यह बात उठाई है, जिनकी राजनीति का आधार कोई एक राज्य और जाति ही है। दुर्भाग्यवश कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े दल भी इस षड्यन्त्र में फंस गये हैं। अब तो मंत्रिमंडलीय समिति ने भी इसे मान लिया है। इससे जातिवाद की आग पर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने वाले प्रसन्न हैं, जबकि देश की एकता और अखंडता के प्रेमियों को निराशा हाथ लगी है।

इस समय अधिकांश प्रबुद्ध लोग, विशेषकर शिक्षित युवा वर्ग जातिवाद के उभार से दुखी है; पर जातिवादियों का स्वर संसद में अधिक मुखर है। एक ओर सगोत्र और अन्तरजातीय विवाह के नाम पर हो रही हत्याओं के विरोध में कानून बनाने की बात हो रही है, तो दूसरी ओर जनगणना द्वारा जातिवादी जहर के बीज बोये जा रहे हैं। यदि देशभक्त जनता, सामाजिक संस्थाएं तथा बुद्धिजीवी इसके विरोध में खड़े हो जाएं, तो उन्हें भरपूर समर्थन मिलेगा और इन जातिवादियों की करारी हार होगी।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि अपनी जाति क्या बताएं ? कुछ लोग इसके लिए ‘मेरी जाति हिन्दुस्तानी’ नामक आंदोलन चला रहे हैं। हम उन्हें बधाई देते हैं; पर हिन्दुस्तानी या हिन्दुस्थानी शब्द जहां से आया है, उस मूल शब्द अर्थात ‘हिन्दू’ को स्वीकार करने में उन्हें क्या आपत्ति है, यह बात समझ नहीं आती।

यहां एक बार फिर स्पष्ट करना होगा कि हिन्दू किसी पूजा पद्धति, वर्ग, पंथ या सम्प्रदाय से बंधा हुआ नहीं है। हिन्दुस्थान के प्रति जिसके मन में श्रद्धा का भाव है, वह हिन्दू है। अतः जाति वाले वर्ग में भी हमें स्पष्टतः ‘हिन्दू’ ही लिखाना चाहिए।

कुछ लोगों का मत है कि जाति का संबंध काम से है। किसी समय यह बात सच रही होगी; पर अब इसे पूर्णतः सच नहीं माना जा सकता। इसलिए अच्छा होगा कि हम इससे ऊपर उठकर अपनी जाति ‘हिन्दू’ मानें। फिर भी किसी को अपने अतीत से बहुत मोह हो, तो वह जाति वाले वर्ग में हिन्दू धोबी, हिन्दू नाई, हिन्दू ठाकुर, हिन्दू पंडित या हिन्दू गुप्ता, हिन्दू सक्सेना, हिन्दू मराठा या हिन्दू मारवाड़ी आदि लिखवा सकता है।

जनगणना में पहली और दूसरी भाषा भी पूछी जाती है। हमारी पहली भाषा निःसंदेह हमारी मातृभाषा है। मातृभाषा अर्थात जिस भाषा में मां अपने शिशु से संवाद करती है। वह हिन्दी, मराठी, बंगला, तमिल या कोई भी भारतीय भाषा हो सकती है। सबको गर्वपूर्वक उसका ही उल्लेख करना चाहिए।

लेकिन यहां भाषा और बोली संबंधी एक पेंच भी है। जिस भाषा के जितने अधिक बोलने वाले होते हैं, उसके समाचार पत्रों को उतने अधिक सरकारी विज्ञापन मिलते हैं। भाषा के आधार पर फिर अकादमियां बनती हैं, जिससे कुछ लोग शासकीय पद पा जाते हैं। ये अकादमियां शासकीय अनुदानों से पुरस्कार बांटकर साहित्यकारों को उपकृत करती हैं। कुछ लोग भाषा के आधार पर अलग राज्य और सत्ता के सपने देखने लगते हैं। इसलिए बोलियों को भी भाषा घोषित कराने का इन दिनों अभियान सा चला है।

जैसे हिन्दू धर्म में सैकड़ों पंथ और सम्प्रदाय हैं, ऐसे ही हर भाषा में भी अनेक बोलियां होती हैं, जो मिलकर भाषा को समृद्ध करती हैं। जैसे हिन्दी में ही अवधी, ब्रज, खड़ी, पहाड़ी, भोजपुरी, मैथिली, बुंदेलखंडी, राजस्थानी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी आदि सैकड़ों बोलियां हैं। इनमें से लाखों-करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली बोलियों को कुछ नेता और साहित्यकार स्वतन्त्र भाषा घोषित कराना चाहते हैं। वे भूलते हैं कि बोली में शब्दों का महत्व है, जबकि भाषा में शब्दों के साथ व्याकरण भी चाहिए। इसलिए मातृभाषा के रूप में अपनी मूल भाषा को महत्व दें, बोली को नहीं।

जहां तक दूसरी भाषा की बात है, वह निश्चित रूप से संस्कृत ही है। भारत की सब भाषाओं की जननी संस्कृत है। हर भाषा में 50 से 75 प्रतिशत शब्द संस्कृत के ही हैं। हम दिन भर अधिकांश संस्कृत शब्द ही प्रयोग करते हैं। विजय, अजय, सुरेश, रमेश, पंकज, आनंद, नूपुर, मेघा, वंदना आदि नाम और जल, वायु, आकाश, अग्नि आदि संस्कृत शब्द ही हैं। पूजा और आरती आदि में भी हम संस्कृत मंत्रों का प्रयोग करते हैं। देवनागरी लिपि के कारण संस्कृत को पढ़ना भी आसान है। इसलिए जनगणना में अपनी दूसरी भाषा हमें ‘संस्कृत’ ही लिखानी चाहिए।

जनगणना के निष्कर्षों के आधार पर ही आगामी नीतियां बनती हैं। जैसे माता-पिता की समृद्धि से उनके बच्चों को लाभ होता है, ऐसे ही हिन्दू धर्म, हिन्दू जाति, हिन्दी, संस्कृत तथा भारतीय भाषाओं की समृद्धि से अन्ततः हिन्दुस्थान ही सबल होगा।

रविवार, 15 अगस्त 2010

14 अगस्त, स्वाधीनता दिवस या....

15 अगस्त के कई समाचार पत्रों ने 14 अगस्त, 2010, शनिवार को सम्पन्न हुए कार्यक्रमों की चर्चा की है। कई स्थानों पर तिरंगा झंडा फहराया गया, जन-गण-मन गाया गया और स्वाधीनता सेनानियों को याद किया गया।

यहां तक तो ठीक है; पर जिन लोगों और पत्रों ने इस कार्यक्रम को ही स्वाधीनता दिवस बना, बता या लिख दिया, उनकी बुद्धि पर मुझे तरस आता है। भारत को स्वाधीनता 15 अगस्त को मिली, 14 को नहीं। 14 अगस्त को आप कोई कार्यक्रम करें, उसमें तिरंगा फहराकर राष्ट्रगान गायें, इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है; पर कम से कम उस दिन को स्वाधीनता दिवस तो न कहें।

मुझे उन सम्पादकों, पत्रकारों और संवाददाताओं से भी नाराजगी है, जो अपनी बुद्धि का प्रयोग कर इसे स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम कह सकते थे; पर उन्होंने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया।

एक आश्चर्य की बात और भी है। प्रतिवर्ष 15 अगस्त को विद्यालयों और सरकारी कार्यालयों में ध्वजारोहण होता है। कुछ नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के संदेश पढ़े जाते हैं; पर इस बार 15 अगस्त को रविवार पड़ गया। बहुत से विद्यालयों और कार्यालयों ने छुट्टी को खराब होने से बचाने के लिए यह औपचारिकता भी 14 अगस्त को ही पूरी कर ली। वे भूल गये कि 14 अगस्त स्वाधीनता का नहीं, विभाजन का दिवस है। इसीलिए हमारा जन्मजात शत्रु पाकिस्तान इसे अपना स्वाधीनता दिवस मानता है।

क्या 15 अगस्त के बदले 14 अगस्त को ही स्वाधीनता दिवस मना लेने वालों का यह काम अपराध नहीं माना जाना चाहिए; क्या ऐसे महामानवों के बल पर ही हमारा देश आगे बढ़ेगा ?