बुधवार, 25 अगस्त 2010

रमजान और स्वास्थ्य

कुछ दिन पूर्व दूरदर्शन पर एक मौलाना रमजान का महत्व बता रहे थे। पहले तो उन्होंने इसे अध्यात्म से जोड़ा और फिर स्वास्थ्य रक्षा और शरीर शुद्धि से। उन्होंने बताया कि जैसे अन्य धर्माें में व्रत और उपवास होता है, वैसे ही हमारे यहां रोजे होते हैं।

रोजे को स्वास्थ्य से जोड़ने वाली उनकी बात मेरे गले नहीं उतरी। ईसाइयों के व्रत के बारे में मैंने कभी नहीं सुना। हिन्दुओं में इनका एक निश्चित क्रम है। कुछ लोग सोमवार, मंगलवार, शनिवार आदि को साप्ताहिक उपवास रखते हैं। कुछ लोग एकादशी पर पाक्षिक उपवास रखते हैं। कुछ लोग गणेश चतुर्थी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, शिवरात्रि आदि के भी उपवास करते हैं। नवरात्र पर वर्ष में दो बार नौ दिन तक भी लोग बड़ी संख्या में उपवास करते हैं। ये व्रत निर्जल, फलाहारी या एक समय भोजन आदि के रूप में होते हैं। बहुत से व्रत या उपवास केवल महिलाएं ही करती हैं। इसमें भी विवाहित और अविवाहित के अलग-अलग व्रत और पूजा विधान हैं।

उपवास का धार्मिक कारण चाहे जो हो; पर व्यवहार रूप में देखें तो एक या दो सप्ताह में पेट की मशीन को आराम देना ही इसका मुख्य कारण है। नवरात्र सर्दी से गर्मी तथा गर्मी से सर्दी की ओर जाने का संधिकाल है। इसमें नौ दिन पेट को पूर्ण या अर्ध विश्राम देना उचित रहता है। जैसे किसी भी मशीन या वाहन की एक निश्चित समय के बाद धुलाई और सफाई कर उसमें तेल, ग्रीस आदि लगाया जाता है, बिल्कुल वैसे ही यह उपवास हैं।

कुछ लोग व्रत-उपवास के समय अन्न तो नहीं खाते; पर दिन में कई बार दूध, फल, मेवे या मिठाई खाकर सामान्य दिनों से अधिक कैलोरी ले लेते हैं। वस्तुतः यह उपवास की भावना का अपमान है। अच्छा तो यह है कि भोजन में जितना समय लगता है, उपवास वाले दिन उसे बचाकर प्रभु भजन या समाज सेवा में लगायें। भोजन न करने से जो अन्न या धन बचे, उसे भी किसी निर्धन को अर्पित कर दें। कुछ संत लोग इसे ही व्रत का सही अर्थ बताते हैं।

व्रत-उपवास वाले दिन व्यक्ति शारीरिक व मानसिक शुद्धता का भी विशेष ध्यान रखता है। वह प्रातः जल्दी उठकर स्नान, ध्यान, पूजा आदि करता है। लोग उस दिन प्याज, लहसुन, मांसाहार या शराब आदि से भी परहेज करते हैं। इसका साफ अर्थ है कि वे इसे गलत मानते हैं; पर किसी कारण छोड़ नहीं पाते। अर्थात उपवास का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से गहरा संबंध है।

पर रोजे के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। पहली बात तो रोजा किसी निश्चित मौसम में नहीं होता। अवैज्ञानिक कालगणना वाला इस्लामी कैलेंडर दस महीने का होने से रोजे कभी सर्दी, तो कभी गर्मी या वर्षा में पड़ जाते हैं। फिर सुबह से शाम तक निर्जल-निराहार रहकर शेष समय खाते ही रहना, यह स्वास्थ्य के लिए कैसे लाभकारी है ?

सूर्यास्त के बाद शरीर शिथिल पड़ जाता है। इसलिए प्रायः रात में भारी भोजन के लिए चिकित्सक मना करते हैं; पर यहां तो रात में ही तेज मिर्च, मसाले वाला अति गरिष्ठ भोजन खाते हैं। सूर्योदय से पहले आधी-अधूरी नींद में उठकर बिना शौच, कुल्ला, मंजन और स्नान किये, भूख न होते हुए भी जबरन कुछ खाना स्वास्थ्य के लिए कैसे हितकारी है ? कई बार तो रोजे के प्रारम्भ या समाप्ति पर एक ही थाली, चम्मच या गिलास से कई लोग खा-पी लेते हैं। यह किस चिकित्सा विज्ञान में सही बताया गया है ?

एक बात पर और विचार करें। जब कोई व्यक्ति रात में देर तक जागकर खाता रहेगा, तो स्वाभाविक रूप से वह सुबह देर तक सोएगा। भले ही सुबह की नमाज पढ़कर सोते हों; पर यह है तो प्राकृतिक नियमों के प्रतिकूल ही। इसीलिए मुस्लिम मोहल्लों में इन दिनों बाजार भी दोपहर में ही खुल पाते हैं। जब बड़े लोग रात में देर तक जगेंगे, महिलाएं देर रात तक रसोई में व्यस्त रहेंगी, तो उस खटपट में छोटे शिशु भी ठीक से नहीं सो पाते। इस अप्राकृतिक दिनचर्या से छात्रों को भी बहुत कठिनाई हो जाती है। इसीलिए रमजान के बाद कई दिन तक रोजे रखने वाले लोग पेट संबंधी रोगों से परेशान रहते हैं।

इसलिए कोई रोजे रखे या न रखे; पहला और अंतिम रखे या पूरे 30; कोई दिन में खुलेआम खाए या छिपकर; कोई इसे अध्यात्म से जोड़े या किसी ऐतिहासिक घटना से, यह अलग बात है; पर इसे स्वास्थ्य सुधार और शरीर शुद्धि से जोड़ना बिल्कुल गलत है।